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  • गंगा नदी के पानी को हुगली में ले जाने के लिए फरक्का बराज बनाइ गई थी . बराज से एक फीडर कनाल द्वारा पानी को हुगली में ले जाया जा रहा है . फीडर कनाल का स्तर गंगा के स्तर से 10 मीटर ऊंचा है. गंगा के पानी को फीडर कनाल में डालने के लिए उसका स्तर 10 मीटर ऊंचा करना जरूरी था . बराज से पानी का यह जल स्तर ऊंचा किया गया है . ऐसा करने से बराज में 50 किलोमीटर पीछे तक एक तालाब बन गया है .

  • वाराणसी में बाँध निर्माण की वजह से कछुओं पर जीवन संकट

    कछुवे नदी के कूड़े को खाकर नदी को स्वच्छ बनाने में मददगार साबित होते हैं .जल मार्ग विकास परियोजना से गंगा नदी को साफ़ करने वाले इन इन कछुवों का अस्तित्व

  • प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा नए मल्टीमोडल प्रोजेक्ट की आधारशिला झारखण्ड में रखी गयी
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 6 अप्रैल को झारखंड में गंगा नदी पर मंगलम टर्मिनल परियोजना की नींव रखी गई है.
  • Post By: Shripad Dharmadhikari & Jinda Sandbhor
    राष्ट्रीय जलमार्ग को दर्शाता नक्शा (वाराणसी) फोटो साभार: जिंदा सिंधभोर

    उत्तर प्रदेश में वाराणसी जलमार्ग का केंद्र बनने जा रहा है क्योंकि यहाँ चार नदियाँ आपस फैली हुई है. वाराणसी में चार जलमार्गो को भरत सरकार ने राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया है, जो की नुक्सानदेह हैं.

  • केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना (फोटो साभार: द इंडियन एक्सप्रेस)
    सरकार ने जल आपूर्ति हेतु नदी जोड़ो परियोजना को शुरू किया है परन्तु इससे आम जनजीवन में बहुत से नुक्सान हैं. जब जल आपूर्ति के अन्य विकल्प मौजूद हैं तो नुकसानदेह परियोजना को बढ़ावा क्यों दिया जा रहा है.
  • अमेरिका द्वारा हटाया गया एल्व्हा डैम (फोटो साभार: डांसिंग बेयर, विकिमीडिया)

     

    अमेरिका ने 2016 में नदियों पर बनाये गए 72 परियोजनाओं को हटाया गया है.जबकि 1912 से 2016 तक अमेरिका ने 1384 बांधों को किया है.

  • गंगोत्री में स्थित माँ गंगा का मंदिर (फोटो साभार: जीएनयू डॉक्स.विकिमीडिया)

     

    “His Holinesses welcomes the declaration of Government of India to name Holy Ganga as the National River” – By Jagadguru Sri Nischalanandji, Shankaracharya of Goverdhan Mutt,Puri

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    सद्गुरु जग्गी वासुदेव ‘रेली फॉर रिवेर्स’ अभियान के तहत कन्याकुमारी से लेकर हिमालय तक गाड़ी चलाकर लेकर जायेंगे जिसके तहत वे लोगों को नदियों को बचाने का सन्देश भी देंगे. यह रेली 16 भारतीय राज्यों से होते हुए देश की 30 नदियों को बचाने का सन्देश देगी.

  • श्रीपद धर्माधिकारी एवं सिन्धभोर द्वारा लिखित

    भारत सरकार ने हाल ही में राष्ट्रीय अंतर्देशीय जलमार्गों की एक महत्वकांक्षी परियोजना को हाथ में लिया है.मंथन औरश्रुति कीनई रिपोर्ट अंतर्देशीय जलमार्गों से संबंधित मुद्दों की विस्तृत विवेचना प्रस्तुत करती है.  राष्ट्रीय जलमार्गों के निर्माण से देश को अनेक फायदे होंगे. किन्तु निर्माण के चरण में पड़ने वाले दुष्प्रभावों को नीचे दर्शाया गया हैं:

    1. जब किसी नदी में नौवहन मार्ग बनाया जाता है तो अपेक्षित गहराई और चौड़ाई बनाने के लिए नदी में ड्रेजिंग की जाती है, जिससे की जलीय जीवन नष्ट होने की सम्भावना रहती है.
    2. ड्रेजिंग के दौरान नदी की तली से गाद, चट्टानों, गारे और कीचड़ को निकला जाता है. इस तरह की कार्यवाही से नदी की स्थिरता व संतुलन पर असर पड़ता है.
    3. किसी भी तरह की ड्रेजिंग के दौरान नदी का पानी गन्दा हो जाता है. इस गंदे पानी की वजह से बहुत सारी मछलियाँ वहां से पलायन कर जाती हैं. गंदे पानी की वजह से सूरज की किरणे भीतर तक नहीं जा पाती हैं जलीय पौधों और जलीय जंतुओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है.
    4. जलमार्ग बनाने के लिए नदियों की तली को काटा जाता है तो भूमिगत जलश्रोतों के कटने की सम्भावना भी ज्यादा बढ़ जाती है. इसकी वजह से आसपास के कुओं और झरनों में पानी की आपूर्ति बंद हो जाएगी और आसपास का भूमिगत जल स्टार भी घटने लगेगा.
    5. नदियों की खाड़ियों और क्रिक्स में ड्रेजिंग के फलस्वरूप पानी के निकासी के कारण समुद्र का खारा पानी क्रिक्स या नदियों में काफी भीतर तक घुस सकता है. पानी के इस तरह से घुसने की वजह से खाड़ी में मौजूद जंगलों, मछलियों एवं जलीय जीवों पर सीधा प्रभाव पड़ना निश्चित है.
    6. जलमार्गों से पदार्थों की ढुलाई और परिवहन के लिए नदी तटों पर बंदरगाह और हब बनाने होंगे जिससे कि आसपास के पेड़ों और मैनग्रोव जंगलों की बड़े पैमाने पर कटाई होगी. और घाटों और बंदरगाहों के निर्माण से नदी, स्थानीय लोग और मछुआरे की पहुँच से बाहर हो जाएगी.

    धर्म्तर पोर्ट

    धरमतर पोर्ट की जेटी पर चालू एस्केवेटर जिसके पीछे विशाल कोयले के भण्डार को साफ़ देखा जा सकता है (फोटो साभार: मंथन और श्रुति)

    धरमतर क्रीक पर लगाया गया बैकहो ड्रेजर
    धरमतर क्रीक पर लगाया गया बैकहो ड्रेजर (फोटो साभार: मंथन और श्रुति)

    अतः हमारा वर्तमान सरकार से यह प्रश्न है कि इस बहुद्देशीय विकास से होने वाले फायदों की वजह से मनुष्य के आम जीवन और नदियों को क्यूँ संकट डाला जा रहा है. इस प्रकार के बहुद्देशीय प्रोजेक्टों को चलाने से पहले दुष्प्रभावों का हल निकलना बहुत जरुरी है.

