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वन

  • केदारनाथ आपदा को आये चार साल बीत चुके हैं.लेकिन पहाड़ों का गुस्सा आज भी कम नहीं हुआ है क्योंकि सरकार ने ऐसी दुर्घटनाओ को दूर करने के लिए ठोस नीति नहीं बनाई है.भारत मौसम विभाग ने दावा किया था

  • चौरास बाँध श्रीनगर

    योजना आयोग ने अपनी एकीकृत ऊर्जा नीति रिपोर्ट में जल विद्युत् को ऊर्जा का सबसे बेहतर श्रोत माना है चूंकि यह कोयले से उत्पन्न ऊर्जा के मुकाबले गैस उत्सर्जन नहीं करता

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    गंगा संरक्षण के लिए हे...गढ़वाल विश्वविद्यालय और राज्य सरकार के बीच MOUसाईंन किया गया (फोटो साभार: दीप जोशी, हिंदुस्तान टाइम्स)

     

    हाल ही में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री की उपस्तिथि में गढ़वाल विश्वविद्यालय को गंगा की सफाई की जिम्मेदारी दी है.  गंगा को जीवित रखने की दृष्टि से सरकार का यह एक उत्तम निर्णय है.

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    सद्गुरु जग्गी वासुदेव ‘रेली फॉर रिवेर्स’ अभियान के तहत कन्याकुमारी से लेकर हिमालय तक गाड़ी चलाकर लेकर जायेंगे जिसके तहत वे लोगों को नदियों को बचाने का सन्देश भी देंगे. यह रेली 16 भारतीय राज्यों से होते हुए देश की 30 नदियों को बचाने का सन्देश देगी.

  • श्रीपद धर्माधिकारी एवं सिन्धभोर द्वारा लिखित

    भारत सरकार ने हाल ही में राष्ट्रीय अंतर्देशीय जलमार्गों की एक महत्वकांक्षी परियोजना को हाथ में लिया है.मंथन औरश्रुति कीनई रिपोर्ट अंतर्देशीय जलमार्गों से संबंधित मुद्दों की विस्तृत विवेचना प्रस्तुत करती है.  राष्ट्रीय जलमार्गों के निर्माण से देश को अनेक फायदे होंगे. किन्तु निर्माण के चरण में पड़ने वाले दुष्प्रभावों को नीचे दर्शाया गया हैं:

    1. जब किसी नदी में नौवहन मार्ग बनाया जाता है तो अपेक्षित गहराई और चौड़ाई बनाने के लिए नदी में ड्रेजिंग की जाती है, जिससे की जलीय जीवन नष्ट होने की सम्भावना रहती है.
    2. ड्रेजिंग के दौरान नदी की तली से गाद, चट्टानों, गारे और कीचड़ को निकला जाता है. इस तरह की कार्यवाही से नदी की स्थिरता व संतुलन पर असर पड़ता है.
    3. किसी भी तरह की ड्रेजिंग के दौरान नदी का पानी गन्दा हो जाता है. इस गंदे पानी की वजह से बहुत सारी मछलियाँ वहां से पलायन कर जाती हैं. गंदे पानी की वजह से सूरज की किरणे भीतर तक नहीं जा पाती हैं जलीय पौधों और जलीय जंतुओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है.
    4. जलमार्ग बनाने के लिए नदियों की तली को काटा जाता है तो भूमिगत जलश्रोतों के कटने की सम्भावना भी ज्यादा बढ़ जाती है. इसकी वजह से आसपास के कुओं और झरनों में पानी की आपूर्ति बंद हो जाएगी और आसपास का भूमिगत जल स्टार भी घटने लगेगा.
    5. नदियों की खाड़ियों और क्रिक्स में ड्रेजिंग के फलस्वरूप पानी के निकासी के कारण समुद्र का खारा पानी क्रिक्स या नदियों में काफी भीतर तक घुस सकता है. पानी के इस तरह से घुसने की वजह से खाड़ी में मौजूद जंगलों, मछलियों एवं जलीय जीवों पर सीधा प्रभाव पड़ना निश्चित है.
    6. जलमार्गों से पदार्थों की ढुलाई और परिवहन के लिए नदी तटों पर बंदरगाह और हब बनाने होंगे जिससे कि आसपास के पेड़ों और मैनग्रोव जंगलों की बड़े पैमाने पर कटाई होगी. और घाटों और बंदरगाहों के निर्माण से नदी, स्थानीय लोग और मछुआरे की पहुँच से बाहर हो जाएगी.

    धर्म्तर पोर्ट

    धरमतर पोर्ट की जेटी पर चालू एस्केवेटर जिसके पीछे विशाल कोयले के भण्डार को साफ़ देखा जा सकता है (फोटो साभार: मंथन और श्रुति)

    धरमतर क्रीक पर लगाया गया बैकहो ड्रेजर
    धरमतर क्रीक पर लगाया गया बैकहो ड्रेजर (फोटो साभार: मंथन और श्रुति)

    अतः हमारा वर्तमान सरकार से यह प्रश्न है कि इस बहुद्देशीय विकास से होने वाले फायदों की वजह से मनुष्य के आम जीवन और नदियों को क्यूँ संकट डाला जा रहा है. इस प्रकार के बहुद्देशीय प्रोजेक्टों को चलाने से पहले दुष्प्रभावों का हल निकलना बहुत जरुरी है.

    अंत में बताते चलें कि: राष्ट्रीय जलमार्ग अधिनियम, 2016 में 111 राष्ट्रीय जलमार्गों का ब्यौरा दिया गया है जिसके अनुसार राष्ट्रीय जलमार्ग भारत की लगभग सभी प्रमुख नदियों से होकर गुज़रते हैं. नीचे हम क्रमानुसार विभिन्न राज्यों में प्रस्तावित जलमार्गों की संख्या को देख सकते हैं:

    1 अगस्त 2016 को पॉट परवहन मंत्रालय द्वारा प्रेस इनफार्मेशन ब्यूरो के माध्यम से जारी की गयी प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक भारत में 6 राष्ट्रीय जलमार्ग कार्यरत हैं:

    1. राष्ट्रीय जलमार्ग 1: गंगा भागीरथी हुगली नदी व्यवस्था (इलाहाबाद- हल्दिया).
    2. राष्ट्रीय जलमार्ग 2: ब्रह्मपुत्र नदी.
    3. राष्ट्रीय जलमार्ग 3: पश्चिमी तट नहर (कोत्त्पुरम-कोल्लम) एवं उद्योगमंडल एवं चम्प्कारा नहरें.
    4. राष्ट्रीय जलमार्ग 68: मांडोवी नदी.
    5. राष्ट्रीय जलमार्ग 97: सुंदरवन जलमार्ग.
    6. राष्ट्रीय जलमार्ग 111: जुआरी नदी.

    लेखक मंथन अध्ययन केंद्र से जुड़े पर्यवारंविद्ध हैं.

     

    आपसे निवेदन है कि पोस्ट पढ़कर नीचे अपना कमेंट/सुझाव आवश्य दें. 

  • उत्तराखंड में टिहरी और श्रीनगर जैसी विद्युत परियोजनाओं के नीचे का पानी अपेक्षाकृत साफ है. फिर भी यह कई मायनों में नदी में  प्रदूषण फैलाते हैं.

    चित्र 1: श्रीनगर बाँध के नीचे बहता साफ़ पानी

    प्रभाव:

    प्रथम प्रभावमछलियों पर है. मछलियों की कार्बनिक पदार्थ को पचाने की क्षमता होती है. मछलियों को तालाबों के साफ पानी में देखा जा सकता है, क्योंकि मछलियां तालाब में कार्बनिक पदार्थ खा लेती हैं.

    चित्र 2: मछलियां नदी के पानी को साफ़ करती हैं

     नदियां मछलियों का निवास स्थान होती हैं. अतः वे इसमें स्वछंद रूप से विचरण कर सभी कार्बनिक पदार्थों को खा लेती हैं. बांधों से मछलियों को हानि होती है.

    उत्तराखंड में पाए जाने वाले प्रसिद्ध माहसीर मछली अंडे देने के लिए ठंडे क्षेत्रों में चली जाती हैं. फिर छोटी मचलियाँ नदी की धारा के साथ बहकर मैदानी क्षेत्रों में पहुँच जाती हैं जहाँ पर ये परिपक्कव मछलियों का रूप ले लेती हैं.(नीचे फोटो देखें).

    चित्र 3: माहसीर मछलियाँ अंडे देने के लिए गंगा के ऊपरी क्षेत्रों में जाती हैं

    परिपक्व माहसीर मछलियां फिर से यही चक्र दोहराते हुए अंडे देने के लिए पहाड़ी क्षेत्रों में जाती हैं किंतु बाँध द्वारा रूकावट के कारण वे अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच पाती हैं. माहसीर मछली पहले उत्तरकाशी तक पायी जाती थी परंतु अब यह टिहरी के ऊपर नहीं पायी जाती हैं. पहले यह 100 किलोग्राम  तक होती थी. अब मात्र 700 ग्राम की ही रह गयी हैं.

