Irrigation

सिंचाई

  • हरिद्वारअंग्रेज 1917 में हरिद्वार के भीमगौडा में गंगा के ऊपर बाँध निर्माण करना चाह रहे थे जिसके विरोध में मदन मोहन मालवीय जी ने आन्दोलन किया था. ऊपर दिए गए चित्र में दिखाई गई उत्तरी चैनल से अंग्रेज एक नहर के माध्यम से पानी निकालना चाहते थे. इस उद्देश्य के लिए वे एक बैराज बनाना चाहते थे. मालवीय जी ने इस परियोजना का विरोध करते हुए कहा कि बराज के पीछे एक जलाशय बनेगा जिसमे से निकला पानी शुद्ध नहीं होगा क्योंकि यह बराज के पीछे रुका  रहेगा. मालवीय जी के विरोध करने के पश्चात ब्रिटिश सरकार ने माना कि उत्तरी चैनल से पानी बिना किसी फाटक के निकाला जाएगा. नीचे की तस्वीर में देखा जा सकता है की उत्तरी चैनल में कोई बराज नहीं बनाया गया. बराज नीचे बनाया गया था. मालवीय जी से हुए समझौते के अंतर्गत गंगा से हर की पौड़ी तक पानी के रास्ते में कोई अवरोध नहीं बनाया गया था. गंगा का अविरल पानी हर की पौड़ी में पहुँचता था जैसा कि नीचे की तस्वीर में दिखाया गया है.

    गूगल अर्थ से फोटो: चैनल के माध्यम से गंगा

    अंग्रेजो के बीच जो समझौता हुआ था उसमें यह भी बताया गया है कि " हिंदू समुदाय के साथ पूर्व विचार-विमर्श के बिना कोई कदम नहीं लिया जाएगा" हिंदू समुदाय के वरिष्ठ प्रतिनिधि चार शंकराचार्य हैं. सभी शंकराचार्यों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि गंगा पर कोई बैराज नहीं बनाया जाना चाहिए. शंकराचार्यों द्वारा दिए गए वक्तव्य यहां रखे गए हैं: श्री भारती तीरथ जी , निश्चलानंद जी  और स्वरुपानंद जी.  समझौते की प्रतिलिपि नीचे दी गई है और आयोजित समझौते का विस्तृत अध्ययन यहां संलग्न है. 

    भारत सरकार ने 1917 समझौते के दो बड़े उल्लंघन किए हैं. एक,उसने टिहरी और श्रीनगर जैसे कई बांध बनाये हैं जिसने गंगा को स्थिर जलाशयों में बदल दिया है. यह 1917 के समझौते के विपरीत है जिसने जोर देकर कहा कि गंगा का पानी जलाशयों में जमा नहीं होना चाहिए. दूसरा,इस समझौते में की गयी व्यवस्था के अनुसार बराज बनाने से पहले हिंदू समुदाय के साथ परामर्श नहीं किया गया है. जब अंग्रेज गंगा की महता को समझ सकते हैं तो हमारी अपनी  सरकारें क्यों नहीं समझती ? हम प्रधान मंत्री मोदी जी से अनुरोध करते हैं कि 1917 के मदन मोहन मालवीय के समझौते को सरकार द्वारा लागू किया जाना चाहिए. गंगा के अविरल अप्रवाह को वाधित करने वाली सभी योजनाओ को हटाया जाए जिनमे टिहरी, चीला, भीमगौड़ा शामिल हैं. गंगा नदी पर बांधों के निर्माण को पूर्णतया बंद करना चाहिए जैसा शंकराचार्यों द्वारा घोषित किया गया है.


     

  • वर्तमान में नरोरा के नीचे गंगा में गंगा नदी का पानी नहीं है. हरिद्वार में भीमगौड़ा बराज से गंगा का लगभग पूरा पानी सिंचाई के लिए निकाल दिया जाता है. भीमगौड़ा बराज के बाद नदी का पानी लगभग सूख जाता है.

