Pollution

प्रदूषण

  • “Central Pollution Control Board (CPCB) has inventoried 35 distilleries… out of which… 17 have achieved Zero Liquid Discharge (ZLD)…”

    देश के सात आईआईटी संस्थानों के वैज्ञानिको ने गंगा प्रदुषण पर अपनी रिपोर्ट बनाई है. रिपोर्ट में स्पष्ट कहा

  •  गंगा नदी के पवित्र जल में स्वयं को शुद्ध रखने की विलक्षण शक्ति होती होती है जिसे बाँध प्रभावित कर रहें है जिस कारण करोडो हिन्दुओ की आष्था को नुकसान हो रहा है .

  • टिहरी झील (फोटो साभार: विमल भाई)

    गंगा नदी की गुणवत्ता को बांधों का निर्माण ऋषिकेश, हरिद्वार, प्रयाग, काशी और गंगा सागर तक प्रभावित कर रहा है। सच है कि बांधों के निर्माण से बिजली की उपलब्धता बढ़ने से लाभ होगा। पर सवाल यह है कि क्या ये बांध नदी के पानी के मनोवैज्ञानिक गुणों की गिरावट का कारण बनती हैं। 

  • Post By: Shripad Dharmadhikari & Jinda Sandbhor
    राष्ट्रीय जलमार्ग को दर्शाता नक्शा (वाराणसी) फोटो साभार: जिंदा सिंधभोर

    उत्तर प्रदेश में वाराणसी जलमार्ग का केंद्र बनने जा रहा है क्योंकि यहाँ चार नदियाँ आपस फैली हुई है. वाराणसी में चार जलमार्गो को भरत सरकार ने राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया है, जो की नुक्सानदेह हैं.

  • केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना (फोटो साभार: द इंडियन एक्सप्रेस)
    सरकार ने जल आपूर्ति हेतु नदी जोड़ो परियोजना को शुरू किया है परन्तु इससे आम जनजीवन में बहुत से नुक्सान हैं. जब जल आपूर्ति के अन्य विकल्प मौजूद हैं तो नुकसानदेह परियोजना को बढ़ावा क्यों दिया जा रहा है.
  • सिंगोली भटवारी पावर प्रोजेक्ट की आपदा में टूटी बराज (फोटो साभार: गंगाटुडे टीम)

    सिंगोली भटवारी पावर प्रोजेक्ट के अनुबंध को तीन साल बढाए जाने के बजाय इस परियोजना को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए.

  • कृत्रिम भूजल रिचार्ज सिस्टम उत्तर-पश्चिम सैन फर्नांडो घाटी(फोटो साभार: L.A.Aqueduct Centennial)

    हाल ही में, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने इस्राइल का दौरा किया. इस्राइल में पहले, पानी की भारी कमी थी लेकिन अब वे कृत्रिम भूमि जल रिचार्ज की प्रक्रिया का उपयोग कर रहे हैं, जिसके द्वारा उन्होंने मनुष्य उपयोगों के लिए पानी की उपलब्धता में वृद्धि की है।

  • सिंचाई के लिए पानी का अत्यधिक उपयोग पानी का नुक्सान है (फोटो साभार: जेफ़ वानुगा, विकिमीडिया)
    सिंचाई के लिए गंगाजल का अत्यधिक इस्तेमाल हो रहा है जिसकी वजह से गंगा नदी अपना अस्तित्व खो रही है. अगर हम गंगा से सिंचाई के लिए पानी निकालना कम कर दें तो ही गंगा जीवित रह सकती है. यदि हम बारिश के पानी का भूजल संरक्षण करें तो हम गंगा के पानी को निकलना कम करके बचा सकते हैं.
  • हाल ही में NGT ने गंगा की सुरक्षा को देखते हुए यह फैसला दिया है कि गंगा के तटों का सीमांकन किया जायेगा. इस फैसले के तहत NGT ने गंगा की सुरक्षा के तहत हर जिले में गंगा के तटों में 200 मीटर के दायरे में कोई भी निर्माण कार्य (पुल, भवन, खनन इत्यादि) नहीं होगा और 500 मीटर के दायरे में कोई भी प्रदुषण नहीं फैलाया जायेगा.

