Uttar Pradesh

उत्तर प्रदेश

  • वाराणसी में बाँध निर्माण की वजह से कछुओं पर जीवन संकट

    कछुवे नदी के कूड़े को खाकर नदी को स्वच्छ बनाने में मददगार साबित होते हैं .जल मार्ग विकास परियोजना से गंगा नदी को साफ़ करने वाले इन इन कछुवों का अस्तित्व

  • हरिद्वारअंग्रेज 1917 में हरिद्वार के भीमगौडा में गंगा के ऊपर बाँध निर्माण करना चाह रहे थे जिसके विरोध में मदन मोहन मालवीय जी ने आन्दोलन किया था. ऊपर दिए गए चित्र में दिखाई गई उत्तरी चैनल से अंग्रेज एक नहर के माध्यम से पानी निकालना चाहते थे. इस उद्देश्य के लिए वे एक बैराज बनाना चाहते थे. मालवीय जी ने इस परियोजना का विरोध करते हुए कहा कि बराज के पीछे एक जलाशय बनेगा जिसमे से निकला पानी शुद्ध नहीं होगा क्योंकि यह बराज के पीछे रुका  रहेगा. मालवीय जी के विरोध करने के पश्चात ब्रिटिश सरकार ने माना कि उत्तरी चैनल से पानी बिना किसी फाटक के निकाला जाएगा. नीचे की तस्वीर में देखा जा सकता है की उत्तरी चैनल में कोई बराज नहीं बनाया गया. बराज नीचे बनाया गया था. मालवीय जी से हुए समझौते के अंतर्गत गंगा से हर की पौड़ी तक पानी के रास्ते में कोई अवरोध नहीं बनाया गया था. गंगा का अविरल पानी हर की पौड़ी में पहुँचता था जैसा कि नीचे की तस्वीर में दिखाया गया है.

    गूगल अर्थ से फोटो: चैनल के माध्यम से गंगा

    अंग्रेजो के बीच जो समझौता हुआ था उसमें यह भी बताया गया है कि " हिंदू समुदाय के साथ पूर्व विचार-विमर्श के बिना कोई कदम नहीं लिया जाएगा" हिंदू समुदाय के वरिष्ठ प्रतिनिधि चार शंकराचार्य हैं. सभी शंकराचार्यों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि गंगा पर कोई बैराज नहीं बनाया जाना चाहिए. शंकराचार्यों द्वारा दिए गए वक्तव्य यहां रखे गए हैं: श्री भारती तीरथ जी , निश्चलानंद जी  और स्वरुपानंद जी.  समझौते की प्रतिलिपि नीचे दी गई है और आयोजित समझौते का विस्तृत अध्ययन यहां संलग्न है. 

    भारत सरकार ने 1917 समझौते के दो बड़े उल्लंघन किए हैं. एक,उसने टिहरी और श्रीनगर जैसे कई बांध बनाये हैं जिसने गंगा को स्थिर जलाशयों में बदल दिया है. यह 1917 के समझौते के विपरीत है जिसने जोर देकर कहा कि गंगा का पानी जलाशयों में जमा नहीं होना चाहिए. दूसरा,इस समझौते में की गयी व्यवस्था के अनुसार बराज बनाने से पहले हिंदू समुदाय के साथ परामर्श नहीं किया गया है. जब अंग्रेज गंगा की महता को समझ सकते हैं तो हमारी अपनी  सरकारें क्यों नहीं समझती ? हम प्रधान मंत्री मोदी जी से अनुरोध करते हैं कि 1917 के मदन मोहन मालवीय के समझौते को सरकार द्वारा लागू किया जाना चाहिए. गंगा के अविरल अप्रवाह को वाधित करने वाली सभी योजनाओ को हटाया जाए जिनमे टिहरी, चीला, भीमगौड़ा शामिल हैं. गंगा नदी पर बांधों के निर्माण को पूर्णतया बंद करना चाहिए जैसा शंकराचार्यों द्वारा घोषित किया गया है.


     

  • वर्तमान में नरोरा के नीचे गंगा में गंगा नदी का पानी नहीं है. हरिद्वार में भीमगौड़ा बराज से गंगा का लगभग पूरा पानी सिंचाई के लिए निकाल दिया जाता है. भीमगौड़ा बराज के बाद नदी का पानी लगभग सूख जाता है.

  • Post By: Shripad Dharmadhikari & Jinda Sandbhor
    राष्ट्रीय जलमार्ग को दर्शाता नक्शा (वाराणसी) फोटो साभार: जिंदा सिंधभोर

    उत्तर प्रदेश में वाराणसी जलमार्ग का केंद्र बनने जा रहा है क्योंकि यहाँ चार नदियाँ आपस फैली हुई है. वाराणसी में चार जलमार्गो को भरत सरकार ने राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया है, जो की नुक्सानदेह हैं.

  • गंगा में स्नान करते श्रद्धालु (फोटो साभार: विकिमीडिया)

    राम नवमी के अवसर पर भक्तों ने गंगा नदी में पवित्र डुबकी लगाई लेकिन गंगा में डुबकी लगाने के लिए पर्याप्त पानी नहीं है.

  • हाल ही में NGT ने गंगा की सुरक्षा को देखते हुए यह फैसला दिया है कि गंगा के तटों का सीमांकन किया जायेगा. इस फैसले के तहत NGT ने गंगा की सुरक्षा के तहत हर जिले में गंगा के तटों में 200 मीटर के दायरे में कोई भी निर्माण कार्य (पुल, भवन, खनन इत्यादि) नहीं होगा और 500 मीटर के दायरे में कोई भी प्रदुषण नहीं फैलाया जायेगा.

    नदी में बाड़ के दौरान नदी में जलमग्न भवन (फोटो साभार: गंगा टुडे टीम)
  • कुछ फसलों की पैदावार के लिए अत्यधिक पानी की आवश्यकता होती है (फोटो साभार: वेमेंकोव, विकिमीडिया)
    जिन फसलों को अत्यधिक पानी की आवश्यकता होती है और उनमे सिंचाई के लिए गंगा के जल से पूर्ति की जाती है तो उन फसलों को तुरंत प्रतिबंधित कर देना चाइये.
  • गंगा जीर्णोधार मंत्रालय के नए मंत्री श्री नितिन गडकरी

     

    प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने माँ गंगा के पुनरुद्धार के लिए गंगा जीर्णोधार मंत्रालय की जिम्मेदारी उनके कर्मठ सहियोगी नितिन गडकरी को सौंपी है. देश को आशा है कि श्री गडकरी उसी तत्परता से गंगा की सफाई करेंगे  जिस तत्परता से उन्होंने देश में सड़कों का जाल बिछाया है.

  • rudolph A furtado

    गंगा नदी में खननकार्य (फोटो साभार: रुडोल्फ ए फुर्तादो)

     

    उत्तराखंड हाईकोर्ट ने गंगा के किनारे खनन पर लगी रोक को हटा दी है. नदी में खनन कार्य भी आवश्यक होता है क्यूंकि नदी में गाद निरंतर बहकर आती रहती है.

  • गंगोत्री में स्थित माँ गंगा का मंदिर (फोटो साभार: जीएनयू डॉक्स.विकिमीडिया)

     

    “His Holinesses welcomes the declaration of Government of India to name Holy Ganga as the National River” – By Jagadguru Sri Nischalanandji, Shankaracharya of Goverdhan Mutt,Puri

  •     कुछ विद्वानों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण भविष्य में वर्षा का वितरण कम होगा. उस समय बांधों में रोका गया पानी सिंचाई के लिए प्रयोग होगा अतः बड़े बांधों का बनना अनुपयोगी क्यों है?

    महानदी पर स्थित भाकड़ा नागल बाँध में वर्षा जल संरक्षण

    ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव

        दरअसल ग्लोबल वार्मिंग के कारण धरती का तापमानबढ़ेगा और वर्षा अधिक होगी. अरब सागर का तापमान बढ़ने से वाष्पीकरण अधिक होगा और भारत में पानी अधिक बरसेगा. अनुमान है कि 5 से 10 प्रतिशत अधिक पानी की वर्षा हो सकती है. लेकिन जो वर्षा वर्तमान में चार महीने फैल कर होती है, वह ग्लोबल वार्मिंग के साथ-साथ कम दिनों में होगी जबकि पानी की मात्रा उतनी ही रहेगी. वर्षा कम दिनों में होने के साथ अधिक तेजी से गिरेगी. नीचे चित्र में वर्षा की 30 साल और 10 साल के वितरण को दर्शाया गया है (WWF की रिपोर्ट यहाँ मौजूद है). नीचे दिये ग्राफ में देखा जा सकता है कि 30 साल की औसत वर्षा में पानी चार महीनों में फैल कर बरसता था वह 10 साल में संकुचित हो गया है. जो इस बात का प्रमाण है की वर्षा कम दिनों में हो रही है.