    अंत में बताते चलें कि: राष्ट्रीय जलमार्ग अधिनियम, 2016 में 111 राष्ट्रीय जलमार्गों का ब्यौरा दिया गया है जिसके अनुसार राष्ट्रीय जलमार्ग भारत की लगभग सभी प्रमुख नदियों से होकर गुज़रते हैं. नीचे हम क्रमानुसार विभिन्न राज्यों में प्रस्तावित जलमार्गों की संख्या को देख सकते हैं:

    1 अगस्त 2016 को पॉट परवहन मंत्रालय द्वारा प्रेस इनफार्मेशन ब्यूरो के माध्यम से जारी की गयी प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक भारत में 6 राष्ट्रीय जलमार्ग कार्यरत हैं:

    1. राष्ट्रीय जलमार्ग 1: गंगा भागीरथी हुगली नदी व्यवस्था (इलाहाबाद- हल्दिया).
    2. राष्ट्रीय जलमार्ग 2: ब्रह्मपुत्र नदी.
    3. राष्ट्रीय जलमार्ग 3: पश्चिमी तट नहर (कोत्त्पुरम-कोल्लम) एवं उद्योगमंडल एवं चम्प्कारा नहरें.
    4. राष्ट्रीय जलमार्ग 68: मांडोवी नदी.
    5. राष्ट्रीय जलमार्ग 97: सुंदरवन जलमार्ग.
    6. राष्ट्रीय जलमार्ग 111: जुआरी नदी.

    लेखक मंथन अध्ययन केंद्र से जुड़े पर्यवारंविद्ध हैं.

     

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  • गंगा नदी को जल आपूर्ति के लिए हूगली नदी की तरफ मोड़ा गया है (फोटो साभार: रिसर्चगेट)

    फरक्का बैराज, भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से एक विवादास्पद मामला रहा है. फराक्का बैराज द्वारा नदी का पानी दो भागों में बांटा जाता है. पानी का एक हिस्सा फीडर कैनाल द्वारा हूगली नदी को दिया जाता है जबकि पानी का दूसरा बराबर हिस्सा बांग्लादेश को प्रदान किया जाता है। पानी की कम आपूर्ति के कारण, बांग्लादेश में उत्पन्न होने वाली बड़ी समस्या “खारे पानी का प्रवेश” है, जिससे की समुद्र का खारा पानी अन्दर की की भूमि में नीचे से आ जाता है। गंगा के पानी को फराक्का बैराज के नीचे से प्रवाहित किया जा रहा है और इसी कारण बांग्लादेश में अधिक मात्रा में गाद का जमाव हो रहा है.(इस मुद्दे पर रिपोर्ट यहां उपलब्ध है) फरक्का बैराज के नीचे से पानी छोड़े जाने के कारण बांग्लादेश को गाद ज्यादा जाती है जिसके कारण बांग्लादेश में बाढ़ की समस्या बढ़ गयी है। इन कारणों से गंगा की कई प्रजातियों का विनाश हो रहा है. फराक्का बैराज परियोजना नें कोलकाता बंदरगाह को अधिक पानी सप्लाई कराने में सफलता पायी है. (विस्तार यहाँ संलग्न है). अगर पानी का विभाजन नहीं होता  है तो, कोलकाता बंदरगाह में पानी की कमी होगी. लेकिन इससे भारत में भी अन्य नकारात्मक परिणाम बढ़े हैं, जैसे कि हिलसा मछली की आबादी कम होना और फरक्का के ऊपर गाद जमा होने से बाढ़ में वृद्धि. 

    भारत और बांग्लादेश दोनों के लिए एक सम्भव समाधान नदी को निरंतर प्रवाह को स्थापित करके फरक्का बैराज को नया रूप देना है जिससे कि गाद दोनों देशों में समान रूप से विभाजित हो और मछलियां आसानी से विचरण कर सकें। (विकल्प के लिए हमारा पिछला लेख यहाँ पर देखें)

    गंगा नदी को बांग्लादेश की तरफ जाते हुए दिखाया गया है (फोटो साभार : गूगल अर्थ)
    इस सन्दर्भ में फरक्का बराज का विडियो यहाँ पर देखें.

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  • लेखक - मयूख डे

    हूगली नदी में यातायात देखा जा सकता है (फोटो साभार: मयुख डे)

    गंगा के मैदानी क्षेत्र में एक अनोखा प्राणी डॉलफिन बसा हुआ है. डॉल्फिन देख नहीं सकता है. यह पशु ध्वनियों पर आधारित रहता है और आवाज़ सुन कर अपने शिकार को पकड़ता है. कलकत्ता में डॉलफिन देखने के बाद मैं आश्चर्यचकित था किशहर के भीतर मैंने कभी नदी में रहने वाले जानवरों के इस अवशेष की कल्पना नहीं की थी. सीवेज, प्लास्टिक, तेल और रसायनों के वाहक होने के अलावा, हूगली नदी, पूरे देश में सबसे व्यस्त जलमार्गों में से एक है. एक मोटरबोट, जिसकी क्षमता 100 लोगों की होती है, प्रत्येक 10 मिनट के अंतराल में एक घाट से दूसरे घाट के बीच में चक्कर लगातीरहती है. इसके अलावा, भरी कंटेनर और कोयला ले जाने वाले जहाजों द्वारा धुंआ भी पूरी नदी में फ़ैल जाता है.

    हुगली नदी में भारी वाहक ट्रैफिक (फोटो साभार: मयुख डे)

    हूगली नदी में भरी वाहक ट्रेफिक होने की वजह से पानी के नीचे बहुत ज्यादा शोर होता है. चूँकि डॉलफिन ध्वनि पर निर्भर हैं, इसलिए हूगली नदी में शोर उन्हें निश्चित रूप से प्रभावित करता है. कलकत्ता में हूगली नदी के विपरीत, बिहार में गंगा नदी है, जहाँ झींगा मछलियों और डॉलफिन की आवाजें, पूरे पानी को स्तंभ से भर देती हैं. वहीँ एक मोटरबोट इन जानवरों की आवाज सुनने और अपनी जीविका चलाने की क्षमता को क्षीर्ण कर देती है. बगेर सही अध्ययन के यह पता नहीं चल पायेगा कि, हमारी नदियों में आवाज का प्रदूषण गंगा नदी में डॉलफिन को कैसे प्रभावित कर रहा है. उदाहरण के लिए चीन की यांगत्जी नदी को लिया जा सकता है, जो कि एक बार डॉलफिन का घर था. नदी में बढ़ता शोर, डॉलफिन के विलुप्त होने के कारणों में से एक माना जा सकता है. कहीं ऐसा न हो जाये कि जिस प्रकार चीनी नदी से डॉलफिन विलुप्त हो गयी हैं उसी प्रकार हमारी गंगा से भी डॉलफिन विलुप्त न हो जाएँ.

