Hydropower

बिजली नीति

  • श्री लालकृष्ण आडवाणी ने ऋषिकेश में गंगा नदी से आशीष मांगा. इसी तरह गंगा से आशीर्वाद लेने के लिए कई प्रसिद्ध मशहूर हस्तियां ऋषिकेश में आते हैं. गंगा को पवित्र माना जाता है क्योंकि उसके पानी में आध्यात्मिक शक्तियां हैं लेकिन सवाल यह उठता है कि गंगा में यह आध्यात्मिकता कहां से आती है ?

  • Prime Minister Narendra Modi addressing addressing a select gathering after laying the foundation stone of multimodal terminal and four lane bridge on the Ganga River
    Dredging in multimodal project leads to the problems to the habitat of aquatic animals, people living at bank of River and biodiversity. which should be banned.
  • नदी के प्रदूषित होने की मुख्य वजह नदी में बहाव कम होना है . शुद्धता बहाव से आती है जैसे पतीले में रखा पानी एक सप्ताह बाद सड़ने लगता है जबकि फुहारे में नाचता पानी शुद्ध रहता है . यह बात नदियों की निर्मलता पर भी लागू होती है . नदी के पानी की स्वछता उसमे पल रहे प्राकृतिक जीव जन्तुओ से स्थापित होती है. इनमे मछली प्रमुख है. बराज बनाने से मछलियों पर दुष्प्रभाव पड़ता है. मछलियाँ अपने प्रजनन क्षेत्रों तक नहीं पहुँच पाती है .प्रजनन क्षेत्र पर नहीं पहुँचने से उन्हें अनुपयुक्त स्थानों पर अंडे देने होते हैं जिस से वे कमजोर होती हैं . आज बंगलादेश से आने वाली हिल्सा मछली फरक्का बराज को पार नहीं कर पाती हैं. पहले यह मछली इलाहाबाद तक पायी जाती थी . नरोरा, हरिद्वार तथा ऋषिकेश में बराज बनाने से महासीर की साइज भी छोटी होती जा रही है . ये जीव जंतु ही जल के प्रदुषण को खाकर नदी के जल को निर्मल बनाते हैं . अतः मछलियों से जल की गुणवत्ता को आंका जा सकता है. जिस नदी में मछलियों की श्रेष्ठ जातियां पाई जाती हैं उस नदी को स्वच्छ मानना चाहिए . मछलियाँ जल की गुणवत्ता को दर्शाती है उसी प्रकार जैसे गुलाब के फूल बगीचे के स्वास्थ्य को दर्शाता है . नीचे दी गई फोटो में आप स्पष्ट देख सकते हैं विष्णुप्रयाग में नदी की स्तिथि क्या है.

    आप देख सकते हैं की विष्णुप्रयाग परियोजना के नीचे नदी में पानी शून्य है .फोटो गंगा टुडे टीम 

    नदी के सूख जाने से मछलियाँ एवं अन्य जलीय जीव जंतु समाप्त हो जाते हैं. इस से नदी का पानी खराब हो जाता है . इसी वजह से कानपुर , बनारस, पटना और कोलकाता में गंगा का पानी खराब है . ठीक इसी तरह नरोरा बराज से पूरा पानी निकाल दिया जाता है जिस कारण गंगा लगभग सूख जाती है आप नीचे दी गई फोटो में देख सकते हैं . बराज के ऊपर पानी है. नीचे केवल एक छोटी धारा है.

    कई पर्यायवर्णीय रिपोर्ट और कोर्ट आदेशो के बावजूद सरकार नदी में पानी की पर्याप्त मात्र छोड़ने पर ध्यान नहीं दे रही है जो की चिंतनीय विषय है . यूपी हाईकोर्ट इलाहाबाद के ने आदेश दिए हैं की उत्तर प्रदेश में गंगा में 50%पानी छोड़ना अनिवार्य है. ( देखें आर्डर पैरा “c” पेज 3-4). दुसरे, जल संसाधन मंत्रालय की रिपोर्ट कहती है की गंगा में ऋषिकेश में औसतन 55 प्रतिशत पानी पर्यावरण के लिये छोड़ना चाहिए (देखेंMOWR रिपोर्ट ( पेज 30). इसीप्रकार यमुना नदी पर किये गए एक अध्ययन में कहा गया है की यमुना में पर्यावरण के लिए के लिए 50-60% पानी छोड़ना आवश्यक है .” इन तमाम रिपोर्टों के बावजूद सरकार द्वारा 50पानी नदी में छोड़ने को कदम नहीं उठाये जा रहे हैं.आज विद्युत परियोजनाओं और सिंचाई के लिए पानी निकाल लेने से गंगा में पानी की मात्रा नामात्र रह गई है जो गंगा के लिए संकट का विषय है . हम नीचे एक गंगा के बहते पानी के फोटो दे रहे हैं जब इस प्रकार गंगा में पर्याप्त पानी होगा तब ही गंगा प्रदुषण मुक्त हो सकती है .

    ऋषिकेश में गंगा 

    सरकार द्वारा प्रदूषण करने वाले होटलों को सील किया जा रहा है और उद्योगों को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने को कहा जा रहा है जो स्वागत योग्य कदम है परन्तु वर्तमान में गंगा के प्रदूषित होने का कारण उसमे पानी का अभाव है जो की जल विद्युत परियोजना और सिंचाई के लिए पानी पूरी तरह निकाल लिया जाता है और गंगा सूख जाती है . श्री नरेन्द्र मोदी से विनातीपूर्ण आग्रह है की गंगा में 50% पानी छोड़ने की व्यवस्था करें तभी होटलों को सील करने एवं उद्योगों पर नकेल कसने की सार्थकता है बिना ऐसे किये गंगा शुद्ध नहीं हो सकती .


     

  • उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गंगा और यमुना नदियों को जीवित व्यक्ति घोषित कर दिया है. यह निर्णय 15 मार्च, 2017 को न्यूजीलैंड संसद द्वारा पारित एक विधेयक (वाँगनूई नदी) का हवाला देकर लिया गया.

  • नदियों पर बाँध बनाना विकास का सूचक माना जाता है. बाँध बनाकार नदी के जल को एक जलाशय में एकत्र करके उससे जलविद्युत बनायी जाती है और नहरें बनाकर सिंचाई के लिए खेतों को पानी उपलब्ध कराया जाता है. लेकिन प्रत्येक परियोजना के समाज एवं पर्यावरण पर कुछ दुष्प्रभाव पड़ते हैं जैसे :

  • केदारनाथ आपदा को आये चार साल बीत चुके हैं.लेकिन पहाड़ों का गुस्सा आज भी कम नहीं हुआ है क्योंकि सरकार ने ऐसी दुर्घटनाओ को दूर करने के लिए ठोस नीति नहीं बनाई है.भारत मौसम विभाग ने दावा किया था

  • चौरास बाँध श्रीनगर

    योजना आयोग ने अपनी एकीकृत ऊर्जा नीति रिपोर्ट में जल विद्युत् को ऊर्जा का सबसे बेहतर श्रोत माना है चूंकि यह कोयले से उत्पन्न ऊर्जा के मुकाबले गैस उत्सर्जन नहीं करता

  •  गंगा नदी के पवित्र जल में स्वयं को शुद्ध रखने की विलक्षण शक्ति होती होती है जिसे बाँध प्रभावित कर रहें है जिस कारण करोडो हिन्दुओ की आष्था को नुकसान हो रहा है .