  • टिहरी झील (फोटो साभार: विमल भाई)

    गंगा नदी की गुणवत्ता को बांधों का निर्माण ऋषिकेश, हरिद्वार, प्रयाग, काशी और गंगा सागर तक प्रभावित कर रहा है। सच है कि बांधों के निर्माण से बिजली की उपलब्धता बढ़ने से लाभ होगा। पर सवाल यह है कि क्या ये बांध नदी के पानी के मनोवैज्ञानिक गुणों की गिरावट का कारण बनती हैं। 

  • Post By: Shripad Dharmadhikari & Jinda Sandbhor
    राष्ट्रीय जलमार्ग को दर्शाता नक्शा (वाराणसी) फोटो साभार: जिंदा सिंधभोर

    उत्तर प्रदेश में वाराणसी जलमार्ग का केंद्र बनने जा रहा है क्योंकि यहाँ चार नदियाँ आपस फैली हुई है. वाराणसी में चार जलमार्गो को भरत सरकार ने राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया है, जो की नुक्सानदेह हैं.

  • टिहरी बांध में डुबने के कारण वीरान हुए खेत (फोटो साभार गंगा टुडे टीम)

    पहाड़ी क्षेत्रों से पलायन हो रहा है क्योंकि मैदानी क्षेत्रों की अपेक्षा पहाड़ी क्षेत्रों में कृषि करना मुश्किल है. जलविद्युत् परियोजनाओं के कारण कई समस्याए पैदा हो रही है जैसे

  • केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना (फोटो साभार: द इंडियन एक्सप्रेस)
    सरकार ने जल आपूर्ति हेतु नदी जोड़ो परियोजना को शुरू किया है परन्तु इससे आम जनजीवन में बहुत से नुक्सान हैं. जब जल आपूर्ति के अन्य विकल्प मौजूद हैं तो नुकसानदेह परियोजना को बढ़ावा क्यों दिया जा रहा है.
  • सिंगोली भटवारी पावर प्रोजेक्ट की आपदा में टूटी बराज (फोटो साभार: गंगाटुडे टीम)

    सिंगोली भटवारी पावर प्रोजेक्ट के अनुबंध को तीन साल बढाए जाने के बजाय इस परियोजना को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए.

  • कृत्रिम भूजल रिचार्ज सिस्टम उत्तर-पश्चिम सैन फर्नांडो घाटी(फोटो साभार: L.A.Aqueduct Centennial)

    हाल ही में, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने इस्राइल का दौरा किया. इस्राइल में पहले, पानी की भारी कमी थी लेकिन अब वे कृत्रिम भूमि जल रिचार्ज की प्रक्रिया का उपयोग कर रहे हैं, जिसके द्वारा उन्होंने मनुष्य उपयोगों के लिए पानी की उपलब्धता में वृद्धि की है।

  • सिंचाई के लिए पानी का अत्यधिक उपयोग पानी का नुक्सान है (फोटो साभार: जेफ़ वानुगा, विकिमीडिया)
    सिंचाई के लिए गंगाजल का अत्यधिक इस्तेमाल हो रहा है जिसकी वजह से गंगा नदी अपना अस्तित्व खो रही है. अगर हम गंगा से सिंचाई के लिए पानी निकालना कम कर दें तो ही गंगा जीवित रह सकती है. यदि हम बारिश के पानी का भूजल संरक्षण करें तो हम गंगा के पानी को निकलना कम करके बचा सकते हैं.
  • अमेरिका द्वारा हटाया गया एल्व्हा डैम (फोटो साभार: डांसिंग बेयर, विकिमीडिया)

     

    अमेरिका ने 2016 में नदियों पर बनाये गए 72 परियोजनाओं को हटाया गया है.जबकि 1912 से 2016 तक अमेरिका ने 1384 बांधों को किया है.