    कई अध्ययनों से पता चलता है कि बांध में मछलियों, कछुओं और अन्य जलीय जानवरों की संख्या में कमी आई है. (IUCN की रिपोर्ट देख यहाँ सकते हैं), (जैविक विविधता के सम्मेलन की रिपोर्ट यहाँ सकते हैं) और (स्थलीय जैविक विविधता पर जलविद्युत परियोजनाओं के प्रभाव की रिपोर्ट यहाँ सकते हैं). जब हम टिहरी जैसे बांधों का निर्माण करते हैं, तो मछलियों की संख्या कम हो जाती है और उनकी प्रदूषण को कम करने की क्षमता भी कम हो जाती है. इसलिए, जो भी प्रदूषक नदी में प्रवेश होता है वह सहज रूप से साफ नहीं होता जैसा कि पहले साफ हो रहा था. अतः प्रदूषण पर बांधों का पहला प्रभाव मछलियों को सीमित करके होता है.

    गंगा की पवित्रता का आधार:

    बांधों का दूसरा प्रभाव कॉलिफाज़ के माध्यम से होता है. गंगा नदी के पानी में एक प्रकार का फायदेमंद बैक्टीरिया पाया जाता है जिसे कॉलिफाज़ कहा जाता है. जबकि गंगा नदी में पाए जाने वाला हानिकारक जीवाणु कॉलिफ़ॉर्म कहलाता है.

    चित्र 4: कॉलिफाज़ गंगा के प्रदूषण में मौजूद कॉलिफ़ॉर्म को खाकर नदी को साफ़ रखते हैं

    कॉलिफाज़, कॉलिफ़ॉर्म को खाकर नदी को साफ करते हैं. कॉलिफाज़ नदी की गाद या रेत में तब तक चिपके रहते हैं जब तक कि उन्हें चारों ओर कॉलिफ़ॉर्म नहीं मिलते. कॉलिफ़ॉर्म के मिलते ही कॉलिफाज़ सक्रिय हो जाते हैं और कॉलिफॉर्म खाने शुरू करते हैं. राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (NEERI) के वैज्ञानिकों ने बताया है कि “गंगा में कॉलिफाज़ अद्वितीय हैं”. आम तौर पर एक प्रकार का कॉलिफाज़ एक प्रकार का ही कॉलिफ़ॉर्म खाता है. गंगा के कॉलिफाज़ की अनूठी गुणवत्ता यह है कि एक कॉलिफाज़ बड़ी संख्या में कॉलिफ़ॉर्म खाते हैं. गंगा के कॉलिफाज़ वाइड स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक दवाओं की तरह होते हैं - जिस प्रकार एक एंटीबायोटिक दवाई बड़ी संख्या में जीवाणुओं को मारती हैं उसी प्रकार गंगा का कॉलिफाज़ भी अनेक कीटाणुओं को नष्ट करता है. यही गंगा के “स्व-शुद्ध" करने की क्षमता का रहस्य है. गंगा का पानी कभी खराब नहीं होता है क्योंकि कॉलिफाज़ लगातार कॉलीफ़ॉर्म को खाते रहते हैं. ये विस्तृत स्पेक्ट्रम कॉलिफाज़ गंगा की रेत में रहते हैं और ये अपस्ट्रीम स्ट्रेच में बनते हैं. रेत गंगा के माध्यम से बहती है और इस रेत को टिहरी बांध ने रोक लिया है जिसकी वजह से कॉलिफाज़ भी टिहरी बाँध में कैद हो चुके हैं और समान्य रूप से नदी में नहीं बह रहे हैं.(कॉलिफाज़ पर हमारी पिछली पोस्ट यहाँ देखें).

    NEERI की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि टिहरी बांध के नीचे भी कॉलिफाज़ भी मिलाता है. लेकिन यह कॉलिफाज़ पहले से बह चुकी रेत के कारण है. अब अपस्ट्रीम से डाउनस्ट्रीम प्रवाह में कमी आने के कारण व्यापक स्पेक्ट्रम कॉलिफाज़ की उपस्थिति में भी कमी आई है और गंगा की स्वयं को शुद्ध रखने की क्षमता में भी गिरावट आई है.

    जल की कमी:

    बांधों द्वारा पड़ने वाला तीसरा नकारात्मक प्रभाव है कि बांध के नीचे डाउनस्ट्रीम बगैर पानी के होता है. उदाहरण के लिए विष्णुप्रयाग में देखा गया है कि जलविद्युत परियोजना द्वारा अलकनंदा में पानी बहुत कम मात्रा में छोड़ा जाता है.

    चित्र 5: विष्णुप्रयाग परियोजना के बाद अलकनंदा नदी में पानी बहुत ही कम है

    पानी को बांध से एक सुरंग के माध्यम से निकाला जाता है और बिजली घर की 20 किलोमीटर की दूरी तक लाया जाता है. बांध के नीचे का खंड तब तक सूखा रहता है जब तक कि नदी में अन्य प्राकृतिक श्रोत शामिल न हों. यह सूखा स्ट्रेच नदी में मौजूद सभी जलीय जीवन को मारता है.

    ऊपर चित्र में दिखाया गया है कि श्रीनगर बाँध के नीची पानी साफ है. लेकिन इस पानी में बीमारी फ़ैलाने वाले कीटाणु उत्पन्न हो रहे हैं. इस रुके हुए पानी के कारण शहर के इतिहास में अब तक के सबसे अधिक टायफ़ायड और पीलिया के मरीज़ देखे गए हैं.

     

    चित्र 6: श्रीनगर परियोजना की वजह से श्रीकोट में रुका हुआ अलकनंदा का पानी

    आध्यात्मिकता:

    बांधों से चौथा प्रभाव पानी की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचाना है. जापानी वैज्ञानिक मासारू इमोटो के अध्ययन से पता चलता है कि पानी के अणु एकत्र होते हैं और पानी के बहते समय वे सुंदर या भद्दे पैटर्न बनाते हैं.

    चित्र 7: साफ़ पानी में बनते वाटर क्रिस्टल के सुन्दर पैटर्न
    चित्र 8: रुके हुए दूषित पानी में बनते हुए भद्दे वाटर क्रिस्टल पैटर्न

    साफ़ पानी में बहुत सुन्दर पैटर्न बनते हैं लेकिन बांधों के पीछे रुका हुआ पानी होता है जिसमे कि भद्दे पैटर्न बनते हैं. बाँध के पीछे बने तालाब में पानी सुंदर से बदसूरत पैटर्न में बदल जाता है और तालाब में जो सुंदर पैटर्न बच जाते हैं वे जल के टरबाईन में पड़ने के साथ ही टूट जाते हैं.पूजा के लिए हिंदू गंगाजल को कलश में रख कर मंत्रोच्चारण करते हैं. ये मंत्र पानी में प्रवेश करते हैं. पूजे के अंत में, पुजारी भक्तों पर यही जल छिड़कते हैं.

    चित्र 9: पूजा स्थल में कलश पर रखा हुआ हुआ शुद्ध गंगाजल आत्मशुद्धि के लिए उपयोग होता है

    सिद्धांत यह है कि मंत्र पानी में प्रवेश करते हैं और सुंदर अणु का पैटर्न बनाते है जो आध्यात्मिक रूप से चार्ज किए जाते हैं. जब हम उपासकों पर इस पानी को छिड़कते हैं, तो उस पानी में निहित आध्यात्मिक शक्ति पूजा करने वालों के शरीर में प्रवेश करती है. बांधों से होकर निकलने वाला पानी उसी प्रकार से माना जा सकता है जिस प्रकार गंगाजल को मिक्सी में घुमाकर भक्तों पर छिड़का जाय. क्या वाकई में गंगाजल को मिक्सी में घुमाने के बाद उसकी वही आध्यात्मिक शक्ति बरकरार रहेगी?

    निष्कर्ष यह है कि जलविद्युत परियोजनाओं के चार नकारात्मक प्रभाव होते हैं. सबसे पहले मछलियों और जलीय जीवों को, जो पानी को साफ करते हैं, उन्हें हम नुकसान पहुंचा रहे हैं. दूसरा, कॉलिफ़ॉर्म खाने वाले कॉलिफाज़ कम हो जाते हैं. तीसरा, हाइड्रोपॉवर बांध के नीचे बने तालाब में जहर विकसित किया जा रहा है. चौथा, बांध के पीछे स्थिर जल और टरबाइन अपर्याप्त से नीचे लाए गए आध्यात्मिक शक्तियों को नुकसान पहुंचाते हैं.

    हमें गंगा में जा रहे मलजल को साफ करना चाहिए लेकिन मछलियों, कॉलिफाज़ और आध्यात्मिक शक्तियों की रक्षा करना भी आवश्यक है. केवल नदी की ऊपरी सफाई करने से ही गंगा का उद्धार नहीं हो सकता. इसके लिए आवश्यक है जलविद्युत परियोजनाओं को हटाकर गंगा की वास्तविक शक्तियों को बचाया जा सके.

     

    इस विषय पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को लिखें

  • आज भारत दुनिया में सबसे तेज़ी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है. हमारे इस आर्थिक विकास को देखकर दुनिया द्वारा हमारा अनुसरण किया जायेगा. यह दर्शाता है कि हम आर्थिक विकास को एक नयी दिशा दे रहे हैं. लेकिन देश की तरक्की के लिए पर्यावरण के अनुकूल रह कर आर्थिक विकास हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है. जिसके लिए हमें देश की विभिन्न प्रजातियों को विलुप्त होने से बचाना चाहिए. हमारे जैवमंडल में हर प्रजाति का अपना महत्त्व है और इनमे से अनेक प्रजातियाँ ऐसी हैं जो भविष्य में मनुष्य को जीवन जीने में कारगर सिद्ध होंगी.