        वर्षा के संकुचित होने का मतलब यह है कि पानी जब बरसेगा तो अत्यधिक तेजी से बरसेगा और जल्द ही नदियों के रास्ते समुद्र को चला जायेगा. अगर पानी धीरे-धीरे बरसता है तो वह भूमि में ज्यादा रिसता है और भूजल का पुनर्भरण होता है. पानी ज्यादा तेज़ी से बरस कर जल्द समुद्र में बह जाने के कारण पानी भूमि में कम रिसेगा और सिंचाई के लिए पानी कम मिलेगा. वर्तमान में भूमिगत जल का स्तर गिर रहा है. भविष्य में यह और तेजी से गिरेगा चूँकि रिसाव कम होगा. फलस्वरूप सिंचाई भी कम हो पायेगी. हमारे खाद्यानों के उत्पादन में भारी गिरावट आयेगी. प्रश्न यह है कि ग्लोबल वार्मिंग के इस विशाल परिवर्तन का हल टिहरी और भाकड़ा जैसे बड़े बांधों द्वारा निकल सकता है अथवा अन्य विकल्पों से ? हमें यह देखना होगा कि कम समय में अधिक बरसे पानी को बड़े बांधों में एकत्रित करके क्या हम अपनी सिंचाई की जरूरतों को पूरी कर सकते हैं?

     

    बड़े बांधो से समस्या

       हमारे आंकलन के अनुसार ऐसा नहीं होगा चूँकि पहली समस्या यह है कि ज्यादा वर्षा हमारे मैदानी इलाकों में होती है, न कि पहाड़ों में.  नीचे दिए गए आंकड़ों से हम उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में वर्षभर की औसत वर्षा को देख सकते हैं:

    उत्तराखंड - 53483 m2 (क्षेत्रफल)* 130.86cm (औसत वर्षा प्रति वर्ष)= 69, 98,000 घन मीटर

    उत्तर प्रदेश  - 243286m2 (क्षेत्रफल)* 156.3cm (औसत वर्षा प्रति वर्ष) = 3,80,25,000 घन मीटर

        ज्ञात हो कि जहाँ उत्तराखंड की कुल वर्षा का मात्र 35 लाख घन मीटर पानी का ही संचयन बड़े बांधों में हो सकता है वहीं उत्तर प्रदेश में 380 लाख घन मीटर पानी बरसता है. हम यह मान लें कि 69,98,000 घन मीटर पानी का आधा पानी उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में बने बांधों में संचयन संभव है. अतः वर्षा का आधा ही पानी बड़े बांधों में संचित होगा यानी कुल 34,99,000 घन मीटर पानी का ही संचयन हो पायेगा.

        ध्यान रहे कि बड़े बांधों से हम केवल पहाड़ में बरसे हुए पानी का भण्डारण कर सकते हैं. मैदानी क्षेत्रों में बरसे पानी का भंडारण पहाड़ी क्षेत्रों में बने बांधों में नहीं होता है. इसलिए पहाड़ में बरसे न्यून पानी के भण्डारण से मैदानी क्षेत्रों की ज्यादा जरूरत को पूरा नही किया जा सकता है. हमें मैदानी इलाकों में होने वाली वर्षा के जल को पुनर्भरण के लिए उपयोग करना ही पड़ेगा और वही हमें ग्लोबल वार्मिंग से छुटकारा दिला सकता है.

        दूसरी समस्या यह है कि हम जब पहाड़ी क्षेत्र के बरसात के पानी को बांधों में रोक लेते हैं तो मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ कम आती है. आम धारणा  यह है कि बाढ़ को सीमित करना जनहित का कार्य है. लेकिन इसका विपरीत प्रभाव भी पड़ता है. जब बाढ़ का पानी चारों तरफ फैलता है, तो मैदानी क्षेत्र में भूमिगत जल का पुनर्भरण होता है, जो कि जाड़े और गर्मियों के मौसम में ट्यूबवेल से निकालकर सिंचाई के काम आता है. अतः जब हम टिहरी जैसे बांधों में बरसात के पानी को रोक लेते हैं, तो मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ कम आती है और बाढ़ कम आने से भूमिगत जल का पुनर्भरण कम होता है और सिंचाई कम होती है. इस प्रकार बड़े बांधों द्वारा सिंचाई पर दो विपरीत प्रभाव पड़ते हैं. सकारात्मक प्रभाव यह होता है कि टिहरी जैसे बाँध में हम पानी रोक कर उसे जाड़े और गर्मियों में छोड़ते हैं जिससे मैदानी क्षेत्र में सिंचाई बढती है. दूसरी तरफ नकारात्मक प्रभाव यह है कि बांधों में पानी रोक लेने से पानी कम फैलता है, बाढ़ कम आती है जिससे मैदानी क्षेत्रों में जल का पुनर्भरण कम होता है और सिंचाई कम होती है. इन दोनों विरोधाभासी प्रभावों का अंतिम प्रभाव सकारात्मक नहीं दिखता. अभी तक का अनुभव है कि टिहरी बाँध के बनने के बाद भी मैदानी क्षेत्रों में भूमिगत जल का स्तर तेजी से गिर रहा है, जो यह दिखाता है की टिहरी जैसे बांधों से सिंचाई में जो वृद्धि हुई है, उसकी तुलना में भूमिगत जल के कम पुनर्भरण से सिंचाई में कटौती ज्यादा हुई है .

        बरसाती पानी को धरती में समाहित करना ही होगा  टिहरी डैम पर आश्रित रहना बड़ी भूल होगी . बाढ़ के पानी द्वारा भूजल पुनर्भरण का एक उत्तम उपाय पाइन (pyne) है. pyne व्यवस्था को हम नीचे दिए गए चित्रों से समझ सकते हैं:

    सामान्यतः नदी ऐसे बहती है:

    जब नदी में  पानी बढ़ता है तो उसे विशेष नहरों से बहाकर गाँव के तालाबों में एकत्रित कर लिया जाता है.

     

    जब नदी का पानी घट जाता है तब वह पानी तालाबों में टिका रहता है. इसके दो लाभ हैं एक ओर जल का रिसाव होगा और उससे भूजल पुनर्भरण होगा दूसरे  उस पानी का सिंचाई के लिए प्रयोग किया जा सकता है . ये तालाब हर तरह से उपयोगी हैं.

     

        पहाड़ों में बड़े बाँध बनाने की तीसरी समस्या गाद भरने की है. जैसा कि वैज्ञानिकों का अनुमान है कि टिहरी बाँध 130 से 170 वर्षों में गाद से भर जाएगा. जिसके बाद इस बाँध की वर्षा के जल भण्डारण की क्षमता शून्यप्राय हो जाएगी. जबकि अगले 100 वर्षों में ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव और अधिक गहराएगा. एक तरफ वर्षा के जल भण्डारण की जरुरत बढ़ेगी वहीं  दूसरी तरफ बांधों के जल संचयन की क्षमता घटेगी. अतः बांधों में जल संचयन अल्पकालीन माना जा सकता है. यह दीर्धकालीन हल नहीं होगा.

        हमारा मानना है कि बड़े बाँध असफल होंगे क्योंकि मैदानी क्षेत्रों की तुलना में उनका कैचमेंट कम है तथा समयक्रम में वे गाद से भर जायेंगे. अतः बांधों के माध्यम से ग्लोबल वार्मिंग का हल निकालना हमारी बड़ी भूल साबित होगी . ग्लोबल वार्मिंग का एकमात्र समाधान है की टिहरी जैसे बांधों को हटाकर इसमें संग्रहीत पानी को निर्बाध फैलने दिया जाय और इसके कारण उत्पन्न  हुई बाढ़  को धरती में समाने दिया जाय तथा मैदानी इलाकों में बाढ़ के इस पानी को पाइन जैसे उपायों से भूमिगत जल में रोका जाये. हमें अपने देश कि तालाब संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा.

     

    आपसे निवेदन है कि पोस्ट पढ़कर नीचे अपना कमेंट/सुझाव आवश्य दें.

  •  

    बाँध के नीचे से गाद निकालने के लिए इस प्रकार से फ्लशिंग की जाती है (फोटो साभार: गर्ट रिचर)

    टिहरी जैसे बाँध उपयुक्त नहीं

    हमारा मानना है कि टिहरी जैसे बड़े बाँध हमारे लिए अनुपयुक्त हैं क्योंकि ये टिकाऊ नहीं हैं. इनमे मुख्य समस्या यह है कि नदी पानी में अपने साथ गाद भी लेकर आती है और वह गाद बाँध में जमा हो जाती है. जब बाँध गाद से भर जाता है तो उसकी पानी को रोकने की क्षमता समाप्त हो जाती है, जैसे कि बाल्टी को यदि बालू से भर दिया जाय तो उसमे पानी नहीं रखा जा सकता है. दरअसल इस बालू और मिट्टी को ही हम गाद कहते हैं जो नदी के साथ बह कर आती है और यह अत्यधिक उपजाऊ होती है. किसान नदी के इस पानी को अपने खेतों में पूर्णतया फैलने देते हैं, जिससे कि यह गाद पूरी तरह से खेतों में फ़ैल जाए और फसल अच्छी हो सके. बाँध के पीछे गाद भरने की इस समस्या को बाँध निर्माता जानते हैं. इस समस्या के हल के लिए उनके द्वारा बाँध के जड़ पर कुछ गेट बनाये जाते हैं जिसको समय-समय पर खोल कर के पीछे भरी हुई गाद को फ्लश आउट यानी निकाल दिया जाता है.