    गंगा के बाढ़ के मैदानों के एक अप्रयुक्त अनुभाग की एक हवाई छवि (फोटो साभार: मयूख डे)

    वास्तविकता यह है कि डॉलफिन गंगा नदी में बने अंतर्देशीय जलमार्गों के अत्याचारों को झेल रही हैं. और यह अंतर्देशीय जलमार्ग डॉलफिन के विनाश का संकेत है. सही है कि कलकत्ता में आज शोर तथा मोबिल ऑइल के बीच डॉलफिन पायी जा रही हैं. परन्तु भागलपुर की तुलना में यह बहुत कमजोर हैं. इस प्रकार के जलमार्गों के निरंतर निर्माण से इस सुन्दर जीव का मिलना, और भी मुश्किल होता जा रहा है. मयूख डे द्वारा लिखित सम्पूर्ण कहानी यहाँ पढ़ सखते हैं...


    मयुख डे: मयुख डे, बैंगलोर के नेशनल सेंटर ऑफ बायोलॉजिकल साइंसेज में वर्तमान एमएससी वाइल्डलाइफ बायोलॉजी और कंजर्वेशन कोहोर्ट कार्यरत है. पहले मगरमच्छ, मछलियों और गंगा नदी डॉल्फिन से जुड़ी परियोजनाओं पर काम करने के बाद, उनका संबद्ध पिछले तीन सालों से ताजे पानी की प्रणालियों से रहा है। यहां, वह डॉल्फिन नदी के लिए अपनी चिंताओं के बारे में लिखते हैं जो भारत के शोरगुल वाले यातायात जलमार्ग में रहता है. 

     

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  • नितिन गडकरी ने 150 प्रोजेक्ट्स की शुरुवात की

    केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने गंगा की सफाई हेतु मार्च 2018 तक 150 नए प्रोजेक्ट स्थापित करने की बात कही है. इसके अंतर्गत 90 प्रोजेक्टों को स्वीकृति दी जा चुकी है और अन्य को भी जल्दी स्वीकृत कर दिया जायेगा. हम गडकरी जी के इस फैसले का समर्थन करते हैं. सरकार का मानना है कि 1.5 लाख करोड़ रुपयों की लागत से बनने वाले ये प्रोजेक्ट गंगा की सफाई में मददगार होंगे. लेकिन गडकरी जी साथ साथ गंगा पर बड़े जहाजों को चलाना चाहते हैं इनसे गंगा प्रदूषित होगी. नीचे चित्र में दिखाया गया है कि जहाजों के पेंट में तांबा होता है जो कि मछलियों  के लिए हानिकारक होता है.

  • गुजरात चुनाव को गुजरात के पूर्व मुख्मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा स्थापित विकास मॉडल के परीक्षण के रूप में देखा जा रहा है. गुजरात मॉडल की उपलब्धियों में से एक साबरमती नदी के बैंकों का विकास है. इसमें कोई संदेह नहीं है कि अहमदाबाद के बड़े बड़े लोग साबरमती बैंको पर घुमने का आनंद ले रहे हैं. लेकिन सिर्फ बड़े लोग क्योंकि साबरमती की अपनी अस्मिता और उसका अपना पर्यावरण नष्ट हो गया है और वह गरीब लोगों की पहुँच से दूर हो गयी है.

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    गुजरात में चुनाव का दौर चल रहा हैं और आरोप प्रत्यारोपों का दौर जारी है. गुजरात में मेगा रैलियों का मेगा शो चल रहा है. पीएम नरेंद्र मोदी भी गुजरात में प्रचार कर रहे है तो साथ ही कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी गुजरात दौरे पर हैं. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान मंदिरों के ताबड़तोड़ दौरों का क्रम जारी रखते हुए भगवान शिव के द्वाद्वश ज्योतिर्लिंगों में से पहले सोमेश्वर महादेव के यहां समुद्र तट पर स्थित भव्य सोमनाथ मंदिर का दर्शन किया. पिछले 25 सितंबर को अपने चुनावी अभियान की शुरूआत द्वारका के जगत मंदिर से करने वाले राहुल अब तक चोटिला चामुंडामाता मंदिर, कागवड के खोडलधाम, अंबाजी, बहुचरमाता मंदिर, गांधीनगर के अक्षरधाम मंदिर समेत 20  से अधिक मंदिरों के दौरे कर चुके हैं. इसे लेकर बीजेपी तंज करती रही है. पीएम ने कहा कि राहुल गांधी के परनाना या फिर उनके पिता के नाना ने सोमनाथ मंदिर नहीं बनवाया है और राहुल गांधी को सोमनाथ मंदिर के इतिहास के बारे में पता नहीं है.

    प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, 'आज सोमनाथ का पताका पूरे विश्व में फहर रहा है. आज जिन लोगों को सोमनाथ याद आ रहे हैं, इनसे एक बार पूछिए कि तुम्हें इतिहास पता है? तुम्हारे परनाना, तुम्हारे पिता जी के नाना, तुम्हारी दादी मां के पिता जी, जो इस देश के पहले प्रधानमंत्री थे. जब सरदार पटेल सोमनाथ का उद्धार करा रहे थे तब उनकी भौहें तन गईं थीं.' इतना ही नहीं भारत के राष्ट्रपति डॉ. राजेद्र प्रसाद को सरदार बल्लभभाई पटेल ने उद्घाटन के समय सोमनाथ आने का न्योता दिया. तब तुम्हारे परनाना पंडित जवाहर लाल नेहरू ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखकर सोमनाथ के कार्यक्रम में जाने पर नाराजगी व्यक्त की थी.' आपको बता दें कि सोमनाथ में ज्योतिर्लिंग है और हिंदू धर्म में इस मंदिर की बड़ी मान्यता है. लेकिन राहुल गांधी के सोमनाथ में जाते ही सोमनाथ के इतिहास नें भी इस चुनावी माहौल में एंट्री ले ली. लेकिन इतिहास समय सापेक्ष होता है. नेहरू जी ने जो कहा और किया वो उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए लिया गया फैसला हो सकता है.

    विषय यह है की आज राहुल गांधी शिव को कितना मानते हैं और सोमनाथ मंदिर या अन्य मंदिरों के प्रति कितने आस्थावान हैं. क्योंकि अगर हम देखें तो 1917 में  मदन मोहन मालवीय जी नें अंग्रोजों के विरोध में आन्दोलन किया था  जिसमें अंग्रेजों के साथ एक अनुबंध हुआ था जिसमे स्पष्ट लिखा था की गंगा पर कोई अवरोध पैदा नहीं किया जाएगा और बिना हिन्दुओ से विचार विमर्श के  कोई परियोजना नहीं बनाई जायेगी.(इससे सम्बंधित पिछला पोस्ट यहाँ पढ़ें) लेकिन इसके बावजूद गंगा पर कई बड़ी परियोजनाए बनाई गई और गंगा के अविरल प्रवाह को बाधित किया गया और लगातार किया जा रहा है. 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने भागीरथी पर निर्माणाधीन तीन परियोजनाओं को  देश की जनता की गंगा के प्रति अस्मिता और श्रधा को देखते हुए निरस्त कर दिया था लेकिन भाजपा सरकार नें 2013 में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बावजूद पीपलकोटी की परियोजना को चालु भी किया और उसको पुरजोर बढ़ा रही है और उसके ऊपर कोई चर्चा करने को तैयार नहीं हैं. इसलिए आज हमको इस सोमनाथ के प्रकरण से हमको चिंतन यह करना चाहिए की आज हम क्या कर रहे हैं पुरानी बातों को ध्यान रखने से कोई फायदा नहीं है.

