Bihar

बिहार

  • गंगा नदी के पानी को हुगली में ले जाने के लिए फरक्का बराज बनाइ गई थी . बराज से एक फीडर कनाल द्वारा पानी को हुगली में ले जाया जा रहा है . फीडर कनाल का स्तर गंगा के स्तर से 10 मीटर ऊंचा है. गंगा के पानी को फीडर कनाल में डालने के लिए उसका स्तर 10 मीटर ऊंचा करना जरूरी था . बराज से पानी का यह जल स्तर ऊंचा किया गया है . ऐसा करने से बराज में 50 किलोमीटर पीछे तक एक तालाब बन गया है .

  • हाल ही में NGT ने गंगा की सुरक्षा को देखते हुए यह फैसला दिया है कि गंगा के तटों का सीमांकन किया जायेगा. इस फैसले के तहत NGT ने गंगा की सुरक्षा के तहत हर जिले में गंगा के तटों में 200 मीटर के दायरे में कोई भी निर्माण कार्य (पुल, भवन, खनन इत्यादि) नहीं होगा और 500 मीटर के दायरे में कोई भी प्रदुषण नहीं फैलाया जायेगा.

    नदी में बाड़ के दौरान नदी में जलमग्न भवन (फोटो साभार: गंगा टुडे टीम)
  • गंगा जीर्णोधार मंत्रालय के नए मंत्री श्री नितिन गडकरी

     

    प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने माँ गंगा के पुनरुद्धार के लिए गंगा जीर्णोधार मंत्रालय की जिम्मेदारी उनके कर्मठ सहियोगी नितिन गडकरी को सौंपी है. देश को आशा है कि श्री गडकरी उसी तत्परता से गंगा की सफाई करेंगे  जिस तत्परता से उन्होंने देश में सड़कों का जाल बिछाया है.

  • rudolph A furtado

    गंगा नदी में खननकार्य (फोटो साभार: रुडोल्फ ए फुर्तादो)

     

    उत्तराखंड हाईकोर्ट ने गंगा के किनारे खनन पर लगी रोक को हटा दी है. नदी में खनन कार्य भी आवश्यक होता है क्यूंकि नदी में गाद निरंतर बहकर आती रहती है.

  • गंगोत्री में स्थित माँ गंगा का मंदिर (फोटो साभार: जीएनयू डॉक्स.विकिमीडिया)

     

    “His Holinesses welcomes the declaration of Government of India to name Holy Ganga as the National River” – By Jagadguru Sri Nischalanandji, Shankaracharya of Goverdhan Mutt,Puri

  • गंगा नदी को जल आपूर्ति के लिए हूगली नदी की तरफ मोड़ा गया है (फोटो साभार: रिसर्चगेट)

    फरक्का बैराज, भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से एक विवादास्पद मामला रहा है. फराक्का बैराज द्वारा नदी का पानी दो भागों में बांटा जाता है. पानी का एक हिस्सा फीडर कैनाल द्वारा हूगली नदी को दिया जाता है जबकि पानी का दूसरा बराबर हिस्सा बांग्लादेश को प्रदान किया जाता है। पानी की कम आपूर्ति के कारण, बांग्लादेश में उत्पन्न होने वाली बड़ी समस्या “खारे पानी का प्रवेश” है, जिससे की समुद्र का खारा पानी अन्दर की की भूमि में नीचे से आ जाता है। गंगा के पानी को फराक्का बैराज के नीचे से प्रवाहित किया जा रहा है और इसी कारण बांग्लादेश में अधिक मात्रा में गाद का जमाव हो रहा है.(इस मुद्दे पर रिपोर्ट यहां उपलब्ध है) फरक्का बैराज के नीचे से पानी छोड़े जाने के कारण बांग्लादेश को गाद ज्यादा जाती है जिसके कारण बांग्लादेश में बाढ़ की समस्या बढ़ गयी है। इन कारणों से गंगा की कई प्रजातियों का विनाश हो रहा है. फराक्का बैराज परियोजना नें कोलकाता बंदरगाह को अधिक पानी सप्लाई कराने में सफलता पायी है. (विस्तार यहाँ संलग्न है). अगर पानी का विभाजन नहीं होता  है तो, कोलकाता बंदरगाह में पानी की कमी होगी. लेकिन इससे भारत में भी अन्य नकारात्मक परिणाम बढ़े हैं, जैसे कि हिलसा मछली की आबादी कम होना और फरक्का के ऊपर गाद जमा होने से बाढ़ में वृद्धि. 