     

    प्रजातियों की विलुप्ति का कारण

    पूर्व में गायों की अलग अलग नसल देखी जाती थी. आज अधिकतर जर्सी गाय ही दिखती हैं. इसी प्रकार पूर्व में पहाड़ों में पेड़ों की तमाम प्रजातियाँ दिखती थी जैसे बुरांश, काफल, इत्यादि. पूर्व में निमोली और कसेरु जैसे फल बाजार में मिलते थे जो अब मिलना बंद हो गए हैं. इससे पता लगता है कि कई प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं.

    शांति मंत्र में कहा गया है:

    शांति कीजिये प्रभु त्रिभुवन में, शांति कीजिये .

    जल थल में और गगन में, अंतरिक्ष में, अग्नि में, पवन में, औषधि वनस्पति वन उपवन में, सकल विश्व में जड़ चेतन में, शांति कीजिये.

    शांति राष्ट्रनिर्माण सृजन में, नगर ग्राम में और भवन में जीवनमात्र के तन में मन में, और जगत के कण कण में शांति कीजिये.

    ॐ शांति  शांति  शांति  ॐ

    कई स्थानों पर हमने संकट में पड़ी प्रजातियों को सुरक्षा प्रदान करके उन्हें जीवित रखने का प्रयास किया है जैसे टाइगर रिज़र्व में. लेकिन दूसरी तरफ कई प्रजातियाँ लुप्त होने की तरफ बढ़ रही है जैसा कि नीचे चित्र में दिखाया गया है:

    फरक्का बराज बनने से हिलसा मछली फरक्का के ऊपर अपने प्रजनन क्षेत्रों तक नही पंहुच पा रही हैं और फरक्का से इलाहाबाद तक लुप्त हो गयी हैं. इसी प्रकार हरिद्वार में भीमगोडा बैराज और श्रीनगर में अलकनंदा पर बांध बनाने से माहसीर मछली अपने ऊपर के प्रजनन तक नहीं पहुंच पा रही हैं और इसका आकार छोटा होता जा रहा है. पूर्व में यह 20-25 किलोग्राम तक की पायी जाती थी जो अब 1 किलोग्राम की मिल रही है.

    IUCN (International Union for Conservation of Nature) की रिपोर्ट के अनुसार प्रजातियों के विलुप्त होने के निम्न छह कारण हैं. IUCN की रिपोर्ट यहाँ देख सकते हैं:

    1. आवासीय स्तर पर गिरावट
    2. अत्यधिक शोषण
    3. प्रदूषण
    4. बीमारियाँ
    5. विदेशी प्रजातियों के आक्रमण
    6. वैश्विक जलवायु परिवर्तन  

    उपरोक्त कारणों में हम नदियों की प्रजातियों को विलुप्त करने में इस प्रकार योगदान दे रहे हैं-

    1. बराजों से मछलियों का आवागमन अवरुद्ध होता है और उनका रिहायशी क्षेत्र छोटा होता है. सिंचाई के लिए अधिक मात्रा में पानी निकालने से भी ऐसा होता है.
    2. प्रदुषण से उनका जीवन कठिन हो जाता है.
    3. जलमार्ग की तरह उपयोग होने से एलियन (विदेशी) प्रजातियों का प्रवेश होता है जो घरेलु जातियों को दबा देती हैं.

    इन प्रजातियों का जीवित रहना हमारे लिए जरुरी है क्योंकि इन प्रजातियों में से कुछ प्रजातीयाँ आने वाले समय में मनुष्य को जावित रहने में मददगार सिद्ध होगी. जैसे धान की एक प्रजाति होती है जो बाढ़ के पानी के साथ साथ बहुत तेजी से बढती है और बाढ़ में ही अनाज पैदा करती है. अब मान लीजिये हमने बांध बना कर बाढ़ के आने को रोक लिया जिससे यह प्रजाति नष्ट हो गयी. इसका बीज अनुपलब्ध हो गया. समय क्रम में हम बाढ़ को किन्ही कारणों से नहीं रोक पाए.

     

    भविष्य की आवश्यकता

    यदि हमने बाढ़ में उपजने वाले धान की प्रजाति का संरक्षण किया होता तो हम उस बीज को पुनः बड़े पैमाने पर खेती करके अपना पेट भर सकते थे. इसके विपरीत यदि हमने उस प्रजाति के बीज को संरक्षित नहीं किया तो भविष्य की बाढ़ में हमको भूखे मरना पड़ेगा. इसीलिए अर्थशास्त्री मानते है कि संकटग्रस्त प्रजातियों को जीवित रखना एक नैसर्गिक जिमेदारी ही नहीं बल्कि एक आर्थिक रिसोर्स है जो कि भविष्य में मनुष्य को जीवित रखने में मददगार साबित होंगी. इसलिए हमें संकटग्रस्त प्रजातियों का संरक्षण करना चाहिए. नदियों के सन्दर्भ में जलविधुत और सिंचाई योजनाओं से पीछे हटना चाहिए, जिससे जलीय जैव विविधता पर नकारात्मक प्रभाव न पड़ें और हम अपने भविष्य को दाव में न लगायें.

     

     

    इस विषय पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को लिखें

     

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  • देश की जनता में उत्साह है कि शहरों में प्लास्टिक का इस्तेमाल होना बंद हो रहा है. मान्यता है कि प्लास्टिक पर्यावरण के लिए हानिप्रद है. वह जल्दी से ख़त्म नहीं होता है. उसको पूरी तरह समाप्त होने में चार सौ से एक हज़ार वर्ष तक का समय लग जाता है. इस समस्या से निजाद पाने के लिए सरकार ने गुटखा, पान मसाला आदि पर  प्लास्टिक के पैकेटों पर प्रतिबन्ध लगाया है.

    लेकिन प्लास्टिक का उपयोग कम करने के कारण अब दुकानदार कपड़े अथवा कागज़ के थैलों का उपयोग कर रहे हैं. प्रश्न यह है कि क्या कपडे अथवा कागज़ से बने यह थैले पर्यावरण के लिए उपयुक्त हैं?

     

    प्लास्टिक और कागज का तुलनात्मक अध्ययन

    उत्तरी आयरलैंड की सरकार द्वारा प्लास्टिक बैग और कागज़ के बैगों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया (रिपोर्ट यहाँ देखें). इस रिपोर्ट में बताया गया है कि:

    • प्लास्टिक बैगों की तुलना में कागज़ से बने बैगों के उत्पादन में ऊर्जा ज्यादा लगती है, ग्रीनहाउस गैसें ज्यादा निकलती हैं और पानी का उपयोग बहुत ज़्यादा होता है जैसा नीचे चित्र 2 में दिया गया है.

    • ग्लोबल वार्मिंग का महत्वपूर्ण कारण ओजोन गैस का उत्सर्जन है. प्लास्टिक बैगों की तुलना में कागज़ के थैलों के उत्पादन में ओजोन का उत्सर्जन तीस प्रतिशत अधिक होता है.
    • नीचे चित्र 4 में हम देख सकते हैं कि कागज़ का कूड़ा जब नदियों और तालाबों में जाता है तो प्लास्टिक की तुलना में पानी में निहित ऑक्सीजन का चौदह गुना ज्यादा इस्तेमाल करता है जिससे जलीय जीवों के जीवन पर संकट मंडरा रहा है. तुलना में प्लास्टिक, तालाब के ऑक्सीजन को नहीं सोखता है.

    • प्लास्टिक की तुलना में कागज़ के थैले का वज़न लगभग चार गुना होता है. नीचे चित्र 5 में कागज़ के थैले का वजन 18 मिलीग्राम है जबकि प्लास्टिक के थैले का वजन 4 मिलीग्राम है.अतः प्लास्टिक की तुलना में कागज़ हमारे प्राकृतिक संसाधनों पर ज़्यादा भारी पड़ता है.

    उपरोक्त इन सभी बिन्दुओं पर कागज़ के थैले प्लास्टिक की तुलना में ज्यादा हानिप्रद हैं. प्लास्टिक का एक मात्र लाभ यह है कि कूड़े की तरह फेंकने पर प्लास्टिक का थैला समाप्त नहीं होता है जबकि कागज़ का थैला जल्दी सड़ कर के पर्यावरण में घुल-मिल जाता है.अतः कागज़ के थैलों का समग्र पर्यावरणीय प्रभाव प्लास्टिक के थैलों से बहुत अधिक है.

     

    प्लास्टिक का पुनः इस्तेमाल

    प्लास्टिक के उपयोग की एक मात्र समस्या कूड़े की है. इसे पुनरुपयोग या रीसायकल कर के इस समस्या से बचा जा सकता है. अतः हमको प्लास्टिक के थैलों का उपयोग बढाकर इनके रीसायकल करने पर ध्यान देना चाहिए जैसा नीचे चित्र 6 में दिखाया गया है.