     

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  • पोस्ट: हिंदुस्तान टाइम्स द्वारा डॉ भरत झुनझुनवाला

    भागलपुर के निकट गंगा को गंगा डॉल्फिन के संरक्षण के लिए वन्यजीव अभ्यारण्य घोषित किया गया है. इस जानवर में आँखें नहीं होती हैं यह अन्य समुद्री जीवों की ध्वनि वातावरण द्वारा विचरण करता है और अपने शिकार को पकड़ता है.

    बीते दिनों में, केंद्र ने राष्ट्रीय जलमार्ग -1 (एनडब्ल्यू -1) के हल्दिया-वाराणसी पर बढ़ते नेविगेशन के लिए 5,369 करोड़ रुपये जल विकास मार्ग परियोजना को मंजूरी दे दी. इस परियोजना की 2023 तक पूरा होने की उम्मीद है. केंद्र सरकार के अनुसार तब परिवहन का एक वैकल्पिक तरीका उपलब्ध होगा जो कि पर्यावरण के अनुकूल होगा और लागत कम आएगी. यह आर्थिक आकलन  केवल बार्जेस चलाने और टर्मिनलों को बनाए रखने की लागत का संज्ञान लेता है. किन्तु यह समाज पर लगाए गए पर्यावरणीय लागतों के मौद्रिक मूल्य का संज्ञान नहीं लेता है.

     

    जलमार्ग परियोजना के पर्यावरणीय दुष्प्रभाव

    यदि पर्यावरण के नुकसान का आर्थिक मूल्य जोड़ दिया जाये तो हमारे आंकलन में यह परियोजना लाभप्रद नहीं रह जायेगी. जलमार्ग परियोजना के निम्नलिखित पर्यावरणीय दुष्प्रभाव के केंद्रसरकार ने अनदेखी की है.

    पहला दुष्प्रभाव जलमार्ग के लिए की गयी ड्रेजिंग का पड़ता है. गंगा नदी छिछले तालाबों और उथले क्षेत्रों पर फैली हुई बहती है। मछली और कछुए इन उथले क्षेत्रों में अंडे देते हैं। लेकिन ड्रेजिंग से नदी का बहाव एक गहरे चैनल में सीमित कर दिया गया है. अब उथले इलाकों में मछली और कछुए के निवास स्थान को नष्ट कर दिया गया है.

    जलमार्ग का दूसरा प्रभाव जहाज़ों के कछुओ पर अघात से पड़ता है. जब जहाज चलते हैं तो कछुए उनके रास्ते से भाग नहीं पाते क्योंकि वे धीरे धीरे चलते हैं, और चोटिल हो जाते हैं.  वाराणसी के निकट गंगा में कछुआ अभयारण्य स्थापित किया गया है. अन्य देशों में अध्ययन से संकेत मिलता है कि बड़ी संख्या में नावों से कछुओं का शिकार होता है.

    जलमार्ग का तीसरा दुष्प्रभाव जहाजों के चलने से निकली आवाज से होता है.भागलपुर के निकट गंगा में डॉल्फिन के संरक्षण के लिए  वन्यजीव अभ्यारण्य घोषित किया गया है. इस जानवर में आँखें नहीं होती हैं. यह जानवर अन्य समुद्री जीवों की आवाजाही के द्वारा उत्पन्न ध्वनि से ही अपना शिकार पकड़ता है. बड़े बार्जेस के चलते इस क्षेत्र में ऊंची ध्वनि पैदा होगी जिससे उनके लिए शिकार को पकड़ना मुश्किल हो जाएगा.

    जलमार्ग का चौथा दुष्प्रभाव प्रदुषण में वृद्धि का होगा.जहाजों और बार्जेस पर लगा पेंट भी पानी दूषित करता है। जहाजों द्वारा छोड़े गए कार्बन डाइऑक्साइड को नदी द्वारा निकटता की वजह से अधिक सोखा जाएगा और यह नदी को प्रदूषित करेगा.

    अमेरिका स्थित एग्रीकल्चर एंड ट्रेड पालिसी इंस्टिट्यूट द्वारा एक रिपोर्ट में कहा गया है कि मिसिसिपी जलमार्ग केवल इसलिए किफायती है क्योंकि इस पर टैक्स वसूला जाता है जबकि रेल और सड़क परिवहन से टैक्स वसूला जाता है. एनडब्ल्यू -1 इससे भिन्न नहीं होगा. पर्यावरण के नुक्सान के मूल्य को जोड़ लिया जाय तो यह देश के लिए अत्यधिक नुकसानदेह सिद्ध होगा.

     

    इस विषय पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को लिखें

     

  • इस पोस्ट में हम पूर्व प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह एवं वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के गंगा के प्रति कार्यों का तुलनात्मक अध्ययन करेंगे.

    श्री मनमोहन सिंह कहा करते थे कि गंगा मेरी माँ है. प्रधानमंत्री का पद ग्रहण करने के शीघ्र बाद श्री नरेन्द्र मोदी ने भी कहा था कि गंगा ने मुझे बुलाया है, अब हमें गंगा से कुछ भी लेना नहीं, बस देना ही है.आइये अब देखें इन्होंने अपने अपने कार्यकाल में गंगा के लिए क्या किया है.

    टिहरी बांध:

    टिहरी बाँध का निर्माण नरसिम्हाराव की कांग्रेस सरकार के दौरान शुरू हुआ था. इसके बाद वाजपेयी जी की सरकार 1999 में सत्ता में आई और उस समय प्रश्न उठा कि क्या गंगा पर बाँध बनाने से गंगा की आध्यात्मिक शक्ति पर दुष्प्रभाव पड़ता है?  इस विषय पर तथा टिहरी के भूकंप सम्बन्धी सम्भावनाओं  को देखने के लिए श्री मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता में वाजपेयी जी ने एक कमिटी बनाई थी. इस कमिटी में चार सदस्य विश्व हिन्दू परिषद् के लिए गए थे. (1.रिपोर्ट नीचे देखें). इस कमिटी ने भूगर्भीय दृष्टिकोण से टिहरी को हरी झंडी दे दी थी और गंगा की आध्यात्मिक शक्ति के विषय में कमिटी नें कहा कि दस सेंटीमीटर (लगभग 4 इंच) की एक पाइप बाँध में डाल दिया जायेगा जो गंगा की अविरलता को सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त होगी.