    नदी में बाड़ के दौरान नदी में जलमग्न भवन (फोटो साभार: गंगा टुडे टीम)
  • अमेरिका द्वारा हटाया गया एल्व्हा डैम (फोटो साभार: डांसिंग बेयर, विकिमीडिया)

     

    अमेरिका ने 2016 में नदियों पर बनाये गए 72 परियोजनाओं को हटाया गया है.जबकि 1912 से 2016 तक अमेरिका ने 1384 बांधों को किया है.

  • गंगा जीर्णोधार मंत्रालय के नए मंत्री श्री नितिन गडकरी

     

    प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने माँ गंगा के पुनरुद्धार के लिए गंगा जीर्णोधार मंत्रालय की जिम्मेदारी उनके कर्मठ सहियोगी नितिन गडकरी को सौंपी है. देश को आशा है कि श्री गडकरी उसी तत्परता से गंगा की सफाई करेंगे  जिस तत्परता से उन्होंने देश में सड़कों का जाल बिछाया है.

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    गंगा संरक्षण के लिए हे...गढ़वाल विश्वविद्यालय और राज्य सरकार के बीच MOUसाईंन किया गया (फोटो साभार: दीप जोशी, हिंदुस्तान टाइम्स)

     

    हाल ही में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री की उपस्तिथि में गढ़वाल विश्वविद्यालय को गंगा की सफाई की जिम्मेदारी दी है.  गंगा को जीवित रखने की दृष्टि से सरकार का यह एक उत्तम निर्णय है.

  • rudolph A furtado

    गंगा नदी में खननकार्य (फोटो साभार: रुडोल्फ ए फुर्तादो)

     

    उत्तराखंड हाईकोर्ट ने गंगा के किनारे खनन पर लगी रोक को हटा दी है. नदी में खनन कार्य भी आवश्यक होता है क्यूंकि नदी में गाद निरंतर बहकर आती रहती है.

  • गंगोत्री में स्थित माँ गंगा का मंदिर (फोटो साभार: जीएनयू डॉक्स.विकिमीडिया)

     

    “His Holinesses welcomes the declaration of Government of India to name Holy Ganga as the National River” – By Jagadguru Sri Nischalanandji, Shankaracharya of Goverdhan Mutt,Puri

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    सद्गुरु जग्गी वासुदेव ‘रेली फॉर रिवेर्स’ अभियान के तहत कन्याकुमारी से लेकर हिमालय तक गाड़ी चलाकर लेकर जायेंगे जिसके तहत वे लोगों को नदियों को बचाने का सन्देश भी देंगे. यह रेली 16 भारतीय राज्यों से होते हुए देश की 30 नदियों को बचाने का सन्देश देगी.

  • श्रीपद धर्माधिकारी एवं सिन्धभोर द्वारा लिखित

    भारत सरकार ने हाल ही में राष्ट्रीय अंतर्देशीय जलमार्गों की एक महत्वकांक्षी परियोजना को हाथ में लिया है.मंथन औरश्रुति कीनई रिपोर्ट अंतर्देशीय जलमार्गों से संबंधित मुद्दों की विस्तृत विवेचना प्रस्तुत करती है.  राष्ट्रीय जलमार्गों के निर्माण से देश को अनेक फायदे होंगे. किन्तु निर्माण के चरण में पड़ने वाले दुष्प्रभावों को नीचे दर्शाया गया हैं:

    1. जब किसी नदी में नौवहन मार्ग बनाया जाता है तो अपेक्षित गहराई और चौड़ाई बनाने के लिए नदी में ड्रेजिंग की जाती है, जिससे की जलीय जीवन नष्ट होने की सम्भावना रहती है.
    2. ड्रेजिंग के दौरान नदी की तली से गाद, चट्टानों, गारे और कीचड़ को निकला जाता है. इस तरह की कार्यवाही से नदी की स्थिरता व संतुलन पर असर पड़ता है.
    3. किसी भी तरह की ड्रेजिंग के दौरान नदी का पानी गन्दा हो जाता है. इस गंदे पानी की वजह से बहुत सारी मछलियाँ वहां से पलायन कर जाती हैं. गंदे पानी की वजह से सूरज की किरणे भीतर तक नहीं जा पाती हैं जलीय पौधों और जलीय जंतुओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है.
    4. जलमार्ग बनाने के लिए नदियों की तली को काटा जाता है तो भूमिगत जलश्रोतों के कटने की सम्भावना भी ज्यादा बढ़ जाती है. इसकी वजह से आसपास के कुओं और झरनों में पानी की आपूर्ति बंद हो जाएगी और आसपास का भूमिगत जल स्टार भी घटने लगेगा.
    5. नदियों की खाड़ियों और क्रिक्स में ड्रेजिंग के फलस्वरूप पानी के निकासी के कारण समुद्र का खारा पानी क्रिक्स या नदियों में काफी भीतर तक घुस सकता है. पानी के इस तरह से घुसने की वजह से खाड़ी में मौजूद जंगलों, मछलियों एवं जलीय जीवों पर सीधा प्रभाव पड़ना निश्चित है.
    6. जलमार्गों से पदार्थों की ढुलाई और परिवहन के लिए नदी तटों पर बंदरगाह और हब बनाने होंगे जिससे कि आसपास के पेड़ों और मैनग्रोव जंगलों की बड़े पैमाने पर कटाई होगी. और घाटों और बंदरगाहों के निर्माण से नदी, स्थानीय लोग और मछुआरे की पहुँच से बाहर हो जाएगी.