    भारत और बांग्लादेश दोनों के लिए एक सम्भव समाधान नदी को निरंतर प्रवाह को स्थापित करके फरक्का बैराज को नया रूप देना है जिससे कि गाद दोनों देशों में समान रूप से विभाजित हो और मछलियां आसानी से विचरण कर सकें। (विकल्प के लिए हमारा पिछला लेख यहाँ पर देखें)

    गंगा नदी को बांग्लादेश की तरफ जाते हुए दिखाया गया है (फोटो साभार : गूगल अर्थ)
    इस सन्दर्भ में फरक्का बराज का विडियो यहाँ पर देखें.

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  • लेखक - मयूख डे

    हूगली नदी में यातायात देखा जा सकता है (फोटो साभार: मयुख डे)

    गंगा के मैदानी क्षेत्र में एक अनोखा प्राणी डॉलफिन बसा हुआ है. डॉल्फिन देख नहीं सकता है. यह पशु ध्वनियों पर आधारित रहता है और आवाज़ सुन कर अपने शिकार को पकड़ता है. कलकत्ता में डॉलफिन देखने के बाद मैं आश्चर्यचकित था किशहर के भीतर मैंने कभी नदी में रहने वाले जानवरों के इस अवशेष की कल्पना नहीं की थी. सीवेज, प्लास्टिक, तेल और रसायनों के वाहक होने के अलावा, हूगली नदी, पूरे देश में सबसे व्यस्त जलमार्गों में से एक है. एक मोटरबोट, जिसकी क्षमता 100 लोगों की होती है, प्रत्येक 10 मिनट के अंतराल में एक घाट से दूसरे घाट के बीच में चक्कर लगातीरहती है. इसके अलावा, भरी कंटेनर और कोयला ले जाने वाले जहाजों द्वारा धुंआ भी पूरी नदी में फ़ैल जाता है.

    हुगली नदी में भारी वाहक ट्रैफिक (फोटो साभार: मयुख डे)

    हूगली नदी में भरी वाहक ट्रेफिक होने की वजह से पानी के नीचे बहुत ज्यादा शोर होता है. चूँकि डॉलफिन ध्वनि पर निर्भर हैं, इसलिए हूगली नदी में शोर उन्हें निश्चित रूप से प्रभावित करता है. कलकत्ता में हूगली नदी के विपरीत, बिहार में गंगा नदी है, जहाँ झींगा मछलियों और डॉलफिन की आवाजें, पूरे पानी को स्तंभ से भर देती हैं. वहीँ एक मोटरबोट इन जानवरों की आवाज सुनने और अपनी जीविका चलाने की क्षमता को क्षीर्ण कर देती है. बगेर सही अध्ययन के यह पता नहीं चल पायेगा कि, हमारी नदियों में आवाज का प्रदूषण गंगा नदी में डॉलफिन को कैसे प्रभावित कर रहा है. उदाहरण के लिए चीन की यांगत्जी नदी को लिया जा सकता है, जो कि एक बार डॉलफिन का घर था. नदी में बढ़ता शोर, डॉलफिन के विलुप्त होने के कारणों में से एक माना जा सकता है. कहीं ऐसा न हो जाये कि जिस प्रकार चीनी नदी से डॉलफिन विलुप्त हो गयी हैं उसी प्रकार हमारी गंगा से भी डॉलफिन विलुप्त न हो जाएँ.

    गंगा के बाढ़ के मैदानों के एक अप्रयुक्त अनुभाग की एक हवाई छवि (फोटो साभार: मयूख डे)

    वास्तविकता यह है कि डॉलफिन गंगा नदी में बने अंतर्देशीय जलमार्गों के अत्याचारों को झेल रही हैं. और यह अंतर्देशीय जलमार्ग डॉलफिन के विनाश का संकेत है. सही है कि कलकत्ता में आज शोर तथा मोबिल ऑइल के बीच डॉलफिन पायी जा रही हैं. परन्तु भागलपुर की तुलना में यह बहुत कमजोर हैं. इस प्रकार के जलमार्गों के निरंतर निर्माण से इस सुन्दर जीव का मिलना, और भी मुश्किल होता जा रहा है. मयूख डे द्वारा लिखित सम्पूर्ण कहानी यहाँ पढ़ सखते हैं...