    चार इंच के पाइप से झील में सड़ने वाले पानी निकलने को अविरलता मान लिया गया. यहाँ देखने की बात यह है कि अविरलता की जरुरत मुख्यतः इसलिए होती है कि रुका हुआ पानी सड़ने लगता है और उसकी आध्यात्मिक शक्ति ख़त्म हो जाती है. बाँध के अवरोध से मछलियां भी आवाजाही नहीं कर पाती और कमजोर हो जाती हैं. टिहरी बाँध के ऊपर अब महसीर मछली नहीं पाई जाती है.जिसकी वजह से पानी की गुणवत्ता में गिरावट आती है. चार इंच के पाइप से न तो पानी की सड़न कम होती है और न ही मछलियों का आवागमन होता है.

    गंगा के लिए समर्पित सानंद स्वामी जी (डॉ जी डी अग्रवाल, पूर्व प्रोफेसर, आई आई टी कानपुर) का कहना है कि मुरली मनोहर जोशी की इस रिपोर्ट के बाद ही टिहरी के ऊपर लोहारी नागपाला, भैरव घाटी और पाला मनेरी के बांधों को भी शुरू करने का क्रम हुआ. उनका मानना है कि भाजपा और विश्व हिन्दू परिषद् के सदस्यों ने जब मान लिया कि बाँध बनाने से गंगा की आध्यात्मिक शक्ति का ह्रास नहीं होगा तब गंगा पर दूसरे बांधों को बनाने का रास्ता खुल गया. यद्यपि जोशी रिपोर्ट मूलतः टिहरी बाँध के विषय में थी परन्तु इसका दीर्घकालिक प्रभाव हुआ और गंगा के ऊपर अन्य परियोजनाएं भी शुरू हो गयी.

    NGRBA:

    श्री सानंद स्वामी जी द्वारा गंगा के लिए किये गए अनशन के फलस्वरूप श्री मनमोहन सिंह ने 2009 में “नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी” का गठन किया. इस अथॉरिटी में दस विशेषज्ञ सदस्यों को पूर्ण सदस्य बनाया गया था. इन सदस्यों में श्री राशिद सिद्दकी, सुनीता नारायण, राजेंद्र सिंह, बी डी त्रिपाठी, आर के सिन्हा जैसे गंगा के ऊपर श्रद्धा से काम करने वाले व्यक्ति समिलित थे. वर्ष 2016 में श्री नरेंद्र मोदी की सरकार नें इस प्रारूप को निरस्त करके नया प्रारूप जारी किया जिसमे ऑथोरिटी के सदस्य केवल मुख्यमंत्री एवं केंद्रीय मंत्री रह गए और व्यवस्था की गई कि एक्सपर्ट्स से चर्चा की जा सकती है. यानि गंगा के बारे में जानकार लोगों का पद सदस्य से घटाकर केवल मांगे जाने पर सुझाव देने का रह गया.  (2.रिपोर्ट नीचे देखें)

    तीन परियोजनाएं:

    सानंद स्वामी जी के ही अनशन के फलस्वरूप श्री मनमोहन सिंह ने गंगा की मुख्य धारा भागीरथी पर निर्माणाधीन तीन जल विद्युत परियोजना पाला मनेरी, भैरव घाटी और लोहारी नागपाला को निरस्त कर दिया (3.रिपोर्ट नीचे देखें). इसके सामने मोदी जी की सरकार के प्रमुख मंत्री श्री नितिन गडकरी नें कहा कि उनका प्रयास रहेगा कि बंद हुई परियोजनाओं को पुनः शुरू किया जाएगा.

    हाल ही में केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री ने बयान दिया है कि गंगा पर अब कोई नयी परियोजनाएं शुरू नहीं की जाएँगी. साथ साथ उन्होंने यह भी कहा है कि रुकी हुई परियोजनाओं का काम जल्द शुरू किया जाएगा. अतः यह स्पष्ट नहीं है कि श्री मनमोहन सिंह द्वारा निरस्त की गई उपरोक्त तीनो परियोजनाओं पुनः शुरू किया जायेगा या नहीं.

    आईआईटी:

    मनमोहन जी की सरकार नें सात IIT के कंसोर्टियम को गंगा रिवर बेसिन मैनेजमेंट प्लान बनाने का कार्य दिया था. IITs नें यह प्लान बनाकर जनवरी 2015 में केंद्र सरकार को सौंप दिया. इस प्लान में कहा गया था कि गंगा को पुनर्जीवित करने के लिए उसकी लोंगीटयुडनल कनेक्टिविटी यानि उसके प्रवाह की प्राकृतिक निरंतरता बनाये रखना जरुरी है

    (dams and barrages must permit longitudinal connectivity and allow E-Flows (Environmental Flows) in rivers. Towards this end, a method for ensuring longitudinal river connectivity with E-Flows passage through dams/barrages is suggested. A comprehensive set of criteria has also been proposed to define environmental clearance requirements for dams/ barrages based on 4 categories of their environmental impacts. - Ganga River Basin Management Plan - 2015). (4.रिपोर्ट नीचे देखें)

    IITs नें कहा कि ऐसे किसी भी प्रोजेक्ट को स्वीकृति नहीं दी जानी चाहिए जिससे कि गंगा की लोंगीटयुडनल कनेक्टिविटी या अविरल धारा बाधित होती है. लेकिन आज सरकार इस रिपोर्ट का कोई जिक्र नहीं करती है और न ही इसपर कोई  निर्णय लिया है. इस संबंद में CAG ने कहा है:

    “National Mission for clean ganga could not finalise the long-term action plans even after more than six and half years of signing of agreement with the consortium of Indian Institute of Technology. As a result, National Mission of Clean Ganga does not have a river basin management plan even after a lapse of more than eight years of National Ganga River Basin Authority notification” -  CAG report 2016). (रिपोर्ट नीचे देखें)

    पर्यावरणीय प्रवाह:

    श्री मनमोहन सिंह सरकार नें गंगा के ऊपर निर्माणाधीन जल विद्युत परियोजनाओं पर विचार करने के लिए श्री बी के चतुर्वेदी की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई थी. इस कमेटी नें निर्णय लिया कि जलविद्युत परियोजनाओं को 20 से  30 प्रतिशत पानी, पर्यावरणीय प्रवाह के रूप में निरंतर छोड़ना होगा. (रिपोर्ट नीचे देखें). नेशनल ग्रीन ट्रेबुनल में दायर की गयी एक याचिका में केरल सरकार ने कहा है कि पर्यावरण मंत्रालय द्वारा इन संस्तुति के अनुसार पर्यावरणीय प्रवाह छोड़ने की शर्त लगयी जा रही है:

      "Ministry of Environmental, forest and Climate Change (MoEF&CC) is suggesting “Minimum environmental flow release would be 20% of average of four months of lean period and 20% to 30% of flows during non-lean and non-monsoon period corresponding to 90% dependable year. The cumulative environmental flow releases including spillage during the monsoon period should be about 30% of the cumulative inflows during the monsoon period coressponding to 90% dependable year” while according environmental clearance from hydro electic projects." (रिपोर्ट नीचे देखें)

    इसके सामने चार साल बीत जाने के बाद भी वर्तमान में चल रहे जल विद्युत परियोजना जैसे टिहरी, विष्णुप्रयाग, मनेरी भाली इत्यादि से 20 से 30 प्रतिशत पर्यावरणीय प्रवाह छोड़ने के प्रति मोदी सरकार नें कोई कदम नहीं उठाया है.