  •  

    श्रीनगर गढ़वाल में निर्मित अलकनंदा जलविद्युत परियोजना (फोटो साभार: गंगा टुडे टीम)
    जब हमारे पास श्रीनगर परियोजना का उत्तम विकल्प मौजूद है तो जरुरी नहीं कि डैम बनाकर क्षेत्र को नुक्सान पहुचाया जाए
  • कुछ फसलों की पैदावार के लिए अत्यधिक पानी की आवश्यकता होती है (फोटो साभार: वेमेंकोव, विकिमीडिया)
    जिन फसलों को अत्यधिक पानी की आवश्यकता होती है और उनमे सिंचाई के लिए गंगा के जल से पूर्ति की जाती है तो उन फसलों को तुरंत प्रतिबंधित कर देना चाइये.
  • rudolph A furtado

    गंगा नदी में खननकार्य (फोटो साभार: रुडोल्फ ए फुर्तादो)

     

    उत्तराखंड हाईकोर्ट ने गंगा के किनारे खनन पर लगी रोक को हटा दी है. नदी में खनन कार्य भी आवश्यक होता है क्यूंकि नदी में गाद निरंतर बहकर आती रहती है.

  • गंगोत्री में स्थित माँ गंगा का मंदिर (फोटो साभार: जीएनयू डॉक्स.विकिमीडिया)

     

    “His Holinesses welcomes the declaration of Government of India to name Holy Ganga as the National River” – By Jagadguru Sri Nischalanandji, Shankaracharya of Goverdhan Mutt,Puri

  •  

     

    सद्गुरु जग्गी वासुदेव ‘रेली फॉर रिवेर्स’ अभियान के तहत कन्याकुमारी से लेकर हिमालय तक गाड़ी चलाकर लेकर जायेंगे जिसके तहत वे लोगों को नदियों को बचाने का सन्देश भी देंगे. यह रेली 16 भारतीय राज्यों से होते हुए देश की 30 नदियों को बचाने का सन्देश देगी.

  • गंगा नदी को जल आपूर्ति के लिए हूगली नदी की तरफ मोड़ा गया है (फोटो साभार: रिसर्चगेट)

    फरक्का बैराज, भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से एक विवादास्पद मामला रहा है. फराक्का बैराज द्वारा नदी का पानी दो भागों में बांटा जाता है. पानी का एक हिस्सा फीडर कैनाल द्वारा हूगली नदी को दिया जाता है जबकि पानी का दूसरा बराबर हिस्सा बांग्लादेश को प्रदान किया जाता है। पानी की कम आपूर्ति के कारण, बांग्लादेश में उत्पन्न होने वाली बड़ी समस्या “खारे पानी का प्रवेश” है, जिससे की समुद्र का खारा पानी अन्दर की की भूमि में नीचे से आ जाता है। गंगा के पानी को फराक्का बैराज के नीचे से प्रवाहित किया जा रहा है और इसी कारण बांग्लादेश में अधिक मात्रा में गाद का जमाव हो रहा है.(इस मुद्दे पर रिपोर्ट यहां उपलब्ध है) फरक्का बैराज के नीचे से पानी छोड़े जाने के कारण बांग्लादेश को गाद ज्यादा जाती है जिसके कारण बांग्लादेश में बाढ़ की समस्या बढ़ गयी है। इन कारणों से गंगा की कई प्रजातियों का विनाश हो रहा है. फराक्का बैराज परियोजना नें कोलकाता बंदरगाह को अधिक पानी सप्लाई कराने में सफलता पायी है. (विस्तार यहाँ संलग्न है). अगर पानी का विभाजन नहीं होता  है तो, कोलकाता बंदरगाह में पानी की कमी होगी. लेकिन इससे भारत में भी अन्य नकारात्मक परिणाम बढ़े हैं, जैसे कि हिलसा मछली की आबादी कम होना और फरक्का के ऊपर गाद जमा होने से बाढ़ में वृद्धि. 

    भारत और बांग्लादेश दोनों के लिए एक सम्भव समाधान नदी को निरंतर प्रवाह को स्थापित करके फरक्का बैराज को नया रूप देना है जिससे कि गाद दोनों देशों में समान रूप से विभाजित हो और मछलियां आसानी से विचरण कर सकें। (विकल्प के लिए हमारा पिछला लेख यहाँ पर देखें)

    गंगा नदी को बांग्लादेश की तरफ जाते हुए दिखाया गया है (फोटो साभार : गूगल अर्थ)
    इस सन्दर्भ में फरक्का बराज का विडियो यहाँ पर देखें.