    धर्म्तर पोर्ट

    धरमतर पोर्ट की जेटी पर चालू एस्केवेटर जिसके पीछे विशाल कोयले के भण्डार को साफ़ देखा जा सकता है (फोटो साभार: मंथन और श्रुति)

    धरमतर क्रीक पर लगाया गया बैकहो ड्रेजर
    धरमतर क्रीक पर लगाया गया बैकहो ड्रेजर (फोटो साभार: मंथन और श्रुति)

    अतः हमारा वर्तमान सरकार से यह प्रश्न है कि इस बहुद्देशीय विकास से होने वाले फायदों की वजह से मनुष्य के आम जीवन और नदियों को क्यूँ संकट डाला जा रहा है. इस प्रकार के बहुद्देशीय प्रोजेक्टों को चलाने से पहले दुष्प्रभावों का हल निकलना बहुत जरुरी है.

    अंत में बताते चलें कि: राष्ट्रीय जलमार्ग अधिनियम, 2016 में 111 राष्ट्रीय जलमार्गों का ब्यौरा दिया गया है जिसके अनुसार राष्ट्रीय जलमार्ग भारत की लगभग सभी प्रमुख नदियों से होकर गुज़रते हैं. नीचे हम क्रमानुसार विभिन्न राज्यों में प्रस्तावित जलमार्गों की संख्या को देख सकते हैं:

    1 अगस्त 2016 को पॉट परवहन मंत्रालय द्वारा प्रेस इनफार्मेशन ब्यूरो के माध्यम से जारी की गयी प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक भारत में 6 राष्ट्रीय जलमार्ग कार्यरत हैं:

    1. राष्ट्रीय जलमार्ग 1: गंगा भागीरथी हुगली नदी व्यवस्था (इलाहाबाद- हल्दिया).
    2. राष्ट्रीय जलमार्ग 2: ब्रह्मपुत्र नदी.
    3. राष्ट्रीय जलमार्ग 3: पश्चिमी तट नहर (कोत्त्पुरम-कोल्लम) एवं उद्योगमंडल एवं चम्प्कारा नहरें.
    4. राष्ट्रीय जलमार्ग 68: मांडोवी नदी.
    5. राष्ट्रीय जलमार्ग 97: सुंदरवन जलमार्ग.
    6. राष्ट्रीय जलमार्ग 111: जुआरी नदी.

    लेखक मंथन अध्ययन केंद्र से जुड़े पर्यवारंविद्ध हैं.

     

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    अब तक,भारत सरकार द्वारा एसटीपी स्थापित करने के लिए नगरपालिकाओं को जिम्मेदारी दी थी. नगर पालिका एसटीपी बनाने के लिए खुश थी लेकिन उन्हें चलाने के लिए नहीं. अब भारत सरकार ने नमामी गांगे कार्यक्रम के तहत "हाइब्रिड एन्युइटी मॉडल" (एचएएम यहां संलग्न) पर वाराणसी और हरिद्वार में दो सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (एसटीपी) के लिए समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं. निजी पार्टी इस मॉडल के तहत अपने स्वयं के निवेश के साथ एसटीपी का निर्माण करेंगे. सरकार निवेश का एक हिस्सा अगले कई वर्षों में देगी.  जैसे वार्षिक भुगतान (एन्युइटी) के माध्यम से पहले पांच वर्षों में परियोजना लागत का 40% दिया जायेगा. शेष भुगतान परियोजना के प्रदर्शन के आधार पर किया जाएगा. अगर एसटीपी काम नहीं करता है तो निजी कंपनी को शेष भुगतान नहीं मिलेगा. हम नमामी गंगे के तहत सरकार की इन परियोजनाओं का समर्थन करते हैं.