    समस्या यह है कि इस प्रक्रिया से झील की पूरी गाद नहीं निकलती है. जैसे कि टिहरी झील में लगभग 45 किलोमीटर तक पानी भरा हुआ है जबकि, फ्लशिंग से जो गाद निकलती है वह लगभग एक या डेड किलोमीटर तक की निकलती है, जैसा कि नीचे दिए गए चित्र में दिखाया गया है.

    45 किलोमीटर बाँध की झील में केवल डेड किलोमीटर की दूरी तक यदि गाद निकल जाएगी तो  लगभग 43 किलोमीटर की गाद तो वैसे ही रह जायेगी. अतः धीरे धीरे गाद भरती जायेगी और झील की जल भण्डारण क्षमता ख़त्म हो जाएगी और बाँध लगभग अनुपयोगी हो जाएगा.

    बाँध का अध्ययन

    टिहरी हाइड्रो पावर कारपोरेशन ने इस समस्या के दो अध्ययन कराए हैं. पहला अध्ययन भारत की टोजो विकास इंटरनेशनल द्वारा किया गया है. इस अध्ययन में इस प्रकार विवरण दिया गया है:

    Progressive loss of storage due to sedimentation in different storage zones are assessed as under:

    Dead storage                       0.6% in 3yrs

    Live storage                          0.59% in 3 yrs

    Gross storage                      0.59% in 3 yrs

    बाँध की कुल क्षमता का कुछ हिस्सा ही उपयोग में आता है. नीचे के हिस्से में सतत पानी भरा रहता है जिसे डेड स्टोरेज कहते हैं. ऊपर का हिस्सा जिसमे गर्मियों और जाड़ों में पानी निकाल लिया जाता है और बरसात में पुन: पानी भर जाता है उसे लाइव स्टोरेज कहते हैं. टोजो कम्पनी के अनुसार तीन साल में लगभग 0.6 प्रतिशत लाइव स्टोरेज और डेड स्टोरेज कम हो गया है. यानी कि एक साल में 0.2 प्रतिशत स्टोरेज ख़त्म हो गया है. डेड स्टोरेज के भरने के सस्थ साथ लाइव स्टोरेज का भरना तेजी से होगा. लाइव स्टोरेज ख़त्म होने का अर्थ यह है कि भविष्य में इस क्षेत्र में बाँध की जल ग्रहण करने की क्षमता ख़त्म हो जाएगी. यदि फ्लशिंग से पूरी गाद निकल गयी होती तो लाइव स्टोरेज में इस प्रकार की कमी नहीं आती. टोजो कंपनी नें अपनी रिपोर्ट में कहा है कि टिहरी बाँध का उपयोगी कार्यकाल लगभग 130 वर्ष होगा. (टोजो कंपनी की रिपोर्ट यहाँ देख सकते हैं):'

    "keeping in view the above calculation by methods defined in the CBIP manual on the reservoir, the useful life of the reservoir can be taken safely as 130 years."

    दूसरा अध्ययन IRI  रूड़की के हाईड्रोलिक डिज़ाइनर श्री ए सी पांडे द्वारा कराया गया है. इसके भी परिणाम लगभग वैसे ही हैं. श्री पांडे के अनुसार टिहरी बाँध में डेड स्टोरेज लगभग 170 साल में पूरी तरह भर जाएगा. पानी भंडारण की पूरी क्षमता 465 वर्षों में शून्य हो जाएगी. (श्री पांडे द्वारा किया गया टिहरी बाँध पर विस्तृत सर्वे यहाँ पर देख सकते हैं)

    बाँध के पूरी तरह से भरने के बाद पानी ऊपरी सतह से होते हुए निकल जायेगा जैसा कि हम नीचे दिए गए चित्र में देख सकते हैं.

    अतः दोनों अध्ययनों के अनुसार डेड स्टोरेज यानी कि नीचे का हिस्सा 130 से 170 सालों में भर जाएगा. उसके बाद टिहरी बाँध की जल भंडारण की क्षमता क्रमशः कम होती चली जाएगी. लगभग 200 से 300 वर्षों में टिहरी बाँध पूरी तरह गाद से भर जाएगा और इसमें एक बूँद पानी भी नहीं टिक सकेगा.

    प्रश्न यह है कि जब हम देश में विकास की बात कर रहे हैं तो केवल दो सौ या तीन सौ साल के अल्पकालिक विकास की क्यों? इस अल्पकालिक समय के लिए इन बड़े बांधों का निर्माण रोक देना चाहिए जो कि मनुष्य और प्रकृति को नज़रंदाज़ करते हुए बनाये जा रहे हैं.

     

    इस विषय पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को लिखें.इस विषय पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को लिखें.

  • पोस्ट: हिंदुस्तान टाइम्स द्वारा डॉ भरत झुनझुनवाला

    भागलपुर के निकट गंगा को गंगा डॉल्फिन के संरक्षण के लिए वन्यजीव अभ्यारण्य घोषित किया गया है. इस जानवर में आँखें नहीं होती हैं यह अन्य समुद्री जीवों की ध्वनि वातावरण द्वारा विचरण करता है और अपने शिकार को पकड़ता है.

    बीते दिनों में, केंद्र ने राष्ट्रीय जलमार्ग -1 (एनडब्ल्यू -1) के हल्दिया-वाराणसी पर बढ़ते नेविगेशन के लिए 5,369 करोड़ रुपये जल विकास मार्ग परियोजना को मंजूरी दे दी. इस परियोजना की 2023 तक पूरा होने की उम्मीद है. केंद्र सरकार के अनुसार तब परिवहन का एक वैकल्पिक तरीका उपलब्ध होगा जो कि पर्यावरण के अनुकूल होगा और लागत कम आएगी. यह आर्थिक आकलन  केवल बार्जेस चलाने और टर्मिनलों को बनाए रखने की लागत का संज्ञान लेता है. किन्तु यह समाज पर लगाए गए पर्यावरणीय लागतों के मौद्रिक मूल्य का संज्ञान नहीं लेता है.

     

    जलमार्ग परियोजना के पर्यावरणीय दुष्प्रभाव

    यदि पर्यावरण के नुकसान का आर्थिक मूल्य जोड़ दिया जाये तो हमारे आंकलन में यह परियोजना लाभप्रद नहीं रह जायेगी. जलमार्ग परियोजना के निम्नलिखित पर्यावरणीय दुष्प्रभाव के केंद्रसरकार ने अनदेखी की है.

    पहला दुष्प्रभाव जलमार्ग के लिए की गयी ड्रेजिंग का पड़ता है. गंगा नदी छिछले तालाबों और उथले क्षेत्रों पर फैली हुई बहती है। मछली और कछुए इन उथले क्षेत्रों में अंडे देते हैं। लेकिन ड्रेजिंग से नदी का बहाव एक गहरे चैनल में सीमित कर दिया गया है. अब उथले इलाकों में मछली और कछुए के निवास स्थान को नष्ट कर दिया गया है.

    जलमार्ग का दूसरा प्रभाव जहाज़ों के कछुओ पर अघात से पड़ता है. जब जहाज चलते हैं तो कछुए उनके रास्ते से भाग नहीं पाते क्योंकि वे धीरे धीरे चलते हैं, और चोटिल हो जाते हैं.  वाराणसी के निकट गंगा में कछुआ अभयारण्य स्थापित किया गया है. अन्य देशों में अध्ययन से संकेत मिलता है कि बड़ी संख्या में नावों से कछुओं का शिकार होता है.

    जलमार्ग का तीसरा दुष्प्रभाव जहाजों के चलने से निकली आवाज से होता है.भागलपुर के निकट गंगा में डॉल्फिन के संरक्षण के लिए  वन्यजीव अभ्यारण्य घोषित किया गया है. इस जानवर में आँखें नहीं होती हैं. यह जानवर अन्य समुद्री जीवों की आवाजाही के द्वारा उत्पन्न ध्वनि से ही अपना शिकार पकड़ता है. बड़े बार्जेस के चलते इस क्षेत्र में ऊंची ध्वनि पैदा होगी जिससे उनके लिए शिकार को पकड़ना मुश्किल हो जाएगा.