    हमारे देश में लाखों लोग सड़कों एवं रेलवे लाइनों के बगल में फेंके हुए प्लास्टिक के थैलों इत्यादि को बटोरते हुए दिखते हैं. इनको सम्मान देना चाहिए और इनके लिए समुचित व्यवस्था करनी चाहिए. लोगों द्वारा प्लास्टिक के थैलों को सडकों और रेलवे लाइनों के किनारे फेंके जाने का मुख्य कारण यह है कि कूड़ेदानो की समुचित व्यवस्था नहीं होती है. मजबूरन लोगों को प्लास्टिक के थैले खुले में फैंकने पड़ते हैं. अतः हमें कूड़ेदानों की उचित व्यवस्था करनी चाहिए. केंद्र सरकार नें नगर पालिकाओं को इस प्रकार की व्यवस्था के लिए आदेश पारित किये हैं परन्तु धन न होने के कारण नगरपालिकाओं के लिए इस कार्य को करना कठिन है. अतः हमको प्लास्टिक के थैलों पर टेक्स लगाना चाहिए और उस रकम से प्लास्टिक को रीसायकल करने की उचित व्यवस्था करनी चाहिए.

    हमारा सभी नागरिकों से आग्रह है कि प्लास्टिक के थैलों का बहिष्कार करने के स्थान पर इनको रीसायकल करने पर ध्यान दें.

    यह पोस्ट डॉ भरत झुनझुनवाला, देबादित्यो सिन्हा, स्वामी शांतिधर्मानंद और विमल भाई द्वारा समर्थित है.

     

     

    इस विषय पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को लिखें

  • पशुओं का मनुष्य जीवन में अहम् योगदान है. अगर हम इतिहास से लेकर अब तक देखें तो हम पाते हैं कि मनुष्य नें पशुओं को किसी न किसी तरह उपयोग में लिया है. लेकिन आज वे ही पशु जो मनुष्य जीवन के साथ साथ चला करते थे आज मनुष्य की आवश्यकताओं के अनुसार विलुप्ति की कगार पर पहुँच रहे हैं. पशुओं की इस विलुप्ति के कारण भारत सरकार नें पशुओं को संरक्षण तो दिया है किन्तु अनावश्यक पशुओं का संरक्षण ही आज स्वयं मनुष्य को नुक्सान पहुंचा रहा है.

    संरक्षण के प्रति सरकार की नीति:

    सरकार ने शेर के संरक्षण के लिए कई कदम उठाये हैं जैसे कि जिम कॉर्बेट और गिर नेशनल पार्क बनाये हैं. शेर आज संकटग्रस्त प्रजाति है. अतः उसके संरक्षण का स्वागत है. इसी क्रम में सुअर और बन्दर को भी संरक्षण दिया जा रहा है. लेकिन शेर और इनकी परिस्थिति में मौलिक अंतर है. शेर मनुष्य को हानि कम पहुंचा रहा है जबकि सूअर और बंदर सृष्टि के लिए हानिप्रद हो गए हैं. इनके द्वारा फसल नष्ट करने से अनाज का उत्पादन कम हो रहा है और मनुष्य का अस्तित्व संकट में पढ़ रहा है. इन पशुओं को संरक्षण देने से सृष्टि की हानि हो रही है.

    मछलियों के प्रति कोई संरक्षण नहीं:

    हमारे देश में तमाम प्रकार की मछलियां हैं. तटीय क्षेत्र की श्रेष्ठ मछली हिलसा है और पहाड़ी क्षेत्र की श्रेष्ठ मछली माहसीर है. ये दोनों मछलियाँ अंडे देने के लिए नीचे से ऊपर को पलायन करती हैं. ऊपरी क्षेत्र में दिए गए अंडे जब छोटी मछलियों का आकार ले लेती हैं तब यह नीचे बहते हुए पहुचते हैं और नीचे बड़े होते हैं. यह पलायन इनके जीवन का एक अहम हिस्सा होता है. सरकार नें फरक्का बराज बनाकर हिलसा के पलायन को अवरुद्ध कर दिया है और आज हिलसा का जीवन संकट में है. उत्तराखंड के पहाड़ों में चीला, श्रीनगर, टिहरी आदि बाँध बनाकर माहसीर के पलायन को अवरुद्ध कर दिया है जिसके कारण जो माहसीर 80 से 100 किलोग्राम के वजन में पायी जाती थी अब मात्र 1 किलोग्राम वजन में ही रह गयी है.

    शेर की तुलना में मछली का संरक्षण ज्यादा जरुरी है क्योंकि यह नदी के पानी को स्वच्छ रखने में मददगार होती है. मछलियाँ नदी में आने वाले आर्गेनिक कूड़े को खाकर पानी को साफ़ कर देती है. सरकार ने गंगा को स्वच्छ करने का जो सराहनीय संकल्प लिया है उसके लिए जरुरी है कि मछलियों का संरक्षण किया जाय. लेकिन फरक्का बराज बनाकर और हाइड्रोपावर को बढ़ावा देकर सरकार उसी मछली को विलुप्त कर रही है जो कि मनुष्य के लिए लाभप्रद है.

    शेर, बन्दर और मछली का 5 बिन्दुओ पर तुलनात्मक अध्ययन:

    • पर्यावरण: पर्यावरण की दृष्टि से बन्दर और शेर का कोई लाभ नहीं है किन्तु नदियों और समुद्रों में जल को साफ़ रखने के लिए मछलियों का महत्वपूर्ण योगदान है, अतः मछलियाँ पर्यावरण की दृष्टि से लाभकारी हैं.
    • आर्थिक: बंदरों और शेरों का विशेष आर्थिक योगदान नहीं है. बल्कि फसल को नष्ट करके बन्दर आर्थिक हानि पंहुचा रहे हैं. किन्तु आर्थिक विकास में मछली के व्यवसाय का सार्थक प्रभाव होता है.
    • मनोरंजन: सौन्दर्य और फोटोग्राफी की दृष्टि से बंदरों का ज्यादा महत्त्व नहीं दिखता है जबकि शेर और मछलियों का अधिक महत्त्व होता है. तमाम पर्यटक डालफिन जैसी मछलियों एवं शेर को देखने को उत्सुक रहते हैं.
    • जीन संरक्षण: बंदरों के जीन संरक्षण की जरुरत नहीं है जबकि शेर और मछलियों का जीन संरक्षण करना जरुरी होता है.
    • सामाजिक प्रभाव: बंदरों का समाज में नकारात्मक महत्त्व है, शेर का सामाजिक महत्व शुन्य है, लेकिन मछलियों का बड़ा सामाजिक महत्त्व होता है. बहुत से लोग मछलियाँ पकड़ कर अपनी जीविका चलाते हैं.

    इस तुलनात्मक अध्ययन को हम सारणी क्रम में नीचे देख सकते हैं:

     तुलनात्मक अध्ययन  बन्दर  शेर  मछली
     पर्यावरण  × ×
     आर्थिक प्रभाव  × ×
     मनोरंजन ×  
     जीनपूल ×
     सामाजिक महत्त्व × ×

    उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि मछली को संरक्षण देना सबसे ज्यादा जरुरी है जबकि बन्दर को नुकसानदेह सरकार नें शेर को संरक्षण दिया है हम उसका स्वागत करते हैं. किन्तु प्रश्न है कि मछलियाँ, जो कि हमारे लिए हर प्रकार से लाभप्रद है, उन्हें हम क्यों मार रहे हैं और बन्दर और सुअर जो कि हमारे लिए अनुपयुक्त हैं उन्हें हम क्यों बचा रहे हैं? हम मनुष्य के विकास पर दोहरी मार अनायास ही क्यों मार रहे हैं?

    बंदर जैसे अनुपयुक्त पशुओं का किसानो को शिकार करने की छूट देनी चाहिए जिससे कि वे अपनी फसल को बर्बाद होने से बचा सकें. साथ ही पहाड़ों में जलविद्युत परियोजनाओं को हटाकर मछलियों का संरक्षण करना चाहिए.

     

    इस विषय पर प्रधानमंत्री जी को लिखें

     

  • सरकार द्वारा “नमामि गंगे” कार्यक्रम चलाया जा रहा है जिसके तीन मुख्य बिंदु हैं. पहला, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाकर गंदे पानी की सफाई करना. दूसरा, नदी में पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित करना तथा तीसरा, खेती में उपयोगिता सुधार कर पानी की मांग को कम करना. इसके सामानांतर चल रहे “रैली ऑफ़ रिवर्स” द्वारा पेड़ लगाकर नदी के संरक्षण की बात की जा रही है. इन सभी मंतव्यों का स्वागत है. लेकिन नदियों की मुख्य समस्याओं को इनके द्वारा नज़रंदाज़ किया गया है. (नमामि गंगे और रैली फॉर रिवर्स के वक्तव्य देखें)

    पहली समस्या नदी में प्रदूषण की है. “नमामि गंगे” के अनुसार सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों को प्राइवेट पार्टियों के सहियोग से लगाया जायेगा. लेकिन समस्या यह है कि वर्त्तमान में लगे हुए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट ही नहीं चल पा रहे हैं क्योंकि नगरपालिकाओं को इन्हें चलाने में खर्च ज्यादा आता है. अतः नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लग भी जाएँ तो ये भी नहीं चलेंगे क्योंकि इन्हें चलाने में भी नगरपालिकाओं की रूचि नहीं होगी. सही उपाय यह है कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से निकले साफ़ पानी को केंद्र सरकार खरीदे और किसानों को सिंचाई के लिए उपलब्ध कराये. तब प्राइवेट पार्टियों को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट चलाने में लाभ होगा. जिस प्रकार प्राइवेट पार्टियां थर्मल प्लांट लगाकर बिजली बोर्डों को बिजली की सप्लाई कर रही हैं उसी प्रकार प्राइवेट पार्टियां सिवेज को साफ़ करके साफ़ पानी को राज्यों के सिंचाई विभाग को उपलब्ध करा सकती हैं. चूंकि साफ़ पानी के खरीद की कोई योजना नहीं है इसलिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की योजना फेल होगी.