    मयुख डे: मयुख डे, बैंगलोर के नेशनल सेंटर ऑफ बायोलॉजिकल साइंसेज में वर्तमान एमएससी वाइल्डलाइफ बायोलॉजी और कंजर्वेशन कोहोर्ट कार्यरत है. पहले मगरमच्छ, मछलियों और गंगा नदी डॉल्फिन से जुड़ी परियोजनाओं पर काम करने के बाद, उनका संबद्ध पिछले तीन सालों से ताजे पानी की प्रणालियों से रहा है। यहां, वह डॉल्फिन नदी के लिए अपनी चिंताओं के बारे में लिखते हैं जो भारत के शोरगुल वाले यातायात जलमार्ग में रहता है. 

     

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  • सरकार द्वारा “नमामि गंगे” कार्यक्रम चलाया जा रहा है जिसके तीन मुख्य बिंदु हैं. पहला, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाकर गंदे पानी की सफाई करना. दूसरा, नदी में पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित करना तथा तीसरा, खेती में उपयोगिता सुधार कर पानी की मांग को कम करना. इसके सामानांतर चल रहे “रैली ऑफ़ रिवर्स” द्वारा पेड़ लगाकर नदी के संरक्षण की बात की जा रही है. इन सभी मंतव्यों का स्वागत है. लेकिन नदियों की मुख्य समस्याओं को इनके द्वारा नज़रंदाज़ किया गया है. (नमामि गंगे और रैली फॉर रिवर्स के वक्तव्य देखें)

    पहली समस्या नदी में प्रदूषण की है. “नमामि गंगे” के अनुसार सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों को प्राइवेट पार्टियों के सहियोग से लगाया जायेगा. लेकिन समस्या यह है कि वर्त्तमान में लगे हुए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट ही नहीं चल पा रहे हैं क्योंकि नगरपालिकाओं को इन्हें चलाने में खर्च ज्यादा आता है. अतः नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लग भी जाएँ तो ये भी नहीं चलेंगे क्योंकि इन्हें चलाने में भी नगरपालिकाओं की रूचि नहीं होगी. सही उपाय यह है कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से निकले साफ़ पानी को केंद्र सरकार खरीदे और किसानों को सिंचाई के लिए उपलब्ध कराये. तब प्राइवेट पार्टियों को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट चलाने में लाभ होगा. जिस प्रकार प्राइवेट पार्टियां थर्मल प्लांट लगाकर बिजली बोर्डों को बिजली की सप्लाई कर रही हैं उसी प्रकार प्राइवेट पार्टियां सिवेज को साफ़ करके साफ़ पानी को राज्यों के सिंचाई विभाग को उपलब्ध करा सकती हैं. चूंकि साफ़ पानी के खरीद की कोई योजना नहीं है इसलिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की योजना फेल होगी.

    “नमामि गंगे” का दूसरा बिंदु है कि प्रदूषण फ़ैलाने वाले पुराने उद्योगों को बंद किया जायेगा और नए उद्योगों के लिए नयी नीति बनाई जायेगी. लेकिन नीति क्या बनाई जायेगी इसकी स्पष्टता नहीं है. देश की जानी मानी IITs द्वारा बनाये गए गंगा संरक्षण के प्रोग्राम में सुझाव दिया गया है कि सरकार को सभी उद्योगों को “जीरो लिक्विड डिस्चार्ज” की पालिसी पर लाना चाहिए. उन्हें इस बात पर मजबूर करना चाहिए कि पानी को बार बार साफ़ करके उपयोग करते रहें जब तक कि वह ख़त्म न हो जाये. एक बूंद भी पानी का भी वे निस्तारण न करें. लेकिन जीरो लिक्विड डिस्चार्ज के प्रति “नमामि गंगे” मौन है. इसलिए राज्यों के प्रदूषण बोर्डों और उद्योगों की मिलीभगत से गन्दा पानी निकलता रहेगा और पुरानी कहानी जारी रहेगी.