    जलमार्ग का चौथा दुष्प्रभाव प्रदुषण में वृद्धि का होगा.जहाजों और बार्जेस पर लगा पेंट भी पानी दूषित करता है। जहाजों द्वारा छोड़े गए कार्बन डाइऑक्साइड को नदी द्वारा निकटता की वजह से अधिक सोखा जाएगा और यह नदी को प्रदूषित करेगा.

    अमेरिका स्थित एग्रीकल्चर एंड ट्रेड पालिसी इंस्टिट्यूट द्वारा एक रिपोर्ट में कहा गया है कि मिसिसिपी जलमार्ग केवल इसलिए किफायती है क्योंकि इस पर टैक्स वसूला जाता है जबकि रेल और सड़क परिवहन से टैक्स वसूला जाता है. एनडब्ल्यू -1 इससे भिन्न नहीं होगा. पर्यावरण के नुक्सान के मूल्य को जोड़ लिया जाय तो यह देश के लिए अत्यधिक नुकसानदेह सिद्ध होगा.

     

    इस विषय पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को लिखें

     

  • चित्र 1: अयोध्या में वर्तमान बाबरी मस्जिद व प्रस्तावित राम मंदिर का मॉडल

    वर्तमान सरकार का एक प्रमुख राजनैतिक मुद्दा अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण करना है.सरकार के इस संकल्प के पीछे मान्यता यह है कि जिस स्थान पर भगवान श्रीराम का जन्म हुआ है उसी स्थान पर भगवान् राम का मंदिर बनाया  जाये क्योंकि वह स्थान हिन्दुओं की आस्था का प्रतीक है अतः मंदिर गर्भगृह के मूल स्थान पर ही बनना चाहिए.

    लेकिन दूसरे स्थानों पर सरकार मंदिरों को उसी स्थान पर बनाये रखने के विरूद्ध कार्य कर रही है. उत्तराखंड में अलकनंदा के तट पर विशाल चट्टान पर धारी देवी का मंदिर स्थित था. जिसका मूल चित्र नीचे दिया जा रहा है.

    चित्र 2: उत्तराखंड के श्रीनगर में स्थित माँ धारी का प्राचीन मंदिर

    धारी मंदिर की मान्यता

    वर्तमान में इस मूल शिला का नामोनिशान भी नहीं बचा है. दरअसल यहाँ श्रीनगर जलविद्युत परियोजना बनाने के कारण झील बनी और मंदिर की शिला को झील में डुबा दिया गया. वर्तमान में उसी स्थान पर खम्बों पर एक नया मंदिर बना कर के धारी देवी की प्रतिमा को नीचे से उठा कर नए मंदिर में स्थापित कर दिया गया है. इस बांध को 2014 में भाजपा सरकार के केंद्र सत्ता में आने के बाद चालू किया गया था (फोटो 3). भाजपा चाहती तो जन भावनाओं का सम्मान करते हुए इसे रोक सकती थी पर सरकार नें ऐसा नहीं किया.

    चित्र 3: धारी देवी का नवीन मंदिर

    मान्यता है कि देवी की प्रतिमा जिसे ऊपर स्थापित किया गया है,वह  केदारनाथ के समीप स्थित कालीमठ से बह कर इस स्थान पर आई थी और इसे उठाकर मूल शिला पर स्थापित किया गया था. मूल महत्त्व उस शिला का है जिस पर माँ धारी की प्रतिमा को स्थापित किया गया था. आज उस शिला को पानी में डुबा दिया गया है और उसे ऊपर नहीं उठाया गया ह, अर्थात धारी मंदिर की जिस शिला की मूल रूप से पूजा होती थी उसको डुबाने के लिए भाजपा सरकार ने अपनी सहमति दी है.

    एक तरफ सरकार अयोध्या में राम जन्मभूमि के स्थान पर मंदिर बनाने के लिए पूरे देश में आन्दोलन चला रही है. दूसरी तरफ धारी शिला को डुबाने को तैयार है. कारण यह दीखता है कि धारी शिला के सन्दर्भ में कमर्शियल इंटरेस्ट हावी है. धारी शिला को डुबाने वाली जलविद्युत परियोजना को हैदराबाद की जी.वी.के. कंपनी द्वारा बनाया गया है. जी.वी.के. कंपनी के वाणिज्यिक स्वार्थों की रक्षा के लिए भाजपा ने धारी शिला को डुबा दिया है.

    यहाँ पर हम स्पष्ट करना चाहेंगे कि विषय बिजली के उत्पादन का नहीं है क्योंकि बिजली उत्पादन के लिए  अनेकों सौर ऊर्जा के जैसे विकल्प मौजूद हैं किन्तु धारी शिला का विकल्प नहीं है, अतः धारी शिला को डुबाना मूलतः जी.वी.के. कंपनी के कमर्शियल इंटरेस्ट को बढ़ाने के लिए किया गया है जिससे कि जनभावनाओं की अनदेखी हुई है और जो अनुचित है.

    अब भाजपा की नजर कालीमठ मंदिर पर है. यह मंदिर कालीगंगा के तट पर स्थित है.

    चित्र 4: गूगल अर्थ द्वारा कालीमठ का दृश्य

    मान्यता है कि गंगा नदी देवप्रयाग में अस्तित्व में आती है. देवप्रयाग में भागीरथी और अलकनंदा नदी का संगम होता है. अलकनंदा की एक सहायक नदी मन्दाकिनी है, और मन्दाकिनी की एक सहायक नदी कालीगंगा है.कालीगंगा का विडियो आप यहाँ पर देख सकते हैं.

     

    कालीगंगा पर कालीमठ

    कालीगंगा नदी के तट पर कालीमठ सिद्धपीठ स्थित है. मान्यता है कि कालीमठ में देवी माँ काली का अवतार हुआ था, और इस स्थान पर उन्होंने रक्तबीज राक्षस का वध किया था. मूल स्थान पर एक दिव्य कुण्ड है. कुण्ड के ऊपर चांदी का ढ़क्कन लगा हुआ है. मान्यता है कि माँ काली रक्तबीज का वध करने के बाद कुंड में समा गई थी. कालीमठ में कालीकुंड की स्थिति नीचे साफ़ देखी जा सकती है.

    चित्र 5: कालीमठ में स्थित देवी कुंड जहाँ पर देवी समा गई थी

    उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने जन भावनाओं की अनदेखी करके योजना बनायी है कि कालीगंगा को एक टनल में डाल दिया जाये और कालीमठ के नीचे इसे पाइपों के माध्यम से पॉवर हाउस तक ले जाया जाये. वहां पर इस पानी से बिजली बनाकर वापस कालीगंगा में डाल दिया जाये. नीचे हम उस पाइप का चित्र दे रहे हैं जिसके माध्यम से यह पानी पॉवर हाउस तक जायेगा और आस पास पड़े उपकरणों का चित्र दे रहे हैं जो कि इस स्थान पर पॉवर हाउस निर्माण में काम आयेंगे.

    चित्र 6: कालीगंगा पर निर्माणाधीन बाँध कार्य

    इस प्रोजेक्ट के बनने के बाद काली गंगा मृतप्राय हो जाएगी. नीचे दिए गए चित्र से समझा जा सकता है जैसे कि विष्णुप्रयाग बाँध बनने के बाद अलकनंदा का पानी बिकुल सूख चुका है. इसी प्रकार से कालीमठ के सामने कालीगंगा भी टनल में डाले जाने के बाद सूख जाएगी. कालीगंगा के सूख जाने से कालीमठ के मंदिर का सौन्दर्य भी जाता रहेगा.

    चित्र 7: विष्णुप्रयाग में जलविद्युत परियोजना के बाद अलकनंदा नदी की स्थिति

    एक तरफ भाजपा राम मंदिर को उसी जगह बनाने के लिए पूरे देश में आन्दोलन छेड़ रही है और दूसरी तरफ धारी शिला को पानी में डुबा दिया है और कालीमठ की कालीगंगा को सुखाने के लिए प्रयासरत है. इस विरोधाभास से भाजपा सरकार को उबरना चाहिए. जिस प्रकार भाजपा को राम जन्मभूमि का महत्व दिखता है उसी प्रकार से अन्य मंदिरों और नदियों को जलविद्युत परियोजनाओं से बचाना चाहिए.

     

    वेब्साईट समर्थित द्वारा : डॉ. भरत झुनझुनवाला, स्वामी शांतिधर्मानंद, देबादित्यो सिन्हा, विमल भाई.

    पोस्ट लिखित द्वारा : अशोक रावत

     

     इस विषय पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को लिखें   

     

      

  • पशुओं का मनुष्य जीवन में अहम् योगदान है. अगर हम इतिहास से लेकर अब तक देखें तो हम पाते हैं कि मनुष्य नें पशुओं को किसी न किसी तरह उपयोग में लिया है. लेकिन आज वे ही पशु जो मनुष्य जीवन के साथ साथ चला करते थे आज मनुष्य की आवश्यकताओं के अनुसार विलुप्ति की कगार पर पहुँच रहे हैं. पशुओं की इस विलुप्ति के कारण भारत सरकार नें पशुओं को संरक्षण तो दिया है किन्तु अनावश्यक पशुओं का संरक्षण ही आज स्वयं मनुष्य को नुक्सान पहुंचा रहा है.