    “नमामि गंगे” का दूसरा बिंदु है कि प्रदूषण फ़ैलाने वाले पुराने उद्योगों को बंद किया जायेगा और नए उद्योगों के लिए नयी नीति बनाई जायेगी. लेकिन नीति क्या बनाई जायेगी इसकी स्पष्टता नहीं है. देश की जानी मानी IITs द्वारा बनाये गए गंगा संरक्षण के प्रोग्राम में सुझाव दिया गया है कि सरकार को सभी उद्योगों को “जीरो लिक्विड डिस्चार्ज” की पालिसी पर लाना चाहिए. उन्हें इस बात पर मजबूर करना चाहिए कि पानी को बार बार साफ़ करके उपयोग करते रहें जब तक कि वह ख़त्म न हो जाये. एक बूंद भी पानी का भी वे निस्तारण न करें. लेकिन जीरो लिक्विड डिस्चार्ज के प्रति “नमामि गंगे” मौन है. इसलिए राज्यों के प्रदूषण बोर्डों और उद्योगों की मिलीभगत से गन्दा पानी निकलता रहेगा और पुरानी कहानी जारी रहेगी.

    “रैली ऑफ़ रिवर्स” का कहना है कि पेड़ लगाने से पानी की गुणवत्ता में सुधर आएगा. यह बात सही है लेकिन पर्याप्त नहीं है. “रैली ऑफ़ रिवर्स” का कार्यक्रम नदियों के किनारे दोनों तरफ एक किलोमीटर तक पेड़ लगाने का है. अगर हम गंगा बेसिन को लें तो लगभग 15,000 वर्ग किलोमीटर भूमि में पेड़ लगेंगे. लेकिन यह पूरे क्षेत्र की तुलना में ऊंट के मुह में जीरा जैसा है. उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल में राज्यों का कुल क्षेत्रफल 484,000 वर्ग किलोमीटर है. इसलिए कुल क्षेत्र के केवल 3 प्रतिशत भूमि में वनीकरण होगा. पानी की गुणवत्ता में मामूली सा ही सुधर होगा. इसलिए “नमामि गंगे” और “रैली फॉर रिवर्स” द्वारा नदियों को साफ़ करने का प्रयास फेल होगा.

    तीसरा बिंदु नदी के बहाव का है. दोनों कार्यक्रमों का कहना है कि पेड़ लगाने से नदी के जलस्तर में वृद्धि होगी. यह बात सही है. वर्षा का पानी पेड़ों की जड़ों से जमीन के अन्दर समा जाता है और जब नदी का जलस्तर कम होता है तो वह बगल की जमीन से नदी में बहकर नदी को पुनर्जीवित करता है.  लेकिन पुनः प्रश्न वही है कि केवल 3 प्रतिशत भूमि में वनीकरण भी भी ऊंट के मुह में जीरा होगा.

    “नमामि गंगे” ने यह भी कहा है कि पर्यावरणीय प्रवाह को सुनिश्त किया जायेगा. लेकिन वर्त्तमान एनडीए सरकार के चार वर्ष बीत चुके हैं और नेशनल ग्रीन ट्रेबुनल (NGT) द्वारा आदेश दिए जाने के बावजूद सरकार नें जल विद्युत परियोजनाओं और सिंचाई परियोजनाओं से पर्यावरणीय प्रवाह छोड़ने को तनिक भी कदम नहीं उठाया है.

    “नमामि गंगे” ने कहा है कि सिंचाई की गुणवत्ता सुधारने का काम किया जायेगा. उतने ही पानी से अधिक क्षेत्र में सिंचाई करने का प्रयास किया जायेगा. यह मंतव्य बिलकुल सही है, लेकिन इससे सिंचाई का क्षेत्रफल बढेगा न कि पानी की मांग घटेगी. जैसे यदि आज दस किलोमीटर में दस बार सिंचाई हो रही है तो कल उतने ही पानी से बीस वर्ग किलोमीटर में दस बार सिंचाई हो जाएगी, लेकिन पानी का उपयोग पूर्वत रहेगा. इसलिए नदी को पुनर्जीवित करने में यह कार्यक्रम असफल रहेगा.

    दो बिन्दुओं पर “नमामि गंगे”  और “रैली फॉर रिवर्स” दोनों मौन हैं. पहाड़ी क्षेत्रों में नदियों पर जलविद्युत परियोजनाएं बनाने से मछलियों का आवागमन अवरुद्ध हो रहा है. जैव विविधता पर विपरीत प्रभाव पढ़ रहा है. इसके लिए जरुरी है कि जल विद्युत परियोजनाओं को री-डिजाईन किया जाए और नदी की एक धारा को निरंतर बहना सुनिश्चित किया जाए. इसके ऊपर दोनों कार्यक्रम मौन हैं. फरक्का बराज पर भी दोनों कार्यक्रम मौन ही हैं. फरक्का के कारण पानी और गाद में असंतुलन बन रहा है. हूगली को आधा पानी लेकिन गाद कम मिल रही है. बांग्लादेश को आधा पानी लेकिन गाद ज्यादा मिल रही है. हूगली में  गाद कम आने से सुंदरबन में कटाव हो रहा है. बांग्लादेश में गाद ज्यादा जाने से बाढ़ ज्यादा हो रही है. दोनों ही कार्यक्रम इस समस्या पर मौन हैं. इसका उपाय यह हो सकता है कि फरक्का बैराज को री-डिजाईन किया जाए जिससे कि पानी के साथ साथ गाद का भी बराबर बराबर वितरण हो. इस सन्दर्भ में हमारी पिछली पोस्ट यहाँ पढ़ें.

    हमारा मानना है “नमामि गंगे”  और “रैली ऑफ़ रिवर्स” गंगा की समस्याओं को हल करने में पूर्णतया विफल होंगी. इनका मंतव्य केवल ऊपरी कार्य करने का है जिससे जनता को लगे कि सरकार गंगा को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रही है यद्यपि गंगा न तो अविरल होगी और न ही निर्मल होगी.

  • स्मार्ट सिटी देहरादून के प्रस्ताव का सुखद पक्ष है कि शहर को एक नोलेज हब के रूप में विकसित किया जाएगा. इसके अंतर्गत साइकिल ट्रैक, सडकों का चौड़ीकरण, अतिक्रमण को दूर करना, स्ट्रीट लाईट की व्यवस्था, इत्यादि किया जाना है. सरकार के इस मंतव्य का हम भरपूर स्वागत करते हैं. हमारा मानना है कि भारत के आर्थिक विकास के लिए सेवा क्षेत्र ही सबसे ज्यादा उपयुक्त है और नोलेज हब को बनाना इस दिशा में सही कदम है.

    स्मार्ट सिटी प्रस्ताव में पर्यावरण सम्बंधित दो विषयों पर विशेष ध्यान देने की जरुरत है. पहला विषय शहर के हरित क्षेत्रों का है. स्मार्ट सिटी प्रस्ताव में बताया गया है कि देहरादून के हरित क्षेत्र वर्ष 2004 में 22 प्रतिशत से घट कर वर्ष 2009 तक 15 प्रतिशत रह गए हैं. (इस सन्दर्भ में स्मार्ट सिटी प्रस्ताव पेज न. 9 नीचे देखें).

    प्रस्ताव में कहा गया है कि हरित क्षेत्र को रेट्रोफिट किया जायेगा यानि उसको पुनर्जीवित किया जायेगा. प्रस्ताव में शहर के 29,350 लोगों का सर्वेक्षण दिया  गया है. सर्वे में 8 प्रतिशत लोगों ने जोन 4 को प्राथमिक बताया है जबकि 67 प्रतिशत लोगों नें जोन 4 + ग्रीनफील्ड - टी स्टेट एरिया को प्रमुखता दी है (जानकारी के लिए चित्र देखें). इसका अर्थ हुआ की ग्रीनफ़ील्ड क्षेत्र को 59 प्रतिशत लोग प्राथमिकता दे रहे हैं.

    अर्थात देहरादून के लोग चाहते हैं कि ग्रीनफ़ील्ड को प्राथमिकता से विकसित किया जाय. इस पृष्टभूमि में हम देख सकते हैं कि स्मार्ट सिटी प्रस्ताव में हरित क्षेत्र को बढ़ाने के लिए क्या कहा गया है?

    स्मार्ट सिटी प्रस्ताव में पार्कों में वृक्षारोपण करने की बात मात्र कही गयी है और रिस्पन्ना के लिए बनाई गयी इको टास्क फ़ोर्स द्वारा नदी किनारे वृक्ष लगाने की बात की जा रही है जिसका हम स्वागत करते हैं.