     आपसे निवेदन है कि पोस्ट पढ़कर नीचे अपना कमेंट/सुझाव आवश्य दें.

  • नमामि गंगे अभियान क्या है?

    गंगा नदी के पुनरुद्धार और कायाकल्प के लिए भारत सरकार द्वारा अक्टूबर 2016 में नमामि गांगे मिशन शुरू किया गया है. मिशन के अंतर्गत गंगा की सतह पर साफ सफाई, क्रीमेटोरिया आधुनिकीकरण, घाट की मरम्मत, ग्रामीण स्वच्छता, नगर मल-जल प्रबंधन और वनीकरण पर ध्यान केंद्रित किया है. (यहां देखें)

  •  

    pancheswar dam
    एक तरफ सरकार पंचेश्वर में विस्थापन के वादे कर रही है . दूसरी तरफ 15 साल पुराने बने टिहरी बाँध में लोगों का धरना प्रदर्शन जारी है. (फोटो साभार: अमर उजाला व इनाडू इंडिया)

    पंचेश्वर की स्थिति

    महाकाली नदी, उत्तराखंड क्षेत्र की एक प्रसिद्ध नदी है जो भारत-नेपाल की सीमा पर है, जिस पर टिहरी बाँध से तीन गुना बड़ा पंचेश्वर बाँध बनेगा. यह विश्व की दूसरी सबसे बड़ी परियोजना होगी. इस बाँध के बनने से राष्ट्रहित में बिजली उत्पादन होगा. लेकिन इस बाँध के उतने ही बड़े नकारात्मक प्रभाव भी पड़ेंगे. पंचेश्वर बाँध के निर्माण से देश के पर्यावरणविद चिंतित हैं. उनका मानना है कि जिस प्रकार टिहरी बाँध ने उत्तराखंड के पर्यावरण को हानि पहुंचाई है उसी प्रकार पंचेश्वर परियोजना भी पर्यावरण के लिए घाटे का सौदा होगी. आप हमारा पिछला पोस्ट पढ़ सकतें हैं जिसमे हमने बांधों से होने वाले फायदे और नुकसानों का आंकलन किया था. इन नकारात्मक प्रभावों पर माउंटेन डेवलपमेंट रिसर्च सेण्टर (हे.न.ब. केंद्रीय विश्वविद्यालय) के नोडल अधिकारी श्री अरविन्द दरमोड़ा बताते हैं कि उत्तराखंड के 200 गावं अपनी सम्पूर्ण पौराणिक सभ्यता के साथ इस बाँध में डूब जायेंगे. इन सभी गावं के लोगों को किसी दूसरी जगह विस्थापित कर दिया जायेगा. लेकिन जब से टिहरी बाँध बना है, तब से अभी तक वहां के लोगों का पूर्ण विस्थापन नहीं हुआ है. तो हम कैसे मान लें कि पंचेश्वर में विस्थापन होगा?  सरकार का बड़े बाँध बनाने का उद्देश्य ज्यादा बिजली उत्पादन करना है किन्तु ग्लोबल वार्मिंग की वजह से नदियों में पानी घट रहा है. भागीरथी में पानी कम होने की वजह से टिहरी बाँध अपनी क्षमता से आधी भी बिजली उत्पादन नहीं कर पा रहा है. इसी प्रकार पंचेश्वर में भी ऐसा ही होगा लेकिन सरकार वर्तमान पानी की उपलब्धता के आधार पर बिजली उत्पादन के आंकड़े दे रही है . (अरविंद दरमोड़ा का साक्षात्कार यहाँ देखें).

    overview of pancheswar
    पंचेश्वर बाँध का गूगल दृश्य (फोटो साभार: गूगल अर्थ)