  • टिहरी बांध में डुबने के कारण वीरान हुए खेत (फोटो साभार गंगा टुडे टीम)

    पहाड़ी क्षेत्रों से पलायन हो रहा है क्योंकि मैदानी क्षेत्रों की अपेक्षा पहाड़ी क्षेत्रों में कृषि करना मुश्किल है. जलविद्युत् परियोजनाओं के कारण कई समस्याए पैदा हो रही है जैसे

  • टिहरी डैम के पीछे झील में गाद का भराव (फोटो साभार: विमल भाई)
    टिहरी झील का गाद से भरने का औसत समय 130 से 171 वर्ष है, तो इस पयोजना से लम्बे समय का विकास कैसे संभव है?
  • गंगोत्री में स्थित माँ गंगा का मंदिर (फोटो साभार: जीएनयू डॉक्स.विकिमीडिया)

     

    “His Holinesses welcomes the declaration of Government of India to name Holy Ganga as the National River” – By Jagadguru Sri Nischalanandji, Shankaracharya of Goverdhan Mutt,Puri

  • आदी गुरु शंकराचार्य गंगा अष्टकम में गंगा के बारे में लिखा है:

    आप (गंगा) गुफाओं और स्वर्ण पर्वत से गुजरते हो कृपया हमें शुद्ध करें .. आपके किनारे से पानी सुबह और शाम को कुशा घास और महान ऋषि द्वारा चढ़ाए गए फूलों द्वारा शोभित होते हैं. यदि आपकी तरंगों की एक झलक कोई देख लेता है, तो उसके पाप नष्ट हो जाते हैं (गंगाष्टम).

  • गंगा नदी का भूगर्भीय जल का श्रोत जिसमे की पानी घट चुका है (फोटो साभार: गंगा टुडे टीम)

    गंगा के निरंतर प्रवाह को बनाए रखने के लिए भूगर्भीय जल श्रोतों से पानी का रिसाव होता है जो घने जंगल की जड़ों से भूमि में समाता है.जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण के लिए सुरंगों का निर्माण किया जाता है. इसके लिए भारी विस्फोट किया जाता है जिससे जलभूमि छिद जाती है. परिणामस्वरूप उस भूमि की जलवहन क्षमता खत्म हो जाती है. जिस कारण गंगा में पानी का प्रवाह गर्मियों के दौरान घट रहा है.

    सुपाना गाँव में प्रकिर्तिक जल श्रोत अब सूख चुका है (फोटो साभार: गंगा टुडे टीम)

    पर्यावरण मंत्रालय द्वारा गंगा की सहायक नदी भागीरथी नदी पर तीन जलविद्युत परियोजनाओं, मानेरी-भाली 1, मनेरी-भाली 2 और लोहारी नागपाला  पर एक अध्ययन किया गया. अध्ययन में पाया गया है कि 24 में से 5 भूगर्भीय जलश्रोत सूख चुके हैं जिन्हें कि निम्न तालिका में लाल रंग से दर्शाया गया है-   

    Sl. No. Village Local Name Of Spring Use of Spring Flow Type Location HEPs Remark
     1  Bhangeli  Moloupala  Drinking/ Irrigation  P  Eastern side of Bhangeli Village  HRT of LNP  Running
     2  Bhangeli  Baig Tok  Drinking  P  Eastern side of Bhangeli Village  HRT of LNP  Running
     3  Bhangeli  Rangela (Kankhor)  Drinking, free flow  S1  Eastern side of Bhangeli Village  HRT of LNP  Running
     4  Bhangeli  Nagi  Drinking/ Irrigation  P  Eastern side of Bhangeli Village  HRT of LNP  Running
     5  Bhangeli  Patya  Irrigation  S1  Above village Bhangeli  HRT of LNP  Running
     6  Bhangeli  Silor  free flowing  S2  Western side of village  HRT of LNP  Running
     7  Bhangeli  Gadora  free flowing  S1  Western side of village  HRT of LNP  Running
     8  Bhangeli  Sillu  free flowing  S2  Below village Bhangeli  HRT of LNP  Running
     9  Bhangeli  Dabsya  free flowing  S2  Below village Bhangeli  HRT of LNP  Running
     10  Bhangeli  Kargu  Irrigation Drinking  P  Below village Bhangeli  HRT of LNP  Running
     11  Bhangeli  Tinura  Irrigation Drinking  P  Below village Bhangeli  HRT of LNP  Running
     12  Bhangeli  Haina (Garari)  free flowing  S1  Way to Bhangeli village  HRT of LNP  Running
     13  Bhangeli  Rumya Dhar  free flowing  S2  Above village Bhangel  HRT of LNP  Running
     14  Bhangeli  Ripra  free flowing  S2  Above village Bhangeli  HRT of LNP  Running
     15  Sunagar  Saraswati pani  Drinking  P  NH - 108  Close to HRT of LNP  Running
     16  Jamak  Nand Khal  Drinking  P  Eastern side of village  MB-1 fore way and main tunnel Dried up 
     17  Jamak  Salana Tok  Drinking  P  Eastern side of village  MB-1 fore way and main tunnel  Dried up
     18  Jamak  Tarta Gad  Drinking/ Irrigation  P  Western side of village  MB-1 fore way and main tunnel  Now only in rainy season
     19  Sanglai  Sangali  Drinking/ Irrigation  P  On the way to Sangali  LNP power house area  Running
     20  Sanglai  Sangali 2  Drinking/ Irrigation  P  NH - 108  -do-  Running
     21  Sanglai  Ghirsa Tok  Drinking/ Irrigation  P  Down side of Tihar village  -do-  Running
     22  Sanglai  Bhumki  Drinking/ Irrigation  S1  NH – 108 (market)  -do-  Dried up
     23  Sanglai  Agarakhal tok  Drinking/ Irrigation  P  Near pressure shaft  Above LNP power house  Dried up due to tunneling
     24  Sanglai  Helagu Gad  Drinking/ Irrigation  P  Helgu Adit  Above LNP power house  Running
    जलविद्युतपरियोजनाओंकाप्राकिर्तिकजलश्रोतोंपरदुष्प्रभाव (डॉ.जी.सी.एस.नेगी )

    हम देश के आर्थिक विकास के लिए जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण कर रहे हैं. लेकिन हम इस प्रक्रिया से गंगा को मार रहे हैं. इस नीति पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है.

     

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    pancheswar dam
    एक तरफ सरकार पंचेश्वर में विस्थापन के वादे कर रही है . दूसरी तरफ 15 साल पुराने बने टिहरी बाँध में लोगों का धरना प्रदर्शन जारी है. (फोटो साभार: अमर उजाला व इनाडू इंडिया)

    पंचेश्वर की स्थिति

    महाकाली नदी, उत्तराखंड क्षेत्र की एक प्रसिद्ध नदी है जो भारत-नेपाल की सीमा पर है, जिस पर टिहरी बाँध से तीन गुना बड़ा पंचेश्वर बाँध बनेगा. यह विश्व की दूसरी सबसे बड़ी परियोजना होगी. इस बाँध के बनने से राष्ट्रहित में बिजली उत्पादन होगा. लेकिन इस बाँध के उतने ही बड़े नकारात्मक प्रभाव भी पड़ेंगे. पंचेश्वर बाँध के निर्माण से देश के पर्यावरणविद चिंतित हैं. उनका मानना है कि जिस प्रकार टिहरी बाँध ने उत्तराखंड के पर्यावरण को हानि पहुंचाई है उसी प्रकार पंचेश्वर परियोजना भी पर्यावरण के लिए घाटे का सौदा होगी. आप हमारा पिछला पोस्ट पढ़ सकतें हैं जिसमे हमने बांधों से होने वाले फायदे और नुकसानों का आंकलन किया था. इन नकारात्मक प्रभावों पर माउंटेन डेवलपमेंट रिसर्च सेण्टर (हे.न.ब. केंद्रीय विश्वविद्यालय) के नोडल अधिकारी श्री अरविन्द दरमोड़ा बताते हैं कि उत्तराखंड के 200 गावं अपनी सम्पूर्ण पौराणिक सभ्यता के साथ इस बाँध में डूब जायेंगे. इन सभी गावं के लोगों को किसी दूसरी जगह विस्थापित कर दिया जायेगा. लेकिन जब से टिहरी बाँध बना है, तब से अभी तक वहां के लोगों का पूर्ण विस्थापन नहीं हुआ है. तो हम कैसे मान लें कि पंचेश्वर में विस्थापन होगा?  सरकार का बड़े बाँध बनाने का उद्देश्य ज्यादा बिजली उत्पादन करना है किन्तु ग्लोबल वार्मिंग की वजह से नदियों में पानी घट रहा है. भागीरथी में पानी कम होने की वजह से टिहरी बाँध अपनी क्षमता से आधी भी बिजली उत्पादन नहीं कर पा रहा है. इसी प्रकार पंचेश्वर में भी ऐसा ही होगा लेकिन सरकार वर्तमान पानी की उपलब्धता के आधार पर बिजली उत्पादन के आंकड़े दे रही है . (अरविंद दरमोड़ा का साक्षात्कार यहाँ देखें).