    यह वृक्षारोपण उन्ही क्षेत्रों में किया जायेगा जहाँ वर्तमान में वृक्षारोपण हुए हैं. अर्थात उनका घनत्व बढाया जायेगा. इस प्रकार के वृक्षारोपण से हरित क्षेत्र नहीं बढेगा. हरित क्षेत्र को पुनः 15 से 22 प्रतिशत या इससे भी अधिक बढाने की बात प्रस्ताव में कही ही नहीं गयी है. जरुरत थी कि जिन क्षेत्रो में वृक्षों के काटे जाने के कारण हरित क्षेत्र 22 से 15 प्रतिशत हो गया है, उसमे वापस ग्रीन कवर को पुनः वापस स्थापित किया जाता. यदि पूर्व के हरित क्षेत्र में सड़क या मकान बना दिए गए हैं, तो इन्हें हटा कर उस क्षेत्र को पुनः हरित क्षेत्र में बदलना था.वास्तविकता यह है की हरित क्षेत्र पर स्मार्ट सिटी मौन है.

    दूसरी समस्या पानी की है. देहरादून में कई प्रसिद्द नदियाँ बहती हैं जिनमे प्रमुख रिस्पन्ना नदी है. आज रिस्पन्ना नदी पूरी तरह सूखी हुई है.

    रिस्पन्ना नदी का उद्गम मसूरी के पास की पहाड़ियों से होता है. वहां पर प्राकृतिक स्रोतों से पानी अभी भी निकलता है और रिस्पन्ना नदी में बहता है. लेकिन नीचे पहुँचने के साथ यह पानी देहरादून की जलापूर्ति के लिए निकाल लिया जाता है.(जलापूर्ति की रिपोर्ट नीचे देखें)

    रिस्पन्ना को पुनर्जीवित करने के लिए पानी निकालना बंद या कम करना होगा. इसके लिए देहरादून में जल आपूर्ति के लिए वैकल्पिक जल स्रोत ढूँढने होंगे. जैसे ऋषिकेश से गंगा नदी के पानी को देहरादून लाया जा सकता है. लेकिन देहरादून के स्मार्ट सिटी प्रस्ताव में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है. इसका अर्थ यह है कि रिस्पन्ना का पानी निकाला जाता रहेगा और नदी पुनः जीवित नहीं होगी.

    रिस्पन्ना नदी के सूखने का दूसरा कारण है कि मैदानी इलाकों में ट्यूबवेल अत्यधिक मात्रा में लगा दिए गए हैं जिसके कारण भूमिगत जल का स्तर नीचे गिर गया है. नदी में आने वाला पानी शीघ्र ही नीचे समा जाता है. इसके लिए जरूरी है कि रिस्पन्ना नदी के 8 से 10 किलोमीटर तक के क्षेत्र में ट्यूबवेल को बंद कर दिया जाय अथवा उनकी गहराई को सीमित कर दिया जाए जिससे कि रिस्पन्ना के क्षेत्र में भूमिगत जल लबालब भरा रहे और रिस्पन्ना का पानी नीचे समाये. तब ही रिस्पन्ना जीवित होगी. लेकिन इस विषय पर भी देहरादून स्मार्ट सिटी प्रस्ताव पूर्णतया खामोश है.

    रिस्पन्ना नदी की तीसरी समस्या अतिक्रमण की है.(अतिक्रमण की रिपोर्ट यहाँ देखें) रिस्पन्ना के मार्ग पर झुग्गी झोपड़ियाँ, मकान और गाड़ियों की पार्किंग बड़ी मात्र में हो रही है, जिसके कारण नदी की आसपास की भूमि में प्रदूषण समा जाता है. जब कभी भी नदी में पानी आता है तो इस प्रदूषण से जल स्वयं प्रदूषित हो जाता है. यानि भूमिगत प्रदूषण से नदी का पानी प्रदूषित होने लगता है जैसा कि ओस्मोसिस प्रक्रिया में होता है. 

    नदियाँ केवल पानी ही नहीं लाती हैं बल्कि शहर के सौन्दर्य, शहर का वातावरण, शहर के भूजल को  संतुलित करती हैं. अतः वर्तमान प्लान स्मार्ट कोटी के सौंदर्य एवं जीवन के विपरीत है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है. जैसा कि नीचे चित्र में देखा जा सकता है  कि स्मार्ट सिटी के प्रस्ताव में नदी को पुनर्जीवित करने की बात पांचवें पाएदान पर लिखी गयी है जिसका कोई विस्तार नहीं दिया गया है.

    रिस्पन्ना नदी बहती है तो शहर का सौन्दर्य नोलेज हब बनाने में भी सहायक होगा. अगर शहर सुन्दर होगा तो यहाँ शिक्षा और सॉफ्टवेयर पार्क बनाने को लोग उत्सुक होंगे.

    पर्यावरण सम्बन्धी इन खर्चों को हमें नुकसानदेह नहीं समझना चाहिए बल्कि यह देखना चाहिए कि यदि शहर का पूरा चित्र सौन्दर्यमयी हो जाता है, नदियाँ बहती हैं, उसके किनारे पार्कों में हरियाली रहती है, लोगों का परस्पर आवागमन रहता है तो हमें शहर को नोलेज हब बनाने में मदद मिलेगी.

     

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    सम्बंधित रिपोर्ट:

  • चीन में भारी संख्या में जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण हुआ है. साथ साथ चीन आर्थिक विकास में हमसे आगे निकल गया है. इसलिए चीन का अनुसरण करते हुए हम भी बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं बना रहे हैं.

    चीन में बना विशाल थ्री गोर्गेस बाँध

    थ्री गोर्गेस बाँध के प्रभाव

    चीन का सबसे बड़ा थ्री गोर्जेस बाँध है जो कि यांग्से नदी के ऊपर बनाया गया है. इस बाँध से वर्ष 2009 में उत्पादन शुरू कर दिया गया था. लेकिन अब इस बाँध के तमाम दुष्प्रभाव सामने आने लगे हैं जो कि निम्न प्रकार हैं:

    • चीनी अकादमी ऑफ इंजीनियरिंग ने रिपोर्ट दी है कि सितंबर 2006 में जलाशयों के स्तर के बढ़ने के बाद के सात महीनों में इस क्षेत्र में  822 भूकंपीय झटके आये है. (रिपोर्ट नीचे देखें)

    • चीन के भूगर्भीय अन्वेषण और खनिज संसाधन ब्यूरो के वैज्ञानिक कहते हैं कि बांध का निर्माण शुरू होने के नौ वर्ष बाद लगभग 700 मिलियन क्यूबिक फीट की चट्टान क्विंगगन नदी (जहाँ से तीन किलोमीटर दूरी पर यांग्से नदी बहती है) में फिसल गई और 65 फुट की लहरें उठी जिसमे 14 लोगों की जान गयी.(रिपोर्ट नीचे देखें).
    क्विंगगन नदी पर हो रहे लगातार भूस्खलन को यहाँ देखा जा सकता है
    • मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी और चीनी एकेडमी ऑफ साइंसेज के प्रोफेसर कहते हैं कि थ्री  गोर्गेस बांध ने 400 से अधिक प्रजातियों को नुक्सान पहुँचाया है, तथा मौसमी पैटर्न में बदलाव हुआ है. चीनी के डव वृक्ष और डौन रेडवुड सहित कम से कम 57 पौधों की प्रजातियां खतरे में पड़ गई है. (रिपोर्ट नीचे देखें).
    चीन की डव वृक्ष और डौन रेडवुड प्रजाति थ्री गोर्गेस बाँध की वजह से खतरे में हैं
    • चीन के वुहान विश्वविद्यालय के अनुसार बांध के नीचे बाढ़ कम हो जाती है और यांग्से नदी के पानी का स्तर भी कम हो गया है, जिससे मछलियों का जीवित रहना मुश्किल हो गया है. इस परियोजना के कारण दुर्लभ “बाजी डॉल्फिन” की संख्या में गिरावट आई है.(रिपोर्ट नीचे देखें).
    थ्री गोर्गेस बाँध की वजह से बाजी डॉलफिन में गिरावट हुई है.
    • चाइना डेली (चीन की सबसे बड़ी अंग्रेजी भाषा का अख़बार) ने बताया कि यांग्त्ज़ी नदी 142 वर्षों में अपने निम्नतम जलस्तर तक पहुंच गयी है. यांग्त्ज़ी नदी जल संसाधन आयोग के एक अधिकारी ने स्वीकार किया कि बांध ने नदी की प्रवाह मात्रा को 50 प्रतिशत कम कर दिया है.(रिपोर्ट नीचे देखें).

    थ्री गॉर्गेस जैसे बड़े बांधों ने देश को बिजली और सिंचाई प्रदान की है, लेकिन यदि हम इन नकारात्मक प्रभावों पर विचार करें तो अल्प अवधि में प्राप्त लाभ की तुलना में दीर्घ अवधि में  हानिकारक प्रभाव अधिक हो सकते हैं.

    चीनी अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

    चाइना एकेडमी ऑफ एनवायरनमेंटल प्लानिंग के एक हालिया अध्ययन में कहा गया है  कि “2012 में वनों, वेटलैंड्स और घास के मैदानों द्वारा पर्यावरणीय क्षति में चीन की जीडीपी 3.5 प्रतिशत कम हो गयी है.’’ थ्री गोर्गेस बाँध को आर्थिक विकास के लिए बनाया गया था, लेकिन अब दिख रहा है कि यह बाँध आर्थिक विकास की दृष्टि से हानिकारक हो सकता है. इसी प्रकार चीन ने हर तरफ पर्यावरण की अनदेखी की है.