    अंतर्देशीय जलमार्ग:

    गंगा के ऊपर ढुलाई करने की योजना बहुत पुरानी है. लेकिन वर्ष 2014 तक श्री मनमोहन सिंह ने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं लिया था. श्री नरेंद्र मोदी जी की सरकार के सत्तारूढ़ होने के तुरंत बाद सितंबर 2014 में ही नेशनल वाटरवे – 1 की डीपीआर बनाने के लिए ठेकों का निमंत्रण जारी कर दिया गया, विश्व बैंक से लोन लिया और आज इस पर तेज़ी से कार्य हो रहा है.

    सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट:

    जहाँ तक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स का विषय है, हमारी जानकारी में श्री मनमोहन सिंह के समय में इनकी बुरी स्थिति थी लेकिन वर्तमान में इनकी दशा में कुछ हद तक सुधार हुआ है यानि केंद्र सरकार द्वारा अच्छी रकम उपलब्ध कराई गयी थी लेकिन जमीनी स्तर पहले इनमे कोई काम नहीं हुआ था. बनारस के लोगों का कहना है कि बीते कुछ समय में मोदी जी की सरकार में गंगा का पानी कुछ साफ़ हुआ है, और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के माध्यम से गंगा में कूड़ा कचरा रोकने का काम पहले कुछ बेहतर हुआ है. IIT कंसोर्टियम नें सुझाव दिया था कि गंगा में जाने वाले गंदे पानी को साफ़ करके सिंचाई के उपयोग में लाया जाना चाहिए. यह रिपोर्ट मोदी जी के समय दी गयी है और इसमें सुधार हुआ है. केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार:

    The estimated sewage generation from Class I cities and Class II towns (as per 2001 census) is 29129 MLD, which is expected to be 33212 MLD at present assuming 30% decadal growth in urban population. Against this, there exist STPs having 6190 MLD capacity while another 1743 MLD capacity is being added. Thus, the existing treatment capacity is just 18.6 % of present sewage generation and another 5.2 % capacity is being added. However, the actual capacity utilization of STPs is only 72.2% and as such only 13.5 % of the sewage is treated. This clearly indicates dismal position of sewage treatment, which is the main cause of pollution of rivers and lakes. To improve the water quality of rivers and lakes, there is an urgent need to increase sewage treatment capacity and its optimum utilization. (यहाँ देखें)

    अब पाठक स्वयं निर्णय करें कि वास्तव में कौन माँ गंगा के प्रति  कारगर है? 

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    सम्बंधित रिपोर्ट:

  • आई.आई.टी. कानपूर के पूर्व प्रोफेसर जी.डी.अग्रवाल सन्यास लेने के बाद सानंद स्वामी के नाम से जाने जाते हैं. सानंद स्वामी जी ने आज से पूर्व पांच बार गंगा की अविरलता स्थापित करने तथा हाइड्रोपावर हटाने के लिए अनशन किया था. अब 22 जून 2018 से पूर्व अनशन पर बैठे हुए हैं. मंगलवार १० जुलाई को साकार ने उन्हें उठा कर अस्पताल में जबरन भरती करा दिया है.

    स्वामी जी ने गंगा को पुनर्जीवित करने के लिए 3 बिंदु बताये हैं.

    जल विद्युत:

    विष्णुगाड-पीपलकोटी निर्माणाधीन परियोजना

    स्वामी जी की मांग है कि अलकनंदा पर निर्माणाधीन विष्णुगाड-पीपलकोटी जल विद्युत परियोजना तथा मन्दाकिनी पर निर्माणाधीन सिंगोली-भटवाडी जल विद्युत परियोजना को तत्काल बंद किया जाये जिससे कि गंगा के इन हिस्सों में अविरलता बनी रहे. स्वामी जी का मानना है कि गंगाजल की अध्यात्मिक शक्ति हाइड्रोपावर टरबाईनो में डालने से नष्ट हो जाती है. इसलिए गंगा की अविरलता को बनाये रखना जरूरी है.

    स्वामी जी का कहना है कि वर्तमान में वे इन दोनों निर्माणाधीन परियोजनाओं को बंद करने के लिए अनशन कर रहें हैं. आगे चलकर गंगा में जो परियोजनायें बन चुकी हैं,उन्हें हटाने की बात करनी चाहिए. इसकी शुरुआत अलकनंदा पर श्रीनगर में बनी जल विद्युत परियोजना को हटाने से की जानी चाहिए.

    सिंचाई:

    गंगा के जल का इस्तेमाल कम जल खपत वाली फसलों के लिए होना चाहिए

    गंगा एवं यमुना की एक प्रमुख समस्या है कि इनका लगभग पूरा पानी हरिद्वार तथा हथनीकुंड में सिंचाई के लिए निकाल लिया जाता हैऔर ये नदियाँ इन बैराजों के नीचे सूख जाती हैं. स्वामी जी का कहना है कि इस समस्या का कारण यह है कि इन क्षेत्रों में अधिक पानी की खपत करने वाली फसलें जैसे गन्ने का उत्पादन किया जा  रहा है. गन्ने के उत्पादन में 15 से 20 बार सिंचाई करनी पड़ती है और इसके लिए पानी की अधिक मात्रा में जरूरत पड़ती है. अतः गंगा और यमुना को जीवित करने के लिए सिंचाई की मांग को कम करना होगा जिससे कि इन नदियों का पानी कम निकाला जाये और इनमें आधा पानी बहने दिया जाये. इस कार्य के लिए वर्तमान में सिंचाई के लिए उपलप्ध कराये जा रहे पानी में हर वर्ष 10 प्रतिशत की कटौती कर दी जाये. जिससे कि किसानो को पानी धीरे धीरे कम मिलेगा और वह गन्ने की स्थान पर दूसरी कम सिंचाई वाली फसलें जैसे गेहूं का उत्पादन करने लगेंगे. इस प्रकार गंगा से पानी निकालना कम हो सकेगा और गंगा पुनः जीवित हो जायेगी.

    गन्ने की खेती कम करने से चीनी का दाम बाजार में बढेगा. हमें अपने पर्यावरण की रक्षा के लिए इस महंगायी को बर्दाश्त करना होगा. बिजली का उत्तम विकल्प सौर उर्जा उपलब्ध है.

    अंतर्देशीय जलमार्ग:

    वाराणसी में निर्माणाधीन अंतर्देशीय जलमार्ग 1

    स्वामी जी का मानना है कि गंगा जी का उपयोग माल की ढुलाई के लिए नहीं करना चाहिए. उनकी दृष्टी में यह उसी प्रकार है जैसे माँ के सर के ऊपर बोझ रखकर उसको खच्चर की तरह उपयोग किया जाये.