    overview of pancheswar
    पंचेश्वर बाँध का गूगल दृश्य (फोटो साभार: गूगल अर्थ)

    इसी प्रकार एनजीओ “प्रकृति पर्यावरण संस्था” से जुड़ी बीना चौधरी कहती हैं(बीना चौधरी का साक्षात्कार यहाँ देखें) कि पंचेश्वर बाँध बनाने का उद्देश्य सिंचाई के लिए पर्याप्त जल जमा करना है. जब नदियों में पानी ही नहीं होगा तो सिंचाई कैसे होगी और पंचेश्वर बाँध बना कर कौन सी सिंचाई के लिए पानी जमा किया जायेगा?  पहले भी मैदानी क्षेत्रों में सिंचाई होती थी, जैसे की तालाबों से. इसी प्रकार के पारंपरिक सिंचाई के साधनों का विकास किया जाना चाहिए. टिहरी परियोजना की तुलना में उत्तर प्रदेश में जल संग्रहण से, 30 गुना ज्यादा सिंचाई की जा सकती है (रिपोर्ट यहाँ उपलब्ध है पेज 91 पैरा 2)तो पंचेश्वर जैसे बाँध की आवश्यकता नहीं होगी. आगे बीना चौधरी कहती हैं कि बाँध बनने से पहले स्थानीय लोगों का फर्जी सर्वे किया जाता है. बाँध बनने के दुष्प्रभाव स्थानीय लोगों को नहीं बताये जाते हैं. उनके जनप्रतिनिधियों को कंपनियों द्वारा लालच देकर बाँध के पक्ष में कर लिया जाता है. यदि स्थानीय जनता को बांधों के दुष्प्रभाव की सही जानकारी होगी, तो वे पंचेश्वर जैसे बांधों का समर्थन नहीं करेंगे. जिन लोगों की जमीनों और घरों पर यह बाँध बनेगा उन लोगों को पैसा और अन्य स्थानों पर जमीनें दे कर खुश कर दिया जायेगा. चूँकि इन लोगों को इस बाँध से होने वाले वास्तिक दुष्प्रभावों की जानकारी नहीं दी जाती है इसलिए उन लोगों को इन दुष्प्रभावों की जानकारी नहीं होती है. अतः वे लोग किस आधार पर इस बाँध का विरोध करेंगे?

     

    पंचेश्वर का निर्माण क्यों

    प्रसिद्द भू-वैज्ञानिक और फॉर्मर वाईस चांसलर कुमाऊं विश्वविध्यालय, खड़ग सिंह वल्दिया जी नें माना था कि बड़े बाँध हिमालयी राज्यों में बहुत नुक्सान दायक हैं. (इसका उल्लेख यहाँ देख सकते हैं) फिर क्यूँ टिहरी परियोजना से तीन गुना बड़ी परियोजना बनाई जा रही है?

    पंचेश्वर बाँध से न तो पर्याप्त बिजली बनेगी, न ही यह सिंचाई का समाधान है. बिजली के लिए सौर ऊर्जा, तथा सिंचाई के लिए जल संग्रहण करना चाहिए. जब हमारे पास बिजली और सिंचाई के बेहतर विकल्प मौजूद हैं तो यह बड़ी परियोजनाएँ किसे फायदा पहुँचाने के लिए बनाई जा रही हैं?

     

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    साबरमती पर धरोई बाँध बनने से नदी सूख गयी थी जिसमे कि अब नर्मदा का पानी डाला जा रहा है (फोटो साभार: गुरुप्रसाद)
    साबरमती नदी का पानी पूर्व में अहमदाबाद तक बहता था. बीते समय में इस पर धरोई बांध बना दिया गया. इसके बाद धरोई से नीचे अहमदाबाद तक साबरमती नदी सुख गयी है.अब इस नदी को जीवित करने के लिए इसमें नर्मदा नदी का पानी डाला जा रहा है. साबरमती के सूखने का दूसरा कारण भूजल का अतिदोहन है. सामान्य रूप से नदी के नीचे की ज़मीन में नमी बनी रहती है, जिससे नदी का पानी नदी के चैनल में टीका रहता है. बीते समय में साबरमती नदी के आसपास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में टूयूबवेल खोदे गए हैं और नदी के नीचे की ज़मीन में नमी कम हो गयी है. नीचे की ज़मीन सूख जाने से साबरमती का पानी भर-भराकर ज़मीन में रिस जाता है और नदी सूख जाती है.    

    एक रिपोर्ट कहती है:

    सूखा पड़ना और नदी की पानी की गुणवत्ता में गिरावट,प्राकृतिक कारणों के कारण होती है जैसे कि जलवायु,तापमान,बारिश और मिट्टी की बनावट की वजह से. लेकिन ये प्राकृतिक कारण भी मानव निर्मित कारणों से ही होते हैं.जैसे कि भूजल के अतिदोहन और वनों की कटाई के कारण.रिपोर्ट यहाँ उपलब्ध है.

    नर्मदा से साबरमती को जीवनदान

    पहले तो हमने साबरमती से जल निकाल कर नदी को जलविहीन कर दिया, फिर नर्मदा नदी से पानी निकालकर साबरमती नदी में डाल दिया. अतः अब साबरमती नदी  में पानी तो है, लेकिन यह साबरमती का पानी नहीं अपितु नर्मदा का पानी है. नर्मदा का पानी साबरमती को देने की वजह से नर्मदा में पानी कम रह गया है इससे नर्मदा नदी का अस्तित्व खतरे में है. इसलिए, नर्मदा को दाव पर लगाकर साबरमती को पुनर्जीवित करना सरकार की अच्छी उपलब्धि नहीं है.

    धरोई बाँध की वजह से साबरमती नदी का पानी सूख चुका है

    हर नदी एक विशेष प्रकार की मछलियों के लिए एक आवास होती है, विशेष प्रकार के पौधों और पेड़ों का घर होती है, जो अपने प्राकृतिक परिस्थितियों में पनपते हैं. नदी का सही विकास उसकी अस्मिता एवं विशेषता को पहचानना और उसका सम्मान करना है.

    एक नदी से जल निकाल कर दूसरी नदी में डालना इस प्रकार माना जा सकता है कि पहले एक स्वस्थ व्यक्ति का खून निकालकर उसे बीमार किया जाये, और फिर बाद में दूसरे व्यक्ति का रक्त उसे देकर स्वस्थ करने की कोशिश की जाए .

    साबरमती और नर्मदा को बचाने के संभव प्रयास

    नर्मदा का जल साबरमती में डालने के बजाये हमें धरोई बाँध को हटाना चाहिए जिससे कि साबरमती का पानी अविरलता से बहता रहे और नर्मदा नदी में भी पानी कम न हो. हमें कृषि में पारंपरिक जल संचयन विधियों को पुनर्जीवित करना चाहिए. साबरमती के आसपास के क्षेत्रों में वर्षा के पानी को खेतो में मेंड बनाकर अथवा बरसाती नालो में चेकडैम बनाकर रोका जा सकता है. इससे यह पानी ज़मीन में रिसेगा और बाद में सिंचाई के लिए निकाला जायेगा. हमें साबरमती के पानी की अत्यधिक जल खपत को रोकना चाहिए. अधिक पानी की खपत करने वाली फसलों जैसे कपास, केला, अंगूर और गन्ने के उत्पादन पर इस क्षेत्र में प्रतिबंध लगा देना चाहिए.

