Pollution

प्रदूषण

  • आदी गुरु शंकराचार्य गंगा अष्टकम में गंगा के बारे में लिखा है:

    आप (गंगा) गुफाओं और स्वर्ण पर्वत से गुजरते हो कृपया हमें शुद्ध करें .. आपके किनारे से पानी सुबह और शाम को कुशा घास और महान ऋषि द्वारा चढ़ाए गए फूलों द्वारा शोभित होते हैं. यदि आपकी तरंगों की एक झलक कोई देख लेता है, तो उसके पाप नष्ट हो जाते हैं (गंगाष्टम).

  • गंगा नदी का भूगर्भीय जल का श्रोत जिसमे की पानी घट चुका है (फोटो साभार: गंगा टुडे टीम)

    गंगा के निरंतर प्रवाह को बनाए रखने के लिए भूगर्भीय जल श्रोतों से पानी का रिसाव होता है जो घने जंगल की जड़ों से भूमि में समाता है.जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण के लिए सुरंगों का निर्माण किया जाता है. इसके लिए भारी विस्फोट किया जाता है जिससे जलभूमि छिद जाती है. परिणामस्वरूप उस भूमि की जलवहन क्षमता खत्म हो जाती है. जिस कारण गंगा में पानी का प्रवाह गर्मियों के दौरान घट रहा है.

    सुपाना गाँव में प्रकिर्तिक जल श्रोत अब सूख चुका है (फोटो साभार: गंगा टुडे टीम)

    पर्यावरण मंत्रालय द्वारा गंगा की सहायक नदी भागीरथी नदी पर तीन जलविद्युत परियोजनाओं, मानेरी-भाली 1, मनेरी-भाली 2 और लोहारी नागपाला  पर एक अध्ययन किया गया. अध्ययन में पाया गया है कि 24 में से 5 भूगर्भीय जलश्रोत सूख चुके हैं जिन्हें कि निम्न तालिका में लाल रंग से दर्शाया गया है-   

    Sl. No. Village Local Name Of Spring Use of Spring Flow Type Location HEPs Remark
     1  Bhangeli  Moloupala  Drinking/ Irrigation  P  Eastern side of Bhangeli Village  HRT of LNP  Running
     2  Bhangeli  Baig Tok  Drinking  P  Eastern side of Bhangeli Village  HRT of LNP  Running
     3  Bhangeli  Rangela (Kankhor)  Drinking, free flow  S1  Eastern side of Bhangeli Village  HRT of LNP  Running
     4  Bhangeli  Nagi  Drinking/ Irrigation  P  Eastern side of Bhangeli Village  HRT of LNP  Running
     5  Bhangeli  Patya  Irrigation  S1  Above village Bhangeli  HRT of LNP  Running
     6  Bhangeli  Silor  free flowing  S2  Western side of village  HRT of LNP  Running
     7  Bhangeli  Gadora  free flowing  S1  Western side of village  HRT of LNP  Running
     8  Bhangeli  Sillu  free flowing  S2  Below village Bhangeli  HRT of LNP  Running
     9  Bhangeli  Dabsya  free flowing  S2  Below village Bhangeli  HRT of LNP  Running
     10  Bhangeli  Kargu  Irrigation Drinking  P  Below village Bhangeli  HRT of LNP  Running
     11  Bhangeli  Tinura  Irrigation Drinking  P  Below village Bhangeli  HRT of LNP  Running
     12  Bhangeli  Haina (Garari)  free flowing  S1  Way to Bhangeli village  HRT of LNP  Running
     13  Bhangeli  Rumya Dhar  free flowing  S2  Above village Bhangel  HRT of LNP  Running
     14  Bhangeli  Ripra  free flowing  S2  Above village Bhangeli  HRT of LNP  Running
     15  Sunagar  Saraswati pani  Drinking  P  NH - 108  Close to HRT of LNP  Running
     16  Jamak  Nand Khal  Drinking  P  Eastern side of village  MB-1 fore way and main tunnel Dried up 
     17  Jamak  Salana Tok  Drinking  P  Eastern side of village  MB-1 fore way and main tunnel  Dried up
     18  Jamak  Tarta Gad  Drinking/ Irrigation  P  Western side of village  MB-1 fore way and main tunnel  Now only in rainy season
     19  Sanglai  Sangali  Drinking/ Irrigation  P  On the way to Sangali  LNP power house area  Running
     20  Sanglai  Sangali 2  Drinking/ Irrigation  P  NH - 108  -do-  Running
     21  Sanglai  Ghirsa Tok  Drinking/ Irrigation  P  Down side of Tihar village  -do-  Running
     22  Sanglai  Bhumki  Drinking/ Irrigation  S1  NH – 108 (market)  -do-  Dried up
     23  Sanglai  Agarakhal tok  Drinking/ Irrigation  P  Near pressure shaft  Above LNP power house  Dried up due to tunneling
     24  Sanglai  Helagu Gad  Drinking/ Irrigation  P  Helgu Adit  Above LNP power house  Running
    जलविद्युतपरियोजनाओंकाप्राकिर्तिकजलश्रोतोंपरदुष्प्रभाव (डॉ.जी.सी.एस.नेगी )

    हम देश के आर्थिक विकास के लिए जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण कर रहे हैं. लेकिन हम इस प्रक्रिया से गंगा को मार रहे हैं. इस नीति पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है.

     

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  • लेखक - मयूख डे

    हूगली नदी में यातायात देखा जा सकता है (फोटो साभार: मयुख डे)

    गंगा के मैदानी क्षेत्र में एक अनोखा प्राणी डॉलफिन बसा हुआ है. डॉल्फिन देख नहीं सकता है. यह पशु ध्वनियों पर आधारित रहता है और आवाज़ सुन कर अपने शिकार को पकड़ता है. कलकत्ता में डॉलफिन देखने के बाद मैं आश्चर्यचकित था किशहर के भीतर मैंने कभी नदी में रहने वाले जानवरों के इस अवशेष की कल्पना नहीं की थी. सीवेज, प्लास्टिक, तेल और रसायनों के वाहक होने के अलावा, हूगली नदी, पूरे देश में सबसे व्यस्त जलमार्गों में से एक है. एक मोटरबोट, जिसकी क्षमता 100 लोगों की होती है, प्रत्येक 10 मिनट के अंतराल में एक घाट से दूसरे घाट के बीच में चक्कर लगातीरहती है. इसके अलावा, भरी कंटेनर और कोयला ले जाने वाले जहाजों द्वारा धुंआ भी पूरी नदी में फ़ैल जाता है.

    हुगली नदी में भारी वाहक ट्रैफिक (फोटो साभार: मयुख डे)

    हूगली नदी में भरी वाहक ट्रेफिक होने की वजह से पानी के नीचे बहुत ज्यादा शोर होता है. चूँकि डॉलफिन ध्वनि पर निर्भर हैं, इसलिए हूगली नदी में शोर उन्हें निश्चित रूप से प्रभावित करता है. कलकत्ता में हूगली नदी के विपरीत, बिहार में गंगा नदी है, जहाँ झींगा मछलियों और डॉलफिन की आवाजें, पूरे पानी को स्तंभ से भर देती हैं. वहीँ एक मोटरबोट इन जानवरों की आवाज सुनने और अपनी जीविका चलाने की क्षमता को क्षीर्ण कर देती है. बगेर सही अध्ययन के यह पता नहीं चल पायेगा कि, हमारी नदियों में आवाज का प्रदूषण गंगा नदी में डॉलफिन को कैसे प्रभावित कर रहा है. उदाहरण के लिए चीन की यांगत्जी नदी को लिया जा सकता है, जो कि एक बार डॉलफिन का घर था. नदी में बढ़ता शोर, डॉलफिन के विलुप्त होने के कारणों में से एक माना जा सकता है. कहीं ऐसा न हो जाये कि जिस प्रकार चीनी नदी से डॉलफिन विलुप्त हो गयी हैं उसी प्रकार हमारी गंगा से भी डॉलफिन विलुप्त न हो जाएँ.

    गंगा के बाढ़ के मैदानों के एक अप्रयुक्त अनुभाग की एक हवाई छवि (फोटो साभार: मयूख डे)

    वास्तविकता यह है कि डॉलफिन गंगा नदी में बने अंतर्देशीय जलमार्गों के अत्याचारों को झेल रही हैं. और यह अंतर्देशीय जलमार्ग डॉलफिन के विनाश का संकेत है. सही है कि कलकत्ता में आज शोर तथा मोबिल ऑइल के बीच डॉलफिन पायी जा रही हैं. परन्तु भागलपुर की तुलना में यह बहुत कमजोर हैं. इस प्रकार के जलमार्गों के निरंतर निर्माण से इस सुन्दर जीव का मिलना, और भी मुश्किल होता जा रहा है. मयूख डे द्वारा लिखित सम्पूर्ण कहानी यहाँ पढ़ सखते हैं...


    मयुख डे: मयुख डे, बैंगलोर के नेशनल सेंटर ऑफ बायोलॉजिकल साइंसेज में वर्तमान एमएससी वाइल्डलाइफ बायोलॉजी और कंजर्वेशन कोहोर्ट कार्यरत है. पहले मगरमच्छ, मछलियों और गंगा नदी डॉल्फिन से जुड़ी परियोजनाओं पर काम करने के बाद, उनका संबद्ध पिछले तीन सालों से ताजे पानी की प्रणालियों से रहा है। यहां, वह डॉल्फिन नदी के लिए अपनी चिंताओं के बारे में लिखते हैं जो भारत के शोरगुल वाले यातायात जलमार्ग में रहता है. 

     

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  • नितिन गडकरी ने 150 प्रोजेक्ट्स की शुरुवात की

    केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने गंगा की सफाई हेतु मार्च 2018 तक 150 नए प्रोजेक्ट स्थापित करने की बात कही है. इसके अंतर्गत 90 प्रोजेक्टों को स्वीकृति दी जा चुकी है और अन्य को भी जल्दी स्वीकृत कर दिया जायेगा. हम गडकरी जी के इस फैसले का समर्थन करते हैं. सरकार का मानना है कि 1.5 लाख करोड़ रुपयों की लागत से बनने वाले ये प्रोजेक्ट गंगा की सफाई में मददगार होंगे. लेकिन गडकरी जी साथ साथ गंगा पर बड़े जहाजों को चलाना चाहते हैं इनसे गंगा प्रदूषित होगी. नीचे चित्र में दिखाया गया है कि जहाजों के पेंट में तांबा होता है जो कि मछलियों  के लिए हानिकारक होता है.

  •  

    NGT को पराली से होने वाला प्रदुषण तो ज्यादा हानिकारक लगता है परन्तु जल विद्युत परियोजनाओं से प्रतिदिन निकलने वाली हानिकारक गैसों की कोई चिंता नहीं

    दिल्ली के लोग धुंध से पीड़ित हैं जो स्वास्थ्य समस्याओं और सड़क दुर्घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार है. पंजाब और हरियाणा की राज्य सरकारों ने धान की पराली को जलाने पर रोक लगा दी है. राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने भी इसी तरह के आदेश दिए हैं. हालांकि, इस तरह के सतही उपायों से समस्या हल नहीं की जा सकती.

     

    पराली को नष्ट करने का कोई विकल्प नहीं

      हम एनजीटी के इस निर्णय का हार्दिक अभिनन्दन करते हैं कि पंजाब में केवल 2 मिलियन टन धान का अवशेष (पराली) होता है जबकि पश्चिम बंगाल 3.6 मिलियन टन पराली होती है. फिर भी, पश्चिम बंगाल में पराली जलाना नहीं देखा जाता. क्योंकि पश्चिम बंगाल में श्रमिक आसानी से उपलब्ध होते हैं. यह आर्थिक रूप से किसानों को श्रमिकों द्वारा धान की पराली को पेपर मीलों तक पहुँचाने में लाभकारी होते हैं या पशु चारे के रूप में इस्तेमाल करने के लिए होता है. लेकिन पंजाब में, श्रम महंगा है और कम आपूर्ति में है. इसके अलावा, धान की पराली की कटाई और गेहूं की बुवाई के लिए 15 दिन का समय उपलब्ध होता है. इस कम समय में किसानों को श्रम नहीं मिलता है इसलिए वे धान की पराली को जलाना ज्यादा आसान समझते हैं. किसान पराली इसलिए जलाते हैं क्योंकि उनके पास पराली को नष्ट करने का कोई अन्य विकल्प नहीं है.

     यह अच्छा है कि सरकार समस्या के बारे में चिंतित है. लेकिन इस समस्या को सुलझाने वाली नीतियां विफल हो रही हैं. क्योंकि किसानों के पास पराली को नष्ट करने के लिए कोई अन्य विकल्प नहीं है. भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के लिए पराली की खपत के लिए यह उत्तम समाधान हो सकता है कि, जिस प्रकार गेंहू और धान के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य स्थापित किये गए हैं उसी प्रकार पराली के लिए भी न्यूनतम समर्थन मूल्य स्थापित किये जाएँ,जिससे कि ठेकेदार, किसानों से पराली खरीद सकें, फिर इसे इकट्ठा करके एफसीआई को इसकी आपूर्ति करें. एफसीआई इस पराली को महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में आपूर्ति करें जहाँ किसानों को अपने जानवर के लिए चारे की जरुरत होती है या फिर जहाँ पेपर मीलों को कच्चे माल की जरुरत होती है. इस पूरी प्रक्रिया में होने वाले नुक्सान का ज़िम्मेदार एफसीआई को होना चाहिए जो कि सरकार द्वारा बाध्य होना चाहिए। इस प्रक्रिया से राष्ट्र को अनेक प्रकार से लाभ होगा जैसे कि हम धुंध की विकराल समस्या से छुटकारा पायेंगे. क्योंकि किसानों द्वारा अब पराली नहीं जलाई जाएगी और वे उसे बेचकर कमाई करेंगे. यह जरूरी है कि धान की पराली को जलाने पर प्रतिबंध लगाने के बजाय सरकार पराली के इस्तेमाल पर अधिक रचनात्मक नीतियों का निर्माण करे.

     

    कार्बन और मीथेन का अत्यधिक उत्सर्जन

     “पराली जलाना” वायु प्रदूषण का एक छोटा सा हिस्सा है जो केवल फसल की कटाई के समय होता है. अतः पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को नगण्य माना जा सकता है. किन्तु हम बड़ी मात्रा में बिजली खपत कर रहे हैं, जिससे कोयले की तरह बड़े पैमाने पर जीवाश्म ईंधन जलता है, और अत्यधिक मात्रा में कार्बन और मीथेन गैसों का उत्सर्जन  होता है जो कि ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने का प्रमुख कारक है. हम बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं का निर्माण कर रहे हैं जो कोयला प्लांटों में उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन से अधिक ज्यादा नुक्सानदेयी गैसों का उत्सर्जन करते हैं. इस बिंदु पर इंटरनेशनल रिवर्स की रिपोर्ट देखें.

     इसी तरह राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (एनईईआरआई) की एक रिपोर्ट बताती है कि: 

    टिहरी बांध के जलाशय से कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन 2550 मिलीग्राम प्रति वर्ग मी. है, जबकि मीथेन उत्सर्जन प्रतिदिन 24 मिलीग्राम प्रति वर्ग मी. प्रति दिन है. यह transpiration के क्षणिक प्रदूषण की तुलना में अधिक खतरनाक है. (रिपोर्ट यहां उपलब्ध है पृष्ठ 15, पैरा 5) हानिकारक उत्सर्जन के बारे में अधिक जानकारी के लिए, आप हमारी पिछली पोस्ट यहां पढ़ सकते हैं.

     एक तरफ, हम पराली जलाने से होने वाली क्षणिक समस्या से बहुत ज्यादा चिंतित हैं दूसरी तरफ, हम बिजली की उच्च खपत पर चुप हैं, जो कि ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने में अत्यधिक लाभकारी है. हमें यह महसूस करना होगा कि इस धरती पर बिजली का असंतुलित उपभोग एक बोझ है और हमें इसे पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए अपनी  जीवनशैली को बदलना होगा. सरकार का पराली जलाने को रोकने का निर्णय व्यर्थ होगा. बजाय इसके हमें बिजली की खपत एक सीमित दायरे में करनी होगी जिससे कि जलविद्युत परियोजनाएं न बने और प्रतिदिन विनाशकारी गैसों के उत्सर्जन से पर्यावरण को बचाया जा सके.

     

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  • पोस्ट: हिंदुस्तान टाइम्स द्वारा डॉ भरत झुनझुनवाला

    भागलपुर के निकट गंगा को गंगा डॉल्फिन के संरक्षण के लिए वन्यजीव अभ्यारण्य घोषित किया गया है. इस जानवर में आँखें नहीं होती हैं यह अन्य समुद्री जीवों की ध्वनि वातावरण द्वारा विचरण करता है और अपने शिकार को पकड़ता है.

    बीते दिनों में, केंद्र ने राष्ट्रीय जलमार्ग -1 (एनडब्ल्यू -1) के हल्दिया-वाराणसी पर बढ़ते नेविगेशन के लिए 5,369 करोड़ रुपये जल विकास मार्ग परियोजना को मंजूरी दे दी. इस परियोजना की 2023 तक पूरा होने की उम्मीद है. केंद्र सरकार के अनुसार तब परिवहन का एक वैकल्पिक तरीका उपलब्ध होगा जो कि पर्यावरण के अनुकूल होगा और लागत कम आएगी. यह आर्थिक आकलन  केवल बार्जेस चलाने और टर्मिनलों को बनाए रखने की लागत का संज्ञान लेता है. किन्तु यह समाज पर लगाए गए पर्यावरणीय लागतों के मौद्रिक मूल्य का संज्ञान नहीं लेता है.

     

    जलमार्ग परियोजना के पर्यावरणीय दुष्प्रभाव

    यदि पर्यावरण के नुकसान का आर्थिक मूल्य जोड़ दिया जाये तो हमारे आंकलन में यह परियोजना लाभप्रद नहीं रह जायेगी. जलमार्ग परियोजना के निम्नलिखित पर्यावरणीय दुष्प्रभाव के केंद्रसरकार ने अनदेखी की है.

    पहला दुष्प्रभाव जलमार्ग के लिए की गयी ड्रेजिंग का पड़ता है. गंगा नदी छिछले तालाबों और उथले क्षेत्रों पर फैली हुई बहती है। मछली और कछुए इन उथले क्षेत्रों में अंडे देते हैं। लेकिन ड्रेजिंग से नदी का बहाव एक गहरे चैनल में सीमित कर दिया गया है. अब उथले इलाकों में मछली और कछुए के निवास स्थान को नष्ट कर दिया गया है.

    जलमार्ग का दूसरा प्रभाव जहाज़ों के कछुओ पर अघात से पड़ता है. जब जहाज चलते हैं तो कछुए उनके रास्ते से भाग नहीं पाते क्योंकि वे धीरे धीरे चलते हैं, और चोटिल हो जाते हैं.  वाराणसी के निकट गंगा में कछुआ अभयारण्य स्थापित किया गया है. अन्य देशों में अध्ययन से संकेत मिलता है कि बड़ी संख्या में नावों से कछुओं का शिकार होता है.

    जलमार्ग का तीसरा दुष्प्रभाव जहाजों के चलने से निकली आवाज से होता है.भागलपुर के निकट गंगा में डॉल्फिन के संरक्षण के लिए  वन्यजीव अभ्यारण्य घोषित किया गया है. इस जानवर में आँखें नहीं होती हैं. यह जानवर अन्य समुद्री जीवों की आवाजाही के द्वारा उत्पन्न ध्वनि से ही अपना शिकार पकड़ता है. बड़े बार्जेस के चलते इस क्षेत्र में ऊंची ध्वनि पैदा होगी जिससे उनके लिए शिकार को पकड़ना मुश्किल हो जाएगा.

    जलमार्ग का चौथा दुष्प्रभाव प्रदुषण में वृद्धि का होगा.जहाजों और बार्जेस पर लगा पेंट भी पानी दूषित करता है। जहाजों द्वारा छोड़े गए कार्बन डाइऑक्साइड को नदी द्वारा निकटता की वजह से अधिक सोखा जाएगा और यह नदी को प्रदूषित करेगा.

    अमेरिका स्थित एग्रीकल्चर एंड ट्रेड पालिसी इंस्टिट्यूट द्वारा एक रिपोर्ट में कहा गया है कि मिसिसिपी जलमार्ग केवल इसलिए किफायती है क्योंकि इस पर टैक्स वसूला जाता है जबकि रेल और सड़क परिवहन से टैक्स वसूला जाता है. एनडब्ल्यू -1 इससे भिन्न नहीं होगा. पर्यावरण के नुक्सान के मूल्य को जोड़ लिया जाय तो यह देश के लिए अत्यधिक नुकसानदेह सिद्ध होगा.