    विश्व बैंक नें कहा है कि “चीन में प्रदूषण की समस्या अर्थव्यवस्था को गिरा रही है और यह चीन और दुनिया के लिए खतरनाक जहर बना हुआ है. चीन यदि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है, तो भविष्य में स्वास्थ्य और समृद्धि को सुरक्षित करने में वह असमर्थ होगा.” (सम्बंधित रिपोर्ट नीचे देखें)

    अमरीका के हवाई राज्य स्थिति पूर्व-पश्चिम केंद्र के अनुसार  "वर्ष 1992 में चीन के पर्यावरणीय प्रदूषण का आर्थिक बोझ, सकल घरेलू उत्पाद के 15 प्रतिशत के बराबर हो सकती है" (सम्बंधित रिपोर्ट नीचे देखें).

    चीन का अनुसरण

    इन अध्ययनों से पता लगता है कि चीन के थ्री गोर्गेस जैसे बड़े बांधों द्वारा यद्यपि तात्काल बिजली तथा सिंचाई जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराई गई हैं लेकिन यह टिकाऊ नहीं है. दीर्धकाल में होने वाले दुष्प्रभावों को यदि संज्ञान में लिया जाय तो यह प्रोजेक्ट नुकसानदेह भी हो सकते हैं. अतः भारत सरकार को चाहिए कि चीन का अन्धानुकरण करने के स्थान पर पंचेश्वर, भाखड़ा नांगल और टिहरी जैसे बड़े बांधों का गंभीर अध्ययन कराये और इनके दुष्प्रभावों की गणना करें, उनका आर्थिक मूल्यांकन करें, तत्पश्चात कोई निर्णय ले कि इस प्रकार के बड़े बाँध बनने चाहिए या नहीं.

    टिहरी बाँध में भी थ्री गोर्गेस बाँध की ही तरह विनाशकारी प्रभाव दीखते हैं
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    सम्बंधित रिपोर्ट:

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    गंगा एक्ट केन्द्रीय मंत्रालय में उमा भारती जी के सामने रखा गया

    प्रधानमंत्री का पद ग्रहण करने के शीघ्र बाद श्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि गंगा से हमें कुछ लेना नहीं है, सिर्फ देना ही देना है. इस मनतव्य  को पूरा करने के लिए आपके द्वारा श्री गिरिधर मालवीय की अध्यक्षता में एक कमिटी बनायीं गयी जिसका कार्य गंगाजी के लिए एक कानून का प्रारूप तैयार करना था. श्री गिरिधर मालवीय, मदन मोहन मालवीय के पुत्र एवं इलाहबाद हाई कोर्ट के पूर्व जज रहें हैं. श्री गिरिधर मालवीय द्वारा गंगा कानून का प्रारूप सरकार को अप्रैल 2017 में सोंप दिया गया है. इस पोस्ट में हमने गंगा कानून के प्रारूप की चर्चा श्री सानंद स्वामी जी (पूर्व प्रोफेसर, इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट, कानपुर) के साथ की और उस चर्चा के आधार पर इस कानून के मुख्य बिंदु पाठक के सामने रखना चाहते हैं. (गंगा एक्ट को विस्तार से नीचे देखें).

    सानंद स्वामी जी गंगा के विषय में चिंतित

    गंगा कानून का सबसे अच्छा पक्ष (Chapter 1, section 3) यह है कि गंगा को राष्ट्रीय नदी का दर्जा उसी प्रकार मिल जायेगा जिस प्रकार “जन गण मन” को राष्ट्रीय गान, “मोर” को राष्ट्रीय पक्षी और “तिरंगे” को राष्ट्रीय झंडे का पद मिला हुआ है.

    वर्ष 2008 में गंगा को भी राष्ट्रीय नदी का दर्जा दिया गया

    गंगा कानून में यह स्पष्ट किया गया है कि उत्तराखंड में गंगा के पंचप्रयागों पर मिलने वाली सभी धाराओं को गंगा की परिभाषा में शामिल किया गया है. इन धाराओं की मूल धारा अलकनंदा है. विष्णुप्रयाग पर धौली गंगा, नंदप्रयाग पर नंदाकिनी, कर्णप्रयाग पर पिंडर, रुद्रप्रयाग पर मंदाकिनी और देवप्रयाग पर भागीरथी, अलकनंदा में मिलती हैं. भागीरथी के देवप्रयाग में मिलने के बाद इस नदी को गंगा के नाम से जाना जाता है. अब तक गंगा पर मुख्यतः भागीरथी के श्रोत गौमुख से गंगासागर को शामिल किया जाता था. अब इसमें इन सभी धाराओं को शामिल किया गया है. (chapter 1, section 4t) यह कानून का सार्थक पक्ष है. फिर भी इसमें सरकार को विचार करना चाहिए कि सोम, दामोदर, महानंदा और चम्बल जैसी नदियाँ जो गंगा में अधिक मात्रा में पानी लाकर डालती हैं उन्हें भी गंगा की परिभाषा में शामिल किया जा सकता था.

    गंगा कानून में सुझाव दिया गया है कि गंगा के प्रवाह की निरंतरता बनायीं रखी जाएगी. साथ ही कानून में जल विद्युत परियोजनाएं तथा सिंचाई के लिए बनाये गये बैराजों को स्वीकार किया गया है.(Chapter 4, section 7.7) अतः कानून के अनुसार निरंतरता का अर्थ हुआ कि गंगा के प्रवाह में अवरोध बना दिए जायें. लेकिन अवरोध से कुछ पानी निरंतर छोड़ा जाये. जैसे बाल्टी में एक तरफ से पानी भरा जाये तथा और दूसरी तरफ से निरंतर छोड़ा जाये, तो वह निरंतर प्रवाह माना गया है. हमारी दृष्टि में यह पर्याप्त नहीं है. गंगा के पानी की गुणवत्ता बनाने में गंगा की मिट्टी तथा गंगा में पलने वाली मछलियों का विशेष योगदान है. उत्तराखंड में महासीर और निचले हिस्से में हिलसा विशेष मछलियाँ हैं. यह मछलियाँ नीचे से पलायन करके ऊपर जाकर अंडे देती हैं और अंडे, छोटे बच्चों में ऊपर बड़े होते हैं. और फिर ये छोटी मछलियां पानी के साथ नीचे आकर बड़ी होती हैं. इन मछलियों के जीवन चक्र में ऊपर जाना और नीचे आना एक अहम हिस्सा है. सिंचाई के बैराजों और जल विद्युत परियोजनाओं से यह आवाजाही बाधित हो जाती है जिससे मछलियों की हानि होती है. जैसे महासीर मछली पूर्व में 100 किलो तक पाई जाती थी अब यह लगभग 1 किलो की रह गयी है.

    गंगा नदी में विलुप्ति की कगार पर हैं महसीर और हिलसा मछलियां

    इसी प्रकार टिहरी जैसे बांधो के पीछे पानी रुकने से पानी सड़ने लगता है. उसमें कार्बन मोनो ऑक्साइड और मिथेन जैसी जहरीली गैसें बन रही हैं. अतः गंगा को पुनर्जीवित करने के लिए जरूरी था कि इन परियोजनाओं के डिजाईन में परिवर्तन किया जाता जिससे की गंगा की मूल धारा बिना किसी बाधा के बहती रहती. लेकिन गंगा कानून में इस पक्ष पर विचार नही किया गया है.

    कानून में व्यवस्था है कि गंगा के पानी की गुणवत्ता को सुनिचित किया जायेगा. (chapter 4, section 8) लेकिन गुणवत्ता के मापदंड मुख्यतः केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा पीने के पानी के मापदंड के अनुरूप माने जाते हैं जिनमें ऑक्सीजन, धुंधलापन इत्यादि देखा जाता है. नदी के पानी के ये गुण हमारे देश की तमाम नदियों में पाए जाते हैं. इनसे गंगा की विशेषता साबित नहीं होती है. गंगा की विशेषता के दो अध्ययन किये गए हैं. नेशनल इन्वायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टिट्यूट नागपुर ने पाया कि गंगा में अच्छे बेक्टीरिया (coliphage) होते हैं जो कि नुकसानदेह बेक्टीरिया (coliform) को खा जाते हैं.

    गंगा नदी की शुद्धता का आधार: कालिफ़ाज

    इंस्टिट्यूट ऑफ़ माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी चंडीगढ़, ने पाया गंगा के बेक्टीरिया में रोगबाधक शक्ति होती है. गंगा को पुनर्जीवित करने के लिए जरूरी था कि पानी की इन विशेषताओं के आधार पर गुन्वात्त्ता के मानदंड स्थापित किये जाते और सुनिश्चित किया जाता कि इन बेक्टीरियों का संरक्षण किया जायेगा.

    कानून में व्यवस्था है कि 35 प्रतिशत पानी पर्यावरणीय प्रवाह के रूप में छोड़ा जायेगा.(chapter 4, section 7) हमारा मानना है की गंगा का मूल अस्तित्व अध्यात्मिक और सामाजिक है. अतः अध्यात्म और समाज की दृष्टि से कम से कम 51 प्रतिशत पानी छोड़ा जाना चाहिए और 49 प्रतिशत पानी का उपयोग सिंचाई अथवा जल विद्युत परियोजनाओ के लिए किया जाना चाहिए.