    हमें साबरमती के पानी की अत्यधिक जल खपत को रोकना चाहिए. नर्मदा जल से साबरमती को पुनर्जीवित करने के बजाए, हमें गुजरात में सिंचाई के लिए नर्मदा जल का सीधे उपयोग करना चाहिए ,जिससे एक नदी को जीवित करने के लिए दूसरी नदी की हत्या न करनी पड़े.

     

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    गुजरात में चुनाव का दौर चल रहा हैं और आरोप प्रत्यारोपों का दौर जारी है. गुजरात में मेगा रैलियों का मेगा शो चल रहा है. पीएम नरेंद्र मोदी भी गुजरात में प्रचार कर रहे है तो साथ ही कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी गुजरात दौरे पर हैं. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान मंदिरों के ताबड़तोड़ दौरों का क्रम जारी रखते हुए भगवान शिव के द्वाद्वश ज्योतिर्लिंगों में से पहले सोमेश्वर महादेव के यहां समुद्र तट पर स्थित भव्य सोमनाथ मंदिर का दर्शन किया. पिछले 25 सितंबर को अपने चुनावी अभियान की शुरूआत द्वारका के जगत मंदिर से करने वाले राहुल अब तक चोटिला चामुंडामाता मंदिर, कागवड के खोडलधाम, अंबाजी, बहुचरमाता मंदिर, गांधीनगर के अक्षरधाम मंदिर समेत 20  से अधिक मंदिरों के दौरे कर चुके हैं. इसे लेकर बीजेपी तंज करती रही है. पीएम ने कहा कि राहुल गांधी के परनाना या फिर उनके पिता के नाना ने सोमनाथ मंदिर नहीं बनवाया है और राहुल गांधी को सोमनाथ मंदिर के इतिहास के बारे में पता नहीं है.

    प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, 'आज सोमनाथ का पताका पूरे विश्व में फहर रहा है. आज जिन लोगों को सोमनाथ याद आ रहे हैं, इनसे एक बार पूछिए कि तुम्हें इतिहास पता है? तुम्हारे परनाना, तुम्हारे पिता जी के नाना, तुम्हारी दादी मां के पिता जी, जो इस देश के पहले प्रधानमंत्री थे. जब सरदार पटेल सोमनाथ का उद्धार करा रहे थे तब उनकी भौहें तन गईं थीं.' इतना ही नहीं भारत के राष्ट्रपति डॉ. राजेद्र प्रसाद को सरदार बल्लभभाई पटेल ने उद्घाटन के समय सोमनाथ आने का न्योता दिया. तब तुम्हारे परनाना पंडित जवाहर लाल नेहरू ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखकर सोमनाथ के कार्यक्रम में जाने पर नाराजगी व्यक्त की थी.' आपको बता दें कि सोमनाथ में ज्योतिर्लिंग है और हिंदू धर्म में इस मंदिर की बड़ी मान्यता है. लेकिन राहुल गांधी के सोमनाथ में जाते ही सोमनाथ के इतिहास नें भी इस चुनावी माहौल में एंट्री ले ली. लेकिन इतिहास समय सापेक्ष होता है. नेहरू जी ने जो कहा और किया वो उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए लिया गया फैसला हो सकता है.

    विषय यह है की आज राहुल गांधी शिव को कितना मानते हैं और सोमनाथ मंदिर या अन्य मंदिरों के प्रति कितने आस्थावान हैं. क्योंकि अगर हम देखें तो 1917 में  मदन मोहन मालवीय जी नें अंग्रोजों के विरोध में आन्दोलन किया था  जिसमें अंग्रेजों के साथ एक अनुबंध हुआ था जिसमे स्पष्ट लिखा था की गंगा पर कोई अवरोध पैदा नहीं किया जाएगा और बिना हिन्दुओ से विचार विमर्श के  कोई परियोजना नहीं बनाई जायेगी.(इससे सम्बंधित पिछला पोस्ट यहाँ पढ़ें) लेकिन इसके बावजूद गंगा पर कई बड़ी परियोजनाए बनाई गई और गंगा के अविरल प्रवाह को बाधित किया गया और लगातार किया जा रहा है. 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने भागीरथी पर निर्माणाधीन तीन परियोजनाओं को  देश की जनता की गंगा के प्रति अस्मिता और श्रधा को देखते हुए निरस्त कर दिया था लेकिन भाजपा सरकार नें 2013 में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बावजूद पीपलकोटी की परियोजना को चालु भी किया और उसको पुरजोर बढ़ा रही है और उसके ऊपर कोई चर्चा करने को तैयार नहीं हैं. इसलिए आज हमको इस सोमनाथ के प्रकरण से हमको चिंतन यह करना चाहिए की आज हम क्या कर रहे हैं पुरानी बातों को ध्यान रखने से कोई फायदा नहीं है.

     

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    विद्युत उत्पादन के लिए सौर ऊर्जा सबसे बेहतर विकल्प है

    हम सुझाव दे रहें हैं कि पर्यावरण, मत्स्य पालन और सेडीमेंट के संरक्षण के लिए जलविद्युत परियोजनाओं के लिए गंगा पर बांध नहीं बनाने चाहिए. लेकिन प्रश्न है कि: "हम अपनी विद्युत उत्पादन की आवश्यकता को कैसे पूरा करेंगे? न ही हमारे पास यूरेनियम है, जिससे हम परमाणु ऊर्जा बना सकें और न ही कोयले का भण्डार है जिससे कि थर्मल ऊर्जा बना सके. हमारे पास केवल जलविद्युत और सौर ऊर्जा के ही विकल्प हैं.” यह बात सही है. लेकिन हम सौर उर्जा से अपनी जरूरत को बखूबी पूरा कर सकते हैं. जलविद्युत की वास्तव में जरूरत ही नहीं है.

    भारतीय सौर ऊर्जा राष्ट्रीय संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार सौर हमारी ऊर्जा उत्पादन की क्षमता 750 गीगावॉट है जबकि "पायनियर" की रिपोर्ट के अनुसार जल विद्युत की क्षमता 306 गीगावॉट है. सरकार ने 100 गीगावॉट सौर ऊर्जा का उत्पादन करने का सही निर्णय लिया है लेकिन साथ-साथ सरकार जल विद्युत परियोजनाओं को भी बढ़ाना चाहती है जिस पर पुनर्विचार की आवश्यकता है.

     

    सौर ऊर्जा की उपयोगिता

    सौर ऊर्जा का उत्पादन पर्यावरण के अनुकूल है. यह नदियों और जंगलों को नुकसान नहीं पहुंचाता है. राजस्थान के रेगिस्तान और डेक्कन पठार जैसे बंजर क्षेत्रों में सौर ऊर्जा पैनल लगाए गए हैं. सौर ऊर्जा, जलविद्युत परियोजनाओं की तुलना में बहुत सस्ती है. सौर ऊर्जा की वर्तमान लागत 3 रुपये प्रति किलोवाट है,जबकि यह जलविद्युत की 8 से 11 रुपये प्रति किलोवॉट है. इसलिए सौर ऊर्जा सस्ती और पर्यावरण के अनुकूल है जिसे देखते हुए हमे इसे बढ़ावा देना चाहिए. हमारी सौर ऊर्जा की क्षमता 750 गीगावॉट है जो की जलविद्युत की क्षमता से लगभग 5 गुना है. इसलिए, हमारी विद्युत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सौर उर्जा सक्षम है. जलविद्युत उत्पन्न करने की कोई आवश्यकता नहीं है.