    इसी प्रकार एनजीओ “प्रकृति पर्यावरण संस्था” से जुड़ी बीना चौधरी कहती हैं(बीना चौधरी का साक्षात्कार यहाँ देखें) कि पंचेश्वर बाँध बनाने का उद्देश्य सिंचाई के लिए पर्याप्त जल जमा करना है. जब नदियों में पानी ही नहीं होगा तो सिंचाई कैसे होगी और पंचेश्वर बाँध बना कर कौन सी सिंचाई के लिए पानी जमा किया जायेगा?  पहले भी मैदानी क्षेत्रों में सिंचाई होती थी, जैसे की तालाबों से. इसी प्रकार के पारंपरिक सिंचाई के साधनों का विकास किया जाना चाहिए. टिहरी परियोजना की तुलना में उत्तर प्रदेश में जल संग्रहण से, 30 गुना ज्यादा सिंचाई की जा सकती है (रिपोर्ट यहाँ उपलब्ध है पेज 91 पैरा 2)तो पंचेश्वर जैसे बाँध की आवश्यकता नहीं होगी. आगे बीना चौधरी कहती हैं कि बाँध बनने से पहले स्थानीय लोगों का फर्जी सर्वे किया जाता है. बाँध बनने के दुष्प्रभाव स्थानीय लोगों को नहीं बताये जाते हैं. उनके जनप्रतिनिधियों को कंपनियों द्वारा लालच देकर बाँध के पक्ष में कर लिया जाता है. यदि स्थानीय जनता को बांधों के दुष्प्रभाव की सही जानकारी होगी, तो वे पंचेश्वर जैसे बांधों का समर्थन नहीं करेंगे. जिन लोगों की जमीनों और घरों पर यह बाँध बनेगा उन लोगों को पैसा और अन्य स्थानों पर जमीनें दे कर खुश कर दिया जायेगा. चूँकि इन लोगों को इस बाँध से होने वाले वास्तिक दुष्प्रभावों की जानकारी नहीं दी जाती है इसलिए उन लोगों को इन दुष्प्रभावों की जानकारी नहीं होती है. अतः वे लोग किस आधार पर इस बाँध का विरोध करेंगे?

     

    पंचेश्वर का निर्माण क्यों

    प्रसिद्द भू-वैज्ञानिक और फॉर्मर वाईस चांसलर कुमाऊं विश्वविध्यालय, खड़ग सिंह वल्दिया जी नें माना था कि बड़े बाँध हिमालयी राज्यों में बहुत नुक्सान दायक हैं. (इसका उल्लेख यहाँ देख सकते हैं) फिर क्यूँ टिहरी परियोजना से तीन गुना बड़ी परियोजना बनाई जा रही है?

    पंचेश्वर बाँध से न तो पर्याप्त बिजली बनेगी, न ही यह सिंचाई का समाधान है. बिजली के लिए सौर ऊर्जा, तथा सिंचाई के लिए जल संग्रहण करना चाहिए. जब हमारे पास बिजली और सिंचाई के बेहतर विकल्प मौजूद हैं तो यह बड़ी परियोजनाएँ किसे फायदा पहुँचाने के लिए बनाई जा रही हैं?

     

    आपसे निवेदन है कि पोस्ट पढ़कर नीचे अपना कमेंट/सुझाव आवश्य दें.

  •  

    साबरमती पर धरोई बाँध बनने से नदी सूख गयी थी जिसमे कि अब नर्मदा का पानी डाला जा रहा है (फोटो साभार: गुरुप्रसाद)
    साबरमती नदी का पानी पूर्व में अहमदाबाद तक बहता था. बीते समय में इस पर धरोई बांध बना दिया गया. इसके बाद धरोई से नीचे अहमदाबाद तक साबरमती नदी सुख गयी है.अब इस नदी को जीवित करने के लिए इसमें नर्मदा नदी का पानी डाला जा रहा है. साबरमती के सूखने का दूसरा कारण भूजल का अतिदोहन है. सामान्य रूप से नदी के नीचे की ज़मीन में नमी बनी रहती है, जिससे नदी का पानी नदी के चैनल में टीका रहता है. बीते समय में साबरमती नदी के आसपास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में टूयूबवेल खोदे गए हैं और नदी के नीचे की ज़मीन में नमी कम हो गयी है. नीचे की ज़मीन सूख जाने से साबरमती का पानी भर-भराकर ज़मीन में रिस जाता है और नदी सूख जाती है.    