    पर्यावारानिय प्रवाह हेतु नदी का इस प्रकार से विभाजन कर के भी जल निकाला जा सकता है

    गंगा कानून में व्यवस्था है कि कानून के अंतर्गत बनायीं गयी नियंत्रक काउंसिल में 5 विशेषज्ञों को समाहित किया जायेगा.(schedule 1, section 11) लेकिन इन विशेषज्ञों की पृष्ठ भूमि पर चर्चा नहीं की गयी है. जरूरी है कि उन 5 विशेषज्ञों को ही इसमें सदस्य बनाया जाये जो गंगा के प्रति समर्पित हैं.

    यह सरकार की अच्छी पहल है कि गंगा के लिए एक अलग कानून बनाने के लिए मालवीय जी की कमिटी स्थापित की गयी. लेकिन दुर्भाग्य है कि अप्रैल 2017 में इस कमिटी की रिपोर्ट दी जाने के एक साल बाद भी इसमें कानून बनाने के लिए सरकार ने कोई कदम नहीं उठाये हैं. (गंगा एक्ट पर सानंद स्वामी जी के तथ्यों को विस्तार से नीचे देखें)

    ऊपर बताई गयी कमियों के बावजूद हम इस बात का स्वागत करते हैं कि गंगा के लिए एक अलग कानून बनाने की मोदी सरकार ने पहल की है.

     

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    सम्बंधित रिपोर्ट:

  • मुंबई के मरीन ड्राइव पर सी-प्लेन की तयारियों का जायजा लेते हुए नितिन गडकरी

    परिवहन एवं जल संसाधन मंत्री श्री नितिन गडकरी ने घोषणा की है कि आने वाले समय में भारत द्वारा दस हज़ार सी-प्लेन  खरीदे जाएंगे. उन्होंने यह भी कहा है कि वाराणसी की अपनी अगली यात्रा में वे गंगा पर सी-प्लेन  से उतारेंगे. पर्यटन को बढ़ावा देने की दृष्टि से बीजेपी सरकार द्वारा लिया गया यह कदम सराहनीय है. वहीँ गुजरात चुनावों के समय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा  अहमदाबाद की साबरमती नदी पर सी-प्लेन  की यात्रा को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी नें कहा था कि सी-प्लेन  को बढ़ावा दिया जाना सिर्फ देश की जनता का ध्यान चुनावी मुद्दों से भटकना है.

    आइये सी-प्लेन के विषय में विस्तृत जानकारी लें.

    सी-प्लेन| हवाई विमान| असफल| दुर्घटनाएं

    द्वितीय विश्व युद्ध से पहले विश्व के देशों में सी-प्लेन का अत्यधिक प्रयोग होता था किन्तु द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भूमि से उड़ने वाले हवाई विमानों का उपयोग बड़े पैमाने में किया जा रहा है. सी-प्लेन का प्रचलन कम होने के कारण हम नीचे देख सकते हैं:

    • सुरक्षित लेंडिंग के लिए सी-प्लेन को शांत जलीय सतह की आवश्यकता होती है. समुद्र या नदी में अक्सर लहरें उठती रहती हैं. पानी में लहरों की वजह से सी-प्लेन  की लेंडिंग असुरक्षित हो जाती है. नीचे दिए गए चित्र में हम देख सकते हैं शांत जल होने की स्थिति में ही सी-प्लेन  सुरक्षित लेंडिंग कर सकते हैं.
    सी-प्लेन को सुरक्षित लेंडिंग के लिए शांत जलीय सतह की जरुरत होती है
    • तेज हवाओं का चलना स्वाभाविक प्रक्रिया है. ये तेज़ हवाएं सी-प्लेन  का संतुलन बिगाड़ने में समर्थ होती हैं. अतः सी-प्लेन  की अकसर दुर्घटनाएं हवाओं द्वारा इनका संतुलन बिगड़ने से होती हैं.
    समुद्री हवाओं से सी-प्लेन का संतुलन बिगड़ जाता है जिससे दुर्घटनाएं होती हैं
    • भूमि से उड़ने वाले हवाई विमान जमीन पर पहियों द्वारा चलते हैं जबकि सी-प्लेन  को पानी में चलने के लिए पोंटून होते हैं. पोंटून और जलीय सतह के बीच अधिक घर्षण होता है जबकि पहियों और भूमि के बीच कम घर्षण होता है. अतः भारी अधिक घर्षण की वजह से सी-प्लेन  को चलने के लिए ज्यादा शक्ति की आवश्यकता होती है नतीजतन सी-प्लेन  द्वारा अधिक उर्जा की खपत होती है.
    • भूमि से उड़ने वाले हवाई विमानों की तुलना में सी-प्लेन  अधिक भारी होते हैं क्योंकि इनमे पोंटून का अतिरिक्त वजन भी होता है. संयुक्त राज्य अमेरिका के नेवल सर्फेस सेंटर कार्डरॉक डिवीजन (NSCCD) द्वारा इन दोनों प्रकार के विमानों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि हवाई विमान द्वारा ले जाये गए भार और विमान के भार का अनुपात 0.25 है जबकि सी-प्लेन  में यह अनुपात 0.1 है. यह दर्शाता है कि सी प्लेन की तुलना में हवाई विमान की भार उठाने की क्षमता 2.5 गुना अधिक है. इस अनुपात को हम निम्न ग्राफ के माध्यम से देख सकते हैं जहाँ नीले बिन्दुओं के माध्यम से सी-प्लेन  और हरे बिन्दुओं के माध्यम से हवाई विमान को दिखाया गया है.

    • सी-प्लेन  का वजन अधिक होता है इसलिए वे 5000 फीट से नीचे उड़ते ही  हैं. अतः वे धरती की सतह पर चलने वाली हवाओं का निरंतर सामना करते रहते है जो कि यात्रा को कठिन बनाती है.
    • सी-प्लेन  को अधिक रखरखाव की आवश्यकता होती है क्योंकि वे लगातार पानी के संपर्क में रहते हैं. सी-प्लेन  के इंजन में जंक लगने का खतरा लगातार बना रहता है. हर उड़ान के बाद सी-प्लेन  के इंजन का रखरखाव करना पड़ता है और जल्दी खराबी आने की वजह से बदलना पड़ता है.
    अधिकतर पानी में रहने की वजह से सी-प्लेन के इंजनो में जल्दी जंक लग जाता है
    इन कारणों से द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया में कुछ विशेष जगहों को छोड़कर सी-प्लेन  का उपयोग लगभग बंद हो चुका है.

    सी-प्लेन  का वास्तविक उपयोग

    सी-प्लेन  का इस्तेमाल आज केवल उन ही चुनिंदा जगहों पर किया जा रहा है जहाँ यातायात के बहुत सीमित साधन हैं या फिर केवल पानी से ही यात्रा संभव है.

    • उदाहरण के लिए मालदीव में माले द्वीप से दूसरे द्वीप तक एक यात्रा सीपलेन द्वारा आसानी से की जाती है क्योंकि इन द्वीपों के पास पानी मौजूद होता है और हर द्वीप में एयरपोर्ट बनाना संभव नहीं है.
    • अगर किसी दूरस्थ घने जंगल में उतरना है जहां पानी मौजूद है तो सी-प्लेन  एक अच्छा साधन है क्योंकि इन क्षेत्रों में हवाई अड्डे को बनाना संभव नहीं है.
    दूरस्थ क्षेत्रों और घने जंगलों में सुरक्षित लेंडिंग के लिए सी-प्लेन मददगार होते हैं
    • सी-प्लेन  बचाव मिशन के लिए उपयोगी हैं. यदि एक जहाज डूबता है और यात्रियों समुद्र पर तैर रहे हैं तो सी-प्लेन  से उनके पास जाना और उन्हें बचाना आसान हो जाता है.
    समुद्र में बचाव मिशन के लिए सी-प्लेन बहुत मददगार होते हैं
    • सी-प्लेन का उपयोग समुद्री कानून को लागू करने के लिए किया जाता है. जैसे अवैध प्रवासियों या अवैध मछुआरों को गिरफ्तार करने के लिए सी-प्लेन  एक अच्छा विकल्प है क्योंकि अवैध लोगों तक जल्दी पहुंच सकता है और पानी में भी उतरा जा सकता है.

    उपरोक्त उदाहरणों से जा सकता है कि सी-प्लेन का उपयोग वशेष एवं आकस्मिक परिस्थिति में लाभकारी है किन्तु इनका प्रयोग यात्रा करने और पर्यटन को बढ़ावा देने में असफल है.

    इस परिस्थिति में, श्री नितिन गडकरी का प्रस्ताव पूरी तरह से असफल है. मुंबई के कुछ हिस्सों को सी-प्लेन से जोड़ना सफल नहीं होगा क्योंकि मुंबई में हेलीकॉप्टर, रेल या सड़क मार्ग से यात्रा की जा सकती है. इसी प्रकार सी-प्लेन  द्वारा गंगा पर वाराणसी में उतरने का विचार भी बेकार है क्योंकि वाराणसी में हवाई अड्डा उपलब्ध है और यातायात के भी भरपूर साधन उपलब्ध हैं. भारत में सी-प्लेन  चलाने का उद्देश्य केवल दिखावा है. वास्तव में सरकार लोगों को जोखिम और उच्च लागत में धकेल रही है.