    सौर ऊर्जा के साथ एकमात्र समस्या यह है कि बिजली उत्पादन केवल दिन के समय हो सकती है जबकि बिजली की मांग सुबह और शाम अधिक होती है. जलविद्युत परियोजनाओं से बिजली किसी भी समय बनायीं जा सकती है. जलविद्युत परियोजना दिन और रात में झील में पानी को रोक लेती हैं, और सुबह और शाम उस पानी को छोड़ कर बिजली उत्पन्न करती है. यही कारण है कि सरकार द्वारा जलविद्युत परियोजनाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है.

     

    सौर ऊर्जा का उत्पादन

    निष्कर्ष यह है कि सौर ऊर्जा सस्ती और पर्यावरण-अनुकूल है, लेकिन यह केवल दिन के समय ही तैयार की जा सकती है. जबकि हमारी जरुरत सुबह और शाम को अधिक होती है. इस समस्या का समाधान यह है कि सौर ऊर्जा को पम्प स्टोरेज सिस्टम से जोड़ दिया जाय. पम्प स्टोरेज सिस्टम में दो तालाब होते हैं. पम्प स्टोरेज सिस्टम से दिन की बिजली को सुबह और शाम की बिजली में आसानी से बदला जा सकता है.

    पम्प स्टोरेज सिस्टम में दो तालाब होते हैं जैसा कि नीचे दिए गए चित्र में दिखाया गया है. दिन के समय जब सस्ती सौर ऊर्जा उपलब्ध होती है तब नीचे के तालाब से पानी को पम्प करके ऊपर के तालाब में डाल दिया जाता है. सुबह और शाम को जब ऊर्जा की मांग ज्यादा होती है और ऊर्जा का दाम ज्यादा होता है, तब उसी पानी को ऊपर के तालाब से नीचे के तालाब में टरबाईंन के माध्यम से छोड़ा जाता है और बिजली बनाई जाती है. इस प्रकार यह पानी ऊपर और नीचे के तालाबों के बीच उसी प्रकार ऊपर नीचे होता रहता है जिस प्रकार दूध को दो गिलासों में फेंटा जाता है. इस प्रक्रिया से हम दिन की सस्ती सौर ऊर्जा को सुबह और शाम की महंगी सौर ऊर्जा में बदल सकते हैं.

    सौर ऊर्जा के साथ पम्प स्टोरेज सिस्टम के उपयोग से जलविद्युत परियोजनाओं को हटाया जा सकता है

    केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की रिपोर्ट के अनुसार पम्प स्टोरेज योजना से दिन की बिजली को सुबह शाम की बिजली में बदलने का खर्च 30 से 40 पैसा प्रति यूनिट (किलोवाट घंटा) आता है (यहाँ देखें). IIT कानपुर ने भी पम्प स्टोरेज सिस्टम का खर्च 30 पैसा बताया है: “It is found that the presence of pumping based storage facility translates to a value of Rs. 0.297/kWh in the overall cost.” (यहाँ देखें)

     

    निष्कर्ष

    अतः सोलर पावर को पंप स्टोरेज सिस्टम के साथ मिलाकर सुबह और शाम की बिजली का खर्च 3.40 रुपये प्रति किलोवाट से भी कम आएगा (3 रूपए सौर उर्जा का खर्च +40 पैसे सोलर प्लांट का खर्च) जबकि जलविद्युत परियोजना की लागत 8 से 11 रुपये के बीच होती है. इसलिए, हमें पंप स्टोरेज सिस्टम के साथ सौर ऊर्जा को जोड़ कर अपनी उर्जा की जरूरत को पूरा करना चाहिए. ऐसा करने से हम सभी जलविद्युत परियोजनाओं को हटा सकते हैं और अपनी नदियों को बांधों से मुक्त कर सकते हैं.

     

    आपसे निवेदन है कि पोस्ट पढ़कर नीचे अपना कमेंट/सुझाव आवश्य दें.

  •     कुछ विद्वानों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण भविष्य में वर्षा का वितरण कम होगा. उस समय बांधों में रोका गया पानी सिंचाई के लिए प्रयोग होगा अतः बड़े बांधों का बनना अनुपयोगी क्यों है?

    महानदी पर स्थित भाकड़ा नागल बाँध में वर्षा जल संरक्षण

    ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव

        दरअसल ग्लोबल वार्मिंग के कारण धरती का तापमानबढ़ेगा और वर्षा अधिक होगी. अरब सागर का तापमान बढ़ने से वाष्पीकरण अधिक होगा और भारत में पानी अधिक बरसेगा. अनुमान है कि 5 से 10 प्रतिशत अधिक पानी की वर्षा हो सकती है. लेकिन जो वर्षा वर्तमान में चार महीने फैल कर होती है, वह ग्लोबल वार्मिंग के साथ-साथ कम दिनों में होगी जबकि पानी की मात्रा उतनी ही रहेगी. वर्षा कम दिनों में होने के साथ अधिक तेजी से गिरेगी. नीचे चित्र में वर्षा की 30 साल और 10 साल के वितरण को दर्शाया गया है (WWF की रिपोर्ट यहाँ मौजूद है). नीचे दिये ग्राफ में देखा जा सकता है कि 30 साल की औसत वर्षा में पानी चार महीनों में फैल कर बरसता था वह 10 साल में संकुचित हो गया है. जो इस बात का प्रमाण है की वर्षा कम दिनों में हो रही है.

        वर्षा के संकुचित होने का मतलब यह है कि पानी जब बरसेगा तो अत्यधिक तेजी से बरसेगा और जल्द ही नदियों के रास्ते समुद्र को चला जायेगा. अगर पानी धीरे-धीरे बरसता है तो वह भूमि में ज्यादा रिसता है और भूजल का पुनर्भरण होता है. पानी ज्यादा तेज़ी से बरस कर जल्द समुद्र में बह जाने के कारण पानी भूमि में कम रिसेगा और सिंचाई के लिए पानी कम मिलेगा. वर्तमान में भूमिगत जल का स्तर गिर रहा है. भविष्य में यह और तेजी से गिरेगा चूँकि रिसाव कम होगा. फलस्वरूप सिंचाई भी कम हो पायेगी. हमारे खाद्यानों के उत्पादन में भारी गिरावट आयेगी. प्रश्न यह है कि ग्लोबल वार्मिंग के इस विशाल परिवर्तन का हल टिहरी और भाकड़ा जैसे बड़े बांधों द्वारा निकल सकता है अथवा अन्य विकल्पों से ? हमें यह देखना होगा कि कम समय में अधिक बरसे पानी को बड़े बांधों में एकत्रित करके क्या हम अपनी सिंचाई की जरूरतों को पूरी कर सकते हैं?

     

    बड़े बांधो से समस्या

       हमारे आंकलन के अनुसार ऐसा नहीं होगा चूँकि पहली समस्या यह है कि ज्यादा वर्षा हमारे मैदानी इलाकों में होती है, न कि पहाड़ों में.  नीचे दिए गए आंकड़ों से हम उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में वर्षभर की औसत वर्षा को देख सकते हैं:

    उत्तराखंड - 53483 m2 (क्षेत्रफल)* 130.86cm (औसत वर्षा प्रति वर्ष)= 69, 98,000 घन मीटर

    उत्तर प्रदेश  - 243286m2 (क्षेत्रफल)* 156.3cm (औसत वर्षा प्रति वर्ष) = 3,80,25,000 घन मीटर

        ज्ञात हो कि जहाँ उत्तराखंड की कुल वर्षा का मात्र 35 लाख घन मीटर पानी का ही संचयन बड़े बांधों में हो सकता है वहीं उत्तर प्रदेश में 380 लाख घन मीटर पानी बरसता है. हम यह मान लें कि 69,98,000 घन मीटर पानी का आधा पानी उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में बने बांधों में संचयन संभव है. अतः वर्षा का आधा ही पानी बड़े बांधों में संचित होगा यानी कुल 34,99,000 घन मीटर पानी का ही संचयन हो पायेगा.