    स्वामी जी के इन विषयों पर विचारों को आप यहाँ यू ट्यूब पर देख सकते हैं.

  • द्वारा: श्रीपiद धर्माधिकारी एवं जिन्दा सांडभोर
    भारत में प्रस्तावित राष्ट्रीय जलमार्ग

     मार्च 2016 को भारतीय संसद में राष्ट्रीय जलमार्ग अधिनियम 2016 पारित किया गया. इस अधिनियम में 111 नदियों को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया गया है. हमारे संविधान में नदियों पर मूलरुप से आधिपत्य राज्य सरकारों का है. लेकिन जहाँ संसद द्वारा किसी नदी को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया जाय, वहां पर जलमार्ग और सम्बंधित निर्माणों के अधिकार केंद्र सरकार को स्थानांतरित हो जाते हैं. उपरोक्त क़ानून के द्वारा जलमार्ग वाली नदियों पर आधिपत्य राज्य सरकार से छीनकर केंद्र सरकार को दे दिया गया है. इस क़ानून के पारित होने से केंद्र सरकार को जहाजरानी एवं नौ परिवहन के लिए इन जलमार्गों के विकास का अधिकार मिल गया है. इसके पीछे मकसद है कि, माल की ढुलाई की आर्थिक संभावनाओं का लाभ उठाया जाय.

    हमारे अध्ययन में नदियों पर माल की ढुलाई की पौलिसी में निम्न समस्याएं देखी जा रही हैं:

    • कैपिटल और रख-रखाव के लिए ड्रेजिंग: कई स्थानों पर नदी की गहराई और चौड़ाई कम होती है. यहाँ पर ड्रेजिंग की आवश्यकता होती है. ड्रेजिंग के दौरान नदी की तली से गाद, गारे, चट्टानो आदि को खोद कर निकाला जाता है जिसकी वजह से नदी का सारा पानी गन्दा हो जाता है. मछलियां पलायन कर जाती हैं. जिसकी वजह से मछुवारों को भारी नुक्सान होता है. ड्रेजिंग से कछुवों और डॉल्फिन जैसे जलीय जीवों का वातावरण दूषित हो जाता है (पानी मटमैला हो जाता है), जिससे वे आपस में संचार स्थापित नहीं कर पाते हैं. गंदे पानी की वजह से जलीय वनस्पति के बीच सूर्य की रौशनी नहीं पहुँच पाती है और प्रकाश संस्लेषण की प्रक्रिया नहीं हो पाती है. उदहारण के लिये, गंगा के निचले बाढ क्षेत्रों में डॉल्फिन पर अध्ययन कर रहे विशेषज्ञ नचिकेत केलकर नें कहा है कि,

    सघन ड्रेजिंग गतिविधियों से बेहद शोर और अस्थिरता पैदा होती है जिससे जलीय जीव विविधता, खासतौर से भारत के राष्ट्रीय जलीय पशु – गंगाई नदी डॉल्फिन (प्लाटेनिस्टा गैंजेटिका)” – पर बहुत हानिकारक प्रभाव पड़ते हैं. गंगा नदी में पाए जाने वाली यह लुप्तप्राय डॉल्फिन मछली एक अनूठा स्तनपायी जीव है जो अल्ट्रासोनिक फ्रीक्वेंसी से ही अपना रास्ता ढूँढता है. शोध के आधार पर हमारा अनुमान है कि प्रस्तावित विधेयक में जिस पैमाने पर जलमार्गों के लिए ड्रेजिंग की बात कही जा रही है उससे राष्ट्रीय महत्त्व की इस प्रजाति का जीवन और भी ज्यादा खतरे में पड़ जायेगा.” (रिपोर्ट 1 नीचे देखें)

    नदियों व् समुद्रों में कैपिटल ड्रेजिंग इस प्रकार से की जाती है
    • नदी को छोटी धारा में समेटना: अक्सर गहराई बनाने के लिए नदी के फैले हुए पानी को एक छोटे चेनल के अन्दर एकत्रित कर दिया जाता है जिससे कि उस चैनल के अन्दर पानी की गहराई ज्यादा हो जाए और जहाज चल सकें. नदी के फैलाव क्षेत्र में जलीय जीव आसानी से अपने अण्डों का संरक्षण करते हैं जिन्हें जैवमंडल का हिस्सा माना जाता है. अतः नदी को एक धारा में समेटने से जैवमंडल में सीधे असर पड़ता है.
    • घाटों और नदी बंदरगाहों का निर्माण: अंतर्देशीय जलमार्ग निर्माण हेतु नदियों,क्रिक्स और खाड़ियों के तटों पर जगह जगह बंदरगाह और हब बनाने होंगे. इन निर्माण कार्यों से आस पास के पेड़ों और मैन्ग्रोव जंगलों की बड़े पैमाने पर कटाई होगी. महाराष्ट्र के धरमतर सीपोर्ट के लिए“राष्ट्रीय जलमार्ग -10 के रास्ते में स्थित एक जेटी के निर्माणके लिए यहाँ तट पर स्थित मैनग्रोव वन पट्टी को साफ़ कर दिया गया है.”(रिपोर्ट 2 नीचे देखें)
    घाटों और बंदरगाहों में कंस्ट्रकशंन कार्य होने से गन्दगी और प्रदुषण बढ़ता है
    • बैराजों का निर्माण: नदी के पानी में आवश्यक गहराई बनाये रखने के लिए ड्रेजिंग के अलावा जगह जगह बैराज भी बनाने होंगे. बैराजों के निर्माण से नदी का किनारा डूबने लगता है, उसमे होने वाली खेती नष्ट हो जाती है, नदी का प्रवाह बदल जाता है, नदी के आसपास के पर्यावरण में बदलाव आते हैं. बैराज बनाने से नदी में गाद का बहाव भी रुक जाता है. उदाहरण के लिए 2016 में गंगा नदी में बाढ़ की स्थिति पैदा हो गयी थी. इस पर बिहार के मुख्यमंत्री नें कहा था कि “फरक्का बैराज के कारण बिहार के निचले हिस्सों (बैराज के ऊपरी हिस्सों)में बड़े पैमाने पर गाद के जमाव की वजह से बिहार में बाढ़ का इतना पानी आया था.

    • डीजल, तेल के रिसने से प्रदूषण: जलमार्गों में चलने वाले जहाज़ों से डीजल, तेल और लुब्रिकेंट रिसते रहते हैं. गंगा जलमार्ग (NW-1) में एलपीजी को जहाजों के इधन के तौर पर इस्तेमाल करने का प्रस्ताव रखा गया है. यह एक स्वागत योग्य कदम है मगर इससे भी नौकाओं से निकलने वाले लुब्रिकेंट की समस्या ख़त्म नहीं होगी.