    संरक्षण के प्रति सरकार की नीति:

    सरकार ने शेर के संरक्षण के लिए कई कदम उठाये हैं जैसे कि जिम कॉर्बेट और गिर नेशनल पार्क बनाये हैं. शेर आज संकटग्रस्त प्रजाति है. अतः उसके संरक्षण का स्वागत है. इसी क्रम में सुअर और बन्दर को भी संरक्षण दिया जा रहा है. लेकिन शेर और इनकी परिस्थिति में मौलिक अंतर है. शेर मनुष्य को हानि कम पहुंचा रहा है जबकि सूअर और बंदर सृष्टि के लिए हानिप्रद हो गए हैं. इनके द्वारा फसल नष्ट करने से अनाज का उत्पादन कम हो रहा है और मनुष्य का अस्तित्व संकट में पढ़ रहा है. इन पशुओं को संरक्षण देने से सृष्टि की हानि हो रही है.

    मछलियों के प्रति कोई संरक्षण नहीं:

    हमारे देश में तमाम प्रकार की मछलियां हैं. तटीय क्षेत्र की श्रेष्ठ मछली हिलसा है और पहाड़ी क्षेत्र की श्रेष्ठ मछली माहसीर है. ये दोनों मछलियाँ अंडे देने के लिए नीचे से ऊपर को पलायन करती हैं. ऊपरी क्षेत्र में दिए गए अंडे जब छोटी मछलियों का आकार ले लेती हैं तब यह नीचे बहते हुए पहुचते हैं और नीचे बड़े होते हैं. यह पलायन इनके जीवन का एक अहम हिस्सा होता है. सरकार नें फरक्का बराज बनाकर हिलसा के पलायन को अवरुद्ध कर दिया है और आज हिलसा का जीवन संकट में है. उत्तराखंड के पहाड़ों में चीला, श्रीनगर, टिहरी आदि बाँध बनाकर माहसीर के पलायन को अवरुद्ध कर दिया है जिसके कारण जो माहसीर 80 से 100 किलोग्राम के वजन में पायी जाती थी अब मात्र 1 किलोग्राम वजन में ही रह गयी है.

    शेर की तुलना में मछली का संरक्षण ज्यादा जरुरी है क्योंकि यह नदी के पानी को स्वच्छ रखने में मददगार होती है. मछलियाँ नदी में आने वाले आर्गेनिक कूड़े को खाकर पानी को साफ़ कर देती है. सरकार ने गंगा को स्वच्छ करने का जो सराहनीय संकल्प लिया है उसके लिए जरुरी है कि मछलियों का संरक्षण किया जाय. लेकिन फरक्का बराज बनाकर और हाइड्रोपावर को बढ़ावा देकर सरकार उसी मछली को विलुप्त कर रही है जो कि मनुष्य के लिए लाभप्रद है.

    शेर, बन्दर और मछली का 5 बिन्दुओ पर तुलनात्मक अध्ययन:

    • पर्यावरण: पर्यावरण की दृष्टि से बन्दर और शेर का कोई लाभ नहीं है किन्तु नदियों और समुद्रों में जल को साफ़ रखने के लिए मछलियों का महत्वपूर्ण योगदान है, अतः मछलियाँ पर्यावरण की दृष्टि से लाभकारी हैं.
    • आर्थिक: बंदरों और शेरों का विशेष आर्थिक योगदान नहीं है. बल्कि फसल को नष्ट करके बन्दर आर्थिक हानि पंहुचा रहे हैं. किन्तु आर्थिक विकास में मछली के व्यवसाय का सार्थक प्रभाव होता है.
    • मनोरंजन: सौन्दर्य और फोटोग्राफी की दृष्टि से बंदरों का ज्यादा महत्त्व नहीं दिखता है जबकि शेर और मछलियों का अधिक महत्त्व होता है. तमाम पर्यटक डालफिन जैसी मछलियों एवं शेर को देखने को उत्सुक रहते हैं.
    • जीन संरक्षण: बंदरों के जीन संरक्षण की जरुरत नहीं है जबकि शेर और मछलियों का जीन संरक्षण करना जरुरी होता है.
    • सामाजिक प्रभाव: बंदरों का समाज में नकारात्मक महत्त्व है, शेर का सामाजिक महत्व शुन्य है, लेकिन मछलियों का बड़ा सामाजिक महत्त्व होता है. बहुत से लोग मछलियाँ पकड़ कर अपनी जीविका चलाते हैं.

    इस तुलनात्मक अध्ययन को हम सारणी क्रम में नीचे देख सकते हैं:

     तुलनात्मक अध्ययन  बन्दर  शेर  मछली
     पर्यावरण  × ×
     आर्थिक प्रभाव  × ×
     मनोरंजन ×  
     जीनपूल ×
     सामाजिक महत्त्व × ×

    उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि मछली को संरक्षण देना सबसे ज्यादा जरुरी है जबकि बन्दर को नुकसानदेह सरकार नें शेर को संरक्षण दिया है हम उसका स्वागत करते हैं. किन्तु प्रश्न है कि मछलियाँ, जो कि हमारे लिए हर प्रकार से लाभप्रद है, उन्हें हम क्यों मार रहे हैं और बन्दर और सुअर जो कि हमारे लिए अनुपयुक्त हैं उन्हें हम क्यों बचा रहे हैं? हम मनुष्य के विकास पर दोहरी मार अनायास ही क्यों मार रहे हैं?

    बंदर जैसे अनुपयुक्त पशुओं का किसानो को शिकार करने की छूट देनी चाहिए जिससे कि वे अपनी फसल को बर्बाद होने से बचा सकें. साथ ही पहाड़ों में जलविद्युत परियोजनाओं को हटाकर मछलियों का संरक्षण करना चाहिए.

     

    इस विषय पर प्रधानमंत्री जी को लिखें

     

  • सरकार द्वारा “नमामि गंगे” कार्यक्रम चलाया जा रहा है जिसके तीन मुख्य बिंदु हैं. पहला, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाकर गंदे पानी की सफाई करना. दूसरा, नदी में पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित करना तथा तीसरा, खेती में उपयोगिता सुधार कर पानी की मांग को कम करना. इसके सामानांतर चल रहे “रैली ऑफ़ रिवर्स” द्वारा पेड़ लगाकर नदी के संरक्षण की बात की जा रही है. इन सभी मंतव्यों का स्वागत है. लेकिन नदियों की मुख्य समस्याओं को इनके द्वारा नज़रंदाज़ किया गया है. (नमामि गंगे और रैली फॉर रिवर्स के वक्तव्य देखें)

    पहली समस्या नदी में प्रदूषण की है. “नमामि गंगे” के अनुसार सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों को प्राइवेट पार्टियों के सहियोग से लगाया जायेगा. लेकिन समस्या यह है कि वर्त्तमान में लगे हुए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट ही नहीं चल पा रहे हैं क्योंकि नगरपालिकाओं को इन्हें चलाने में खर्च ज्यादा आता है. अतः नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लग भी जाएँ तो ये भी नहीं चलेंगे क्योंकि इन्हें चलाने में भी नगरपालिकाओं की रूचि नहीं होगी. सही उपाय यह है कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से निकले साफ़ पानी को केंद्र सरकार खरीदे और किसानों को सिंचाई के लिए उपलब्ध कराये. तब प्राइवेट पार्टियों को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट चलाने में लाभ होगा. जिस प्रकार प्राइवेट पार्टियां थर्मल प्लांट लगाकर बिजली बोर्डों को बिजली की सप्लाई कर रही हैं उसी प्रकार प्राइवेट पार्टियां सिवेज को साफ़ करके साफ़ पानी को राज्यों के सिंचाई विभाग को उपलब्ध करा सकती हैं. चूंकि साफ़ पानी के खरीद की कोई योजना नहीं है इसलिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की योजना फेल होगी.

    “नमामि गंगे” का दूसरा बिंदु है कि प्रदूषण फ़ैलाने वाले पुराने उद्योगों को बंद किया जायेगा और नए उद्योगों के लिए नयी नीति बनाई जायेगी. लेकिन नीति क्या बनाई जायेगी इसकी स्पष्टता नहीं है. देश की जानी मानी IITs द्वारा बनाये गए गंगा संरक्षण के प्रोग्राम में सुझाव दिया गया है कि सरकार को सभी उद्योगों को “जीरो लिक्विड डिस्चार्ज” की पालिसी पर लाना चाहिए. उन्हें इस बात पर मजबूर करना चाहिए कि पानी को बार बार साफ़ करके उपयोग करते रहें जब तक कि वह ख़त्म न हो जाये. एक बूंद भी पानी का भी वे निस्तारण न करें. लेकिन जीरो लिक्विड डिस्चार्ज के प्रति “नमामि गंगे” मौन है. इसलिए राज्यों के प्रदूषण बोर्डों और उद्योगों की मिलीभगत से गन्दा पानी निकलता रहेगा और पुरानी कहानी जारी रहेगी.

    “रैली ऑफ़ रिवर्स” का कहना है कि पेड़ लगाने से पानी की गुणवत्ता में सुधर आएगा. यह बात सही है लेकिन पर्याप्त नहीं है. “रैली ऑफ़ रिवर्स” का कार्यक्रम नदियों के किनारे दोनों तरफ एक किलोमीटर तक पेड़ लगाने का है. अगर हम गंगा बेसिन को लें तो लगभग 15,000 वर्ग किलोमीटर भूमि में पेड़ लगेंगे. लेकिन यह पूरे क्षेत्र की तुलना में ऊंट के मुह में जीरा जैसा है. उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल में राज्यों का कुल क्षेत्रफल 484,000 वर्ग किलोमीटर है. इसलिए कुल क्षेत्र के केवल 3 प्रतिशत भूमि में वनीकरण होगा. पानी की गुणवत्ता में मामूली सा ही सुधर होगा. इसलिए “नमामि गंगे” और “रैली फॉर रिवर्स” द्वारा नदियों को साफ़ करने का प्रयास फेल होगा.

    तीसरा बिंदु नदी के बहाव का है. दोनों कार्यक्रमों का कहना है कि पेड़ लगाने से नदी के जलस्तर में वृद्धि होगी. यह बात सही है. वर्षा का पानी पेड़ों की जड़ों से जमीन के अन्दर समा जाता है और जब नदी का जलस्तर कम होता है तो वह बगल की जमीन से नदी में बहकर नदी को पुनर्जीवित करता है.  लेकिन पुनः प्रश्न वही है कि केवल 3 प्रतिशत भूमि में वनीकरण भी भी ऊंट के मुह में जीरा होगा.

    “नमामि गंगे” ने यह भी कहा है कि पर्यावरणीय प्रवाह को सुनिश्त किया जायेगा. लेकिन वर्त्तमान एनडीए सरकार के चार वर्ष बीत चुके हैं और नेशनल ग्रीन ट्रेबुनल (NGT) द्वारा आदेश दिए जाने के बावजूद सरकार नें जल विद्युत परियोजनाओं और सिंचाई परियोजनाओं से पर्यावरणीय प्रवाह छोड़ने को तनिक भी कदम नहीं उठाया है.

    “नमामि गंगे” ने कहा है कि सिंचाई की गुणवत्ता सुधारने का काम किया जायेगा. उतने ही पानी से अधिक क्षेत्र में सिंचाई करने का प्रयास किया जायेगा. यह मंतव्य बिलकुल सही है, लेकिन इससे सिंचाई का क्षेत्रफल बढेगा न कि पानी की मांग घटेगी. जैसे यदि आज दस किलोमीटर में दस बार सिंचाई हो रही है तो कल उतने ही पानी से बीस वर्ग किलोमीटर में दस बार सिंचाई हो जाएगी, लेकिन पानी का उपयोग पूर्वत रहेगा. इसलिए नदी को पुनर्जीवित करने में यह कार्यक्रम असफल रहेगा.

    दो बिन्दुओं पर “नमामि गंगे”  और “रैली फॉर रिवर्स” दोनों मौन हैं. पहाड़ी क्षेत्रों में नदियों पर जलविद्युत परियोजनाएं बनाने से मछलियों का आवागमन अवरुद्ध हो रहा है. जैव विविधता पर विपरीत प्रभाव पढ़ रहा है. इसके लिए जरुरी है कि जल विद्युत परियोजनाओं को री-डिजाईन किया जाए और नदी की एक धारा को निरंतर बहना सुनिश्चित किया जाए. इसके ऊपर दोनों कार्यक्रम मौन हैं. फरक्का बराज पर भी दोनों कार्यक्रम मौन ही हैं. फरक्का के कारण पानी और गाद में असंतुलन बन रहा है. हूगली को आधा पानी लेकिन गाद कम मिल रही है. बांग्लादेश को आधा पानी लेकिन गाद ज्यादा मिल रही है. हूगली में  गाद कम आने से सुंदरबन में कटाव हो रहा है. बांग्लादेश में गाद ज्यादा जाने से बाढ़ ज्यादा हो रही है. दोनों ही कार्यक्रम इस समस्या पर मौन हैं. इसका उपाय यह हो सकता है कि फरक्का बैराज को री-डिजाईन किया जाए जिससे कि पानी के साथ साथ गाद का भी बराबर बराबर वितरण हो. इस सन्दर्भ में हमारी पिछली पोस्ट यहाँ पढ़ें.

    हमारा मानना है “नमामि गंगे”  और “रैली ऑफ़ रिवर्स” गंगा की समस्याओं को हल करने में पूर्णतया विफल होंगी. इनका मंतव्य केवल ऊपरी कार्य करने का है जिससे जनता को लगे कि सरकार गंगा को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रही है यद्यपि गंगा न तो अविरल होगी और न ही निर्मल होगी.

  • सरकार नें इलाहबाद का नाम प्रयागराज करने का निर्णय लिया है

    उत्तरप्रदेश सरकार ने इलाहाबाद का नाम बदलकर पुराना नाम प्रयागराज रखने का फैसला किया है. ऐसी जगह जहां दो नदियों का संगम होता है उसे प्रयाग कहा जाता है. यहाँ गंगा और यमुना नदियाँ हिमालय के विभिन्न हिस्सों से बहकर आती हैं और विभिन्न आध्यात्मिक शक्तियां अपने साथ लाती हैं. दोनों नदियों के मिलन से आध्यात्मिक शक्तिओं का मिलन होता है और ये शक्तियां कई गुना बढ़ जाती हैं. इस प्रकार समझा जा सकता है कि जिस प्रकार दो बहनों का दस वर्ष बाद मिलन हो तो आपस में अपार आनंद की अनुभूति होती है.

    बगैर आध्यात्मिक शक्तियों के गंगा और यमुना नदियों का मिलन प्रयागराज में होता है

    जापानी वैज्ञानिक मासारू इमोटो ने पानी में बनने वाले क्रिस्टलों का अध्ययन किया है. उन्होंने पाया है कि आध्यात्मिक रूप से चार्ज हुआ पानी बहुत ही सुंदर क्रिस्टलों की स्थापना करता है, जबकि प्रदूषित और रुका हुए पानी से बने क्रिस्टल बहुत बदसूरत होते हैं. पानी आध्यात्मिक शक्तियों से भी परीपूर्ण होता है. इस प्रकार यमुना और गंगा विभिन्न प्रकार की आध्यात्मिक शक्तियां  लाती हैं और इन शक्तियों के मिश्रण से आध्यात्मिक शक्ति बढती है.

    नदी के पानी में अध्यात्मिक शक्तियों को वहन करने की क्षमता होती है

    झंडे का कोई सैन्य महत्व नहीं होता है लेकिन युद्ध के दौरान झंडे का महत्व बहुत अधिक होता है. यह सभी सैनिकों की ऊर्जा को बढ़ाता है. हम लेडी कामा का सम्मान करते हैं क्योंकि उन्होंने भारतीय ध्वज उठाया, न कि झंडे ने स्वतंत्रता दिलाई. ध्वज देश के लोगों की भावनात्मक शक्ति को बढ़ाता है. इसलिए प्रयागराज नाम बदलना उचित है चूँकि नदियों की आध्यात्मिक शक्ति की तरफ लोगों का ध्यान खींचता है.

    सवाल उठाया जा रहा है कि नाम बदल कर सरकार इतिहास को फिर से लिख रही है. मुगल इतिहास को खत्म कर रही है. लेकिन इतिहास लगातार बार बार लिखा जाता रहा है. हिटलर के समय जर्मनों ने एक अलग इतिहास लिखा और वे आज एक अलग इतिहास लिखते हैं. इसलिए इतिहास दुबारा लिखने में कुछ भी गलत नहीं है. इसलिए सरकार द्वारा इलाहबाद का नाम बदलने को हम उचित मानते है. इससे गंगा और यमुना के महत्व पर ध्यान खींचा जा सकेगा.

    गंगा का पानी नरोरा में निकाल लिया जाता है इलाहबाद पहुँचने वाला पानी काली नदी का है

    प्रश्न है कि क्या गंगा और यमुना वास्तव में आज अपने साथ आध्यात्मिक शक्तियां ला रही हैं? गंगा का पानी आज इलाहाबाद तक नहीं पहुंच रहा है. हरिद्वार, बिजनौर और नरोरा बैराज में सिंचाई के लिए गंगा का लगभग पूरा पानी हटा दिया जाता है. नरोरा के बाद गंगा नदी लगभग सूख गयी है. गंगा से इलाहाबाद में आने वाला पानी वास्तव में काली नदी का पानी है जो नरोरा के बाद गंगा में मिलती है. इसी प्रकार यमुना का पूरा पानी हथिनिकुंड में हटा दिया जाता है. यमुना नदी द्वारा इलाहाबाद में आने वाला पानी वास्तव में चंबल नदी का पानी है जो मथुरा के बाद यमुना में जुड़ती है. हम प्रयागराज नाम इसलिए दे रहे हैं क्योंकिहम मान रहे हैं कि गंगा और यमुना हिमालय से आध्यात्मिक शक्तियों को ला रही हैं. लेकिन वास्तव में वे इस तरह की शक्तियों को नहीं ला पा रही हैं. सर्वप्रथम सरकार को गंगा और यमुना नदियों को हिमालय से इलाहाबाद तक बहाल करना चाहिए था. हरिद्वार, बिजनोर, नरोरा और हथिनिकुंड के बैराजों के डिज़ाइन बदलकर हिमालयी गंगा और यमुना के पानी को प्रयागराज तक पहुँचाना था उसके बाद ही इलाहाबाद का नाम बदल कर प्रयागराज रखना चाहिए था. इसके बाद ही प्रयागराज नाम बदलना सार्थक होगा.

  • इलाहाबाद नाम इस्लामिक शब्द "अल्लाह" से लिया गया है जिसका अर्थ अल्लाह का निवास स्थान है. यह नाम लोगों का ध्यान अल्लाह की तरफ आकर्षित करता है. इस्लाम में अल्लाह का कोई रूप और आकार नहीं है और यह सबसे शक्तिशाली और सर्वज्ञानी है. ईसाई धर्म में भी केवल एक ही गॉड है जिसका कोई रूप और आकार नहीं है और वह भी सबसे शक्तिशाली है. हिंदू धर्म में भी परमात्मा का भी कोई रूप नहीं है और यह सबसे शक्तिशाली है अतः इलाहाबाद नाम लोगों का ध्यान अल्लाह या गॉड या परमात्मा की शक्ति की तरफ आकर्षित करता है.

    “प्रयागराज” नाम गंगा और यमुना के संगम या "प्रयाग" को दर्शाता है. यह नाम लोगों का ध्यान गंगा की आध्यात्मिक शक्तियों की ओर खींचता है. अब प्रश्न यह है कि ये शक्तियां क्या हैं? हिंदू मनोविज्ञान का मानना ​​है कि रीढ़ की हड्डी में सात चक्र या मानसिक केंद्र होते हैं. प्रत्येक चक्र मानव शरीर के कुछ हिस्सों को नियंत्रित करता है और इनके मानसिक पहलू भी होते हैं. इनमे विशेष देवताओं का वास भी होता है.

    मेरु दंड में सात मनोवैज्ञानिक चक्र होते हैं

    हमारी समझ के अनुसार इन सात चक्रों की परिस्थिति निम्न प्रकार से है:

    Serial No. Chakra Colour Phychic Power Deity
    1. Root (Base of spine) Deep Red Security Devi
    2. Sacral (Below Navel) Orange Sex, Energy Ganesha
    3. Navel (Navel) Yellow Activity Vishnu
    4. Heart (Heart) Blue Emotions Shiva
    5. Throat (Throat) Violet Communication Brahma
    6. 3rd Eye (Behind Eyes) White Thinking Indra
    7. Crown (Skull) Transparent Universal Energy Allah, Parmatma

    ऊपर दिए गए प्रत्येक चक्र का सम्बन्ध एक रंग से होता है जिसे ऊपर तालिका में दिखाया गया है. आप देखेंगे कि इंद्रधनुष के सात रंगों के क्रम में रंगों का संबंध विशेष देवताओं से दिखता है. जैसे देवी का रंग लाल (रक्त), गणेश का नारंगी रंग, विष्णु का पीला रंग (पीताम्बरी), शिव का नीला रंग (नीलकंठ) सा दिखता है. गंगा को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है. विष्णु का स्थान पीले रंग के अनुसार नाभि में होता है. यह चक्र गतिविधि और दृढ़ संकल्प को नियंत्रित करता है.

    गंगा शब्द में व्यंजन "ग" का दो बार उपयोग होता है. व्यंजन "ग" भी गतिविधि और दृढ़ संकल्प को दर्शाता है. इसी व्यंजन "ग" से अंग्रेजी का शब्द "Go" बना है जो की गतिविधि को दर्शाता है. इसलिए गंगा नाम भी गतिविधि और दृढ़ संकल्प को बढाता है. अतः शब्द गंगा नाभि चक्र को सक्रिय करता है और व्यक्ति को गतिविधि और दृढ़ संकल्प की प्रेरणा देता है.

    अब हम इलाहाबाद और प्रयागराज नामों का मानसिक प्रभाव देख सकते हैं. इलाहाबाद नाम क्राउन चक्र से जुड़ा हुआ है और व्यक्ति को अल्लाह या परमात्मा से जुड़ने में मदद करता है. प्रयागराज नाम नाभि चक्र से जुड़ा है और व्यक्ति को अधिक सक्रिय और दृढ़ बनाने में मदद करता है. अतः गंगा या प्रयागराज नाम हमारी उर्जा को नाभि चक्र पर केंद्रित करता है. दूसरी तरफ, इलाहबाद अथवा पर्मत्माबाद नाम क्राउन चक्र पर केंद्रित है और सार्वभौमिक ऊर्जा से जुड़ता है. अगर कोई व्यक्ति गंगा नाम का जप करता है तो उसका नाभि चक्र सक्रिय होगा और उसकी गतिविधि में वृद्धि होगी. अगर वही व्यक्ति बार-बार “अल्लाह” या “परमात्मा” का जप करता है तो वह सार्वभौमिक ऊर्जा से जुड़ जाएगा और उसके सभी चक्र सक्रिय हो जाएंगे. हमारी समझ से नाभि चक्र का सक्रीय होना लाभप्रद होता है परंतु सभी चक्रों का सक्रीय होना ज्यादा लाभप्रद होता है. 

    इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज रखने में हम अपना ध्यान परमात्मा के स्थान पर विष्णु पर केंद्रित करते हैं. एक तरह से हम उच्च स्तर से निम्न स्तर पर आ रहे हैं. अगर हम इलाहाबाद का नाम परमात्माबाद रखे तो हम भगवान की उच्च आध्यात्मिक शक्तियों पर अपना ध्यान बनाए रखेंगे.

  • बगैर पवित्र जल के प्रयागराज में कुम्भ मेले का आयोजन किया जा रहा है

    कुंभ मेला|प्रयागराज|गंगा|यमुना|शिप्रा|गोदावरी

    प्रयागराज में कुंभ मेले का आयोजन हो रहा है. कुंभ मेला हर तीन वर्ष में अलग-अलग नदियों के तट पर आयोजित किया जाता है - प्रयागराज में गंगा और यमुना के संगम पर, उज्जैन में शिप्रा नदी के तट पर, नासिक में गोदावरी नदी के तट पर और हरिद्वार में गंगा नदी के तट पर. इसके अलावा, कुंभ एक विशेष ग्रह नक्षत्र में आयोजित किया जाता है. कुंभ की विशेष शक्तियां नदियों के ऊर्जावान जल और विशेष ग्रह-नक्षत्र के संयोग से उत्पन्न होती हैं.

    गंगा और यमुना नदियों के संगम पर प्रयागराज स्थित है. यह एकमात्र कुंभ है जो नदियों के संगम पर आयोजित किया जाता है. यह चारों कुंभों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण है. गंगा और यमुना हिमालय से अलग-अलग आध्यात्मिक ऊर्जा लाती हैं और प्रयागराज में उनके मिलन से और भी अधिक आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है. जैसे यदि दो बहनें बीस साल बाद मिलें तो वे एक दूसरे के साथ एक गहरी ऊर्जा को महसूस करती हैं. अतः प्रयाग के कुंभ का वास्तविक उद्देश्य हिमालय से गंगा और यमुना द्वारा लायी गयी आध्यात्मिक शक्तियों पर निर्भर करता है.

    आध्यात्मिक ऊर्जा| हिमालय| हरिद्वार| नरोरा| हथनीकुंड| काली नदी

    वर्तमान समय में यह आध्यात्मिक ऊर्जा दो तरह से खंडित हो रही है. पहला कारण यह कि हिमालय से आने वाले उर्जावान जल वर्ष के अधिकांश समय में प्रयागराज तक नहीं पहुँचता है क्योंकि गंगा का पानी हरिद्वार और नरौरा में लगभग पूरी तरह से निकाला जा रहा है. नरोरा बराज के नीचे हम सुखी हुई गंगा नदी की स्थिति नीचे दिए गए चित्र में देख सकते हैं.