        ध्यान रहे कि बड़े बांधों से हम केवल पहाड़ में बरसे हुए पानी का भण्डारण कर सकते हैं. मैदानी क्षेत्रों में बरसे पानी का भंडारण पहाड़ी क्षेत्रों में बने बांधों में नहीं होता है. इसलिए पहाड़ में बरसे न्यून पानी के भण्डारण से मैदानी क्षेत्रों की ज्यादा जरूरत को पूरा नही किया जा सकता है. हमें मैदानी इलाकों में होने वाली वर्षा के जल को पुनर्भरण के लिए उपयोग करना ही पड़ेगा और वही हमें ग्लोबल वार्मिंग से छुटकारा दिला सकता है.

        दूसरी समस्या यह है कि हम जब पहाड़ी क्षेत्र के बरसात के पानी को बांधों में रोक लेते हैं तो मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ कम आती है. आम धारणा  यह है कि बाढ़ को सीमित करना जनहित का कार्य है. लेकिन इसका विपरीत प्रभाव भी पड़ता है. जब बाढ़ का पानी चारों तरफ फैलता है, तो मैदानी क्षेत्र में भूमिगत जल का पुनर्भरण होता है, जो कि जाड़े और गर्मियों के मौसम में ट्यूबवेल से निकालकर सिंचाई के काम आता है. अतः जब हम टिहरी जैसे बांधों में बरसात के पानी को रोक लेते हैं, तो मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ कम आती है और बाढ़ कम आने से भूमिगत जल का पुनर्भरण कम होता है और सिंचाई कम होती है. इस प्रकार बड़े बांधों द्वारा सिंचाई पर दो विपरीत प्रभाव पड़ते हैं. सकारात्मक प्रभाव यह होता है कि टिहरी जैसे बाँध में हम पानी रोक कर उसे जाड़े और गर्मियों में छोड़ते हैं जिससे मैदानी क्षेत्र में सिंचाई बढती है. दूसरी तरफ नकारात्मक प्रभाव यह है कि बांधों में पानी रोक लेने से पानी कम फैलता है, बाढ़ कम आती है जिससे मैदानी क्षेत्रों में जल का पुनर्भरण कम होता है और सिंचाई कम होती है. इन दोनों विरोधाभासी प्रभावों का अंतिम प्रभाव सकारात्मक नहीं दिखता. अभी तक का अनुभव है कि टिहरी बाँध के बनने के बाद भी मैदानी क्षेत्रों में भूमिगत जल का स्तर तेजी से गिर रहा है, जो यह दिखाता है की टिहरी जैसे बांधों से सिंचाई में जो वृद्धि हुई है, उसकी तुलना में भूमिगत जल के कम पुनर्भरण से सिंचाई में कटौती ज्यादा हुई है .

        बरसाती पानी को धरती में समाहित करना ही होगा  टिहरी डैम पर आश्रित रहना बड़ी भूल होगी . बाढ़ के पानी द्वारा भूजल पुनर्भरण का एक उत्तम उपाय पाइन (pyne) है. pyne व्यवस्था को हम नीचे दिए गए चित्रों से समझ सकते हैं:

    सामान्यतः नदी ऐसे बहती है:

    जब नदी में  पानी बढ़ता है तो उसे विशेष नहरों से बहाकर गाँव के तालाबों में एकत्रित कर लिया जाता है.

     

    जब नदी का पानी घट जाता है तब वह पानी तालाबों में टिका रहता है. इसके दो लाभ हैं एक ओर जल का रिसाव होगा और उससे भूजल पुनर्भरण होगा दूसरे  उस पानी का सिंचाई के लिए प्रयोग किया जा सकता है . ये तालाब हर तरह से उपयोगी हैं.

     

        पहाड़ों में बड़े बाँध बनाने की तीसरी समस्या गाद भरने की है. जैसा कि वैज्ञानिकों का अनुमान है कि टिहरी बाँध 130 से 170 वर्षों में गाद से भर जाएगा. जिसके बाद इस बाँध की वर्षा के जल भण्डारण की क्षमता शून्यप्राय हो जाएगी. जबकि अगले 100 वर्षों में ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव और अधिक गहराएगा. एक तरफ वर्षा के जल भण्डारण की जरुरत बढ़ेगी वहीं  दूसरी तरफ बांधों के जल संचयन की क्षमता घटेगी. अतः बांधों में जल संचयन अल्पकालीन माना जा सकता है. यह दीर्धकालीन हल नहीं होगा.

        हमारा मानना है कि बड़े बाँध असफल होंगे क्योंकि मैदानी क्षेत्रों की तुलना में उनका कैचमेंट कम है तथा समयक्रम में वे गाद से भर जायेंगे. अतः बांधों के माध्यम से ग्लोबल वार्मिंग का हल निकालना हमारी बड़ी भूल साबित होगी . ग्लोबल वार्मिंग का एकमात्र समाधान है की टिहरी जैसे बांधों को हटाकर इसमें संग्रहीत पानी को निर्बाध फैलने दिया जाय और इसके कारण उत्पन्न  हुई बाढ़  को धरती में समाने दिया जाय तथा मैदानी इलाकों में बाढ़ के इस पानी को पाइन जैसे उपायों से भूमिगत जल में रोका जाये. हमें अपने देश कि तालाब संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा.

     

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  • उत्तराखंड में टिहरी और श्रीनगर जैसी विद्युत परियोजनाओं के नीचे का पानी अपेक्षाकृत साफ है. फिर भी यह कई मायनों में नदी में  प्रदूषण फैलाते हैं.

    चित्र 1: श्रीनगर बाँध के नीचे बहता साफ़ पानी

    प्रभाव:

    प्रथम प्रभावमछलियों पर है. मछलियों की कार्बनिक पदार्थ को पचाने की क्षमता होती है. मछलियों को तालाबों के साफ पानी में देखा जा सकता है, क्योंकि मछलियां तालाब में कार्बनिक पदार्थ खा लेती हैं.

    चित्र 2: मछलियां नदी के पानी को साफ़ करती हैं

     नदियां मछलियों का निवास स्थान होती हैं. अतः वे इसमें स्वछंद रूप से विचरण कर सभी कार्बनिक पदार्थों को खा लेती हैं. बांधों से मछलियों को हानि होती है.

    उत्तराखंड में पाए जाने वाले प्रसिद्ध माहसीर मछली अंडे देने के लिए ठंडे क्षेत्रों में चली जाती हैं. फिर छोटी मचलियाँ नदी की धारा के साथ बहकर मैदानी क्षेत्रों में पहुँच जाती हैं जहाँ पर ये परिपक्कव मछलियों का रूप ले लेती हैं.(नीचे फोटो देखें).

    चित्र 3: माहसीर मछलियाँ अंडे देने के लिए गंगा के ऊपरी क्षेत्रों में जाती हैं

    परिपक्व माहसीर मछलियां फिर से यही चक्र दोहराते हुए अंडे देने के लिए पहाड़ी क्षेत्रों में जाती हैं किंतु बाँध द्वारा रूकावट के कारण वे अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच पाती हैं. माहसीर मछली पहले उत्तरकाशी तक पायी जाती थी परंतु अब यह टिहरी के ऊपर नहीं पायी जाती हैं. पहले यह 100 किलोग्राम  तक होती थी. अब मात्र 700 ग्राम की ही रह गयी हैं.

    कई अध्ययनों से पता चलता है कि बांध में मछलियों, कछुओं और अन्य जलीय जानवरों की संख्या में कमी आई है. (IUCN की रिपोर्ट देख यहाँ सकते हैं), (जैविक विविधता के सम्मेलन की रिपोर्ट यहाँ सकते हैं) और (स्थलीय जैविक विविधता पर जलविद्युत परियोजनाओं के प्रभाव की रिपोर्ट यहाँ सकते हैं). जब हम टिहरी जैसे बांधों का निर्माण करते हैं, तो मछलियों की संख्या कम हो जाती है और उनकी प्रदूषण को कम करने की क्षमता भी कम हो जाती है. इसलिए, जो भी प्रदूषक नदी में प्रवेश होता है वह सहज रूप से साफ नहीं होता जैसा कि पहले साफ हो रहा था. अतः प्रदूषण पर बांधों का पहला प्रभाव मछलियों को सीमित करके होता है.