    एक रिपोर्ट कहती है:

    सूखा पड़ना और नदी की पानी की गुणवत्ता में गिरावट,प्राकृतिक कारणों के कारण होती है जैसे कि जलवायु,तापमान,बारिश और मिट्टी की बनावट की वजह से. लेकिन ये प्राकृतिक कारण भी मानव निर्मित कारणों से ही होते हैं.जैसे कि भूजल के अतिदोहन और वनों की कटाई के कारण.रिपोर्ट यहाँ उपलब्ध है.

    नर्मदा से साबरमती को जीवनदान

    पहले तो हमने साबरमती से जल निकाल कर नदी को जलविहीन कर दिया, फिर नर्मदा नदी से पानी निकालकर साबरमती नदी में डाल दिया. अतः अब साबरमती नदी  में पानी तो है, लेकिन यह साबरमती का पानी नहीं अपितु नर्मदा का पानी है. नर्मदा का पानी साबरमती को देने की वजह से नर्मदा में पानी कम रह गया है इससे नर्मदा नदी का अस्तित्व खतरे में है. इसलिए, नर्मदा को दाव पर लगाकर साबरमती को पुनर्जीवित करना सरकार की अच्छी उपलब्धि नहीं है.

    धरोई बाँध की वजह से साबरमती नदी का पानी सूख चुका है

    हर नदी एक विशेष प्रकार की मछलियों के लिए एक आवास होती है, विशेष प्रकार के पौधों और पेड़ों का घर होती है, जो अपने प्राकृतिक परिस्थितियों में पनपते हैं. नदी का सही विकास उसकी अस्मिता एवं विशेषता को पहचानना और उसका सम्मान करना है.

    एक नदी से जल निकाल कर दूसरी नदी में डालना इस प्रकार माना जा सकता है कि पहले एक स्वस्थ व्यक्ति का खून निकालकर उसे बीमार किया जाये, और फिर बाद में दूसरे व्यक्ति का रक्त उसे देकर स्वस्थ करने की कोशिश की जाए .

    साबरमती और नर्मदा को बचाने के संभव प्रयास

    नर्मदा का जल साबरमती में डालने के बजाये हमें धरोई बाँध को हटाना चाहिए जिससे कि साबरमती का पानी अविरलता से बहता रहे और नर्मदा नदी में भी पानी कम न हो. हमें कृषि में पारंपरिक जल संचयन विधियों को पुनर्जीवित करना चाहिए. साबरमती के आसपास के क्षेत्रों में वर्षा के पानी को खेतो में मेंड बनाकर अथवा बरसाती नालो में चेकडैम बनाकर रोका जा सकता है. इससे यह पानी ज़मीन में रिसेगा और बाद में सिंचाई के लिए निकाला जायेगा. हमें साबरमती के पानी की अत्यधिक जल खपत को रोकना चाहिए. अधिक पानी की खपत करने वाली फसलों जैसे कपास, केला, अंगूर और गन्ने के उत्पादन पर इस क्षेत्र में प्रतिबंध लगा देना चाहिए.

    हमें साबरमती के पानी की अत्यधिक जल खपत को रोकना चाहिए. नर्मदा जल से साबरमती को पुनर्जीवित करने के बजाए, हमें गुजरात में सिंचाई के लिए नर्मदा जल का सीधे उपयोग करना चाहिए ,जिससे एक नदी को जीवित करने के लिए दूसरी नदी की हत्या न करनी पड़े.

     

    आपसे निवेदन है कि पोस्ट पढ़कर नीचे अपना कमेंट/सुझाव आवश्य दें.