    गंगा का पानी टिहरी और नरोरा परियोजनाओं द्वारा निकाल लिया जाता है

    इसी प्रकार से यमुना का पानी पूरी तरह से हथिनीकुंड में निकाल लिया जाता है जिसे हरियाणा और यूपी को सिंचाई के लिए दे दिया जाता है. हथनीकुंड बराज के नीचे हम यमुना नदी की स्थिति निचे दिए गए चित्र में देख सकते हैं.

    यमुना का पानी हथनीकुंड बैराज में निकाल लिया जाता है

    नरौरा बराज के बाद गंगा लगभग सूखी हो जाती है और प्रयागराज तक पहुंचने वाला पानी ज्यादातर काली और अन्य नदियों का होता है जो कि नरौरा बराज के बाद गंगा में मिलती हैं. इसी तरह प्रयागराज में पहुंचने वाला यमुना का ज्यादातर पानी चंबल नदी का होता है जो हथिनीकुंड बराज के बाद यमुना नदी में मिलती है. प्रयागराज में आज गंगा और यमुना नदियों का संगम नहीं बल्कि काली और चंबल नदियों का संगम है. 

    सरकार ने कुंभ मेले के दौरान प्रयागराज में भागीरथी नदी का पानी उपलब्ध कराने के लिए टिहरी बांध से अतिरिक्त पानी छोड़ने का प्रस्ताव रखा है. गंगा की दो सहायक नदियाँ हैं - भागीरथी और अलकनंदा. भागीरथी नदी पर टिहरी बांध का निर्माण किया गया है. लेकिन पहली समस्या यह है कि टिहरी बाँध से भागीरथी के प्रवाह को टरबाइनों के माध्यम से छोड़ा जा रहा है जिसके कारण भागीरथी के जल की आध्यात्मिक शक्तियां नष्ट हो रही हैं. दूसरी समस्या है कि भागीरथी के जल को टिहरी बाँध के पीछे एक झील में रोका गया है जिसके कारण यह दूषित जल में बदल चुका है.

    टिहरी बाँध में भागीरथी का रुका हुआ पानी

    टिहरी बाँध|मीथेन उत्सर्जन|अलकनंदा|विष्णुप्रयाग|श्रीनगर

    टिहरी बांध का पानी निष्क्रिय हो गया है. उसमें ऑक्सीजन नहीं है. टिहरी बाँध से मीथेन जैसी जहरीली गैसों का उत्सर्जन हो रहा है जो इस बात का सूचक है कि पानी में ऑक्सीजन नहीं बची है. ऐसा पानी प्रयागराज में पहुंचने पर शायद ही आध्यात्मिक ऊर्जा लाएगा क्योंकि यह निष्क्रिय पानी है. इसी तरह अलकनंदा का पानी विष्णुप्रयाग और श्रीनगर के बांधों से टरबाइनों से होकर गुजरता है. जब पानी टरबाइन की ब्लेड से टकराता है तो पानी की आध्यात्मिक ऊर्जा स्वतः ही समाप्त हो जाती है. नवरात्र पूजा के दौरान एक कुम्भ में रखा हुआ पानी यदि मिक्सी में मैथ कार तीर्थयात्रियों पर छिड़का जाता है तो शायद ही इस पानी में आध्यात्मिक ऊर्जा का आभास होगा.

    नवरात्र में पूजा कलश में भरा जल आध्यात्मिक ऊर्जा का स्रोत होता है

    इस प्रकार भागीरथी का पानी भी टिहरी बाँध की टर्बाइनों से होकर प्रयाग पहुचता है, अलकनंदा का पानी विष्णु प्रयाग और श्रीनगर के टर्बाइनों से होकर प्रयाग पहुचता है, और यमुना का पानी इचरी जलविद्युत परियोजना के माध्यम से प्रयाग पहुचता है. प्रयागराज में पहुंचने वाला पानी आज आध्यात्मिक ऊर्जा से रहित ही है.

    बांधों की टरबाइनों से टकराने से पानी की आध्यात्मिक ऊर्जा को नष्ट हो जाती है

    गंगा के मैदान| उत्तर प्रदेश| भूजल पुनर्भरण| बराज 

    समाधान यह है कि हमें टिहरी जैसे बड़े बांधों को हटाना होगा और गंगा के मैदानी इलाकों में भूजल पुनर्भरण करना होगा. टिहरी बांध की क्षमता 2.6 बिलियन क्यूबिक मीटर है, जबकि उत्तर प्रदेश में भूजल एक्विफरों में लगभग 70 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी संग्रहित किया जा सकता है. टिहरी बाँध की तुलना में हम उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों में 30 गुना अधिक पानी संरक्षित कर सकते हैं.

    नदी के तट पर स्थित भूजल एक्वीफर्स का भरण बारिश के पानी से होता है तो पानी की कुछ मात्रा नदी में लगातार रिसता रहता है जिसे "नेचुरल डिस्चार्ज" कहा जाता है. यह पानी नदी को पुनर्जीवित करता है. इसी तरह हमें हथिनीकुंड बैराज को हटाना चाहिए और सुनिश्चित करना चाहिए कि यमुना की आध्यात्मिक ऊर्जा से आवेशित पानी प्रयागराज तक पहुंचे. हम तीर्थयात्रियों को इन तथ्यों को नहीं बताकर एक बड़ी गलती करते हैं जिस पर जल्द सुधारात्मक कार्रवाई की आवश्यकता है.

  • गंगा महासभा के श्री डी पी तिवारी जी नें प्रयागराज में कुंभ के दौरान नदियों के पानी की गुणवत्ता पर लगातार नजर बनाये रखी. उनका कहना है कि जल की स्थिति में सुधार आवश्य हुआ है हालांकि ज्यादातर सुधार टिहरी बांध से अधिक पानी छोड़े जाने के कारण हुआ है.

    झूसी क्षेत्र में 14 सीवेज नालियां गंगाजी में गिर रही हैं. कुछ सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों द्वारा इनका उपचार करने के प्रयास किये गए हैं. इनमे से एक बहुप्रचलित तकनीक जियो-सिंथेटिक ट्यूब की है जिसे हम नीचे चित्र 1 में देख सकते हैं.

    प्रयागराज के राजापुर नाले में जियो-सिंथेटिक ट्यूब तकनीक से गंगा की सफाई

    जियो-सिंथेटिक ट्यूब द्वारा ट्रीटमेंट के बाद छोड़े गए पानी को चित्र 2 में देख सकते हैं.

    प्रयागराज के राजापुर में जियो सिंथेटिक ट्यूब तकनीक के बाद छोड़ा गया पानी

    चित्र 2 में आप देख सकते हैं की जियो-सिंथेटिक ट्यूब तकनीक से ट्रीटेड पानी नीचे बह कर गंदे पानी में ही मिल रहा है. ट्रीटेड पानी की तुलना में गंदे पानी की मात्रा बहुत अधिक है.

    इसी प्रकार, कुंभ के दौरान सलोरी ट्रीटमेंट प्लांट से निकलने वाले उपचारित पानी को नीचे चित्र 3 में देख सकते हैं.

    प्रयागराज में सलोरी ट्रीटमेंट प्लांट से निकलने वाला ट्रीटेड पानी

    राजापुर ट्रीटमेंट प्लांट से निकलने वाले ट्रीटेड पानी को नीचे इमेज 4 में दिखाया गया है.

    राजापुर ट्रीटमेंट प्लांट से निकलने वाले ट्रीटेड पानी को नीचे इमेज 4 में दिखाया गया है.

    नीचे चित्र 5 में हम देख सकते हैं कि राजापुर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से पानी में अभी भी बहुत अधिक झाग आ रहा है जो अपर्याप्त ट्रीटमेंट को दर्शाता करता है. 

    प्रयागराज के राजापुर ट्रीटमेंट प्लांट के नीचे पानी की स्थिति

    वर्तमान में लगाये गए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स की क्षमता आवश्यकता से बहुत कम है. यदि आवश्यकता 100 मिलियन लीटर क्षमता की है तो सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों की क्षमता केवल 16 मिलियन लीटर प्रति दिन ही है. अतः अधिकाँश पानी अनुपचारित ही रह जाता है.

    इस प्रकार पानी का ट्रीटमेंट दो कारणों से रह जाता है. पहला यह कि जो तकनीकें अपनाई गई हैं वे पूर्णत सीवेज ट्रीटमेंट नहीं करते हैं. दूसरा यह कि ये अस्थायी हैं. इन सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटो को चलाने का अनुबंध भी केवल अप्रैल तक ही दिया गया है. अतः वे प्रयागराज की दीर्घकालिक समस्याओं का समाधान नहीं करते हैं.

    निष्कर्ष है कि जहां पानी की गुणवत्ता में कुछ सुधार हुआ है, यह सुधार मुख्यतः टिहरी से पानी छोड़े जाने और गंगा में अधिक पानी होने के कारण हुआ है.