    गंगा की पवित्रता का आधार:

    बांधों का दूसरा प्रभाव कॉलिफाज़ के माध्यम से होता है. गंगा नदी के पानी में एक प्रकार का फायदेमंद बैक्टीरिया पाया जाता है जिसे कॉलिफाज़ कहा जाता है. जबकि गंगा नदी में पाए जाने वाला हानिकारक जीवाणु कॉलिफ़ॉर्म कहलाता है.

    चित्र 4: कॉलिफाज़ गंगा के प्रदूषण में मौजूद कॉलिफ़ॉर्म को खाकर नदी को साफ़ रखते हैं

    कॉलिफाज़, कॉलिफ़ॉर्म को खाकर नदी को साफ करते हैं. कॉलिफाज़ नदी की गाद या रेत में तब तक चिपके रहते हैं जब तक कि उन्हें चारों ओर कॉलिफ़ॉर्म नहीं मिलते. कॉलिफ़ॉर्म के मिलते ही कॉलिफाज़ सक्रिय हो जाते हैं और कॉलिफॉर्म खाने शुरू करते हैं. राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (NEERI) के वैज्ञानिकों ने बताया है कि “गंगा में कॉलिफाज़ अद्वितीय हैं”. आम तौर पर एक प्रकार का कॉलिफाज़ एक प्रकार का ही कॉलिफ़ॉर्म खाता है. गंगा के कॉलिफाज़ की अनूठी गुणवत्ता यह है कि एक कॉलिफाज़ बड़ी संख्या में कॉलिफ़ॉर्म खाते हैं. गंगा के कॉलिफाज़ वाइड स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक दवाओं की तरह होते हैं - जिस प्रकार एक एंटीबायोटिक दवाई बड़ी संख्या में जीवाणुओं को मारती हैं उसी प्रकार गंगा का कॉलिफाज़ भी अनेक कीटाणुओं को नष्ट करता है. यही गंगा के “स्व-शुद्ध" करने की क्षमता का रहस्य है. गंगा का पानी कभी खराब नहीं होता है क्योंकि कॉलिफाज़ लगातार कॉलीफ़ॉर्म को खाते रहते हैं. ये विस्तृत स्पेक्ट्रम कॉलिफाज़ गंगा की रेत में रहते हैं और ये अपस्ट्रीम स्ट्रेच में बनते हैं. रेत गंगा के माध्यम से बहती है और इस रेत को टिहरी बांध ने रोक लिया है जिसकी वजह से कॉलिफाज़ भी टिहरी बाँध में कैद हो चुके हैं और समान्य रूप से नदी में नहीं बह रहे हैं.(कॉलिफाज़ पर हमारी पिछली पोस्ट यहाँ देखें).

    NEERI की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि टिहरी बांध के नीचे भी कॉलिफाज़ भी मिलाता है. लेकिन यह कॉलिफाज़ पहले से बह चुकी रेत के कारण है. अब अपस्ट्रीम से डाउनस्ट्रीम प्रवाह में कमी आने के कारण व्यापक स्पेक्ट्रम कॉलिफाज़ की उपस्थिति में भी कमी आई है और गंगा की स्वयं को शुद्ध रखने की क्षमता में भी गिरावट आई है.

    जल की कमी:

    बांधों द्वारा पड़ने वाला तीसरा नकारात्मक प्रभाव है कि बांध के नीचे डाउनस्ट्रीम बगैर पानी के होता है. उदाहरण के लिए विष्णुप्रयाग में देखा गया है कि जलविद्युत परियोजना द्वारा अलकनंदा में पानी बहुत कम मात्रा में छोड़ा जाता है.

    चित्र 5: विष्णुप्रयाग परियोजना के बाद अलकनंदा नदी में पानी बहुत ही कम है

    पानी को बांध से एक सुरंग के माध्यम से निकाला जाता है और बिजली घर की 20 किलोमीटर की दूरी तक लाया जाता है. बांध के नीचे का खंड तब तक सूखा रहता है जब तक कि नदी में अन्य प्राकृतिक श्रोत शामिल न हों. यह सूखा स्ट्रेच नदी में मौजूद सभी जलीय जीवन को मारता है.

    ऊपर चित्र में दिखाया गया है कि श्रीनगर बाँध के नीची पानी साफ है. लेकिन इस पानी में बीमारी फ़ैलाने वाले कीटाणु उत्पन्न हो रहे हैं. इस रुके हुए पानी के कारण शहर के इतिहास में अब तक के सबसे अधिक टायफ़ायड और पीलिया के मरीज़ देखे गए हैं.

     

    चित्र 6: श्रीनगर परियोजना की वजह से श्रीकोट में रुका हुआ अलकनंदा का पानी

    आध्यात्मिकता:

    बांधों से चौथा प्रभाव पानी की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचाना है. जापानी वैज्ञानिक मासारू इमोटो के अध्ययन से पता चलता है कि पानी के अणु एकत्र होते हैं और पानी के बहते समय वे सुंदर या भद्दे पैटर्न बनाते हैं.

    चित्र 7: साफ़ पानी में बनते वाटर क्रिस्टल के सुन्दर पैटर्न
    चित्र 8: रुके हुए दूषित पानी में बनते हुए भद्दे वाटर क्रिस्टल पैटर्न

    साफ़ पानी में बहुत सुन्दर पैटर्न बनते हैं लेकिन बांधों के पीछे रुका हुआ पानी होता है जिसमे कि भद्दे पैटर्न बनते हैं. बाँध के पीछे बने तालाब में पानी सुंदर से बदसूरत पैटर्न में बदल जाता है और तालाब में जो सुंदर पैटर्न बच जाते हैं वे जल के टरबाईन में पड़ने के साथ ही टूट जाते हैं.पूजा के लिए हिंदू गंगाजल को कलश में रख कर मंत्रोच्चारण करते हैं. ये मंत्र पानी में प्रवेश करते हैं. पूजे के अंत में, पुजारी भक्तों पर यही जल छिड़कते हैं.

    चित्र 9: पूजा स्थल में कलश पर रखा हुआ हुआ शुद्ध गंगाजल आत्मशुद्धि के लिए उपयोग होता है

    सिद्धांत यह है कि मंत्र पानी में प्रवेश करते हैं और सुंदर अणु का पैटर्न बनाते है जो आध्यात्मिक रूप से चार्ज किए जाते हैं. जब हम उपासकों पर इस पानी को छिड़कते हैं, तो उस पानी में निहित आध्यात्मिक शक्ति पूजा करने वालों के शरीर में प्रवेश करती है. बांधों से होकर निकलने वाला पानी उसी प्रकार से माना जा सकता है जिस प्रकार गंगाजल को मिक्सी में घुमाकर भक्तों पर छिड़का जाय. क्या वाकई में गंगाजल को मिक्सी में घुमाने के बाद उसकी वही आध्यात्मिक शक्ति बरकरार रहेगी?

    निष्कर्ष यह है कि जलविद्युत परियोजनाओं के चार नकारात्मक प्रभाव होते हैं. सबसे पहले मछलियों और जलीय जीवों को, जो पानी को साफ करते हैं, उन्हें हम नुकसान पहुंचा रहे हैं. दूसरा, कॉलिफ़ॉर्म खाने वाले कॉलिफाज़ कम हो जाते हैं. तीसरा, हाइड्रोपॉवर बांध के नीचे बने तालाब में जहर विकसित किया जा रहा है. चौथा, बांध के पीछे स्थिर जल और टरबाइन अपर्याप्त से नीचे लाए गए आध्यात्मिक शक्तियों को नुकसान पहुंचाते हैं.