     

    इस विषय पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को लिखें

     

  • उत्तराखंड में टिहरी और श्रीनगर जैसी विद्युत परियोजनाओं के नीचे का पानी अपेक्षाकृत साफ है. फिर भी यह कई मायनों में नदी में  प्रदूषण फैलाते हैं.

    चित्र 1: श्रीनगर बाँध के नीचे बहता साफ़ पानी

    प्रभाव:

    प्रथम प्रभावमछलियों पर है. मछलियों की कार्बनिक पदार्थ को पचाने की क्षमता होती है. मछलियों को तालाबों के साफ पानी में देखा जा सकता है, क्योंकि मछलियां तालाब में कार्बनिक पदार्थ खा लेती हैं.

    चित्र 2: मछलियां नदी के पानी को साफ़ करती हैं

     नदियां मछलियों का निवास स्थान होती हैं. अतः वे इसमें स्वछंद रूप से विचरण कर सभी कार्बनिक पदार्थों को खा लेती हैं. बांधों से मछलियों को हानि होती है.

    उत्तराखंड में पाए जाने वाले प्रसिद्ध माहसीर मछली अंडे देने के लिए ठंडे क्षेत्रों में चली जाती हैं. फिर छोटी मचलियाँ नदी की धारा के साथ बहकर मैदानी क्षेत्रों में पहुँच जाती हैं जहाँ पर ये परिपक्कव मछलियों का रूप ले लेती हैं.(नीचे फोटो देखें).

    चित्र 3: माहसीर मछलियाँ अंडे देने के लिए गंगा के ऊपरी क्षेत्रों में जाती हैं

    परिपक्व माहसीर मछलियां फिर से यही चक्र दोहराते हुए अंडे देने के लिए पहाड़ी क्षेत्रों में जाती हैं किंतु बाँध द्वारा रूकावट के कारण वे अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच पाती हैं. माहसीर मछली पहले उत्तरकाशी तक पायी जाती थी परंतु अब यह टिहरी के ऊपर नहीं पायी जाती हैं. पहले यह 100 किलोग्राम  तक होती थी. अब मात्र 700 ग्राम की ही रह गयी हैं.

    कई अध्ययनों से पता चलता है कि बांध में मछलियों, कछुओं और अन्य जलीय जानवरों की संख्या में कमी आई है. (IUCN की रिपोर्ट देख यहाँ सकते हैं), (जैविक विविधता के सम्मेलन की रिपोर्ट यहाँ सकते हैं) और (स्थलीय जैविक विविधता पर जलविद्युत परियोजनाओं के प्रभाव की रिपोर्ट यहाँ सकते हैं). जब हम टिहरी जैसे बांधों का निर्माण करते हैं, तो मछलियों की संख्या कम हो जाती है और उनकी प्रदूषण को कम करने की क्षमता भी कम हो जाती है. इसलिए, जो भी प्रदूषक नदी में प्रवेश होता है वह सहज रूप से साफ नहीं होता जैसा कि पहले साफ हो रहा था. अतः प्रदूषण पर बांधों का पहला प्रभाव मछलियों को सीमित करके होता है.

    गंगा की पवित्रता का आधार:

    बांधों का दूसरा प्रभाव कॉलिफाज़ के माध्यम से होता है. गंगा नदी के पानी में एक प्रकार का फायदेमंद बैक्टीरिया पाया जाता है जिसे कॉलिफाज़ कहा जाता है. जबकि गंगा नदी में पाए जाने वाला हानिकारक जीवाणु कॉलिफ़ॉर्म कहलाता है.

    चित्र 4: कॉलिफाज़ गंगा के प्रदूषण में मौजूद कॉलिफ़ॉर्म को खाकर नदी को साफ़ रखते हैं

    कॉलिफाज़, कॉलिफ़ॉर्म को खाकर नदी को साफ करते हैं. कॉलिफाज़ नदी की गाद या रेत में तब तक चिपके रहते हैं जब तक कि उन्हें चारों ओर कॉलिफ़ॉर्म नहीं मिलते. कॉलिफ़ॉर्म के मिलते ही कॉलिफाज़ सक्रिय हो जाते हैं और कॉलिफॉर्म खाने शुरू करते हैं. राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (NEERI) के वैज्ञानिकों ने बताया है कि “गंगा में कॉलिफाज़ अद्वितीय हैं”. आम तौर पर एक प्रकार का कॉलिफाज़ एक प्रकार का ही कॉलिफ़ॉर्म खाता है. गंगा के कॉलिफाज़ की अनूठी गुणवत्ता यह है कि एक कॉलिफाज़ बड़ी संख्या में कॉलिफ़ॉर्म खाते हैं. गंगा के कॉलिफाज़ वाइड स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक दवाओं की तरह होते हैं - जिस प्रकार एक एंटीबायोटिक दवाई बड़ी संख्या में जीवाणुओं को मारती हैं उसी प्रकार गंगा का कॉलिफाज़ भी अनेक कीटाणुओं को नष्ट करता है. यही गंगा के “स्व-शुद्ध" करने की क्षमता का रहस्य है. गंगा का पानी कभी खराब नहीं होता है क्योंकि कॉलिफाज़ लगातार कॉलीफ़ॉर्म को खाते रहते हैं. ये विस्तृत स्पेक्ट्रम कॉलिफाज़ गंगा की रेत में रहते हैं और ये अपस्ट्रीम स्ट्रेच में बनते हैं. रेत गंगा के माध्यम से बहती है और इस रेत को टिहरी बांध ने रोक लिया है जिसकी वजह से कॉलिफाज़ भी टिहरी बाँध में कैद हो चुके हैं और समान्य रूप से नदी में नहीं बह रहे हैं.(कॉलिफाज़ पर हमारी पिछली पोस्ट यहाँ देखें).

    NEERI की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि टिहरी बांध के नीचे भी कॉलिफाज़ भी मिलाता है. लेकिन यह कॉलिफाज़ पहले से बह चुकी रेत के कारण है. अब अपस्ट्रीम से डाउनस्ट्रीम प्रवाह में कमी आने के कारण व्यापक स्पेक्ट्रम कॉलिफाज़ की उपस्थिति में भी कमी आई है और गंगा की स्वयं को शुद्ध रखने की क्षमता में भी गिरावट आई है.

    जल की कमी:

    बांधों द्वारा पड़ने वाला तीसरा नकारात्मक प्रभाव है कि बांध के नीचे डाउनस्ट्रीम बगैर पानी के होता है. उदाहरण के लिए विष्णुप्रयाग में देखा गया है कि जलविद्युत परियोजना द्वारा अलकनंदा में पानी बहुत कम मात्रा में छोड़ा जाता है.

    चित्र 5: विष्णुप्रयाग परियोजना के बाद अलकनंदा नदी में पानी बहुत ही कम है

    पानी को बांध से एक सुरंग के माध्यम से निकाला जाता है और बिजली घर की 20 किलोमीटर की दूरी तक लाया जाता है. बांध के नीचे का खंड तब तक सूखा रहता है जब तक कि नदी में अन्य प्राकृतिक श्रोत शामिल न हों. यह सूखा स्ट्रेच नदी में मौजूद सभी जलीय जीवन को मारता है.

    ऊपर चित्र में दिखाया गया है कि श्रीनगर बाँध के नीची पानी साफ है. लेकिन इस पानी में बीमारी फ़ैलाने वाले कीटाणु उत्पन्न हो रहे हैं. इस रुके हुए पानी के कारण शहर के इतिहास में अब तक के सबसे अधिक टायफ़ायड और पीलिया के मरीज़ देखे गए हैं.

     

    चित्र 6: श्रीनगर परियोजना की वजह से श्रीकोट में रुका हुआ अलकनंदा का पानी

    आध्यात्मिकता:

    बांधों से चौथा प्रभाव पानी की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचाना है. जापानी वैज्ञानिक मासारू इमोटो के अध्ययन से पता चलता है कि पानी के अणु एकत्र होते हैं और पानी के बहते समय वे सुंदर या भद्दे पैटर्न बनाते हैं.

    चित्र 7: साफ़ पानी में बनते वाटर क्रिस्टल के सुन्दर पैटर्न
    चित्र 8: रुके हुए दूषित पानी में बनते हुए भद्दे वाटर क्रिस्टल पैटर्न

    साफ़ पानी में बहुत सुन्दर पैटर्न बनते हैं लेकिन बांधों के पीछे रुका हुआ पानी होता है जिसमे कि भद्दे पैटर्न बनते हैं. बाँध के पीछे बने तालाब में पानी सुंदर से बदसूरत पैटर्न में बदल जाता है और तालाब में जो सुंदर पैटर्न बच जाते हैं वे जल के टरबाईन में पड़ने के साथ ही टूट जाते हैं.पूजा के लिए हिंदू गंगाजल को कलश में रख कर मंत्रोच्चारण करते हैं. ये मंत्र पानी में प्रवेश करते हैं. पूजे के अंत में, पुजारी भक्तों पर यही जल छिड़कते हैं.

    चित्र 9: पूजा स्थल में कलश पर रखा हुआ हुआ शुद्ध गंगाजल आत्मशुद्धि के लिए उपयोग होता है

    सिद्धांत यह है कि मंत्र पानी में प्रवेश करते हैं और सुंदर अणु का पैटर्न बनाते है जो आध्यात्मिक रूप से चार्ज किए जाते हैं. जब हम उपासकों पर इस पानी को छिड़कते हैं, तो उस पानी में निहित आध्यात्मिक शक्ति पूजा करने वालों के शरीर में प्रवेश करती है. बांधों से होकर निकलने वाला पानी उसी प्रकार से माना जा सकता है जिस प्रकार गंगाजल को मिक्सी में घुमाकर भक्तों पर छिड़का जाय. क्या वाकई में गंगाजल को मिक्सी में घुमाने के बाद उसकी वही आध्यात्मिक शक्ति बरकरार रहेगी?

    निष्कर्ष यह है कि जलविद्युत परियोजनाओं के चार नकारात्मक प्रभाव होते हैं. सबसे पहले मछलियों और जलीय जीवों को, जो पानी को साफ करते हैं, उन्हें हम नुकसान पहुंचा रहे हैं. दूसरा, कॉलिफ़ॉर्म खाने वाले कॉलिफाज़ कम हो जाते हैं. तीसरा, हाइड्रोपॉवर बांध के नीचे बने तालाब में जहर विकसित किया जा रहा है. चौथा, बांध के पीछे स्थिर जल और टरबाइन अपर्याप्त से नीचे लाए गए आध्यात्मिक शक्तियों को नुकसान पहुंचाते हैं.

    हमें गंगा में जा रहे मलजल को साफ करना चाहिए लेकिन मछलियों, कॉलिफाज़ और आध्यात्मिक शक्तियों की रक्षा करना भी आवश्यक है. केवल नदी की ऊपरी सफाई करने से ही गंगा का उद्धार नहीं हो सकता. इसके लिए आवश्यक है जलविद्युत परियोजनाओं को हटाकर गंगा की वास्तविक शक्तियों को बचाया जा सके.

     

    इस विषय पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को लिखें

  • दावेस में हुए वर्ल्ड इकोनोमिक फ़ोरम द्वारा एक रिपोर्ट जारी की गयी है, जिसमें विश्व के 180 देशों के पर्यावरण की स्थिति का मूल्यांकन किया गया है. रिपोर्ट (वर्ल्ड इकोनोमिक फ़ोरम की रिपोर्ट यहाँ देखें) में बताया गया कि भारत 180 देशों की सूची में 177वें पायदान पर है. हम नेपाल और बांग्लादेश के साथ सबसे निचले पांच देशों में शोभा पा रहे हैं.

     

    रिपोर्ट का विश्लेषण

    रिपोर्ट के अनुसार भारत की न्यून श्रेणी का प्रमुख कारण वायु प्रदूषण है. वायु प्रदूषण के जो प्रमुख कारण रिपोर्ट में बताए गये हैं, उनमे पराली का जलाया जाना और थर्मल पॉवर प्लांटों के लिए कोयले का जलाया जाना विशेषकर  बताया गया है. पराली के जलाये जाने के बारे में आप विस्तृत रूप से यहाँ पढ़ सकते हैं. वर्तमान विषय बिजली उत्पादन में कोयले के जलाने से हो रहे कार्बन उत्सर्जन का है. अमूमन यह माना जाता है कि कोयले से बनी थर्मल पॉवर ज्यादा प्रदूषण फैलाती है जबकि जलविद्युत या हाइड्रोपावर तुलना में कम प्रदूषण फैलाती है. लेकिन वस्तुस्थिति इसके विपरीत है. सच यह है की बिजली के उत्पादन में जितना कार्बन उत्सर्जन कोयले से होता है, लगभग उतना ही या संभवतः उससे ज्यादा उत्सर्जन बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं से होता है.

    रेफेरेंस – वाशिंगटन पोस्ट  (यहाँ देखें)

    बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में एक बाँध बनाया जाता है जिसके पीछे एक बड़ा तालाब बन जाता है जैसा कि सरदार सरोवर, भाखड़ा नांगल या टिहरी डैम में बना है. ऊपर से नदियाँ पानी को इस तालाब में लेकर आती हैं और अपने साथ मरे हुए पशु, पेड़ पौधे इत्यादि ऑर्गेनिक पदार्थ भी लेकर आती है. ये जैविक पदार्थ तालाब में नीचे बैठ जाते हैं और वहां सड़ने लगते हैं. शुरू में यह पानी में उपलब्ध आसपास की ऑक्सीजन को सोखते हैं, और सड़ने से उत्पन्न हुआ कार्बन इस ऑक्सीजन के साथ मिलकर कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) बनाता है और कार्बन डाइऑक्साइड का तालाब से उत्सर्जन होता है. कुछ समय बाद तालाब के नीचे के हिस्से के पानी में ऑक्सीजन की मात्र शून्यप्राय हो जाती है लेकिन आर्गेनिक पदार्थ का सड़ना जारी रहता है. इस सडन से आर्गेनिक पदार्थ में मौजूद कार्बन को ऑक्सीजन नहीं मिल पाती है. वह कार्बन तालाब में मौजूद हाइड्रोजन के साथ मिल कर मीथेन गैस (CH4) बनाती है जैसा नीचे चित्र में दिखाया गया है. यह मीथेन गैस, पर्यावरण के लिए कार्बन डाइऑक्साइड से लगभग 25 गुना अधिक हानिप्रद है:

    In environmental terms, CH4 is a greenhouse gas. It has a Global Warming Potential (GWP) of 25, i.e. 25 times the GWP of CO2, the reference greenhouse gas (the GWP of CO2 = 1) (GWP values from the Intergovernmental Panel on Climate Change (IPCC)'s fourth assessment report published in 2007). Among the greenhouse gases covered by the Kyoto Protocol, CH4 is the second largest contributor to global warming after carbon dioxide (CO2). (रिपोर्ट यहाँ देखें)

    ऐसा प्रमाण मिलता है की बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं के तालाब से निकलने वाली यह कार्बन डाइऑक्साइड एवं मीथेन गैस वास्तव में कोयले से बनी बिजली से ज्यादा नुकसानदेय है. इंटरनेशनल रिवेर्स द्वारा किये गये एक अध्ययन मे पाया गया है कि ब्राज़ील के गरम देश में बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं से एक यूनिट बिजली बनाने के लिए 2154 ग्राम कार्बन डाइऑक्साइड हवा में उत्सर्जित होता हैं. जिसमे लगभग 900 ग्राम कार्बन होता है. कोयले से बिजली बनाने में भी लगभग 800 ग्राम कार्बन प्रति यूनिट बिजली उत्सर्जित होता है (रिपोर्ट यहाँ देखें).अतः गरम क्षेत्रों में बड़ी जलविद्युत  परियोजनाओं से उत्सर्जित कार्बन और कोयले से उत्सर्जित कार्बन लगभग बराबर होता है. इसलिए वर्ल्ड इकनोमिक फोरम  की रिपोर्ट में केवल कोयले का उल्लेख करना और बड़ी जल विद्युत् परियोजनाओं का उल्लेख न करना गलत दिखता है. यहाँ यह स्पष्ट करना जरुरी होगा कि इंटरनेशनल रिवेर्स की उसी रिपोर्ट में कनाडा जैसे ठन्डे देश में बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं से कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन मात्र 36 ग्राम प्रति यूनिट बताया गया है. अतः ऊपर बताई गयी जलविद्युत और थर्मल पॉवर की समानता मुख्यतः गरम क्षेत्रों के लिए लागू होती है जैसा कि सरदार सरोवर बाँध के लिए माना जा सकता है.

     

    हिमालयी क्षेत्रों में परियोजनाए

    भारत में अधिकतर बड़ी जल विद्युत परियोजनाएं  हिमालयी क्षेत्रो में बन रही है. नेशनल इन्वोर्न्मेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टिट्यूट नागपुर(NEERI) द्वारा किये गए एक अध्ययन में पाया गया कि टिहरी झील से 2.5 ग्राम कार्बन डाइऑक्साइड प्रति वर्ग मीटर प्रतिदिन उत्सर्जित हो रहा है और 24 मिलीग्राम मीथेन प्रति वर्ग मीटर प्रतिदिन उत्सर्जित हो रहा है. गणना बताती है कि यह मात्रा लगभग 1200 टन कार्बन प्रतिदिन उत्सर्जित होती है [2.5 ग्राम * 450 वर्ग किलोमीटर मीटर क्षेत्र] .(NEERI की विस्तृत रिपोर्ट यहाँ देखें - पेज 190). अतः इस अध्ययन से स्पष्ट होता है कि हमारी जलविद्युत परियोजनाओं की स्थिति ब्राज़ील के समतुल्य है ना कि कनाडा के समतुल्य यद्यपि हमारी जलविद्युत परियोजनाएं हिमालय की गोद में स्थापित हो रही हैं, इसलिए वर्ल्ड इकनोमिक फोरम की  रिपोर्ट को पढ़ते समय हमें केवल थर्मल पॉवर प्लांटों से उतर्जित कार्बन की चिंता न करके साथ साथ जल विद्युत परियोजनाओं से उत्सर्जित उतनी ही कार्बन और मीथेन की भी चिंता करनी चाहिए.

    वर्ल्ड इकनोमिक फोरम के वायु सम्बन्धी प्रदूषण में बताया गया है कि भारत में हर वर्ष  लगभग 16 लाख लोगों की मृत्यु वायु के प्रदूषण से हो रही है. यह मृत्यु मुख्यत: स्वाश सम्बन्धी रोगों से हो रही है.

    इसके साथ जल विद्युत परियोजनाओं का जन स्वास्थ पर एक और विपरीत प्रभाव पड़ता है. इन परियोजनाओं के पीछे बनी बड़ी झील एवं नीचे सूखी या अर्धसूखी नदी के छोटे छोटे तालाबों में मछर पैदा होते हैं जो कि मलेरिया जैसे संक्रामक रोगों का फैलाव करते हैं. हमने उत्तराखंड के स्वास्थ्य विभाग से सूचना के अधिकार में जानकारी पाई कि उत्तराखंड के सभी जिलों में मलेरिया का प्रभाव कम हो रहा है लेकिन टिहरी जिले में मलेरिया का प्रभाव बढ़ रहा है, जो कि प्रमाणित करता है कि टिहरी जैसे बड़े बांधों से जन स्वास्थ की भी हानि होती है.

    प्रधानमंत्री जी ने वर्ल्ड इकनोमिक फोरम में बड़े जोश से विश्व के निवेशकों को भारत में निवेश करने को कहा. लेकिन वे इस बात को छुपा गए कि उसी वर्ल्ड इकनोमिक फोरम में भारत की पर्यावरण एवं वायु प्रदूषण की बद्दतर स्थिति की भी रिपोर्ट जारी की गयी है. और प्रदूषण की बद्दतर स्थिति में सुधर करने के लिए प्रधानमंत्री जी नें कोई कदम नहीं उठाये हैं. बल्कि वे लाखवार, व्यासी तथा पंचेश्वर जैसी बड़ी परियोजनाओं को बड़े जोर शोर से बढ़ावा दे रहे है.

    हमारी जिम्मेदारी बनती है कि यदि हमें विश्व में अपनी सही पैठ बनानी है, तो आर्थिक विकास के साथ साथ प्रदूषण और जन स्वास्थ की भी रक्षा करनी ही पड़ेगी. इस दृष्टि से देश को जलविद्युत परियोजनाओं का मौलिक पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए जिनसे वायु प्रदूषण एवं जन स्वास्थ पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है.

     

    इस विषय पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को लिखें इस विषय पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को लिखे.   

  • देश की जनता में उत्साह है कि शहरों में प्लास्टिक का इस्तेमाल होना बंद हो रहा है. मान्यता है कि प्लास्टिक पर्यावरण के लिए हानिप्रद है. वह जल्दी से ख़त्म नहीं होता है. उसको पूरी तरह समाप्त होने में चार सौ से एक हज़ार वर्ष तक का समय लग जाता है. इस समस्या से निजाद पाने के लिए सरकार ने गुटखा, पान मसाला आदि पर  प्लास्टिक के पैकेटों पर प्रतिबन्ध लगाया है.