    दौलतगंज उत्तरप्रदेश में कार्यरत सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (फोटो साभार: फ्लिकर)

    लेकिन पहले समझाना होगा की मौजूदा एसटीपी के साथ समस्या क्या है? केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक रिपोर्ट( पृष्ठ 29, अध्याय 5) के अनुसार, इन प्लांटों से संबंधित प्रमुख समस्याएं इस प्रकार हैं:

    • एक्शन प्लान में शामिल ज्यादातर शहरों / कस्बों में, उचित सीवेज सिस्टम मौजूद नहीं है और खुली नालियों में सीवेज बहती है जो बरसात के मौसम में प्राकृतिक और गंध की समस्याएं पैदा करती है.
    • कई शहरों में, सीवेज सीवेज ट्रांसपोर्ट सिस्टम के गैर-अस्तित्व या गैर-कामकाज के कारण एसटीपी तक नहीं पहुंच रहा है.

    सीपीडब्ल्यूबी की रिपोर्ट में कहा गया है कि नगर पालिकाओं  को एसटीपी चलाने के लिए धन नहीं दिया जा रहा है. सीपीडब्ल्यूबी रिपोर्ट बताती है कि (रिपोर्ट पृष्ठ 29, अध्याय 5):

    • एसटीपी को सीवेज पहुँचाने की व्यवस्था करनी होगी.
    • एसटीपी के संचालन और रखरखाव विभाग को अलग-अलग फंड आवंटन किया जाना चाहिए.

    हाइब्रिड एन्युइटी मॉडल इन मुद्दों का समाधान नहीं होता है. सीवेज पंपिंग का कोई प्रावधान नहीं है. एसटीपी चलाने के लिए धन उपलब्ध कराने का कोई प्रावधान नहीं है. यह लगभग निश्चित है कि नगरपालिका अभी भी एसटीपी चलाने के लिए धन उपलब्ध नहीं कराएगी और एचएएम एसटीपी काम नहीं करेंगे. पूरी परियोजना केवल निजी कंपनी, नगर पालिका और भारत सरकार के बीच मुकदमेबाजी में सिमट जाएगी. गंगा को साफ करने का एकमात्र तरीका एसटीपी द्वारा ट्रीट किये गए स्वच्छ पानी को खरीदने का है. तब ही अकेले निजी कंपनियों को संयंत्र चलाने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा. भारत सरकार को नमामी गांगे कार्यक्रम के तहत हाइब्रिड एन्युइटी मॉडल  के एसटीपी जैसी व्यर्थ परियोजनाएं नहीं बनाना चाहिए.


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  • गंगा नदी को जल आपूर्ति के लिए हूगली नदी की तरफ मोड़ा गया है (फोटो साभार: रिसर्चगेट)

    फरक्का बैराज, भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से एक विवादास्पद मामला रहा है. फराक्का बैराज द्वारा नदी का पानी दो भागों में बांटा जाता है. पानी का एक हिस्सा फीडर कैनाल द्वारा हूगली नदी को दिया जाता है जबकि पानी का दूसरा बराबर हिस्सा बांग्लादेश को प्रदान किया जाता है। पानी की कम आपूर्ति के कारण, बांग्लादेश में उत्पन्न होने वाली बड़ी समस्या “खारे पानी का प्रवेश” है, जिससे की समुद्र का खारा पानी अन्दर की की भूमि में नीचे से आ जाता है। गंगा के पानी को फराक्का बैराज के नीचे से प्रवाहित किया जा रहा है और इसी कारण बांग्लादेश में अधिक मात्रा में गाद का जमाव हो रहा है.(इस मुद्दे पर रिपोर्ट यहां उपलब्ध है) फरक्का बैराज के नीचे से पानी छोड़े जाने के कारण बांग्लादेश को गाद ज्यादा जाती है जिसके कारण बांग्लादेश में बाढ़ की समस्या बढ़ गयी है। इन कारणों से गंगा की कई प्रजातियों का विनाश हो रहा है. फराक्का बैराज परियोजना नें कोलकाता बंदरगाह को अधिक पानी सप्लाई कराने में सफलता पायी है. (विस्तार यहाँ संलग्न है). अगर पानी का विभाजन नहीं होता  है तो, कोलकाता बंदरगाह में पानी की कमी होगी. लेकिन इससे भारत में भी अन्य नकारात्मक परिणाम बढ़े हैं, जैसे कि हिलसा मछली की आबादी कम होना और फरक्का के ऊपर गाद जमा होने से बाढ़ में वृद्धि. 