    हमें गंगा में जा रहे मलजल को साफ करना चाहिए लेकिन मछलियों, कॉलिफाज़ और आध्यात्मिक शक्तियों की रक्षा करना भी आवश्यक है. केवल नदी की ऊपरी सफाई करने से ही गंगा का उद्धार नहीं हो सकता. इसके लिए आवश्यक है जलविद्युत परियोजनाओं को हटाकर गंगा की वास्तविक शक्तियों को बचाया जा सके.

     

    इस विषय पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को लिखें

  • चित्र 1: अयोध्या में वर्तमान बाबरी मस्जिद व प्रस्तावित राम मंदिर का मॉडल

    वर्तमान सरकार का एक प्रमुख राजनैतिक मुद्दा अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण करना है.सरकार के इस संकल्प के पीछे मान्यता यह है कि जिस स्थान पर भगवान श्रीराम का जन्म हुआ है उसी स्थान पर भगवान् राम का मंदिर बनाया  जाये क्योंकि वह स्थान हिन्दुओं की आस्था का प्रतीक है अतः मंदिर गर्भगृह के मूल स्थान पर ही बनना चाहिए.

    लेकिन दूसरे स्थानों पर सरकार मंदिरों को उसी स्थान पर बनाये रखने के विरूद्ध कार्य कर रही है. उत्तराखंड में अलकनंदा के तट पर विशाल चट्टान पर धारी देवी का मंदिर स्थित था. जिसका मूल चित्र नीचे दिया जा रहा है.

    चित्र 2: उत्तराखंड के श्रीनगर में स्थित माँ धारी का प्राचीन मंदिर

    धारी मंदिर की मान्यता

    वर्तमान में इस मूल शिला का नामोनिशान भी नहीं बचा है. दरअसल यहाँ श्रीनगर जलविद्युत परियोजना बनाने के कारण झील बनी और मंदिर की शिला को झील में डुबा दिया गया. वर्तमान में उसी स्थान पर खम्बों पर एक नया मंदिर बना कर के धारी देवी की प्रतिमा को नीचे से उठा कर नए मंदिर में स्थापित कर दिया गया है. इस बांध को 2014 में भाजपा सरकार के केंद्र सत्ता में आने के बाद चालू किया गया था (फोटो 3). भाजपा चाहती तो जन भावनाओं का सम्मान करते हुए इसे रोक सकती थी पर सरकार नें ऐसा नहीं किया.

    चित्र 3: धारी देवी का नवीन मंदिर

    मान्यता है कि देवी की प्रतिमा जिसे ऊपर स्थापित किया गया है,वह  केदारनाथ के समीप स्थित कालीमठ से बह कर इस स्थान पर आई थी और इसे उठाकर मूल शिला पर स्थापित किया गया था. मूल महत्त्व उस शिला का है जिस पर माँ धारी की प्रतिमा को स्थापित किया गया था. आज उस शिला को पानी में डुबा दिया गया है और उसे ऊपर नहीं उठाया गया ह, अर्थात धारी मंदिर की जिस शिला की मूल रूप से पूजा होती थी उसको डुबाने के लिए भाजपा सरकार ने अपनी सहमति दी है.

    एक तरफ सरकार अयोध्या में राम जन्मभूमि के स्थान पर मंदिर बनाने के लिए पूरे देश में आन्दोलन चला रही है. दूसरी तरफ धारी शिला को डुबाने को तैयार है. कारण यह दीखता है कि धारी शिला के सन्दर्भ में कमर्शियल इंटरेस्ट हावी है. धारी शिला को डुबाने वाली जलविद्युत परियोजना को हैदराबाद की जी.वी.के. कंपनी द्वारा बनाया गया है. जी.वी.के. कंपनी के वाणिज्यिक स्वार्थों की रक्षा के लिए भाजपा ने धारी शिला को डुबा दिया है.

    यहाँ पर हम स्पष्ट करना चाहेंगे कि विषय बिजली के उत्पादन का नहीं है क्योंकि बिजली उत्पादन के लिए  अनेकों सौर ऊर्जा के जैसे विकल्प मौजूद हैं किन्तु धारी शिला का विकल्प नहीं है, अतः धारी शिला को डुबाना मूलतः जी.वी.के. कंपनी के कमर्शियल इंटरेस्ट को बढ़ाने के लिए किया गया है जिससे कि जनभावनाओं की अनदेखी हुई है और जो अनुचित है.

    अब भाजपा की नजर कालीमठ मंदिर पर है. यह मंदिर कालीगंगा के तट पर स्थित है.

    चित्र 4: गूगल अर्थ द्वारा कालीमठ का दृश्य

    मान्यता है कि गंगा नदी देवप्रयाग में अस्तित्व में आती है. देवप्रयाग में भागीरथी और अलकनंदा नदी का संगम होता है. अलकनंदा की एक सहायक नदी मन्दाकिनी है, और मन्दाकिनी की एक सहायक नदी कालीगंगा है.कालीगंगा का विडियो आप यहाँ पर देख सकते हैं.

     

    कालीगंगा पर कालीमठ

    कालीगंगा नदी के तट पर कालीमठ सिद्धपीठ स्थित है. मान्यता है कि कालीमठ में देवी माँ काली का अवतार हुआ था, और इस स्थान पर उन्होंने रक्तबीज राक्षस का वध किया था. मूल स्थान पर एक दिव्य कुण्ड है. कुण्ड के ऊपर चांदी का ढ़क्कन लगा हुआ है. मान्यता है कि माँ काली रक्तबीज का वध करने के बाद कुंड में समा गई थी. कालीमठ में कालीकुंड की स्थिति नीचे साफ़ देखी जा सकती है.

    चित्र 5: कालीमठ में स्थित देवी कुंड जहाँ पर देवी समा गई थी

    उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने जन भावनाओं की अनदेखी करके योजना बनायी है कि कालीगंगा को एक टनल में डाल दिया जाये और कालीमठ के नीचे इसे पाइपों के माध्यम से पॉवर हाउस तक ले जाया जाये. वहां पर इस पानी से बिजली बनाकर वापस कालीगंगा में डाल दिया जाये. नीचे हम उस पाइप का चित्र दे रहे हैं जिसके माध्यम से यह पानी पॉवर हाउस तक जायेगा और आस पास पड़े उपकरणों का चित्र दे रहे हैं जो कि इस स्थान पर पॉवर हाउस निर्माण में काम आयेंगे.

    चित्र 6: कालीगंगा पर निर्माणाधीन बाँध कार्य

    इस प्रोजेक्ट के बनने के बाद काली गंगा मृतप्राय हो जाएगी. नीचे दिए गए चित्र से समझा जा सकता है जैसे कि विष्णुप्रयाग बाँध बनने के बाद अलकनंदा का पानी बिकुल सूख चुका है. इसी प्रकार से कालीमठ के सामने कालीगंगा भी टनल में डाले जाने के बाद सूख जाएगी. कालीगंगा के सूख जाने से कालीमठ के मंदिर का सौन्दर्य भी जाता रहेगा.

    चित्र 7: विष्णुप्रयाग में जलविद्युत परियोजना के बाद अलकनंदा नदी की स्थिति

    एक तरफ भाजपा राम मंदिर को उसी जगह बनाने के लिए पूरे देश में आन्दोलन छेड़ रही है और दूसरी तरफ धारी शिला को पानी में डुबा दिया है और कालीमठ की कालीगंगा को सुखाने के लिए प्रयासरत है. इस विरोधाभास से भाजपा सरकार को उबरना चाहिए. जिस प्रकार भाजपा को राम जन्मभूमि का महत्व दिखता है उसी प्रकार से अन्य मंदिरों और नदियों को जलविद्युत परियोजनाओं से बचाना चाहिए.

     

    वेब्साईट समर्थित द्वारा : डॉ. भरत झुनझुनवाला, स्वामी शांतिधर्मानंद, देबादित्यो सिन्हा, विमल भाई.

    पोस्ट लिखित द्वारा : अशोक रावत

     

     इस विषय पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को लिखें