    लेकिन प्लास्टिक का उपयोग कम करने के कारण अब दुकानदार कपड़े अथवा कागज़ के थैलों का उपयोग कर रहे हैं. प्रश्न यह है कि क्या कपडे अथवा कागज़ से बने यह थैले पर्यावरण के लिए उपयुक्त हैं?

     

    प्लास्टिक और कागज का तुलनात्मक अध्ययन

    उत्तरी आयरलैंड की सरकार द्वारा प्लास्टिक बैग और कागज़ के बैगों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया (रिपोर्ट यहाँ देखें). इस रिपोर्ट में बताया गया है कि:

    • प्लास्टिक बैगों की तुलना में कागज़ से बने बैगों के उत्पादन में ऊर्जा ज्यादा लगती है, ग्रीनहाउस गैसें ज्यादा निकलती हैं और पानी का उपयोग बहुत ज़्यादा होता है जैसा नीचे चित्र 2 में दिया गया है.

    • ग्लोबल वार्मिंग का महत्वपूर्ण कारण ओजोन गैस का उत्सर्जन है. प्लास्टिक बैगों की तुलना में कागज़ के थैलों के उत्पादन में ओजोन का उत्सर्जन तीस प्रतिशत अधिक होता है.
    • नीचे चित्र 4 में हम देख सकते हैं कि कागज़ का कूड़ा जब नदियों और तालाबों में जाता है तो प्लास्टिक की तुलना में पानी में निहित ऑक्सीजन का चौदह गुना ज्यादा इस्तेमाल करता है जिससे जलीय जीवों के जीवन पर संकट मंडरा रहा है. तुलना में प्लास्टिक, तालाब के ऑक्सीजन को नहीं सोखता है.

    • प्लास्टिक की तुलना में कागज़ के थैले का वज़न लगभग चार गुना होता है. नीचे चित्र 5 में कागज़ के थैले का वजन 18 मिलीग्राम है जबकि प्लास्टिक के थैले का वजन 4 मिलीग्राम है.अतः प्लास्टिक की तुलना में कागज़ हमारे प्राकृतिक संसाधनों पर ज़्यादा भारी पड़ता है.

    उपरोक्त इन सभी बिन्दुओं पर कागज़ के थैले प्लास्टिक की तुलना में ज्यादा हानिप्रद हैं. प्लास्टिक का एक मात्र लाभ यह है कि कूड़े की तरह फेंकने पर प्लास्टिक का थैला समाप्त नहीं होता है जबकि कागज़ का थैला जल्दी सड़ कर के पर्यावरण में घुल-मिल जाता है.अतः कागज़ के थैलों का समग्र पर्यावरणीय प्रभाव प्लास्टिक के थैलों से बहुत अधिक है.

     

    प्लास्टिक का पुनः इस्तेमाल

    प्लास्टिक के उपयोग की एक मात्र समस्या कूड़े की है. इसे पुनरुपयोग या रीसायकल कर के इस समस्या से बचा जा सकता है. अतः हमको प्लास्टिक के थैलों का उपयोग बढाकर इनके रीसायकल करने पर ध्यान देना चाहिए जैसा नीचे चित्र 6 में दिखाया गया है.

    हमारे देश में लाखों लोग सड़कों एवं रेलवे लाइनों के बगल में फेंके हुए प्लास्टिक के थैलों इत्यादि को बटोरते हुए दिखते हैं. इनको सम्मान देना चाहिए और इनके लिए समुचित व्यवस्था करनी चाहिए. लोगों द्वारा प्लास्टिक के थैलों को सडकों और रेलवे लाइनों के किनारे फेंके जाने का मुख्य कारण यह है कि कूड़ेदानो की समुचित व्यवस्था नहीं होती है. मजबूरन लोगों को प्लास्टिक के थैले खुले में फैंकने पड़ते हैं. अतः हमें कूड़ेदानों की उचित व्यवस्था करनी चाहिए. केंद्र सरकार नें नगर पालिकाओं को इस प्रकार की व्यवस्था के लिए आदेश पारित किये हैं परन्तु धन न होने के कारण नगरपालिकाओं के लिए इस कार्य को करना कठिन है. अतः हमको प्लास्टिक के थैलों पर टेक्स लगाना चाहिए और उस रकम से प्लास्टिक को रीसायकल करने की उचित व्यवस्था करनी चाहिए.

    हमारा सभी नागरिकों से आग्रह है कि प्लास्टिक के थैलों का बहिष्कार करने के स्थान पर इनको रीसायकल करने पर ध्यान दें.

    यह पोस्ट डॉ भरत झुनझुनवाला, देबादित्यो सिन्हा, स्वामी शांतिधर्मानंद और विमल भाई द्वारा समर्थित है.

     

     

    इस विषय पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को लिखें

  • कहानी उत्तराखंड में 1985 में शुरू होती है. उस समय गंगा की मुख्य धारा अलकनंदा पर श्रीनगर के पास एक जलविद्युत परियोजना को पर्यावरण मंत्रालय नें स्वीकृति दी थी. लेकिन इस परियोजना का निर्माण वर्ष 2006  में शुरू हुआ. परियोजना पर निर्माण शुरू होने से पहले ही वर्ष 2004 में पर्यावरण मंत्रालय नें एक अध्यादेश (यहाँ देखें) जारी किया जिसमे कहा था कि वर्ष 2004 तक जिन परियोजनाओं का निर्माण प्लिन्थ तक न हुआ हो उन्हें नयी पर्यावरण स्वीकृति लेनी होगी. चूंकि श्रीनगर परियोजना का निर्माण 2006 में शुरू हुआ था इसलिए इस परियोजना को उक्त अध्यादेश के अनुसार नयी पर्यावरण स्वीकृति लेनी थी.

    इस मुद्दे को उत्तराखंड के नैनीताल हाईकोर्ट में उठाया गया. चीफ जस्टिस बारिन घोष नें नवम्बर 2011 (निर्णय यहाँ देखें) में निर्णय दिया कि 2004 के अध्यादेश के मद्देनजर परियोजना की पर्यावरणीय स्वीकृति रद्द हो चुकी थी. उन्होंने पर्यावरण मंत्रालय को आदेश दिया कि नयी जन-सुनुवाई करके तय करे कि पुरानी पर्यावरण स्वीकृति को रद्द करना है, जारी रखना है, या फिर उसमे परिवर्तन करना है. बताते चलें कि पर्यावरण स्वीकृति लेने का एक प्रमुख अंग जन-सुनुवाई होता है. सरकार द्वारा स्थानीय जनता को सुना जाता है और उनकी आपत्तियों और विचारों को ध्यान में रख कर ही तय किया जाता है कि पर्यावरण स्वीकृति दी जाएगी या नहीं. अतः वर्ष 2004 के अध्यादेश के अनुसार परियोजना की पर्यावरण स्वीकृति पर निर्णय लेने की प्रक्रिया के प्रथम चरण में जनसुनुवाई की जानी थी. परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों का पुनः आंकलन करना था और नयी स्वीकृति देनी थी. लेकिन इस परियोजना को लागू करने वाली जीवीके कंपनी नें बिना नयी पर्यावरण स्वीकृति लिए परियोजना का निर्माण 2006 में शुरू कर दिया जैसा कि चित्र 1 में दिया गया है.

    नैनीताल हाईकोर्ट के आदेश के विरुद्ध जीवीके कंपनी सुप्रीम कोर्ट पहुंची. जीवीके की अपील जस्टिस दीपक मिश्रा के साथ दो अन्य जजों द्वारा जनवरी 2012 में सुनी गयी. जस्टिस दीपक मिश्रा नें पहली सुनवाई को ही निर्णय दिया कि नयी पर्यावरणीय स्वीकृति जरुरी है या नहीं इसको बाद में तय किया जायेगा परन्तु फिलहाल परियोजना का निर्माण निर्बाध जारी रहेगा. इस प्रकार उन्होंने ऐसी परियोजना जिसका निर्माण पर्यावरण मंत्रालय के 2004 के अध्यादेश के विरुद्ध हो रहा था उसको जारी करा दिया.

    जुलाई 2012 में एक और सम्बंधित मुद्दा उठाया गया. मई 2011 में पर्यावरण मंत्रालय द्वारा परियोजना के काम को रोक दिया गया था चूँकि परियोजना द्वारा 1985 की पर्यावरण स्वीकृति की शर्तों का उलंघन किया जा रहा था (ऑर्डर यहाँ देखें). यह मामला जस्टिस के.एस.राधाकृष्णन और जस्टिस दीपक मिश्रा नें सुना. उन्हें बताया गया कि जीवीके कंपनी नें जनवरी 2012 में जब कार्य निर्बाध चलने का ऑर्डर दिया गया था उस समय GVK ने जून 2011 के पर्यावरण मंत्रालय किए आदेश को जानबूझ कर सुप्रीम कोर्ट से छुपाया था. इस प्रकार परियोजना के सम्बन्ध में दो अंतर्विरोधी ऑर्डर थे. एक तरफ पर्यावरण मंत्रालय का जून 2011 का आर्डर था जिसमे परियोजना पर काम रोकने का आदेश था और दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट का जनवरी 2012 का ऑर्डर था जिसमे कार्य को निर्बाध चलने देने का आदेश दे दिया था. जस्टिस के.एस.राधाकृष्णन  और दीपक मिश्रा नें इस अंतर विरोध को हल नहीं किया बल्कि इसे उलझाकर ऑर्डर दे दिया कि पर्यावरण मंत्रालय रिपोर्ट देगा कि उसके द्वारा दिए गए ऑर्डर का अनुपालन हो रहा है या नहीं. यानि पर्यावरण मंत्रालय के काम रोको आदेशों को नजरअंदाज करते हुए कार्य को जारी रखने का आदेश दे दिया.

    अगस्त 2013 (निर्णय यहाँ देखें) में इस अपील का सुप्रीम कोर्ट नें निर्णय दिया. जस्टिस के.एस.राधाकृष्णन और दीपक मिश्रा की पीठ नें निर्णय दिया कि जन-सुनुवाई का उद्देश्य केवल परियोजना के सम्बन्ध में सुरक्षात्मक उपाय सुझाने का होता है. चूंकि परियोजना निर्माण अब काफी आगे तक हो  चुका था इसलिए इस समय जन-सुनुवाई करने का कोई औचित्य नहीं है. अतः उन्होंने परियोजना को हरी झंडी दे दी. उन्होंने अपने निर्णय में इस बात का उल्लेख भी नहीं किया कि परियोजना का निर्माण जून 2011 के पर्यावरण मंत्रालय के काम रोको आदेश के विरोध में एवं 2004 के अध्यादेश के विरोध में हो रहा था. इस प्रकार एक असंवैधानिक परियोजना को आपने चलने दिया.

    अगस्त 2013 में निर्णय देने के पूर्व जून 2013 में उत्तराखंड में आपदा आ चुकी थी. अगस्त 2013 के ऑर्डर में जस्टिस के.एस.राधाकृष्णन एवं दीपक मिश्रा नें यह आदेश भी पारित किया कि उत्तराखंड सरकार द्वारा एक कमिटी बनाकर जांच की जाएगी कि जलविद्युत परियोजना का आपदा में योगदान था या नहीं और तब तक के लिए केंद्र अथवा उत्तराखंड सरकार द्वारा कोई नयी पर्यावरण स्वीकृति जारी नहीं की जाएगी.

    मई 2014 में पर्यावरण मंत्रालय नें उपरोक्त रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रस्तुत किया. रिपोर्ट में कहा गया था कि जलविद्युत परियोजनाओं के कारण आपदा की भीषणता में वृद्धि हुई थी. इसी समय एक और रिपोर्ट वाइल्ड लाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इण्डिया द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गयी. उस रिपोर्ट में कहा गया था कि उत्तराखंड में निर्माणाधीन अथवा प्रस्तावित 24 जलविद्युत  परियोजनाओं का जैव विविधता पर विशेष दुष्प्रभाव पड़ेगा. इस रिपोर्ट के आधार पर जस्टिस के.एस.राधाकृष्णन एवं दीपक मिश्रा नें इन 24 परियोजनाओं पर कार्य को रोक दिया. इसके बाद जस्टिस के.एस.राधाकृष्णन सेवानिवृत्त हो गये.

    वर्ष 2015 में मामला पुनः सुप्रीम कोर्ट में लिया गया जिसे जस्टिस दीपक मिश्रा एवं जस्टिस यू.यू.ललित द्वारा सुना गया. उन्होंने जस्टिस के.एस.राधाकृष्णन द्वारा पूर्व में दिए गए आदेश कि “राज्य सरकार द्वारा उत्तराखंड में कोई भी नयी पर्यावरण स्वीकृति नहीं दी जाएगी” का परिवर्तन कर दिया. इन्होने कहा कि यह आदेश अब या तो अलकनंदा भागीरथी बेसिन मात्र पर लगेगा अथवा केवल 24 परियोजनाओं पर लगेगा. अन्य परियोजनाओं को पर्यावरणीय स्वीकृति दी जा सकती है.

    अब हम मामले से जुड़े तीन जजों की भूमिका का आंकलन कर सकते हैं. उत्तराखंड हाईकोर्ट के जस्टिस बारीन घोष नें 2004 के अध्यादेश के विरोध में चल रहे निर्माण को स्वीकार किया और नयी पर्यावरण स्वीकृति लेने के लिए आदेश दिया इसलिए उनकी भूमिका सकारात्मक थी. 

    जस्टिस के.एस.राधाकृष्णन नें श्रीनगर परियोजना को पर्यावरण मंत्रालय के आदेश के एवं 2004 के अध्यादेश के बावजूद परियोजना को चलते रहने का आदेश दिया, यह उनकी नकारात्मक भूमिका थी. साथ में उन्होंने 24 परियोजनाओं को रोका जो उनकी सकारात्मक भूमिका थी. यह माना जा सकता है कि उनकी भूमिका मिली-जुली थी.

    जस्टिस दीपक मिश्रा नें जनवरी 2011 में परियोजना का निर्माण निर्बाध चलते रहने का आदेश दिया, फिर 2013 में श्रीनगर परियोजना को चलते रहने का आदेश दिया और अंत में उत्तराखंड के सभी क्षेत्रों पर लागू जस्टिस के.एस.राधाकृष्णन के ऑर्डर को समेटकर 24 परियोजनाओं तक सीमित कर दिया. इस प्रकार उनकी भूमिका गंगा के प्रति नकारात्मक रही है.

  • सरकार द्वारा “नमामि गंगे” कार्यक्रम चलाया जा रहा है जिसके तीन मुख्य बिंदु हैं. पहला, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाकर गंदे पानी की सफाई करना. दूसरा, नदी में पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित करना तथा तीसरा, खेती में उपयोगिता सुधार कर पानी की मांग को कम करना. इसके सामानांतर चल रहे “रैली ऑफ़ रिवर्स” द्वारा पेड़ लगाकर नदी के संरक्षण की बात की जा रही है. इन सभी मंतव्यों का स्वागत है. लेकिन नदियों की मुख्य समस्याओं को इनके द्वारा नज़रंदाज़ किया गया है. (नमामि गंगे और रैली फॉर रिवर्स के वक्तव्य देखें)

    पहली समस्या नदी में प्रदूषण की है. “नमामि गंगे” के अनुसार सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों को प्राइवेट पार्टियों के सहियोग से लगाया जायेगा. लेकिन समस्या यह है कि वर्त्तमान में लगे हुए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट ही नहीं चल पा रहे हैं क्योंकि नगरपालिकाओं को इन्हें चलाने में खर्च ज्यादा आता है. अतः नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लग भी जाएँ तो ये भी नहीं चलेंगे क्योंकि इन्हें चलाने में भी नगरपालिकाओं की रूचि नहीं होगी. सही उपाय यह है कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से निकले साफ़ पानी को केंद्र सरकार खरीदे और किसानों को सिंचाई के लिए उपलब्ध कराये. तब प्राइवेट पार्टियों को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट चलाने में लाभ होगा. जिस प्रकार प्राइवेट पार्टियां थर्मल प्लांट लगाकर बिजली बोर्डों को बिजली की सप्लाई कर रही हैं उसी प्रकार प्राइवेट पार्टियां सिवेज को साफ़ करके साफ़ पानी को राज्यों के सिंचाई विभाग को उपलब्ध करा सकती हैं. चूंकि साफ़ पानी के खरीद की कोई योजना नहीं है इसलिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की योजना फेल होगी.

    “नमामि गंगे” का दूसरा बिंदु है कि प्रदूषण फ़ैलाने वाले पुराने उद्योगों को बंद किया जायेगा और नए उद्योगों के लिए नयी नीति बनाई जायेगी. लेकिन नीति क्या बनाई जायेगी इसकी स्पष्टता नहीं है. देश की जानी मानी IITs द्वारा बनाये गए गंगा संरक्षण के प्रोग्राम में सुझाव दिया गया है कि सरकार को सभी उद्योगों को “जीरो लिक्विड डिस्चार्ज” की पालिसी पर लाना चाहिए. उन्हें इस बात पर मजबूर करना चाहिए कि पानी को बार बार साफ़ करके उपयोग करते रहें जब तक कि वह ख़त्म न हो जाये. एक बूंद भी पानी का भी वे निस्तारण न करें. लेकिन जीरो लिक्विड डिस्चार्ज के प्रति “नमामि गंगे” मौन है. इसलिए राज्यों के प्रदूषण बोर्डों और उद्योगों की मिलीभगत से गन्दा पानी निकलता रहेगा और पुरानी कहानी जारी रहेगी.

    “रैली ऑफ़ रिवर्स” का कहना है कि पेड़ लगाने से पानी की गुणवत्ता में सुधर आएगा. यह बात सही है लेकिन पर्याप्त नहीं है. “रैली ऑफ़ रिवर्स” का कार्यक्रम नदियों के किनारे दोनों तरफ एक किलोमीटर तक पेड़ लगाने का है. अगर हम गंगा बेसिन को लें तो लगभग 15,000 वर्ग किलोमीटर भूमि में पेड़ लगेंगे. लेकिन यह पूरे क्षेत्र की तुलना में ऊंट के मुह में जीरा जैसा है. उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल में राज्यों का कुल क्षेत्रफल 484,000 वर्ग किलोमीटर है. इसलिए कुल क्षेत्र के केवल 3 प्रतिशत भूमि में वनीकरण होगा. पानी की गुणवत्ता में मामूली सा ही सुधर होगा. इसलिए “नमामि गंगे” और “रैली फॉर रिवर्स” द्वारा नदियों को साफ़ करने का प्रयास फेल होगा.

    तीसरा बिंदु नदी के बहाव का है. दोनों कार्यक्रमों का कहना है कि पेड़ लगाने से नदी के जलस्तर में वृद्धि होगी. यह बात सही है. वर्षा का पानी पेड़ों की जड़ों से जमीन के अन्दर समा जाता है और जब नदी का जलस्तर कम होता है तो वह बगल की जमीन से नदी में बहकर नदी को पुनर्जीवित करता है.  लेकिन पुनः प्रश्न वही है कि केवल 3 प्रतिशत भूमि में वनीकरण भी भी ऊंट के मुह में जीरा होगा.

    “नमामि गंगे” ने यह भी कहा है कि पर्यावरणीय प्रवाह को सुनिश्त किया जायेगा. लेकिन वर्त्तमान एनडीए सरकार के चार वर्ष बीत चुके हैं और नेशनल ग्रीन ट्रेबुनल (NGT) द्वारा आदेश दिए जाने के बावजूद सरकार नें जल विद्युत परियोजनाओं और सिंचाई परियोजनाओं से पर्यावरणीय प्रवाह छोड़ने को तनिक भी कदम नहीं उठाया है.

    “नमामि गंगे” ने कहा है कि सिंचाई की गुणवत्ता सुधारने का काम किया जायेगा. उतने ही पानी से अधिक क्षेत्र में सिंचाई करने का प्रयास किया जायेगा. यह मंतव्य बिलकुल सही है, लेकिन इससे सिंचाई का क्षेत्रफल बढेगा न कि पानी की मांग घटेगी. जैसे यदि आज दस किलोमीटर में दस बार सिंचाई हो रही है तो कल उतने ही पानी से बीस वर्ग किलोमीटर में दस बार सिंचाई हो जाएगी, लेकिन पानी का उपयोग पूर्वत रहेगा. इसलिए नदी को पुनर्जीवित करने में यह कार्यक्रम असफल रहेगा.

    दो बिन्दुओं पर “नमामि गंगे”  और “रैली फॉर रिवर्स” दोनों मौन हैं. पहाड़ी क्षेत्रों में नदियों पर जलविद्युत परियोजनाएं बनाने से मछलियों का आवागमन अवरुद्ध हो रहा है. जैव विविधता पर विपरीत प्रभाव पढ़ रहा है. इसके लिए जरुरी है कि जल विद्युत परियोजनाओं को री-डिजाईन किया जाए और नदी की एक धारा को निरंतर बहना सुनिश्चित किया जाए. इसके ऊपर दोनों कार्यक्रम मौन हैं. फरक्का बराज पर भी दोनों कार्यक्रम मौन ही हैं. फरक्का के कारण पानी और गाद में असंतुलन बन रहा है. हूगली को आधा पानी लेकिन गाद कम मिल रही है. बांग्लादेश को आधा पानी लेकिन गाद ज्यादा मिल रही है. हूगली में  गाद कम आने से सुंदरबन में कटाव हो रहा है. बांग्लादेश में गाद ज्यादा जाने से बाढ़ ज्यादा हो रही है. दोनों ही कार्यक्रम इस समस्या पर मौन हैं. इसका उपाय यह हो सकता है कि फरक्का बैराज को री-डिजाईन किया जाए जिससे कि पानी के साथ साथ गाद का भी बराबर बराबर वितरण हो. इस सन्दर्भ में हमारी पिछली पोस्ट यहाँ पढ़ें.

    हमारा मानना है “नमामि गंगे”  और “रैली ऑफ़ रिवर्स” गंगा की समस्याओं को हल करने में पूर्णतया विफल होंगी. इनका मंतव्य केवल ऊपरी कार्य करने का है जिससे जनता को लगे कि सरकार गंगा को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रही है यद्यपि गंगा न तो अविरल होगी और न ही निर्मल होगी.

  • स्मार्ट सिटी देहरादून के प्रस्ताव का सुखद पक्ष है कि शहर को एक नोलेज हब के रूप में विकसित किया जाएगा. इसके अंतर्गत साइकिल ट्रैक, सडकों का चौड़ीकरण, अतिक्रमण को दूर करना, स्ट्रीट लाईट की व्यवस्था, इत्यादि किया जाना है. सरकार के इस मंतव्य का हम भरपूर स्वागत करते हैं. हमारा मानना है कि भारत के आर्थिक विकास के लिए सेवा क्षेत्र ही सबसे ज्यादा उपयुक्त है और नोलेज हब को बनाना इस दिशा में सही कदम है.

    स्मार्ट सिटी प्रस्ताव में पर्यावरण सम्बंधित दो विषयों पर विशेष ध्यान देने की जरुरत है. पहला विषय शहर के हरित क्षेत्रों का है. स्मार्ट सिटी प्रस्ताव में बताया गया है कि देहरादून के हरित क्षेत्र वर्ष 2004 में 22 प्रतिशत से घट कर वर्ष 2009 तक 15 प्रतिशत रह गए हैं. (इस सन्दर्भ में स्मार्ट सिटी प्रस्ताव पेज न. 9 नीचे देखें).

    प्रस्ताव में कहा गया है कि हरित क्षेत्र को रेट्रोफिट किया जायेगा यानि उसको पुनर्जीवित किया जायेगा. प्रस्ताव में शहर के 29,350 लोगों का सर्वेक्षण दिया  गया है. सर्वे में 8 प्रतिशत लोगों ने जोन 4 को प्राथमिक बताया है जबकि 67 प्रतिशत लोगों नें जोन 4 + ग्रीनफील्ड - टी स्टेट एरिया को प्रमुखता दी है (जानकारी के लिए चित्र देखें). इसका अर्थ हुआ की ग्रीनफ़ील्ड क्षेत्र को 59 प्रतिशत लोग प्राथमिकता दे रहे हैं.

    अर्थात देहरादून के लोग चाहते हैं कि ग्रीनफ़ील्ड को प्राथमिकता से विकसित किया जाय. इस पृष्टभूमि में हम देख सकते हैं कि स्मार्ट सिटी प्रस्ताव में हरित क्षेत्र को बढ़ाने के लिए क्या कहा गया है?

    स्मार्ट सिटी प्रस्ताव में पार्कों में वृक्षारोपण करने की बात मात्र कही गयी है और रिस्पन्ना के लिए बनाई गयी इको टास्क फ़ोर्स द्वारा नदी किनारे वृक्ष लगाने की बात की जा रही है जिसका हम स्वागत करते हैं.

    यह वृक्षारोपण उन्ही क्षेत्रों में किया जायेगा जहाँ वर्तमान में वृक्षारोपण हुए हैं. अर्थात उनका घनत्व बढाया जायेगा. इस प्रकार के वृक्षारोपण से हरित क्षेत्र नहीं बढेगा. हरित क्षेत्र को पुनः 15 से 22 प्रतिशत या इससे भी अधिक बढाने की बात प्रस्ताव में कही ही नहीं गयी है. जरुरत थी कि जिन क्षेत्रो में वृक्षों के काटे जाने के कारण हरित क्षेत्र 22 से 15 प्रतिशत हो गया है, उसमे वापस ग्रीन कवर को पुनः वापस स्थापित किया जाता. यदि पूर्व के हरित क्षेत्र में सड़क या मकान बना दिए गए हैं, तो इन्हें हटा कर उस क्षेत्र को पुनः हरित क्षेत्र में बदलना था.वास्तविकता यह है की हरित क्षेत्र पर स्मार्ट सिटी मौन है.

    दूसरी समस्या पानी की है. देहरादून में कई प्रसिद्द नदियाँ बहती हैं जिनमे प्रमुख रिस्पन्ना नदी है. आज रिस्पन्ना नदी पूरी तरह सूखी हुई है.

    रिस्पन्ना नदी का उद्गम मसूरी के पास की पहाड़ियों से होता है. वहां पर प्राकृतिक स्रोतों से पानी अभी भी निकलता है और रिस्पन्ना नदी में बहता है. लेकिन नीचे पहुँचने के साथ यह पानी देहरादून की जलापूर्ति के लिए निकाल लिया जाता है.(जलापूर्ति की रिपोर्ट नीचे देखें)

    रिस्पन्ना को पुनर्जीवित करने के लिए पानी निकालना बंद या कम करना होगा. इसके लिए देहरादून में जल आपूर्ति के लिए वैकल्पिक जल स्रोत ढूँढने होंगे. जैसे ऋषिकेश से गंगा नदी के पानी को देहरादून लाया जा सकता है. लेकिन देहरादून के स्मार्ट सिटी प्रस्ताव में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है. इसका अर्थ यह है कि रिस्पन्ना का पानी निकाला जाता रहेगा और नदी पुनः जीवित नहीं होगी.

    रिस्पन्ना नदी के सूखने का दूसरा कारण है कि मैदानी इलाकों में ट्यूबवेल अत्यधिक मात्रा में लगा दिए गए हैं जिसके कारण भूमिगत जल का स्तर नीचे गिर गया है. नदी में आने वाला पानी शीघ्र ही नीचे समा जाता है. इसके लिए जरूरी है कि रिस्पन्ना नदी के 8 से 10 किलोमीटर तक के क्षेत्र में ट्यूबवेल को बंद कर दिया जाय अथवा उनकी गहराई को सीमित कर दिया जाए जिससे कि रिस्पन्ना के क्षेत्र में भूमिगत जल लबालब भरा रहे और रिस्पन्ना का पानी नीचे समाये. तब ही रिस्पन्ना जीवित होगी. लेकिन इस विषय पर भी देहरादून स्मार्ट सिटी प्रस्ताव पूर्णतया खामोश है.

    रिस्पन्ना नदी की तीसरी समस्या अतिक्रमण की है.(अतिक्रमण की रिपोर्ट यहाँ देखें) रिस्पन्ना के मार्ग पर झुग्गी झोपड़ियाँ, मकान और गाड़ियों की पार्किंग बड़ी मात्र में हो रही है, जिसके कारण नदी की आसपास की भूमि में प्रदूषण समा जाता है. जब कभी भी नदी में पानी आता है तो इस प्रदूषण से जल स्वयं प्रदूषित हो जाता है. यानि भूमिगत प्रदूषण से नदी का पानी प्रदूषित होने लगता है जैसा कि ओस्मोसिस प्रक्रिया में होता है. 

    नदियाँ केवल पानी ही नहीं लाती हैं बल्कि शहर के सौन्दर्य, शहर का वातावरण, शहर के भूजल को  संतुलित करती हैं. अतः वर्तमान प्लान स्मार्ट कोटी के सौंदर्य एवं जीवन के विपरीत है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है. जैसा कि नीचे चित्र में देखा जा सकता है  कि स्मार्ट सिटी के प्रस्ताव में नदी को पुनर्जीवित करने की बात पांचवें पाएदान पर लिखी गयी है जिसका कोई विस्तार नहीं दिया गया है.

    रिस्पन्ना नदी बहती है तो शहर का सौन्दर्य नोलेज हब बनाने में भी सहायक होगा. अगर शहर सुन्दर होगा तो यहाँ शिक्षा और सॉफ्टवेयर पार्क बनाने को लोग उत्सुक होंगे.

    पर्यावरण सम्बन्धी इन खर्चों को हमें नुकसानदेह नहीं समझना चाहिए बल्कि यह देखना चाहिए कि यदि शहर का पूरा चित्र सौन्दर्यमयी हो जाता है, नदियाँ बहती हैं, उसके किनारे पार्कों में हरियाली रहती है, लोगों का परस्पर आवागमन रहता है तो हमें शहर को नोलेज हब बनाने में मदद मिलेगी.

     

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    सम्बंधित रिपोर्ट:

  • इस पोस्ट में हम पूर्व प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह एवं वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के गंगा के प्रति कार्यों का तुलनात्मक अध्ययन करेंगे.

    श्री मनमोहन सिंह कहा करते थे कि गंगा मेरी माँ है. प्रधानमंत्री का पद ग्रहण करने के शीघ्र बाद श्री नरेन्द्र मोदी ने भी कहा था कि गंगा ने मुझे बुलाया है, अब हमें गंगा से कुछ भी लेना नहीं, बस देना ही है.आइये अब देखें इन्होंने अपने अपने कार्यकाल में गंगा के लिए क्या किया है.

    टिहरी बांध:

    टिहरी बाँध का निर्माण नरसिम्हाराव की कांग्रेस सरकार के दौरान शुरू हुआ था. इसके बाद वाजपेयी जी की सरकार 1999 में सत्ता में आई और उस समय प्रश्न उठा कि क्या गंगा पर बाँध बनाने से गंगा की आध्यात्मिक शक्ति पर दुष्प्रभाव पड़ता है?  इस विषय पर तथा टिहरी के भूकंप सम्बन्धी सम्भावनाओं  को देखने के लिए श्री मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता में वाजपेयी जी ने एक कमिटी बनाई थी. इस कमिटी में चार सदस्य विश्व हिन्दू परिषद् के लिए गए थे. (1.रिपोर्ट नीचे देखें). इस कमिटी ने भूगर्भीय दृष्टिकोण से टिहरी को हरी झंडी दे दी थी और गंगा की आध्यात्मिक शक्ति के विषय में कमिटी नें कहा कि दस सेंटीमीटर (लगभग 4 इंच) की एक पाइप बाँध में डाल दिया जायेगा जो गंगा की अविरलता को सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त होगी.

    चार इंच के पाइप से झील में सड़ने वाले पानी निकलने को अविरलता मान लिया गया. यहाँ देखने की बात यह है कि अविरलता की जरुरत मुख्यतः इसलिए होती है कि रुका हुआ पानी सड़ने लगता है और उसकी आध्यात्मिक शक्ति ख़त्म हो जाती है. बाँध के अवरोध से मछलियां भी आवाजाही नहीं कर पाती और कमजोर हो जाती हैं. टिहरी बाँध के ऊपर अब महसीर मछली नहीं पाई जाती है.जिसकी वजह से पानी की गुणवत्ता में गिरावट आती है. चार इंच के पाइप से न तो पानी की सड़न कम होती है और न ही मछलियों का आवागमन होता है.

    गंगा के लिए समर्पित सानंद स्वामी जी (डॉ जी डी अग्रवाल, पूर्व प्रोफेसर, आई आई टी कानपुर) का कहना है कि मुरली मनोहर जोशी की इस रिपोर्ट के बाद ही टिहरी के ऊपर लोहारी नागपाला, भैरव घाटी और पाला मनेरी के बांधों को भी शुरू करने का क्रम हुआ. उनका मानना है कि भाजपा और विश्व हिन्दू परिषद् के सदस्यों ने जब मान लिया कि बाँध बनाने से गंगा की आध्यात्मिक शक्ति का ह्रास नहीं होगा तब गंगा पर दूसरे बांधों को बनाने का रास्ता खुल गया. यद्यपि जोशी रिपोर्ट मूलतः टिहरी बाँध के विषय में थी परन्तु इसका दीर्घकालिक प्रभाव हुआ और गंगा के ऊपर अन्य परियोजनाएं भी शुरू हो गयी.

    NGRBA:

    श्री सानंद स्वामी जी द्वारा गंगा के लिए किये गए अनशन के फलस्वरूप श्री मनमोहन सिंह ने 2009 में “नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी” का गठन किया. इस अथॉरिटी में दस विशेषज्ञ सदस्यों को पूर्ण सदस्य बनाया गया था. इन सदस्यों में श्री राशिद सिद्दकी, सुनीता नारायण, राजेंद्र सिंह, बी डी त्रिपाठी, आर के सिन्हा जैसे गंगा के ऊपर श्रद्धा से काम करने वाले व्यक्ति समिलित थे. वर्ष 2016 में श्री नरेंद्र मोदी की सरकार नें इस प्रारूप को निरस्त करके नया प्रारूप जारी किया जिसमे ऑथोरिटी के सदस्य केवल मुख्यमंत्री एवं केंद्रीय मंत्री रह गए और व्यवस्था की गई कि एक्सपर्ट्स से चर्चा की जा सकती है. यानि गंगा के बारे में जानकार लोगों का पद सदस्य से घटाकर केवल मांगे जाने पर सुझाव देने का रह गया.  (2.रिपोर्ट नीचे देखें)

    तीन परियोजनाएं:

    सानंद स्वामी जी के ही अनशन के फलस्वरूप श्री मनमोहन सिंह ने गंगा की मुख्य धारा भागीरथी पर निर्माणाधीन तीन जल विद्युत परियोजना पाला मनेरी, भैरव घाटी और लोहारी नागपाला को निरस्त कर दिया (3.रिपोर्ट नीचे देखें). इसके सामने मोदी जी की सरकार के प्रमुख मंत्री श्री नितिन गडकरी नें कहा कि उनका प्रयास रहेगा कि बंद हुई परियोजनाओं को पुनः शुरू किया जाएगा.

    हाल ही में केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री ने बयान दिया है कि गंगा पर अब कोई नयी परियोजनाएं शुरू नहीं की जाएँगी. साथ साथ उन्होंने यह भी कहा है कि रुकी हुई परियोजनाओं का काम जल्द शुरू किया जाएगा. अतः यह स्पष्ट नहीं है कि श्री मनमोहन सिंह द्वारा निरस्त की गई उपरोक्त तीनो परियोजनाओं पुनः शुरू किया जायेगा या नहीं.

    आईआईटी:

    मनमोहन जी की सरकार नें सात IIT के कंसोर्टियम को गंगा रिवर बेसिन मैनेजमेंट प्लान बनाने का कार्य दिया था. IITs नें यह प्लान बनाकर जनवरी 2015 में केंद्र सरकार को सौंप दिया. इस प्लान में कहा गया था कि गंगा को पुनर्जीवित करने के लिए उसकी लोंगीटयुडनल कनेक्टिविटी यानि उसके प्रवाह की प्राकृतिक निरंतरता बनाये रखना जरुरी है

    (dams and barrages must permit longitudinal connectivity and allow E-Flows (Environmental Flows) in rivers. Towards this end, a method for ensuring longitudinal river connectivity with E-Flows passage through dams/barrages is suggested. A comprehensive set of criteria has also been proposed to define environmental clearance requirements for dams/ barrages based on 4 categories of their environmental impacts. - Ganga River Basin Management Plan - 2015). (4.रिपोर्ट नीचे देखें)

    IITs नें कहा कि ऐसे किसी भी प्रोजेक्ट को स्वीकृति नहीं दी जानी चाहिए जिससे कि गंगा की लोंगीटयुडनल कनेक्टिविटी या अविरल धारा बाधित होती है. लेकिन आज सरकार इस रिपोर्ट का कोई जिक्र नहीं करती है और न ही इसपर कोई  निर्णय लिया है. इस संबंद में CAG ने कहा है:

    “National Mission for clean ganga could not finalise the long-term action plans even after more than six and half years of signing of agreement with the consortium of Indian Institute of Technology. As a result, National Mission of Clean Ganga does not have a river basin management plan even after a lapse of more than eight years of National Ganga River Basin Authority notification” -  CAG report 2016). (रिपोर्ट नीचे देखें)

    पर्यावरणीय प्रवाह:

    श्री मनमोहन सिंह सरकार नें गंगा के ऊपर निर्माणाधीन जल विद्युत परियोजनाओं पर विचार करने के लिए श्री बी के चतुर्वेदी की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई थी. इस कमेटी नें निर्णय लिया कि जलविद्युत परियोजनाओं को 20 से  30 प्रतिशत पानी, पर्यावरणीय प्रवाह के रूप में निरंतर छोड़ना होगा. (रिपोर्ट नीचे देखें). नेशनल ग्रीन ट्रेबुनल में दायर की गयी एक याचिका में केरल सरकार ने कहा है कि पर्यावरण मंत्रालय द्वारा इन संस्तुति के अनुसार पर्यावरणीय प्रवाह छोड़ने की शर्त लगयी जा रही है:

      "Ministry of Environmental, forest and Climate Change (MoEF&CC) is suggesting “Minimum environmental flow release would be 20% of average of four months of lean period and 20% to 30% of flows during non-lean and non-monsoon period corresponding to 90% dependable year. The cumulative environmental flow releases including spillage during the monsoon period should be about 30% of the cumulative inflows during the monsoon period coressponding to 90% dependable year” while according environmental clearance from hydro electic projects." (रिपोर्ट नीचे देखें)

    इसके सामने चार साल बीत जाने के बाद भी वर्तमान में चल रहे जल विद्युत परियोजना जैसे टिहरी, विष्णुप्रयाग, मनेरी भाली इत्यादि से 20 से 30 प्रतिशत पर्यावरणीय प्रवाह छोड़ने के प्रति मोदी सरकार नें कोई कदम नहीं उठाया है.

    अंतर्देशीय जलमार्ग:

    गंगा के ऊपर ढुलाई करने की योजना बहुत पुरानी है. लेकिन वर्ष 2014 तक श्री मनमोहन सिंह ने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं लिया था. श्री नरेंद्र मोदी जी की सरकार के सत्तारूढ़ होने के तुरंत बाद सितंबर 2014 में ही नेशनल वाटरवे – 1 की डीपीआर बनाने के लिए ठेकों का निमंत्रण जारी कर दिया गया, विश्व बैंक से लोन लिया और आज इस पर तेज़ी से कार्य हो रहा है.

    सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट:

    जहाँ तक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स का विषय है, हमारी जानकारी में श्री मनमोहन सिंह के समय में इनकी बुरी स्थिति थी लेकिन वर्तमान में इनकी दशा में कुछ हद तक सुधार हुआ है यानि केंद्र सरकार द्वारा अच्छी रकम उपलब्ध कराई गयी थी लेकिन जमीनी स्तर पहले इनमे कोई काम नहीं हुआ था. बनारस के लोगों का कहना है कि बीते कुछ समय में मोदी जी की सरकार में गंगा का पानी कुछ साफ़ हुआ है, और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के माध्यम से गंगा में कूड़ा कचरा रोकने का काम पहले कुछ बेहतर हुआ है. IIT कंसोर्टियम नें सुझाव दिया था कि गंगा में जाने वाले गंदे पानी को साफ़ करके सिंचाई के उपयोग में लाया जाना चाहिए. यह रिपोर्ट मोदी जी के समय दी गयी है और इसमें सुधार हुआ है. केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार:

    The estimated sewage generation from Class I cities and Class II towns (as per 2001 census) is 29129 MLD, which is expected to be 33212 MLD at present assuming 30% decadal growth in urban population. Against this, there exist STPs having 6190 MLD capacity while another 1743 MLD capacity is being added. Thus, the existing treatment capacity is just 18.6 % of present sewage generation and another 5.2 % capacity is being added. However, the actual capacity utilization of STPs is only 72.2% and as such only 13.5 % of the sewage is treated. This clearly indicates dismal position of sewage treatment, which is the main cause of pollution of rivers and lakes. To improve the water quality of rivers and lakes, there is an urgent need to increase sewage treatment capacity and its optimum utilization. (यहाँ देखें)

    अब पाठक स्वयं निर्णय करें कि वास्तव में कौन माँ गंगा के प्रति  कारगर है? 

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    सम्बंधित रिपोर्ट:

  • द्वारा: श्रीपiद धर्माधिकारी एवं जिन्दा सांडभोर
    भारत में प्रस्तावित राष्ट्रीय जलमार्ग

     मार्च 2016 को भारतीय संसद में राष्ट्रीय जलमार्ग अधिनियम 2016 पारित किया गया. इस अधिनियम में 111 नदियों को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया गया है. हमारे संविधान में नदियों पर मूलरुप से आधिपत्य राज्य सरकारों का है. लेकिन जहाँ संसद द्वारा किसी नदी को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया जाय, वहां पर जलमार्ग और सम्बंधित निर्माणों के अधिकार केंद्र सरकार को स्थानांतरित हो जाते हैं. उपरोक्त क़ानून के द्वारा जलमार्ग वाली नदियों पर आधिपत्य राज्य सरकार से छीनकर केंद्र सरकार को दे दिया गया है. इस क़ानून के पारित होने से केंद्र सरकार को जहाजरानी एवं नौ परिवहन के लिए इन जलमार्गों के विकास का अधिकार मिल गया है. इसके पीछे मकसद है कि, माल की ढुलाई की आर्थिक संभावनाओं का लाभ उठाया जाय.

    हमारे अध्ययन में नदियों पर माल की ढुलाई की पौलिसी में निम्न समस्याएं देखी जा रही हैं:

    • कैपिटल और रख-रखाव के लिए ड्रेजिंग: कई स्थानों पर नदी की गहराई और चौड़ाई कम होती है. यहाँ पर ड्रेजिंग की आवश्यकता होती है. ड्रेजिंग के दौरान नदी की तली से गाद, गारे, चट्टानो आदि को खोद कर निकाला जाता है जिसकी वजह से नदी का सारा पानी गन्दा हो जाता है. मछलियां पलायन कर जाती हैं. जिसकी वजह से मछुवारों को भारी नुक्सान होता है. ड्रेजिंग से कछुवों और डॉल्फिन जैसे जलीय जीवों का वातावरण दूषित हो जाता है (पानी मटमैला हो जाता है), जिससे वे आपस में संचार स्थापित नहीं कर पाते हैं. गंदे पानी की वजह से जलीय वनस्पति के बीच सूर्य की रौशनी नहीं पहुँच पाती है और प्रकाश संस्लेषण की प्रक्रिया नहीं हो पाती है. उदहारण के लिये, गंगा के निचले बाढ क्षेत्रों में डॉल्फिन पर अध्ययन कर रहे विशेषज्ञ नचिकेत केलकर नें कहा है कि,

    सघन ड्रेजिंग गतिविधियों से बेहद शोर और अस्थिरता पैदा होती है जिससे जलीय जीव विविधता, खासतौर से भारत के राष्ट्रीय जलीय पशु – गंगाई नदी डॉल्फिन (प्लाटेनिस्टा गैंजेटिका)” – पर बहुत हानिकारक प्रभाव पड़ते हैं. गंगा नदी में पाए जाने वाली यह लुप्तप्राय डॉल्फिन मछली एक अनूठा स्तनपायी जीव है जो अल्ट्रासोनिक फ्रीक्वेंसी से ही अपना रास्ता ढूँढता है. शोध के आधार पर हमारा अनुमान है कि प्रस्तावित विधेयक में जिस पैमाने पर जलमार्गों के लिए ड्रेजिंग की बात कही जा रही है उससे राष्ट्रीय महत्त्व की इस प्रजाति का जीवन और भी ज्यादा खतरे में पड़ जायेगा.” (रिपोर्ट 1 नीचे देखें)

    नदियों व् समुद्रों में कैपिटल ड्रेजिंग इस प्रकार से की जाती है
    • नदी को छोटी धारा में समेटना: अक्सर गहराई बनाने के लिए नदी के फैले हुए पानी को एक छोटे चेनल के अन्दर एकत्रित कर दिया जाता है जिससे कि उस चैनल के अन्दर पानी की गहराई ज्यादा हो जाए और जहाज चल सकें. नदी के फैलाव क्षेत्र में जलीय जीव आसानी से अपने अण्डों का संरक्षण करते हैं जिन्हें जैवमंडल का हिस्सा माना जाता है. अतः नदी को एक धारा में समेटने से जैवमंडल में सीधे असर पड़ता है.
    • घाटों और नदी बंदरगाहों का निर्माण: अंतर्देशीय जलमार्ग निर्माण हेतु नदियों,क्रिक्स और खाड़ियों के तटों पर जगह जगह बंदरगाह और हब बनाने होंगे. इन निर्माण कार्यों से आस पास के पेड़ों और मैन्ग्रोव जंगलों की बड़े पैमाने पर कटाई होगी. महाराष्ट्र के धरमतर सीपोर्ट के लिए“राष्ट्रीय जलमार्ग -10 के रास्ते में स्थित एक जेटी के निर्माणके लिए यहाँ तट पर स्थित मैनग्रोव वन पट्टी को साफ़ कर दिया गया है.”(रिपोर्ट 2 नीचे देखें)
    घाटों और बंदरगाहों में कंस्ट्रकशंन कार्य होने से गन्दगी और प्रदुषण बढ़ता है
    • बैराजों का निर्माण: नदी के पानी में आवश्यक गहराई बनाये रखने के लिए ड्रेजिंग के अलावा जगह जगह बैराज भी बनाने होंगे. बैराजों के निर्माण से नदी का किनारा डूबने लगता है, उसमे होने वाली खेती नष्ट हो जाती है, नदी का प्रवाह बदल जाता है, नदी के आसपास के पर्यावरण में बदलाव आते हैं. बैराज बनाने से नदी में गाद का बहाव भी रुक जाता है. उदाहरण के लिए 2016 में गंगा नदी में बाढ़ की स्थिति पैदा हो गयी थी. इस पर बिहार के मुख्यमंत्री नें कहा था कि “फरक्का बैराज के कारण बिहार के निचले हिस्सों (बैराज के ऊपरी हिस्सों)में बड़े पैमाने पर गाद के जमाव की वजह से बिहार में बाढ़ का इतना पानी आया था.

    • डीजल, तेल के रिसने से प्रदूषण: जलमार्गों में चलने वाले जहाज़ों से डीजल, तेल और लुब्रिकेंट रिसते रहते हैं. गंगा जलमार्ग (NW-1) में एलपीजी को जहाजों के इधन के तौर पर इस्तेमाल करने का प्रस्ताव रखा गया है. यह एक स्वागत योग्य कदम है मगर इससे भी नौकाओं से निकलने वाले लुब्रिकेंट की समस्या ख़त्म नहीं होगी.

     

    जहाजों से इस प्रकार से डीजल और तेल का रिसाव होता है
    • वैश्विक अनुभव: भारत में विभिन्न परिवहन माध्यमों में अंतर्देशीय नौ परिवहन का हिस्सा केवल5 प्रतिशत रहा है जबकि चीन, अमेरिका और यूरोप में यह संख्या क्रमशः 8.7, 8.3 और 7 प्रतिशत रहा है. ऐसा प्रतीत होता है कि इन देशों का अनुसरण करते हुए भारत सरकार नें भी जलमार्गों के विस्तार का विचार बनाया है. लेकिन हम भूल रहे हैं कि भारत और अन्य देशों की नदियों के चरित्र में मौलिक अंतर है. भारत की नदियों में अधिकतर पानी मानसून के चार महीनो में बहता है जबकि यूरोप और अमेरिका की नदियों में पानी जल श्रोतों से आता है और पूरे वर्ष बहता है. भारत में पानी के स्तर का उतार चढाव ज्यादा होने के कारण वर्ष में आठ महीने नदी में पानी कम रहता है जिसको गहरा करने के लिए हमें ड्रेजिंग करनी पड़ती है. यह परिस्थिति अमेरिका और यूरोप में नहीं है. चीन का अध्ययन हम नहीं कर पाए हैं. दूसरा अंतर यह है कि हमारे देश में नदियों की गहरी सांस्कृतिक भूमिका है. कावेरी, कृष्णा, नर्मदा और गंगा को हम पूजते हैं और इनमे स्नान करते हैं. अतः भारत में जलमार्ग बनाकर नदियों के चरित्र में परिवर्तन करने से हमारी संस्कृति पर गहरा आघात पड़ता है. तीसरी बात यह है कि मिस्सिसिपी वाटरवे के अध्ययन में बताया गया है कि मूल रूप से जलमार्ग से ढुलाई करना, सड़क परिवहन की तुलना में महंगा पड़ता है. परन्तु सड़क मार्ग से ढुलाई करने पर सरकार टैक्स वसूल करती है, जबकि जलमार्ग से ढुलाई पर सरकार कोई टैक्स वसूल नहीं करती है. अतः टैक्स के इस अंतर के कारण जलमार्ग लाभकारी हो जाता है.

    अमेरिका की इंस्टिट्यूट फॉर एग्रीकल्चर एंड ट्रेड पालिसीके एक अध्ययन के अनुसार अमेरिका में जलमार्गों को बनाये रखने के लिए 800 मिलियन डॉलर प्रतिवर्ष का खर्च होता है. इसमें से ढुलाई करने वाली कंपनियां केवल 80 मिलियन डॉलर अदा करती हैं जो कि कुल खर्चे का मात्र 10% होता है. बाकी 90% खर्च सरकार द्वारा वहन किया जाता है. अगर इसकी तुलना ढुलाई के दुसरे माध्यमों से करें तो सड़कों के रख-रखाव के लिए 70% खर्च तेल उर वाहनों पर अदा किये गए टेक्स से लिया जाता है. यानि सड़कों के रख-रखाव में केंद्र सरकार केवल 30% खर्च करती है. इसी प्रकार रेल लाइनों को बनाये रखने के लिए पूरा खर्चा रेल कम्पनियां करती हैं. रेल लाइनों के रख-रखाव का सरकार पर तनिक भी भार नहीं पड़ता है. इंस्टिट्यूट के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि अमेरिका में जो जलमार्ग चल रहा है उसका कारण उसकी आर्थिक व्यवहार्यतानहीं बल्कि उसे सरकार द्वारा दी जा रही सब्सिडी है. जलमार्गों के रख-रखाव में 90% खर्च सरकार देती है, सड़कों में 30% और रेल लाइनों में शून्य. इस अंतर के कारण रेलमार्ग किफायती प्रतीत होता है, जो कि वास्तव में किफायती नहीं है. भारत में जलमार्ग की सही गणना करने के लिए जरुरी है कि सड़क तथा रेलमार्ग से वसूले गए टैक्स और जलमार्ग पर प्रस्तावित टैक्स को देखते हुए ही इसका किफायती होने का आंकलन किया जाए.

    मिसिसिपी वाटरवे की रिपोर्ट में कहा गया है कि:

    In 2012, the shippers and barge companies contributed a paltry 10 percent toward the cost of the Inland Waterways Navigation System- just $80 million of the $800 million needed to keep the system running each year. Few other American businesses receive such a generous tax payer subsidy of their expanses.

    Other U.S. transportation sectors contribute much more toward infrastructure costs. For example, 70% of the cost to maintain roads and highways is paid through taxes on fuel and truck parts. The cost to maintain commercial freight lines is paid in full by railroad companies and receives no direct taxpayer support. It is time to level the playing fields and let markets function more efficiently. ” (report IATP, annexure- 24) (विस्तृत रिपोर्ट 3 नीचे देखें)

    यानि केवल टेक्स की छूट के कारण भारत में जलमार्ग फायदेमंद समझा जा रहा है. अतः इन देशों में चल रहे जलमार्गों के अधिक प्रचालन का हमें अन्धानुकरण नहीं करना चाहिए.

    अंतर्देशीय जल परिवहन को उसकी किफ़ायत और पर्यावरण संबंधी अनुकूलता के आधार पर सही ठहराया जा रहा है. उपरी तौर पर ईधन की लागतों के लिहाज से तो यह काफी किफायती दिखाई पड़ता है मगर यह किफायत हमेशा मुमकिन नहीं होती बल्कि बहुत सारे दूसरे हालातों पर भी निर्भर करती है. खासतौर से यह इस पर निर्भर करती है कि पूरी परिवहन श्रृंखला केवल  पानी पर ही आश्रित है या परिवहन के दूसरे साधनों की भी आवश्यकता होगी. इसके अलावा जलमार्गों से परिवहन की लागत और उससे होने वाले फायदे जलमार्ग के  स्वरूप, उसकी गहराई और कई दूसरे कारकों पर भी काफी निर्भर करते हैं. लिहाजा हमे जलमार्गो की लाभप्रदता को आंकने के लिये एक-एक जलमार्ग का अलग अलग अध्ययन और विशलेषण करना होगा. 

    निष्कर्ष:

    भारत के सभी बड़े जलमार्गों के निर्माण से नदी के चरित्र, और समुदायों की आजीविका पर गंभीर असर पड़ेगा. यह भी स्पष्ट नहीं है कि जिन आर्थिक लाभों की बात की जा रही है वे इन परियोजनाओं की भारी लागतों से ज्यादा होंगे या नहीं. हमारा मानना है कि जलमार्गों के निर्माण के लिए इस एकतरफा मारामारी को फिलहाल रोक दिया जाना चाहिए. पहले इन जलमार्गों की आवश्यकता, उनकी लागत और प्रभावों का विस्तृत आंकलन किया जाना चाहिए. जिसमे लोगों और नागरिक संगठनो की पूरी सहभागिता हो. तब-तक जलमार्गों के बारे में अंतिम फैंसला नहीं लिया जाना चाहिए.

     

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    सम्बंधित रिपोर्ट:

     

  • गंगाजी   और  पन-बिजली   -   विकास

    [ यह लेख श्री स्वामी ज्ञान स्वरुप सानंद जी (फॉर्मर प्रोफेसर जी डी अग्रवाल, आई आई टी कानपुर और सेकेटरी मेंबर - केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ) के पचासवें दिन की भूख हड़ताल के दिन लिया गया है. स्वामी ज्ञान स्वरुप का सबसे व्यापक बयान इस बात के लिए है कि वे गंगाजी के लिए क्यों आमरण अनशन पर हैं - उनके लिए  गंगा तपस्या और उन लोगों के लिए सांस्कृतिक विवेक जाग्रत करने के लिए एक एक आवाहन है  जिससे माँ गंगा की देखभाल हो सके.]

    sanand swami ji maharaaj

    A

    गंगाजी-विशेषतायें  एवं महत्व

    A1 प्रथमदृष्ट्या गंगाजी एक धारा हैं । धारा का प्रमुख गुण होता है प्रवाह, प्रवाह नहीं तो वह धारा नहीं; झील, तालाब, जोहड, पोखर कुछ भी हो, पर धारा नहीं । टिहरी बांध के पीछे 50-60 कि.मी., श्रीनगर-अलकनंदा बांध के पीछे 10-15 कि.मी., यहां तक कि मनेरी बांध के पीछे 2-3 कि.मी., या उत्तरकाशी और विष्णुप्रयाग बराजों के पीछे एकाध कि.मी. को अब न धारा कह सकते हैं, न गंगाजी ।

    A2 हिमालय पर्वत के ग्लेशियरों (हिमनदों) तथा पर्वत-सिक्त झरनों द्वारा पूरित जल के कारण गंगाजी की धाराए स्वभावतः सदानीरा हैं, मौसमी, बरसाती नहीं । प्रवाह घटता - बढता हैं ; प्राकृतिक कारणों से जैसे वर्षा, तापक्रम, हिमपात; पर्याप्त सूचना देकर अनायास नहीं; विशेषतया मानव-इच्छा या मानव-स्वार्थ जनित कारणों से नहीं (जैसा जल-विद्युत उत्पादन में बार-बार होता रहता है) ।

    A3 प्राकृतिक जलधाराओं जिनमें पहाडी सोतों, झरनों से नदी, नाले, गाड सभी आते हैं एक विशेष गुण है ऊपर वायु-मण्डल से और शेष तीन तरफ (तली और दोनों बगल) में क्षेत्र की भूमि के साथ निरंतर सम्पर्क और आदान प्रदान । कहीं तली या एक या दोनों बगल की भूमि से जल रिस कर धारा में आता है, तो कहीं रिस कर धारा से भूमि में आता है । कहीं तली या भूमि के कण, टुकडे कट कर धारा में मिल जाते हैं तो कहीं धारा से अलग हो तली या एक या दोनों बगलों में बैठ जाते हैं । कहीं वायु में उपस्थित आक्सिजन, कार्बन डाई आक्साइड, नैट्रोजन आक्साइड, सल्फर आक्साइड, आदी गैसें जल में धुल जाती हैं तो जल जीवो द्वारा उत्सर्जित गैसें जल-धारा से निकल कर वायु में चली जाती हैं । यदि ऊपर छत डाल कर जल का वायु-मण्डल से सम्पर्क समाप्त कर दिया जाये, या तली पक्की कर या एक या दोनों बगल में तट बन्ध बनाकर उसका क्षेत्र की भूमि से सम्पर्क काटदिया जाये तो वह प्राकृतिक नदी नहीं रह जाती । प्राकृतिक नदी के इन आवश्य गुणों को अंग्रेजी में bed connectivity, lateral connectivity तथा open-to-air कहते हैं ।

    A4 उपर्युक्त सभी गुणों, सदैव समुचित (प्राकृतिक/नैसर्गिक या environmental/ecological/पर्यावश्यक) प्रवाह (गति एवं मात्रा दोनों) तथा निरन्तर वायु-मण्डल से और क्षेत्रीय भूमि से तीनों ओर (तली और दोनों तटों) से सम्पर्क के साथ-साथ अबाध प्रवाह-पथ (longitudinal connectivity) कि शर्त मिलाने पर यदि पूरी होती हों तब हम उस धारा को अविरल कहेंगे । स्पष्ट है कि उपर्युक्त शर्ते मानव छेड छाड हीन स्थिति ही में सैद्धान्तिक या वास्तविक रूप में पूरी हो सकती हैं । व्यावहारिक परिस्थिति में छोटे-मोटे समझौते करने ही पडेंगे जैसे हम पुल बनाते समय करते हैं ।

    A5 सभी जानते हैं कि सभी मानव-सभ्यतायें नदी घाटियों में ही जन्मी, पालित हुई और इस का कारण मात्र जल नहीं, उतना ही महत्वपूर्ण गुण-वती मृदा का सृजन आदान-प्रदान एवं नवी-करण था जो बिना अविरलता के संभव नहीं । भूगर्भ जल स्तर को बनाये रख वर्षा-हीन महीनों में पेय जल, सिंचाई आदि में योगदान दे पाना भी अविरलता के अभाव में संभव नहीं होगा । अविरलता की सबसे अधिक आवश्यकता तो जलीय प्राणियों को है चाहे वह हिल्सा माछ हो या डाल्फिन या घडियाल या कछुए, बैक्टीरिया या कीडे खाने वाले मैंढक ।

    A6 गंगाजी, प्रथमदृष्ट्या एक प्राकृतिक जल-धारा, एक नदीं हैं (जैसा कि A1 में कहा गया है) उन पर भी वें सभी बातें लागू होती हैं जो हर अन्य नदी पर लागू होती हैं और हम ने A1 से A5 में कही । हर नदी में हर समय हर स्थान पर उस नदी, समय, और स्थान के लिये आवश्यक पर्यावश्यक (ecological/environmental) प्रवाह होना चाहिये और bed connectivity, longitudinal and lateral connectivity तथा open-to-air आदि अविरलता की सभी शर्तें (छोटो-मोटे समझौतों के साथ) पूरी होनी चाहिए । पर क्या गंगा जी के लिये भी मात्र इतना ही अर्थात् अविरलता की शर्तें पूरा होना ही काफी है ?? नहीं ,नहीं !!

    A7 गंगाजी को हमारी पुरातन (हिंदू, बौद्ध, जैन, द्रविड, बनवासी आदी सभी पुरातन भारतीय, भारत में जन्मी) संस्कृतियों में अत्यंत विशेष, अत्यन्त उच्च स्थान दिया गया - सभी अन्य नदियों से ऊपर । रामायण और राजा भगीरथ की कथा द्वारा गंगाजी के पाप-नाशक, मोक्ष-दायक होने की कह, उनका संबंध हमारे तीनों बडे देवता ब्रह्मा-विष्णु-महेश से जोड कर, गीता में कृष्ण जी द्वारा धाराओं में मैं जाह्नवी (गंगा) कहलाकर, और आदि शंकर द्वारा रोग-शोक-ताप-पाप हरने वाली के रूप में । पुराणों में तो ढेर सारी अनर्गल कथायें गढ कर उन्हें कहीं देवी (super-human) तो कही मानवी (human) रूप देकर । किसी पण्डित संस्कृतज्ञ से गंगाजी की विशेषता पूछो तो वो ढेर सारे श्लोक पढ देगा या पौराणिक कथायें सुना देगा पूछो प्रमाण तो कहेगा शास्त्रवचन । शायद कुछ और श्लोक पढ डाले । मैं शास्त्रों के प्रति श्रद्धा रखता हूं पर पोंगा पन्थी के प्रति नहीं । गंगाजी की तथा उनके जल, उनके द्वारा लाई गई मिट्टी, साद (जो नीचे बैठ जाये), गाद (जो तैरती रहे) जल जीवों की विशेषतायें हमारे पूर्वजों ने अपने अनुभवों से जानी, जांची, वर्षों तक परखी और फिर अपनी भावी नासमझ अनुभवहीन पीढियों के लिये उन्हें विशेष वरदान के रूप में आदर देने, उनका संरक्षण करने को कह गये । स्वार्थी संस्कृतज्ञ ब्राह्मणों ने उन्हें पुराणों का पात्र बना डाला । चलो इस मूर्खता और पोंगा पंथी से ही सही उन्नीसवीं सदी में कॅाटले से पहले तक गंगाजी मानवीया छेड छाड से तो बची रही । वैसे हिलसा माछ, गांगेय डाल्फिन,अन्य गांगेय जलजीव, गंगाजी की मिट्टी, साद, गाद के उपजाऊपन, गंगाजल के सडन-मुक्त, प्रदूषण-नाशक, रोग-नाशक गुणों को क्या हमारें पूर्वज अपने लंबी अनुभव से नही जानते थे - मुझे तो ये सब मेरे बाबा दादी ने बताये-सिखाये जो न विज्ञान पढे थे न पुराणों पर विश्वास करते थे । अब गंगाजल तथा गंगाजी की मिट्टी, साद, गाद (और बालू, बजरी, बोल्डर भी क्योंकि इन्ही से तो मिट्टी, साद, गाद बनते है) का विश्लेषण और अध्ययन इन गुणों की पुष्टि करना, मात्रा नापना और इन गुणों के वैज्ञानिक कारण तलाशना वैज्ञानिक शोधकर्ताओं का काम है और ऐसी शोध प्रेरित करना जरूरत पडे तो आदेश देकर कराना हमारे नेताओं हमारी सरकारों का काम । ऐसी शोध पर्याप्त मात्रा में हो रही है क्या? नहीं हो रही तो क्यों नहीं हो रही?? जब तक न हो तब तक गंगाजी को सामान्य नदी मान उन्हें विकास रथ में जोतकर मार डालें??? वाह री हमारी सरकार !!!

    A8 उपरोक्त चर्चा से निम्न निष्कर्श स्पष्ट हो जाते हैं -

    (क) गंगाजल सामान्य जल नहीं - उसमें अद्भुत अनुपम सडन-नाशक, रोग नाशक, स्वास्थ्य वर्धक, प्रदूषण नाशक गुण है जिन्हें बनाये रखने हैं ।

    (ख) उपरोक्त गुण निलाम्बित कणों के कारण हैं । प्रवाह में छेड-छाड करने से ये कण नीचे बैठ जाते हैं (जैसे बांध बराज के पीछे) या नष्ट हो जाते है (जैसे टरबाइन में) ।

    (ग) गंगाजल की गुणवत्ता बनाये रखने के लिये अविरल प्रवाह जरूरी होगा । 

    (घ) गंगाजी के जल जीवों की रक्षा के लिये भी अविरलता आवश्यक शर्त होगी । 

    (ङ) गंगाजी के विशेष गुण-युक्त जल कम से कम कुछ मात्राओं में गंगासागर तक पहुंचे और जल जीवों के भी रक्षा हो इसके लिये हर स्थान पर हर समय गंगाजी की धारा में न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह बना रहना आवश्यक होगा ।

    (च) गंगाजल की गुणवत्ता मात्र pH (acidity), DO (Dissolved Oxygen), BOD (Biological Oxygen Demand) , TDS (Total Dissolved Solids) , FC (Free Chlorine), TC (Total Chlorine) जैसे सामान्य जल गुणवत्ता से नही मापी जा सकती न केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड, BIS (Bureau of Indian Standards), EPA (United States Environmental Protection Agency) या WHO (World Health Organization) के मानक गंगाजल पर लगाये जा सकते हैं । RO (Reverse Osmosis), UV (Ultra Violet) जैसी आधुनिक तकनीकों संशोधित जल गंगाजल या उसके समान नहीं बन जायेंगे । गंगाजल की गुणवत्ता के परीक्षण के लिये हमें नये कारक, नये मानक, स्थापित करने होंगे । याद रखें निर्मल जल गंगा जल नहीं हो जाता,गंगाजल की गुणवत्ता  निर्मलता  से कहीं अलग,अधिक र ऊपर है ।

    (छ) इसका अर्थ यह नहीं कि निर्मलता आवश्यक नहीं क्योंकि डाला गया मल गंगाजल के स्वाभाविक गुणों को भी प्रभावित कर सकता है । आवश्यक गंगा जल के स्वाभाविक गुणों का आकलन और उनकी रक्षा, जैसे भी हो ।


    B

    पन-बिजली -- विकास

     

    B1 कोई भी क्रिया बिना ऊर्जा नहीं हो सकती, चाहे वह जैवि क क्रिया हो चाहे भौतिक या रासायनिक एवं प्राकृतिक । साथ ही हमारी पृथ्वी पर ऊर्जा का एक मात्र स्रोत सूर्य है - (जैसे कि सभी पदार्थों का भी आदि स्रोत क्योंकि अन्ततः तो हमारी पृथ्वी सूर्य से ही टूटा एक टुकडा है ) । सूर्य से प्राप्त यह ऊर्जा एक ओर तो सभी ठोस और द्रव पदार्थों मे रासायनिक ऊर्जा के रूप में विद्यमान है और पृथ्वी के गर्भ में तापीय geo-thermal ऊर्जा के रूप में भी तथा दूसरी ओर सूर्य किरणों के माध्यम से प्रकाश और ताप के रूप में ही नहीं वायु-प्रवाह जनित पवन ऊर्जा, समुद्री तरंगों और ज्वार-भाटे की या बनस्पति, पेड पौधों की बदने में संगृहीत होती रासायनिक ऊर्जा भी मूलतः सौर ऊर्जा ही है । ऊंचे पहाडों से तेजी के साथ नीचे आते जल में या जल प्रपात में उपस्थित भौतिक ऊर्जा (static या potential energy + गतिज या dynamic energy) भी मूलतः सौर ऊर्जा ही है । टरबाईन - generator द्वारा इस ऊर्जा का दोहन कर इसे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करना पन-बिजली उत्पादन कहलाता है ।

    B2 जीवन का तात्पर्य ही क्रियात्मकता है । सृष्टि में जीवन के उद्भव से ही प्रत्येक जीव अपनी सभी स्वाभाविक एवं आवश्यक क्रियाओं को अपने स्वयं के शरीर में विद्यमान रासायनिक ऊर्जा के द्वारा सम्पन्न करता था जिसकी पूर्ति वह या तो प्रकाश-संश्लेषण द्वारा करता था या अपने भोजन के आक्सीकरण या अन्य रासायनिक क्रियाओं द्वारा । छोटे से छोटे  जीवाणु से लेकर बडे से बडे पशु पक्षि तक, जिन में मानव भी शामिल है अन्य किसी प्रकार की ऊर्जा की आवश्यकता जीवों को नहीं थी। सभी अपनी सभी क्रियायें प्रकाश-संश्लेषण या भोजन से प्राप्त शारीरिक ऊर्जा से स्वयं ही कर लेते थे । अधिकतर जीवों में तो सहयोग की भी आवश्यकता कम ही पडती थी, चीटियों, मधुमक्खियों, जैसी कुछ प्रजातियों को छोड कर या जीव के शैशव काल में । पर मानव जाति तो अधिक बुद्धिशाली थी । और वह बुद्धि ही क्या जो श्रम से बचने के तरीके न ढूंढे सो शरीरश्रम से बचने के लिये पशुओं का और मानव-दासों के पशुबल की ऊर्जा का उपयोग शुरू हुवा । जैसे सभ्यता का विकास हुवा शरीरबल के साथ साथ पशुबल का उपयोग भी हेय माने जाने लगा साथ ही ऊर्जा की खपत भी दिन दूनी रात चौगुनी बढती गई । यातायात साधन, प्रकाश या पंखे ही नहीं, ए०सी०, मिक्सी, ओवेन, फ्रिज, वाशिंग मशीन, वैक्यूम क्लीनर, तरह तरह के कल कारखाने । जितना अधिक सभ्य उतनी अधिक ऊर्जा की खपत और फिर भी संतोष नहीं- और - और - और । ऐसे में पहाडों से आते जल की पनबिजली पर ललचाई नजर कैसे न पडती ।

    B3 तीव्र गति से बहते या तीखे ढाल से नीचे उतरते जल से सीधे टरबाईन चला कर बिजली बनाई जा सकती है - इससे प्राप्त होने वाली ऊर्जा की मात्रा [ प्रवाह * (((गति^२)/२)) + g * ऊंचाई का अंतर) ] के ऊपर निर्भर करती है । पहाडी क्षेत्र में जहां प्रवाह की गति और ऊंचाई का अंतर अधिक मिलते हैं प्रवाह की मात्रा कम ही होती है - प्रकृति में जल प्रवाह की गति भी 3-4 मी०/से० से अधिक नहीं मिलती (तली के घर्षण और वायु के अवरोध के कारण / अतः प्राप्त हो सकने वाली ऊर्जा अन्ततः [ प्रवाह की मात्रा x ऊंचायी के अंतर ] पर निर्भर हो जाती है । प्राकृतिक प्रपात पर तो सीधे सीधे प्रपात के ऊपर से जल पेन्सटाक पाइप के द्वारा प्रपात के नीचे स्थापित टर्बाइन में डाल कर बिजली बनाई जा सकती है - अन्यथा एक कृत्रिम प्रपात उत्पन्न करना पडता है बांध बनाकर । जितना ऊंचा बांध, उतना ही अधिक ऊंचायी का अन्तर, उतना ही अधिक बिजली उत्पादन । पर बांध के पीछे इतनी ही बडी झील, झील में डूबने वाली भूमि, बनों या खेती का विनाश, लोगों का विस्थापन, लागत तो बडी होगी ही । टिहरी बांध का उदाहरण सामने है ही जिसने धरासू से लगभग 60 कि०मी० दूर बांध की भागीरथी जी को प्रवाह-हीन झील में परिवर्तित कर दिया, एक लाख से ऊपर लोगों को उजाडा उनकी कृषि भूमि और संपत्ति और एक बडे क्षेत्र के बन नष्ट किये । पर्यावरण पर वन्य पशुओं पर तथा प्रवासी जलजीव प्रजातियों पर दुष्प्रभाव तो सदा बने ही रहेंगे ।

    ऊँचा बांध बनाने का एक दूसरा विकल्प निकाला गया । एक कम ऊंचे बांध या बराज के द्वारा जल धारा को बगल के पहाड में एक बडे पाइपनुमा सुरंग खोद कर पहाड के अंदर अंदर ले जाकर कही 10-25 कि०मी० दूर और सुरंग के मुह से 100-250 मीटर नीचे उसी नदी या किसी अन्य जल प्रवाह के पास टर्बाइन लगा कर बिजली बना कर जल को फेंक दिया जाये । इस में ऊंचा बांध तो नहीं बनाना पडा पर पहाड में एक लंबी सुरंग खोदनी पडी । झील नहीं बनी पर मलबा जो सुरंग से निकला उसके निस्तारण की समस्या । जल में प्रवाह तो बना रहा पर जल का प्राकृतिक चहानों, बनस्पति और वायु से संपर्क तो कट गया । जल जीवों का संकट भी जस का तस बना रहा । पहाड में बडे व्यास की लंबी सुरंग बनाने से जल स्रोतों की और पहाड की स्थिरता की नई समस्याएं खडी होने की या ऊपर के पहाडों के ढहने-टूटने की समस्याएं भी बड जाती हैं ।

    B4 उपरोक्त सभी कठिनाई और दुष्प्रभाव होते हुवे भी यदि पर्यावरण पर होने वाले दुष्प्रभाव की लागत न जोडी जाये तो अन्य किसी भी तरह के (पशु-ऊर्जा को छोडकर) ऊर्जा दोहन से सस्ती पडती हैं । प्रारंभ में स्थापित करने में बडी पूंजी भले ही लगे, पर बाद में हल्दी लगे ना फिटकरी पर रंग आये चोखा वाली बात हो जाती है - लगभग मुफ्त ढेर सारी ऊर्जा । इसमें भी बडी बात यह कि ऊर्जा दोहन के अन्य तरीकों की तुलना में पन-बिजली स्थापनाओं की अधिक लागत मशीनों पर नहीं बांध या सुरंग बनाने में मजदूरों तथा दुलाई जैसे कार्यो पर होता है जिसे सरकारे पसन्द करती हैं - बहुत लोगों को रोजगार मिलता हैं - सालों तक । सडके बनती है पूरा क्षेत्र बाहर के लिये खुल सा जाता जाता है ।

    B5 पन बिजली की एक विशेषता मिनटों में उत्पादन शुरू कर देने और जब चाहों मिनटों में उसे बन्द कर देने में है । अतः अधिक आवश्यक के समय (जैसे सायं 6 बजे से 11 बजे तक) बिजली बनाई फिर अगले दिन सायं तक बन्द कर दी । इसका प्रभाव नीचे के स्थानों जलस्तर के घटने बढने पर और जल-जीवों पर पडता है - जैसे उत्तरकाशी के घाटों पर मनेरी-भाली परियोजना का या ऋषिकेश के त्रिवेणी घाट पर टिहरी का । क्या इसका कोई मूल्य नहीं ?

    C

    गंगाजी र पन-बिजली

     

    C1 गंगाजी या उनकी उत्तराखंड में स्थित धाराओं के साथ कोई बडी छेड छाड मुगलों के शासनकाल तक भी नहीं हुई, यद्यपि यमुना जी से पश्चिमी यमुना नहर निकालने का कार्य अकबर के शासन में शुरू हुवा, और शाहजहां के काल में तो इस से यमुना जी का जल डाक - पत्थर से इस नहर द्वारा करनाल, कुरुक्षेत्र, पानीपत होता हुवा दिल्ली में चांदनी चौक और लाल किले तक पहुंचता था । 1820 के दशक में अंग्रेजों ने इस बादशाही नहर का नवीकरण किया, और डाक-पत्थर से पूर्वी यमुना नहर निकाली जो सहारनपुर, शामली, बडौत, बागपत होते हुवे दिल्ली शाहदरा तक सिंचाई-जल पहुंचाती थी । 1840 में अंग्रेज सरकार ने गंगाजी को छेडने का साहस किया । गंगाजी से निकलने वाली पहली नहर का कार्य 1841 में प्रारंभ होकर 1846 में पूरा हुवा । नहर के मार्ग में उपलब्ध ढाल उससे कहीं अधिक था जितने की नहर के प्रवाह के लिये जरूरत थी अतः नहर में कई जगह जल प्रपात थे जैसे पथरी, आसफनगर, मुहम्मदपुर, आदि ।

    C2 कॅाटले (Sir Proby Thomas Cautley) द्वारा बनाये भीमगोडा हैडवर्क्स एक बहुत कम ऊंचायी (1.5 मी०) पत्थर की चिनाई की दीवार (weir) थी जिसकी ऊंचायी बढाने के लिये जल कम होने पर 0.5 मी० तख्ते खडे किये जाते थे। उसके एक भाग में मछलियों के ऊपर नीचे जाने के लिये fish-ladder थी । बगल से (दाये) नहर हर की पैडी से होती हुई जाती थी - आवश्यकता से अधिक जल बाये तट के साथ लगे तख्ते दार फाटकों से निकाल कर वापस नील धारा में डाल दिया जाता था । इस प्रकार न अविरलता भंग होती थी न गंगाजी के विशेष कणों या जलीय जीवों के आवागमन में बाधा पडती थी । मान्यता भी यही थी और काफी हद तक तथ्य भी कि रुडकी, देबबन्द, खतौली, मुरादनगर, बुलन्दशहर, तक तो मानो गंगनहर गंगाजी की धारा ही है - उसी श्रद्धा से लोग नहाते और पूजा करते हैं ।

    C3 1905-1910 बीच भीमगोडा हैडवर्क्स का आधुनिकीकरण हो गया कान्क्रीट का बांध, लोहे के गेटवाले स्लूइस आदि और मायापुर डैम बन गये । गंगाजी अविरलता भंग हो गयी - हर की पैडी से ऊपर ही । कई वर्ष के संघर्ष के बाद माननीय मालवीय जी के नेतृत्व में हर की पैडी की अविरल धारा तो प्रतीक रूप में बहाल हो गयी पर नीचे की नहर और नील-धारा-गंगाजी की मूलधारा जिस पर नीचे की सभी गांगेय तीर्थ स्थित हैं - शुक्रताल, बृजघाट, राजघाट, ब्रह्मावर्त, शृंगवेरपुर, प्रयाग, वाराणसी आदि सभी स्थित हैं, तो गंगाजी की अविरल धारा से महरूम ही हैं । गंगात्व या गंगाजी के विशेष गुणों से अनभिज्ञ, हरिद्वार से नीचे के जल में सडनहीनता विशेषता के प्रति तापरवाह, प्राचीन ग्रंथों (तथाकथित शास्त्रों) की कथाओं में अंधविश्वास रखने वाले मूढ, लालची, स्वार्थी हमारे समाज को क्या अन्तर पडना था -- उन्हें तो बस मनौतियां मांगना, परम्परा निभाना ।

    C4 1920 के बाद अंग्रेज सरकारों का ध्यान पन-बिजली दोहन की ओर गया और गंगा नहर पर स्थित दो बडे प्रपातों, पथरी तथा मुहम्मदपुर में पनबिजली घर बनायें गये इन में न भण्डारण बांध था न सुरंग । नहर में गंगात्व या अविरलता का प्रश्न ही नहीं था और इन बिजली घरों से कोई दुष्प्रभाव हुवा हो मुझे नही लगता । 1952-55 में ऊपर के दो छोटे प्रपातों को तोडकर, पूरे प्रवाह का बिजली बनाने में उपयोग कर तथा डिजाइन में सुधार कर पथरी जल-विद्युत-केंद्र की क्षमता लगभग तिगुनी कर दी गई । मैं तब रुडकी में पढ रहा था जहां से पथरी मात्र 18 कि०मी० था । पनबिजलीघर डिजाइन और निर्माण के पहले पाठ मैं ने वहीं से सीखे ।

    C5 उत्तराखंड में मुख्य धाराओं पर जल-विद्युत परियोजनाओं का कोई काम 1960 तक प्रारंभ नही हुवा यद्यपि उत्तरप्रदेश में शारदा प्रणाली पर पनबिजली दोहन शुरू हुवा और जल-विद्युत विभाग गठित हुवा जिसकी रिहन्द जल-विद्युत परियोजना के निर्माण में मैं 1954 से 1960 तक कार्यरत रहा जो एक बडे कान्क्रीट बांध पर आधारित थी । 1960 के अंतिम 6 मास में उत्तर प्रदेश के केंद्रीय डिजाइन डाइरेक्टरेट में कार्यरत था जहां मेरा सम्पर्क पहली बार गंगा-यमुना से बिजली दोहन के चिन्तन से हुवा पर यह बहुत ही प्राथमिक, लगभग वैचारिक स्तर पर ही था । 1961 के प्रारंभ में ही मैं ने उत्तरप्रदेश सरकार की सेवा त्याग, आई.आई.टी. कानपुर में अध्यापक हो गया और शीघ्र ही सिंचाई-पनबिजली क्षेत्र छोड पर्यावरण-विशेषज्ञ कहलाने लगा । पर पुराना लगाव छूटता कहाँ है? मैं सिंचाई और पनबिजली परियोजनाओं पर जाता रहा । मेरा दुर्भाग्य कि 1978 पर जब गंगाजी की किसी भी एक प्रमुख धारा पर पहली बिजली परियोजना -- भागीरथी पर मनेरी-भाली परियोजना -- प्रारंभ हो रही थी मुझे निर्माण-नियोजन विशेषज्ञ के रूप 15 दिन मनेरी निर्माणस्थल पर रहने का अवसर मिला । काश मैं उस समय उस परियोजना के भागीरथी जी पर दुष्प्रभाव आंक कर उसका विरोध करता । मनेरी-भाली एक सुरंग परियोजना थी जिसने भागीरथी जी की अविरलता नष्ट कर दी और उनके जल में विद्यमान गंगात्व को बहुत हानी पहुँचाई । अब तो मनेरी-भाली परियोजना का दूसरा चरण (उत्तरकाशी-धरासू) भी पूरा हो चुका है अब तो मनेरी से एक कि०मी० ऊपर से टिहरी (बल्कि कोटेश्वर) के नीचे तक के लगभग 150 कि०मी० में भागीरथी जी धारा के रूप में मात्र उत्तरकाशी के घाटों के निकट 2-3 कि०मी० में दिखती हैं अन्यथा या सुरंग में या झील में लुप्त । कहीं सभी निर्माणाधीन और प्रस्तावित बांध बन गये तो क्या होगा??

    पनबिजली  के लिये गंगाजी की बलि!!

    क्या ऐसीसंभावना  रोकने के लिये यह नश्वर जीवन दांव  पर लगाना  कोई बडी बात है?

    मेरे विचार से नहीं ।

    Swami Gyan Swaroop Sanand started his fast on the 22nd June 2018 CE, that is, on Ganga Dussehra having not received any responses from the Prime Minister of India or the Government of India for his Open Letters written to the Prime Minister dt. 24th February 2018 CE and 13th June 2018 CE.

    He wrote a third letter to the Prime Minister of India on the 5th of August 2018 CE which was sent through Sushri Uma Bharti ji to the PM Shri Narendra Modi.

    In addition to this statement, Swami Gyan Swaroop Sanand wrote an educative article to reflect on the terms being used today as well as his observations on what is the way forward given the state we are in to preserve the sacredness and uniquenessof Ma Gangaji. They can be seen from the next page. It is these ideas that inform his directives/requests for action to/from the Prime Minister through his Open Letters as well as the Letter sent through Sushri Uma Bharti ji.

     

    गंगाजी की निर्मलता ~ स्वच्छता ~ पवित्रता ~ गुणवत्ता

    [Article Collected on the 50th day of his fast that he started on 22nd June 2018 CE]

    (Swami Gyan Swaroop Sanand wrote this on both sides of a page and left another blank page possibly to add to it.

    We will add to it as and when it is updated.)

    1. गंभीरता और वैज्ञानिक समझ से बचने वाला हमारा समाज (यहां तक कि सरकारी विशेषज्ञ भी) इन दिनों गंगाजी के संदर्भ में इन चार गुणों में से पहले दो का बहुतायत से प्रयोग करता है जैसे वे दोनों एक ही बात हों । मेरे बचपन के दिनों में हम गंगाजी या गंगाजल के सन्दर्भ में पवित्रता की बात करते थे निर्मलता या स्वच्छता की नहीं । वैज्ञानिक दृष्टि से गंगाजी एक जलधारा हैं और उनके सन्दर्भ में हमें गंगाजल की गुणवत्ता की बात करनी चाहिये। इन चारों को समझें ।

    (क) जिस जल में आंख से देखनेवाला मैल न हो अर्थात् जो देखने मे पारदर्शी और रंगहीन हो उसे निर्मल कहेंगे। इस प्रकार शुद्ध दूध को भी निर्मल नहीं कहेंगे पर धुले हुवे रंगहीन लवणों, BOD या उपस्थित जीवाणुओं से निर्मलता पर असर नही पडेगा । निर्मलता को मापने के कारक colour तथा turbidity होंगे।

    (ख) स्वच्छता केवल एक भावात्मक गुण है जिसमें पांचों ज्ञानेन्द्रियों से पहचाने जा सकने वाले सभी गुणों का आभास ही नहीं पूर्व का इतिहास भी समाहित रहता है पर जिसे नापा नहीं जा सकता । धुले हुवे वस्त्र को स्वच्छ कहेंगे निर्मल नहीं । जिस बर्तन का संसर्ग गन्दगी से हुवा हो उसे या उसमें रखे जल को स्वच्छ नहीं कहेंगे, भले ही गन्दगी कहीं नजर न आये । इस प्रकार स्वच्छता निर्मलता से कहीं आगे जाती है - दिखाई न पडने वाली “मैल” को भी देखती है । बहुधा उपचार या शोधन से निर्मलता आती है, स्वच्छता नहीं । स्वास्थ्य के लिये स्वच्छता चाहिये निर्मलता से काम नहीं चलेगा ।

    (ग) पवित्रता से तात्पर्य होता है मैल को नष्ट करने की क्षमता - केवल मैल या अस्वच्छता का अभाव या अनुपस्थिति नहीं। गंगाजल को बचपन में हमें पवित्र कहना होता था वह झूठ नहीं था क्योंकि :

    • डा. D.S. भार्गव की शोध के अनुसार गंगा जल मे BOD नष्ट करने की क्षमता सामान्य जल से 10-25 गुण अधिक है ।
    • NEERI की शोध के अनुसार मल-जीवाणु काॅलीफार्म को नष्ट करने की अद्भुत क्षमता है ।
    • IMBT चण्डीगढ के S. Mayilraj की शोध के अनुसार लगभग 20 प्रजातियों के जीवाणुओं को नष्ट करने की क्षमता है ।
    • आदि शंकराचार्य और तुलसीदास जी के अनुसार गंगाजल में रोग, शाप, ताप ही नहीं पापकर्म तक भी नाश करने का क्षमता है भले ही उसे सिद्ध न किया जा सके ।

    मल को नाश करने की यह क्षमता ही गंगाजल का विशेषगुण, उसका गंगात्व है । इस गंगात्व को पूर्ववत् स्थापित करना ही Gangaji Rejuvenation होगा, इसे बनाये रखाना ही गंगाजी का  Conservation । याद रखें इसका कम से कम कुछ भाग मापनीय है ।

    (घ) गुणवत्ता: ऊपर की चर्चा से यह तो स्पष्ट हो गया होगा कि गंगाजी के सन्दर्भ में मात्र निर्मलता या स्वच्छता की बात करना निरर्थक ही नहीं गंगाजी का घोर अपमान है । निर्मल तो कुएं, सरोवर, झील का या बोतलबंद पानी भी हो सकता है तो क्या वह गंगाजल हो जायेगा? गंगाजल और गंगा जी की तली की बालू-बजरी के गुणों की जांच के लिये हमें उपयुक्त अनुमापनीय कारक और उनकी स्वीकार्य सीमायें तय करनी होंगी । स्पष्ट है इनमें pH  (acidity), turbidity, DO (Dissolved Oxygen), TDS (Total Dissolved Solids), BOD (Biological Oxygen Demand), COD (Chemical Oxygen Demand) , Coliform MPN (Most Probable Number) जैसे सामान्य जल गुणवत्ता कारक तो होंगी ही (यद्यपि इनके स्वीकार्य सीमायें भिन्न हो सकती है ) साथ ही BOD Destruction Rate Constant, Re-oxidation Rate Constant, Coliphage types and density, phages for clinical pathogens - types and density - जैसे गंगात्व के विशेष गुण भी नापने होंगे । इस सब पर विस्तृत शोध कार्य की आवश्यकता है । गंगा Rejuvenation या Conservation के लिये उपलब्ध धनराशि का कम से कम 10% भाग तो ऐसी शोध पर ही लगना चाहिये जो शेष प्रबन्धन में आवश्यक कार्यों का स्वरूप तय करें ।

    1. गंगाजी की पवित्रता / गुणवत्ता (कहीं जा रही निर्मलता / स्वच्छता) के लिये कार्य:

    (क) समझा जाये और दृढ मन से माना जाये कि गंगाजी के विशेषगुण उनकी पवित्रता, उनका गंगात्व सब हिमालय से आते हैं - हम एक बार नष्ट या कम हो जाने पर उन्हें पैदा नहीं कर सकते, बढा नही कर सकते - कर सकते तो गंगाजल बनाने की फैक्टरियां स्थापित कर लेते । गंगात्व का गंगाजी में अलग अलग जगह पर भिन्न भिन्न मौसम में मापन करना, उसमे कभी किन कारणों से आती है यह समझना और उस समझ के आधार पर प्रबन्धन तय करना होगा ।

    (ख) अविरलता और पर्यावरणीय प्रवाह (FDC (Flow Duration Curve) विधि से गणनाकृत) बनाये रखना तो आवश्यक लगते ही हैं और इन्हें तो तुरन्त कड़ाई से लागू कर देना चाहिये ।

    (ग) बाहर से आने या मिलने वाले प्रदूषण, वह नगरीय सीवेज हो या औद्योगिक अवजल या ठोस अपाशिष्ट या अन्य मल उसकी मात्रा उस समय और स्थान पर गंगाजी की शोधन क्षमता के 10% से अधिक न हो ऐसा सुनिश्चित करना होगा । गंगाजी में डालने से पूर्व शोधन -- sewage treatment, effluent treatment तथा sewage pumping, Municipal Waste Disposal, आदि -- का दायित्व गंगाजी का नहीं । गंगा मंत्रालय इनके गंगाजी में प्रवेश पर नियंत्रण कर सकता है, इन की, या इन पर खर्च की जिम्मेदारी या उसमें भागीदारी नहीं ।

  • भारत के दिल्ली और मुंबई जैसे प्रमुख शहरों की हवा को साफ करने के लिए केंद्र सरकार नें बड़ी वायु सफाई मशीनों को स्थापित करने का निर्णय लिया है.

    वायु सफाई की मशीने प्रदूषण हटाने में सक्षम नहीं हैं

    अधिकांश वायु प्रदूषण वाहनों या उद्योगों द्वारा उत्पन्न होता है. इस वायु प्रदूषण का जिम्मेदार केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) है. हमारे पास कानून हैं जो कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन और सल्फर जैसी गैसों के स्तर को निर्धारित करते हैं जिन्हें वाहनों और उद्योगों द्वारा उत्सर्जित किया जाता है. लेकिन सीपीसीबी द्वारा इन कानूनों को लागू नहीं किया जाता है. नतीजा यह है कि हमने हवा को प्रदूषित कर दिया है. अब हम इसे साफ करने के लिए बड़ी मशीनों को स्थापित करना चाहते हैं.

    फैक्टरियाँ और वाहन वायु प्रदूषण के प्रमुख श्रोत हैं

    यदि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा उद्योगों और वाहनों द्वारा प्रदूषण कानूनों का पालन कराया गया होता तो शहरों की हवा स्वयं ही साफ़ और स्वच्छ होती. उदाहरण के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की बीजिंग यात्रा के दौरान चीनी सरकार ने बीजिंग के आसपास के सभी प्रदूषण उद्योगों को एक सप्ताह के लिए बंद रहने का आदेश दिया जिससे बीजिंग में हवा तत्काल ही साफ हो गयी थी. यह घटना स्थापित करती है कि प्रदूषण की समस्या वास्तव में प्रदूषण नियंत्रण कानूनों का पालन नहीं किये जाने की वजह से है जिसके लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड बढ़ते हुए प्रदूषण के जिम्मेदार है. 

    डोनाल्ड ट्रम्प की चीन यात्रा के दौरान चीन सरकार नें बीजिंग की फैक्ट्रियों को एक सप्ताह के लिए बंद कर दिया था

    एक संसदीय समिति की रिपोर्ट (यहां देखें) में कहा गया है कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड एक निष्क्रिय शरीर की तरह सिकुड़ कर रह गया है. केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के प्रमुख पद, भारतीय प्रशासनिक सेवाओं या नौकरशाह अधिकारियों द्वारा भरे जा रहे हैं जिनके पास प्रदूषण नियंत्रण गतिविधियों के प्रबंधन की क्षमता और विशेषज्ञता नहीं है.

    राजनैतिक और प्रशासनिक दबाव के कारण केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड प्रदूषण रोकने में असमर्थ है

    पर्यावरण मंत्रालय ने प्रस्ताव दिया था कि राष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्र पर्यावरणीय  संरक्षण प्राधिकरण स्थापित किया जा सकता है जो प्रदूषण नियंत्रण कानूनों को लागू करने के लिए जिम्मेदार हो. वर्तमान में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण मंत्रालय द्वारा संचालित होता है. नतीजतन मंत्रालय उन अधिकारियों को ही नियुक्त करता है जो मंत्रियों और आईएएस अधिकारियों को पसंद हों. सरकार को प्रदूषण रोकने हेतु स्वतंत्र प्राधिकरण बनाना चाहिए जैसा संचार के लिए दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (टीआरएआई) स्वतंत्र रूप से स्थापित किया गया है, जिसने टेलीफोन कंपनियों के विनियमन के मामलों को बहुत प्रभावी तरीके से निपटाया है. 

    भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने एक रिपोर्ट में उल्लेख किया है (यहां देखें) कि ई-वेस्ट प्रबंधन के नियमों की अधिसूचना के बाद, सीपीसीबी ने उन नियमों के प्रवर्तन के लिए कोई भी कदम नहीं उठाया है. निष्कर्ष यह है कि सीपीसीबी प्रदूषण नियंत्रण कानूनों को लागू करने में असफल है. (यहां एसजी रिपोर्ट देखें) 

    यह भी स्वीकार किया जाना चाहिए कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों में प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त शक्तियां नहीं हैं. वे जुर्माना लगाने या बंद करने की नोटिस जारी नहीं कार सकते हैं. देश की न्यायिक प्रणाली इतनी धीमी और भ्रष्ट है कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के लिए प्रदूषकों को दंडित करना असंभव है. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अपने सीमित संसाधनों के साथ प्रदूषण को नियंत्रित करने में सक्षम नहीं हैं.

     हमें सीपीसीबी को एक स्वतंत्र प्राधिकारी बनाना चाहिए और अपराधियों को दंडित करने के लिए पर्याप्त शक्तियां देनी चाहिए जिससे राजनीतिक और प्रशासनिक हस्तक्षेप दूर हो जाएगा और सीपीसीबी भी प्रभावी होगा. यदि ऐसा  किया जाता है, तो वायु प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सकेगा. हवा को साफ करने के लिए बड़ी मशीनों को स्थापित करने की आवश्यकता नहीं होगी.

     इन मशीनों का भी कोई बहुत अच्छा ट्रैक रिकॉर्ड नहीं है. इसी प्रकार की मशीन  चीन के बीजिंग में स्थापित की गई थी (जैसा कि नीचे दिखाया गया है) जिसके  परिणाम अनुकूल नहीं हैं. मशीन की लागत 1 करोड़ रुपये थी. इस मशीन के डिजाइनर और आर्किटेक्ट डेन रूजगार्ड ने कहा है कि "इस मशीन द्वारा बहुत ही छोटे क्षेत्र में ही हवा साफ़ की जा सकती है (लगभग 30,000 घन मीटर). ऐसी छोटी क्षेत्र की तकनीक शहर की हवा को भी साफ करने में सक्षम नहीं है. इस टावर का उद्देश्य है कि हमें वायु प्रदूषण की समस्याओं को भूलना नहीं है अर्थात समाधानों की खोज जारी रखनी होगी" 

    चीन में लगी वायु सफाई मशीन के भी नकारात्मक परिणाम हैं

    सही तरीका यह होगा कि हमें सीपीसीबी को स्वतंत्र बनाना है और इसे वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने की शक्तियां देना है. इस विकल्प से बचना चाहिए कि पहले प्रदूषण बढ़ने दिया जाय और फिर उसी प्रदूषण को हटाने में निष्प्रभावी मशीनों को स्थापित करने पर खर्च किया जाय.

  • सरकार नें इलाहबाद का नाम प्रयागराज करने का निर्णय लिया है

    उत्तरप्रदेश सरकार ने इलाहाबाद का नाम बदलकर पुराना नाम प्रयागराज रखने का फैसला किया है. ऐसी जगह जहां दो नदियों का संगम होता है उसे प्रयाग कहा जाता है. यहाँ गंगा और यमुना नदियाँ हिमालय के विभिन्न हिस्सों से बहकर आती हैं और विभिन्न आध्यात्मिक शक्तियां अपने साथ लाती हैं. दोनों नदियों के मिलन से आध्यात्मिक शक्तिओं का मिलन होता है और ये शक्तियां कई गुना बढ़ जाती हैं. इस प्रकार समझा जा सकता है कि जिस प्रकार दो बहनों का दस वर्ष बाद मिलन हो तो आपस में अपार आनंद की अनुभूति होती है.

    बगैर आध्यात्मिक शक्तियों के गंगा और यमुना नदियों का मिलन प्रयागराज में होता है

    जापानी वैज्ञानिक मासारू इमोटो ने पानी में बनने वाले क्रिस्टलों का अध्ययन किया है. उन्होंने पाया है कि आध्यात्मिक रूप से चार्ज हुआ पानी बहुत ही सुंदर क्रिस्टलों की स्थापना करता है, जबकि प्रदूषित और रुका हुए पानी से बने क्रिस्टल बहुत बदसूरत होते हैं. पानी आध्यात्मिक शक्तियों से भी परीपूर्ण होता है. इस प्रकार यमुना और गंगा विभिन्न प्रकार की आध्यात्मिक शक्तियां  लाती हैं और इन शक्तियों के मिश्रण से आध्यात्मिक शक्ति बढती है.

    नदी के पानी में अध्यात्मिक शक्तियों को वहन करने की क्षमता होती है

    झंडे का कोई सैन्य महत्व नहीं होता है लेकिन युद्ध के दौरान झंडे का महत्व बहुत अधिक होता है. यह सभी सैनिकों की ऊर्जा को बढ़ाता है. हम लेडी कामा का सम्मान करते हैं क्योंकि उन्होंने भारतीय ध्वज उठाया, न कि झंडे ने स्वतंत्रता दिलाई. ध्वज देश के लोगों की भावनात्मक शक्ति को बढ़ाता है. इसलिए प्रयागराज नाम बदलना उचित है चूँकि नदियों की आध्यात्मिक शक्ति की तरफ लोगों का ध्यान खींचता है.

    सवाल उठाया जा रहा है कि नाम बदल कर सरकार इतिहास को फिर से लिख रही है. मुगल इतिहास को खत्म कर रही है. लेकिन इतिहास लगातार बार बार लिखा जाता रहा है. हिटलर के समय जर्मनों ने एक अलग इतिहास लिखा और वे आज एक अलग इतिहास लिखते हैं. इसलिए इतिहास दुबारा लिखने में कुछ भी गलत नहीं है. इसलिए सरकार द्वारा इलाहबाद का नाम बदलने को हम उचित मानते है. इससे गंगा और यमुना के महत्व पर ध्यान खींचा जा सकेगा.

    गंगा का पानी नरोरा में निकाल लिया जाता है इलाहबाद पहुँचने वाला पानी काली नदी का है

    प्रश्न है कि क्या गंगा और यमुना वास्तव में आज अपने साथ आध्यात्मिक शक्तियां ला रही हैं? गंगा का पानी आज इलाहाबाद तक नहीं पहुंच रहा है. हरिद्वार, बिजनौर और नरोरा बैराज में सिंचाई के लिए गंगा का लगभग पूरा पानी हटा दिया जाता है. नरोरा के बाद गंगा नदी लगभग सूख गयी है. गंगा से इलाहाबाद में आने वाला पानी वास्तव में काली नदी का पानी है जो नरोरा के बाद गंगा में मिलती है. इसी प्रकार यमुना का पूरा पानी हथिनिकुंड में हटा दिया जाता है. यमुना नदी द्वारा इलाहाबाद में आने वाला पानी वास्तव में चंबल नदी का पानी है जो मथुरा के बाद यमुना में जुड़ती है. हम प्रयागराज नाम इसलिए दे रहे हैं क्योंकिहम मान रहे हैं कि गंगा और यमुना हिमालय से आध्यात्मिक शक्तियों को ला रही हैं. लेकिन वास्तव में वे इस तरह की शक्तियों को नहीं ला पा रही हैं. सर्वप्रथम सरकार को गंगा और यमुना नदियों को हिमालय से इलाहाबाद तक बहाल करना चाहिए था. हरिद्वार, बिजनोर, नरोरा और हथिनिकुंड के बैराजों के डिज़ाइन बदलकर हिमालयी गंगा और यमुना के पानी को प्रयागराज तक पहुँचाना था उसके बाद ही इलाहाबाद का नाम बदल कर प्रयागराज रखना चाहिए था. इसके बाद ही प्रयागराज नाम बदलना सार्थक होगा.

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    देश में प्रदूषण पर लगातार होती राजनीति

    दिल्ली में प्रदूषण| ममता बनर्जी| नरेंद्र मोदी| राहुल गाँधी

    विश्व के मेट्रो शहरों में से दिल्ली को सबसे प्रदूषित स्थान दिया गया है. दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में 14 शहर भारत में हैं. हाल में भारत और श्रीलंका के बीच क्रिकेट मैच के दौरान पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि वह श्रीलंकाई क्रिकेटरों को प्रदूषण मास्क में देखकर शर्मिंदा थीं. इसी चिंता को व्यक्त करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि हमें दिल्ली में प्रदूषण को कम करने के कदम उठाने की जरूरत है.

    प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी भी चिंतित हैं. हालांकि, इसके लिए उन्होंने जनता को दोषी ठहराया है. राज्य पर्यावरण मंत्रियों से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि प्रदूषण का कारण जनता की बदलती हुई जीवन शैली है. लेकिन इस पोस्ट में हम बतायेंगे कि कैसे यह बढ़ता प्रदूषण सरकार की विफलता के कारण है.

    लाभ-लागत | वायु प्रदूषण

    वायु प्रदूषण लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है. अतः वायु प्रदूषण कम होने से जनता के स्वाथ्य में सुधार होता है. स्वस्थ्य में सुधार से लोगों की आयु बढ़ती है. अतः इस समस्या का हल पाने के लिए जनता कुछ रकम अदा करने के लिए तैयार रहती है. इस रकम को Value of Statistical Life या VSL कहा जाता है. VSL के आधार पर अर्थशास्त्री वायु प्रदूषण के लाभ की गणना करते हैं.

    वायु प्रदूषण के नियंत्रण की लागत वह होती है जो कि प्रदूषण फ़ैलाने वालों  को वहन करनी पड़ती है. जैसे थर्मल पवार प्लांट में धूएँ को साफ़ करने का खर्च वायु प्रदूषण के नियंत्रण का खर्च होता है.

    अर्थशास्त्री किसी परियोजना के लाभ और लगत की अलग अलग उपरोक्तानुसार गणना करते हैं. फिर लागत से लाभ को विभाजित कर "लाभ-लागत अनुपात" बनाया जाता है. यदि लाभ-लागत अनुपात 1 से अधिक है, तो इसका मतलब है कि लाभ अधिक है और परियोजना को स्वीकृत किया जाता है.इसके विपरीत, यदि लाभ-लागत अनुपात 1 से कम है, तो इसका मतलब है कि लाभ लागत से कम है और परियोजना को अस्वीकृत कर दिया जाता है.

    बिल एवं मेलिंडा गेट्स| फ्लू गैस डीसफ्युराईज़ेशन| पावरप्लांट

    बिल एवं मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के एक अध्ययन (यहां रिपोर्ट देखें) ने भारत में आठ बिजली संयंत्रों में फ्लू गैस डीसफ्युराईज़ेशन(FGD) तकनीक शुरू करने के लाभ और लागत का अध्ययन किया. नीचे तालिका में 8 बिजली संयंत्रों में एफजीडी को फिट करने के लाभ-लागत अनुपात को देख सकते हैं:

    Table 1: Benifit/Cost Ratos for FGD Retrofits

    Plant Name VSL=$84,036,r=3% VSL=$160,000,r=3% VSL=$256,000,r=3% VSL=$256,000,r=8%
    Dadri 6.0 11 18 14
    Unchahar 4.0 7.5 12 9.5
    Bakreswar 1.8 3.4 5.5 4.3
    Dahanu 1.3 2.4 3.8 3.0
    Talcher 0.77 1.5 2.4 1.9
    Koradi 0.53 1.0 1.6 1.3
    Rayalaseema 0.29 0.56 0.89 0.70
    Tuticorin 0.27 0.51 0.82 0.65

    बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन ने पाया कि 8 में से 6 थर्मल संयंत्रों में,एफजीडी उपकरण को फिट करने की लागत कम और लाभ ज़्यादा था. दादरी में लाभ 6 से 18 गुना था.अर्थ यह हुआ कि अगर सरकार दादरी बिजली संयंत्र में एफजीडी फिट करती है, तो लोगों को 6 से 18 गुना लाभ होगा.

    दादरी सयंत्र में अगर FGD तकनीक का प्रयोग कर उत्पादन किया जाता है तो यह प्रदूषण नहीं होगा

    OECD| शंघाई – चीन| कोयला कारखाने| प्रदूषण नियंत्रण

    आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) द्वारा एक अध्ययन (यहां रिपोर्ट देखें) में वायु प्रदूषण के नियन्त्रण के लाभ और लगत को मापा गया. OECD द्वारा दिया गया ग्राफ हम नीचे देख सकते हैं:

    ग्राफ में हरे कालम लाभ और लाल कालम लागत को दिखाते हैं. इस चार्ट में प्रदूषण नियंत्रण के चार स्तरों पर लाभ और लागत का आंकलन किया गया है. यह ग्राफ दर्शाता है कि हर स्तर के नियंत्रण पर अगर सरकार 1 रूपया खर्च करे तो उनसे होने वाले फायदे 5-20 गुना अधिक होंगे.

     

    चीन में कोयले सयंत्रों द्वारा बगैर प्रदूषण की चिंता किये हुए उत्पादन किया जाता है

    बांग्लादेश| कोपनहेगन कन्सेंसस सेंटर| ईंट भट्टे| लाभ एवं लागत

    प्रश्न यह है कि जब वायु प्रदूषण के लाभ, लागत से अधिक हैं, तो सरकार प्रदूषण को नियंत्रित करने के उपायों को लागू क्यों नहीं करती है? इस समस्या का समाधान कोपेनहेगन सेन्सस केंद्र द्वारा किए गए बांग्लादेश के अध्ययन में दिया गया है. इस अध्ययन में ढाका के पास ईंट भट्टों में बेहतर प्रदूषण नियंत्रण उपकरण स्थापित करने के लिए समाज और ईंट भट्टा मालिकों को होने वाले लाभ और खर्च की अलग-अलग गणना की है.

    पाया गया कि वायु प्रदूषण के नियंत्रण का लाभ आम आबादी को होता है जबकि प्रदूषण नियंत्रण की लागत उद्योग मालिकों को वहन करनी होती है. अतः प्रदूषण को नियंत्रित करना उद्योगों को फायदेमंद नहीं होता है.समाज के लिए लाभ बहुत अधिक हैं परन्तु इससे उद्योगों को सरोकार नहीं होता है.अध्ययन में पाया गया कि वायु प्रदूषण नियंत्रण की नयी (IZK) तकनीक को अपनाने में, लोगों का लाभ 4857 बीडीटी मिलियन होगा जबकि लोगों की लागत 408 बीडीटी मिलियन आएगी जैसा नीचे तालिका में दिखाया गया है. आम आबादी को शुद्ध 4449 बीडीटी मिलियन का लाभ होगा.

    Table 2: Annualized social beifits and costs of full conversation to cleaner brick kilns in Greater Dhaka, 2014 (BDT million)

            Benifits Cost
      Vsl DALY  
    From CSK to IZK 4,857 3,184 408
    New IZK 4,857 3,184 815
    New VSBK 8,606 6,097 1,605
    New HHK 13,766 11,257 3,261

     Note: Annualized benifits and costs are 5% discount rate. VSL= valuation of avoided deaths using VSL. DALY= valuation of a DALY at GDP per capita.

    ईंट भट्टा मालिकों के लिए लाभ और लागत अलग है. नीचे दी गई तालिका में (तालिका 9.1) हम देख सकते हैं कि ईंट भट्टा मालिकों की लागत 5333 रुबीडीटी मिलियन है जबकि उनके लिए लाभ केवल 1440 बीडीटी मिलियन है.इन्हें 3893 बीडीटी मिलियन का शुद्ध नुक्सान होगा. इसलिए वे नयी (IZK) तकनीक को लागू करने में रुचि नहीं रखते हैं.

      From  FCK to IZK New  IZK New VSBK New HHK
    Costs:        
    Investment Cost 5,333 10,667 21,000 42,667
    Benifits: - - - -
    Increased Production Value Per  Year 0 0 0 3,000
    Cost Savings Per Year 1,440 1,440 3,440 5,600
    Private benifits Per Year 1,440 1,440 3,440 8,600

     अगर हम निजी और सामाजिक लाभ एवं लागत को जोड़ते हैं, तो हम देख सकते हैं कि आम आदमी को 4449 बीडीटी मिलियन का लाभ होगा ईंट भट्टी मालिकों को 3893 बीडीटी मिलियन का नुकसान होगा. यह बताता है कि यद्यपि नयी (IZK) तकनीक समाज के लिए फायदेमंद है लेकिन यह ईंट भट्टी मालिकों के लिए लाभदायक नहीं है इसलिए ईंट भट्टी मालिक वायु प्रदूषण नियंत्रण नहीं करना चाहते हैं और लोग वायु प्रदूषण से पीड़ित हैं.

    बांग्लादेश में ईंट भट्टे के मालिकों द्वारा बगैर प्रदूषण की चिंता किये हुए उत्पादन किया जाता है

    सारांश| प्रदूषण फेक्टरियाँ| वायु प्रदूषण यंत्र| प्रदूषण की समस्या

    समस्या का समाधान सरकार द्वारा ईंट भट्टों को वायु प्रदूषण उपकरण स्थापित करना अनिवार्य बनाना होगा.

    वायु प्रदूषण की समस्या वास्तव में सरकार द्वारा निष्क्रियता की समस्या है. प्रदूषण का नियंत्रण समाज के लिए फायदेमंद है. लेकिन क्योंकि निजी उत्पादकों के लिए नुकसानदेह है इसलिए वे वायु प्रदूषण नियंत्रण उपकरण स्थापित करने में अनिच्छुक हैं.इस विषय पर सरकार को नियम बनाने और उन्हें कार्यान्वित करने की जरुरत है.इस प्रकार के नियमों के बनने और उनके पालन होने से वायु प्रदूषण को साफ किया जा सकता है और लोगों का स्वास्थ्य बचाया जा सकता है.

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि भारत में वायु प्रदूषण की समस्या जीवनशैली में बदलाव के कारण है. यह मान्य नहीं है क्योंकि दुनिया के स्वच्छ महानगरों में हम स्वीडन में ब्रेडकलैन, फिनलैंड में मुओनो, स्पेन में एल पुएयो, फ्रांस में ला प्लेन, पुर्तगाल में गुइमारायस आदि को पाते हैं.समस्या अगर जीवनशैली की होती, तो इन शहरों को दिल्ली से अधिक प्रदूषित होना चाहिए था. समस्या जीवनशैली नहीं है बल्कि समस्या प्रदूषकों पर उचित नियम लगाकर प्रदूषण को रोकने की है.

    समस्या यह है कि सरकार प्रदूषकों के खिलाफ कदम उठाने को तैयार नहीं है.सरकार की इस निष्क्रियता का नतीजा यह है कि देश के लोग प्रदूषण से पीड़ित हैं. अगर सरकार ने प्रदूषकों को वायु प्रदूषण नियंत्रण उपकरण स्थापित करने के लिए मजबूर किया तो समाज को बड़े पैमाने पर लाभ होगा और वायु प्रदूषण से मुक्ति मिल जायेगी.

     

  • गंगा महासभा के श्री डी पी तिवारी जी नें प्रयागराज में कुंभ के दौरान नदियों के पानी की गुणवत्ता पर लगातार नजर बनाये रखी. उनका कहना है कि जल की स्थिति में सुधार आवश्य हुआ है हालांकि ज्यादातर सुधार टिहरी बांध से अधिक पानी छोड़े जाने के कारण हुआ है.

    झूसी क्षेत्र में 14 सीवेज नालियां गंगाजी में गिर रही हैं. कुछ सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों द्वारा इनका उपचार करने के प्रयास किये गए हैं. इनमे से एक बहुप्रचलित तकनीक जियो-सिंथेटिक ट्यूब की है जिसे हम नीचे चित्र 1 में देख सकते हैं.

    प्रयागराज के राजापुर नाले में जियो-सिंथेटिक ट्यूब तकनीक से गंगा की सफाई

    जियो-सिंथेटिक ट्यूब द्वारा ट्रीटमेंट के बाद छोड़े गए पानी को चित्र 2 में देख सकते हैं.

    प्रयागराज के राजापुर में जियो सिंथेटिक ट्यूब तकनीक के बाद छोड़ा गया पानी

    चित्र 2 में आप देख सकते हैं की जियो-सिंथेटिक ट्यूब तकनीक से ट्रीटेड पानी नीचे बह कर गंदे पानी में ही मिल रहा है. ट्रीटेड पानी की तुलना में गंदे पानी की मात्रा बहुत अधिक है.

    इसी प्रकार, कुंभ के दौरान सलोरी ट्रीटमेंट प्लांट से निकलने वाले उपचारित पानी को नीचे चित्र 3 में देख सकते हैं.

    प्रयागराज में सलोरी ट्रीटमेंट प्लांट से निकलने वाला ट्रीटेड पानी

    राजापुर ट्रीटमेंट प्लांट से निकलने वाले ट्रीटेड पानी को नीचे इमेज 4 में दिखाया गया है.

    राजापुर ट्रीटमेंट प्लांट से निकलने वाले ट्रीटेड पानी को नीचे इमेज 4 में दिखाया गया है.

    नीचे चित्र 5 में हम देख सकते हैं कि राजापुर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से पानी में अभी भी बहुत अधिक झाग आ रहा है जो अपर्याप्त ट्रीटमेंट को दर्शाता करता है. 

    प्रयागराज के राजापुर ट्रीटमेंट प्लांट के नीचे पानी की स्थिति

    वर्तमान में लगाये गए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स की क्षमता आवश्यकता से बहुत कम है. यदि आवश्यकता 100 मिलियन लीटर क्षमता की है तो सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों की क्षमता केवल 16 मिलियन लीटर प्रति दिन ही है. अतः अधिकाँश पानी अनुपचारित ही रह जाता है.

    इस प्रकार पानी का ट्रीटमेंट दो कारणों से रह जाता है. पहला यह कि जो तकनीकें अपनाई गई हैं वे पूर्णत सीवेज ट्रीटमेंट नहीं करते हैं. दूसरा यह कि ये अस्थायी हैं. इन सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटो को चलाने का अनुबंध भी केवल अप्रैल तक ही दिया गया है. अतः वे प्रयागराज की दीर्घकालिक समस्याओं का समाधान नहीं करते हैं.

    निष्कर्ष है कि जहां पानी की गुणवत्ता में कुछ सुधार हुआ है, यह सुधार मुख्यतः टिहरी से पानी छोड़े जाने और गंगा में अधिक पानी होने के कारण हुआ है.  

     

     

  • जलविद्युत परियोजनाओं के विरोध में स्वामी सानंद ने अपने प्राण त्याग दिए थे

    आईआईटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर जी डी अग्रवाल (स्वामी सानंद) ने मंदाकिनी और अलकनंदा पर चार निर्माणाधीन जलविद्युत परियोजनाओं को रद्द करने की मांग करते हुए 112 दिनों के लम्बे उपवास के बाद पिछले साल के अंत में अपना शरीर त्याग दिया. केरल के छब्बीस साल के ब्रह्मचारी संत आत्म्बोधानंद पिछले चार मास से अधिक समय से (23 फरवरी 2019 से) से उपवास करते हुए उन्ही चार परियोजनाओं को रद्द करने की मांग कर रहे हैं.

    स्वच्छ गंगा:

    गंगा पर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) बनाने में केंद्र सरकार लगभग 20,000 करोड़ रुपये खर्च कर रही है. प्रदूषण का एक प्रमुख कारण हानिकारक जीवाणुओं की उपस्थिति है जिन्हें कोलीफॉर्म कहा जाता है. ये हजारों प्रकार के पाए जाते हैं. प्रत्येक प्रकार के कोलीफॉर्म को एक विशेष प्रकार के लाभकारी जीवाणुओं द्वारा नष्ट कर दिया जाता है जिसे कोलिफाज कहा जाता है. नेशनल एन्वायरमेंट इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट, नागपुर ने कहा है कि गंगा के कोलिफाज में अद्वितीय "व्यापक स्पेक्ट्रम" क्षमताएं हैं. एक कोलीफॉर्म कई प्रकार के कोलिफाज को नष्ट कर सकता है. इंस्टीट्यूट ऑफ माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी, चंडीगढ़ ने कहा है कि उनके शोध में पाया गया है की गंगा के जल में उपलब्ध कोलिफाज 17 प्रकार के रोगों को बनाने वाल कॉलिफोर्म को नष्ट कार देते है जो का गंगा इस अद्वितीय गुण है. ये लाभकारी कौलिफाज़ गंगा की गाद से चिपक जाते हैं. इन लाभकारी कौलिफाज़ को जीवित रहने के लिए नदी में गाद का निरंतर प्रवाह होना जरुरी है. गंगा के पानी को जलविद्युत परियोजनाएँ द्वारा सुरंगों में डाल दिया जाता है या फिर जलाशयों के पीछे रोक लिया जाता है जिससे गाद का बनना बंद हो जता है, इन अद्वितीय कलिफाज का घर नष्ट हो जाता है, और ये कौलिफाज़ नष्ट हो जाते हैं, और हमें पानी को साफ़ करने का अतिरिक्त खर्च एसटीपी में करना पड़ता है. इसलिए जलविद्युत परियोजनाओं हो हटाना लाभप्रद है.

    प्रयागराज में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट

    जैव विविधता:

    हमें ग्लोबल वार्मिंग के गंभीर परिदृश्य में अपनी जैव विविधता की रक्षा करनी चाहिए. उत्तराखंड की प्रसिद्ध महसीर मछली अंडे देने के लिए ऊपर की ओर पलायन करती है. फ़िशलिंग तब बहते पानी के साथ नीचे बहते हैं. नीचे बड़े होकर वे अगले चक्र में ऊपर की ओर पलायन करते हैं. यह पलायन जल विद्युत परियोजनाओं द्वारा बाधित होता है. इसी प्रकार मछ्ली की प्रजाति स्नो ट्राउट को जीवित रहने के लिए बहुत अधिक ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है जो की बहते पानी में ही उपलब्ध होती है. इन अनोखी प्रजातियों को परियोजनाओं से नुकसान होता है.  

    नदी का सौन्दर्य:

    संयुक्त राज्य अमेरिका के वाशिंगटन राज्य के लोगों ने सरकार को याचिका दी कि एल्हवा बांध उन्हें मछली पकड़ने और कयाकिंग से रोक रहा है. सरकार ने एक सर्वेक्षण किया. राज्य के लोगों से पूछा गया था कि वे एल्व्हा बांध को हटाने के लिए कितना पैसा देने को तैयार होंगे? सर्वेक्षण में पाया गया कि बिजली उत्पादन और सिंचाई से होने वाले लाभों की तुलना में लोग एल्हवा बांध को हटाने के लिए अधिक भुगतान करने को तैयार थे. सरकार ने इस सर्वे के आधार पर बांध को हटा दिया. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, रुड़की ने अनुमान लगाया है कि यदि गंगा स्वतंत्र रूप से बहती है, तो भारत के लोग प्रति वर्ष 23,255 करोड़ रुपये का लाभ प्राप्त करेंगे. यदि हम इस मूल्य का दस प्रतिशत चार निर्माणाधीन परियोजनाओं के लिए आवंटित करते हैं, तो इन 4 परियोजनाओं को हटाने का लाभ 2,325 करोड़ रुपये प्रति वर्ष होगा. इन परियोजनाओं पर अब तक लगभग 5,000 रुपये खर्च किए जा चुके हैं. इन परियोजनाओं को हटाने की लागत 5,000 करोड़ रुपये की होगी जबकि हमें प्रति वर्ष 2,325 करोड़ रुपये का लाभ होगा. 

    नदी के सौन्दर्य के लिए वाशिंगटन में हटाया गया एल्वाह डैम

    आर्थिक विकास:

    उत्तराखंड राज्य को जल विद्युत परियोजनाओं से 12 प्रतिशत मुफ्त बिजली मिलती है. ये परियोजनाएँ गंगा की ऊँचाई से गिरने और समुद्र तक पहुँचने की सभी भौतिक गुणवत्ता का उपयोग करती हैं. इसका विकल्प गंगा के उच्च मनोवैज्ञानिक गुणों का उपयोग करना है. हमने हरिद्वार, ऋषिकेश और देवप्रयाग में तीर्थ यात्रियों का सर्वेक्षण किया और पाया कि छब्बीस प्रतिशत तीर्थयात्रियों को गंगा में डुबकी लगाने से स्वास्थ्य लाभ मिला, 14 प्रतिशत को बेहतर व्यवसाय मिला और 9 प्रतिशत को परीक्षाओं में सफलता मिली. यह इंगित करता है कि गंगा के किनारे अस्पताल और विश्वविद्यालय जैसे सेवा क्षेत्र सफलता की बेहतर दर प्रदान करेंगे. इन गतिविधियों से राज्य को भारी राजस्व प्राप्त होगा.

    पीकिंग पावर:

    नई जलविद्युत परियोजनाओं से बिजली की उत्पादन लागत 10-11 रुपये प्रति यूनिट है. नयी सोलर उर्जा की लगत 3-4 रुपये प्रति यूनिट है. विद्युत मंत्रालय के केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के प्रमुख के अनुसार सौर ऊर्जा का भंडारण और उपयोग सुबह और शाम को किया जा सकता है. इसमे केवल 40 पैसे प्रति यूनिट की लागत होती है. अतः सोलर पाकिंग उर्जा का दाम 5 रूपए से कम पड़ेगा जबकि जलविद्युत का दाम 10 रूपए पड़ेगा. यही कारण है कि आज जल विद्युत परियोजनाएं वित्तीय संकट में हैं. इन्हें हटाना ही उत्तम है.

    जल विद्युत परियोजनाओं में पम्प स्टोरेज विधि एक बेहतर विकल्प है

    गंगा बोनस:

    फिर भी इन परियोजनाओं को हटाने से लाभ पूरे देश के लोगों को मिलेगा, जबकि उत्तराखंड राज्य को नुकसान हो सकता है. इसलिए, केंद्र सरकार द्वारा  राज्य को "गंगा बोनस" का भुगतान करना चाहिए.