    “रैली ऑफ़ रिवर्स” का कहना है कि पेड़ लगाने से पानी की गुणवत्ता में सुधर आएगा. यह बात सही है लेकिन पर्याप्त नहीं है. “रैली ऑफ़ रिवर्स” का कार्यक्रम नदियों के किनारे दोनों तरफ एक किलोमीटर तक पेड़ लगाने का है. अगर हम गंगा बेसिन को लें तो लगभग 15,000 वर्ग किलोमीटर भूमि में पेड़ लगेंगे. लेकिन यह पूरे क्षेत्र की तुलना में ऊंट के मुह में जीरा जैसा है. उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल में राज्यों का कुल क्षेत्रफल 484,000 वर्ग किलोमीटर है. इसलिए कुल क्षेत्र के केवल 3 प्रतिशत भूमि में वनीकरण होगा. पानी की गुणवत्ता में मामूली सा ही सुधर होगा. इसलिए “नमामि गंगे” और “रैली फॉर रिवर्स” द्वारा नदियों को साफ़ करने का प्रयास फेल होगा.

    तीसरा बिंदु नदी के बहाव का है. दोनों कार्यक्रमों का कहना है कि पेड़ लगाने से नदी के जलस्तर में वृद्धि होगी. यह बात सही है. वर्षा का पानी पेड़ों की जड़ों से जमीन के अन्दर समा जाता है और जब नदी का जलस्तर कम होता है तो वह बगल की जमीन से नदी में बहकर नदी को पुनर्जीवित करता है.  लेकिन पुनः प्रश्न वही है कि केवल 3 प्रतिशत भूमि में वनीकरण भी भी ऊंट के मुह में जीरा होगा.

    “नमामि गंगे” ने यह भी कहा है कि पर्यावरणीय प्रवाह को सुनिश्त किया जायेगा. लेकिन वर्त्तमान एनडीए सरकार के चार वर्ष बीत चुके हैं और नेशनल ग्रीन ट्रेबुनल (NGT) द्वारा आदेश दिए जाने के बावजूद सरकार नें जल विद्युत परियोजनाओं और सिंचाई परियोजनाओं से पर्यावरणीय प्रवाह छोड़ने को तनिक भी कदम नहीं उठाया है.

    “नमामि गंगे” ने कहा है कि सिंचाई की गुणवत्ता सुधारने का काम किया जायेगा. उतने ही पानी से अधिक क्षेत्र में सिंचाई करने का प्रयास किया जायेगा. यह मंतव्य बिलकुल सही है, लेकिन इससे सिंचाई का क्षेत्रफल बढेगा न कि पानी की मांग घटेगी. जैसे यदि आज दस किलोमीटर में दस बार सिंचाई हो रही है तो कल उतने ही पानी से बीस वर्ग किलोमीटर में दस बार सिंचाई हो जाएगी, लेकिन पानी का उपयोग पूर्वत रहेगा. इसलिए नदी को पुनर्जीवित करने में यह कार्यक्रम असफल रहेगा.

    दो बिन्दुओं पर “नमामि गंगे”  और “रैली फॉर रिवर्स” दोनों मौन हैं. पहाड़ी क्षेत्रों में नदियों पर जलविद्युत परियोजनाएं बनाने से मछलियों का आवागमन अवरुद्ध हो रहा है. जैव विविधता पर विपरीत प्रभाव पढ़ रहा है. इसके लिए जरुरी है कि जल विद्युत परियोजनाओं को री-डिजाईन किया जाए और नदी की एक धारा को निरंतर बहना सुनिश्चित किया जाए. इसके ऊपर दोनों कार्यक्रम मौन हैं. फरक्का बराज पर भी दोनों कार्यक्रम मौन ही हैं. फरक्का के कारण पानी और गाद में असंतुलन बन रहा है. हूगली को आधा पानी लेकिन गाद कम मिल रही है. बांग्लादेश को आधा पानी लेकिन गाद ज्यादा मिल रही है. हूगली में  गाद कम आने से सुंदरबन में कटाव हो रहा है. बांग्लादेश में गाद ज्यादा जाने से बाढ़ ज्यादा हो रही है. दोनों ही कार्यक्रम इस समस्या पर मौन हैं. इसका उपाय यह हो सकता है कि फरक्का बैराज को री-डिजाईन किया जाए जिससे कि पानी के साथ साथ गाद का भी बराबर बराबर वितरण हो. इस सन्दर्भ में हमारी पिछली पोस्ट यहाँ पढ़ें.

    हमारा मानना है “नमामि गंगे”  और “रैली ऑफ़ रिवर्स” गंगा की समस्याओं को हल करने में पूर्णतया विफल होंगी. इनका मंतव्य केवल ऊपरी कार्य करने का है जिससे जनता को लगे कि सरकार गंगा को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रही है यद्यपि गंगा न तो अविरल होगी और न ही निर्मल होगी.