    भारत और बांग्लादेश दोनों के लिए एक सम्भव समाधान नदी को निरंतर प्रवाह को स्थापित करके फरक्का बैराज को नया रूप देना है जिससे कि गाद दोनों देशों में समान रूप से विभाजित हो और मछलियां आसानी से विचरण कर सकें। (विकल्प के लिए हमारा पिछला लेख यहाँ पर देखें)

    गंगा नदी को बांग्लादेश की तरफ जाते हुए दिखाया गया है (फोटो साभार : गूगल अर्थ)
    इस सन्दर्भ में फरक्का बराज का विडियो यहाँ पर देखें.

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  • टिहरी झील में मीथेन की मात्रा जांचते नीरी के वैज्ञानिक

    मृत पशुओं, पेड़ों, पौधों और अन्य कार्बनिक पदार्थ नदी के प्रवाह के साथ पनबिजली परियोजनाओं द्वारा बनाये गये जलाशयों में नीचे बैठ कर सड़ने लगते हैं. शुरू में वे पानी में उपलब्ध ऑक्सीजन का इस्तेमाल करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का उत्सर्जन करते हैं. लेकिन जब पानी में ऑक्सीजन समाप्त हो जाती है, तो वे मिथेन (CH4) गैस का उत्सर्जन करते हैं जो कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में अधिक हानिकारक होती है. नागपुर स्थित नेशनल इन्वोर्मेंट इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (NEERI) ने टिहरी जलाशय से उत्सर्जन का अध्ययन किया है. वे कहते हैं कि: "ग्रीनहाउस गैस, अर्थात CO2 और CH4 का उत्सर्जन, जलाशय में जलमग्न वनस्पति के माध्यम से आने वाले आने वाले जैविक पदार्थों के कारण अधिक होने की संभावना है. जलाशय से कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन का उत्सर्जन स्तर क्रमशः 2550 और 24 मिलीग्राम प्रति वर्ग मीटर "प्रति दिन" होता है. (एनईईआरआई रिपोर्ट यहां उपलब्ध है पृष्ठ 5, पैरा 5). यह स्पष्ट है कि टिहरी जलाशय के नीचे स्थित पानी मर चुका है. इसमें ऑक्सीजन नहीं है. बिजली पैदा करने के बाद टिहरी से जो पानी छोड़ा जाता है उसमे ऑक्सीजन नहीं होती है और वह मृत पानी होता है.

    इंटरनेशनल रिवर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ब्राजील में बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं से ग्रीनहाउस गैस का कुल उत्सर्जन 2 किलो कार्बन प्रति किलोवाट बिजली से अधिक है (रिपोर्ट यहां उपलब्ध है - तालिका 1). इसकी तुलना में कोयले से केवल 0.95 किग्रा प्रति किलोवाट बिजली का उत्सर्जन होता है. (संदर्भ के लिए संलग्न रिपोर्ट - पृष्ठ 8) है। इसलिए, थर्मल प्लांटों की तुलना में बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं कार्बन उत्सर्जन में और अधिक बढ़ जाती हैं.

    सरकार गंगा की सहायक नदियों पर लखवार, व्यासी और पंचेश्वर जैसे बड़े बांधों का निर्माण कर रही है. इन परियोजनाओं से मरा हुआ पानी छोड़ा जायेगा तो गंगा साफ़ कैसे होगी?

     

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  • नमामि गंगे अभियान क्या है?

    गंगा नदी के पुनरुद्धार और कायाकल्प के लिए भारत सरकार द्वारा अक्टूबर 2016 में नमामि गांगे मिशन शुरू किया गया है. मिशन के अंतर्गत गंगा की सतह पर साफ सफाई, क्रीमेटोरिया आधुनिकीकरण, घाट की मरम्मत, ग्रामीण स्वच्छता, नगर मल-जल प्रबंधन और वनीकरण पर ध्यान केंद्रित किया है. (यहां देखें)