  •  

    गुजरात में चुनाव का दौर चल रहा हैं और आरोप प्रत्यारोपों का दौर जारी है. गुजरात में मेगा रैलियों का मेगा शो चल रहा है. पीएम नरेंद्र मोदी भी गुजरात में प्रचार कर रहे है तो साथ ही कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी गुजरात दौरे पर हैं. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान मंदिरों के ताबड़तोड़ दौरों का क्रम जारी रखते हुए भगवान शिव के द्वाद्वश ज्योतिर्लिंगों में से पहले सोमेश्वर महादेव के यहां समुद्र तट पर स्थित भव्य सोमनाथ मंदिर का दर्शन किया. पिछले 25 सितंबर को अपने चुनावी अभियान की शुरूआत द्वारका के जगत मंदिर से करने वाले राहुल अब तक चोटिला चामुंडामाता मंदिर, कागवड के खोडलधाम, अंबाजी, बहुचरमाता मंदिर, गांधीनगर के अक्षरधाम मंदिर समेत 20  से अधिक मंदिरों के दौरे कर चुके हैं. इसे लेकर बीजेपी तंज करती रही है. पीएम ने कहा कि राहुल गांधी के परनाना या फिर उनके पिता के नाना ने सोमनाथ मंदिर नहीं बनवाया है और राहुल गांधी को सोमनाथ मंदिर के इतिहास के बारे में पता नहीं है.

    प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, 'आज सोमनाथ का पताका पूरे विश्व में फहर रहा है. आज जिन लोगों को सोमनाथ याद आ रहे हैं, इनसे एक बार पूछिए कि तुम्हें इतिहास पता है? तुम्हारे परनाना, तुम्हारे पिता जी के नाना, तुम्हारी दादी मां के पिता जी, जो इस देश के पहले प्रधानमंत्री थे. जब सरदार पटेल सोमनाथ का उद्धार करा रहे थे तब उनकी भौहें तन गईं थीं.' इतना ही नहीं भारत के राष्ट्रपति डॉ. राजेद्र प्रसाद को सरदार बल्लभभाई पटेल ने उद्घाटन के समय सोमनाथ आने का न्योता दिया. तब तुम्हारे परनाना पंडित जवाहर लाल नेहरू ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखकर सोमनाथ के कार्यक्रम में जाने पर नाराजगी व्यक्त की थी.' आपको बता दें कि सोमनाथ में ज्योतिर्लिंग है और हिंदू धर्म में इस मंदिर की बड़ी मान्यता है. लेकिन राहुल गांधी के सोमनाथ में जाते ही सोमनाथ के इतिहास नें भी इस चुनावी माहौल में एंट्री ले ली. लेकिन इतिहास समय सापेक्ष होता है. नेहरू जी ने जो कहा और किया वो उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए लिया गया फैसला हो सकता है.

    विषय यह है की आज राहुल गांधी शिव को कितना मानते हैं और सोमनाथ मंदिर या अन्य मंदिरों के प्रति कितने आस्थावान हैं. क्योंकि अगर हम देखें तो 1917 में  मदन मोहन मालवीय जी नें अंग्रोजों के विरोध में आन्दोलन किया था  जिसमें अंग्रेजों के साथ एक अनुबंध हुआ था जिसमे स्पष्ट लिखा था की गंगा पर कोई अवरोध पैदा नहीं किया जाएगा और बिना हिन्दुओ से विचार विमर्श के  कोई परियोजना नहीं बनाई जायेगी.(इससे सम्बंधित पिछला पोस्ट यहाँ पढ़ें) लेकिन इसके बावजूद गंगा पर कई बड़ी परियोजनाए बनाई गई और गंगा के अविरल प्रवाह को बाधित किया गया और लगातार किया जा रहा है. 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने भागीरथी पर निर्माणाधीन तीन परियोजनाओं को  देश की जनता की गंगा के प्रति अस्मिता और श्रधा को देखते हुए निरस्त कर दिया था लेकिन भाजपा सरकार नें 2013 में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बावजूद पीपलकोटी की परियोजना को चालु भी किया और उसको पुरजोर बढ़ा रही है और उसके ऊपर कोई चर्चा करने को तैयार नहीं हैं. इसलिए आज हमको इस सोमनाथ के प्रकरण से हमको चिंतन यह करना चाहिए की आज हम क्या कर रहे हैं पुरानी बातों को ध्यान रखने से कोई फायदा नहीं है.

     

    आपसे निवेदन है कि पोस्ट पढ़कर नीचे अपना कमेंट/सुझाव आवश्य दें.