     

    जहाजों से इस प्रकार से डीजल और तेल का रिसाव होता है
    • वैश्विक अनुभव: भारत में विभिन्न परिवहन माध्यमों में अंतर्देशीय नौ परिवहन का हिस्सा केवल5 प्रतिशत रहा है जबकि चीन, अमेरिका और यूरोप में यह संख्या क्रमशः 8.7, 8.3 और 7 प्रतिशत रहा है. ऐसा प्रतीत होता है कि इन देशों का अनुसरण करते हुए भारत सरकार नें भी जलमार्गों के विस्तार का विचार बनाया है. लेकिन हम भूल रहे हैं कि भारत और अन्य देशों की नदियों के चरित्र में मौलिक अंतर है. भारत की नदियों में अधिकतर पानी मानसून के चार महीनो में बहता है जबकि यूरोप और अमेरिका की नदियों में पानी जल श्रोतों से आता है और पूरे वर्ष बहता है. भारत में पानी के स्तर का उतार चढाव ज्यादा होने के कारण वर्ष में आठ महीने नदी में पानी कम रहता है जिसको गहरा करने के लिए हमें ड्रेजिंग करनी पड़ती है. यह परिस्थिति अमेरिका और यूरोप में नहीं है. चीन का अध्ययन हम नहीं कर पाए हैं. दूसरा अंतर यह है कि हमारे देश में नदियों की गहरी सांस्कृतिक भूमिका है. कावेरी, कृष्णा, नर्मदा और गंगा को हम पूजते हैं और इनमे स्नान करते हैं. अतः भारत में जलमार्ग बनाकर नदियों के चरित्र में परिवर्तन करने से हमारी संस्कृति पर गहरा आघात पड़ता है. तीसरी बात यह है कि मिस्सिसिपी वाटरवे के अध्ययन में बताया गया है कि मूल रूप से जलमार्ग से ढुलाई करना, सड़क परिवहन की तुलना में महंगा पड़ता है. परन्तु सड़क मार्ग से ढुलाई करने पर सरकार टैक्स वसूल करती है, जबकि जलमार्ग से ढुलाई पर सरकार कोई टैक्स वसूल नहीं करती है. अतः टैक्स के इस अंतर के कारण जलमार्ग लाभकारी हो जाता है.

    अमेरिका की इंस्टिट्यूट फॉर एग्रीकल्चर एंड ट्रेड पालिसीके एक अध्ययन के अनुसार अमेरिका में जलमार्गों को बनाये रखने के लिए 800 मिलियन डॉलर प्रतिवर्ष का खर्च होता है. इसमें से ढुलाई करने वाली कंपनियां केवल 80 मिलियन डॉलर अदा करती हैं जो कि कुल खर्चे का मात्र 10% होता है. बाकी 90% खर्च सरकार द्वारा वहन किया जाता है. अगर इसकी तुलना ढुलाई के दुसरे माध्यमों से करें तो सड़कों के रख-रखाव के लिए 70% खर्च तेल उर वाहनों पर अदा किये गए टेक्स से लिया जाता है. यानि सड़कों के रख-रखाव में केंद्र सरकार केवल 30% खर्च करती है. इसी प्रकार रेल लाइनों को बनाये रखने के लिए पूरा खर्चा रेल कम्पनियां करती हैं. रेल लाइनों के रख-रखाव का सरकार पर तनिक भी भार नहीं पड़ता है. इंस्टिट्यूट के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि अमेरिका में जो जलमार्ग चल रहा है उसका कारण उसकी आर्थिक व्यवहार्यतानहीं बल्कि उसे सरकार द्वारा दी जा रही सब्सिडी है. जलमार्गों के रख-रखाव में 90% खर्च सरकार देती है, सड़कों में 30% और रेल लाइनों में शून्य. इस अंतर के कारण रेलमार्ग किफायती प्रतीत होता है, जो कि वास्तव में किफायती नहीं है. भारत में जलमार्ग की सही गणना करने के लिए जरुरी है कि सड़क तथा रेलमार्ग से वसूले गए टैक्स और जलमार्ग पर प्रस्तावित टैक्स को देखते हुए ही इसका किफायती होने का आंकलन किया जाए.

    मिसिसिपी वाटरवे की रिपोर्ट में कहा गया है कि:

    In 2012, the shippers and barge companies contributed a paltry 10 percent toward the cost of the Inland Waterways Navigation System- just $80 million of the $800 million needed to keep the system running each year. Few other American businesses receive such a generous tax payer subsidy of their expanses.

    Other U.S. transportation sectors contribute much more toward infrastructure costs. For example, 70% of the cost to maintain roads and highways is paid through taxes on fuel and truck parts. The cost to maintain commercial freight lines is paid in full by railroad companies and receives no direct taxpayer support. It is time to level the playing fields and let markets function more efficiently. ” (report IATP, annexure- 24) (विस्तृत रिपोर्ट 3 नीचे देखें)

    यानि केवल टेक्स की छूट के कारण भारत में जलमार्ग फायदेमंद समझा जा रहा है. अतः इन देशों में चल रहे जलमार्गों के अधिक प्रचालन का हमें अन्धानुकरण नहीं करना चाहिए.

    अंतर्देशीय जल परिवहन को उसकी किफ़ायत और पर्यावरण संबंधी अनुकूलता के आधार पर सही ठहराया जा रहा है. उपरी तौर पर ईधन की लागतों के लिहाज से तो यह काफी किफायती दिखाई पड़ता है मगर यह किफायत हमेशा मुमकिन नहीं होती बल्कि बहुत सारे दूसरे हालातों पर भी निर्भर करती है. खासतौर से यह इस पर निर्भर करती है कि पूरी परिवहन श्रृंखला केवल  पानी पर ही आश्रित है या परिवहन के दूसरे साधनों की भी आवश्यकता होगी. इसके अलावा जलमार्गों से परिवहन की लागत और उससे होने वाले फायदे जलमार्ग के  स्वरूप, उसकी गहराई और कई दूसरे कारकों पर भी काफी निर्भर करते हैं. लिहाजा हमे जलमार्गो की लाभप्रदता को आंकने के लिये एक-एक जलमार्ग का अलग अलग अध्ययन और विशलेषण करना होगा. 

    निष्कर्ष:

    भारत के सभी बड़े जलमार्गों के निर्माण से नदी के चरित्र, और समुदायों की आजीविका पर गंभीर असर पड़ेगा. यह भी स्पष्ट नहीं है कि जिन आर्थिक लाभों की बात की जा रही है वे इन परियोजनाओं की भारी लागतों से ज्यादा होंगे या नहीं. हमारा मानना है कि जलमार्गों के निर्माण के लिए इस एकतरफा मारामारी को फिलहाल रोक दिया जाना चाहिए. पहले इन जलमार्गों की आवश्यकता, उनकी लागत और प्रभावों का विस्तृत आंकलन किया जाना चाहिए. जिसमे लोगों और नागरिक संगठनो की पूरी सहभागिता हो. तब-तक जलमार्गों के बारे में अंतिम फैंसला नहीं लिया जाना चाहिए.

     

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    सम्बंधित रिपोर्ट: