Flood Control

बाढ़-नियंत्रण

  • केदारनाथ आपदा को आये चार साल बीत चुके हैं.लेकिन पहाड़ों का गुस्सा आज भी कम नहीं हुआ है क्योंकि सरकार ने ऐसी दुर्घटनाओ को दूर करने के लिए ठोस नीति नहीं बनाई है.भारत मौसम विभाग ने दावा किया था

  • शिपिंग को सक्षम बनाने के लिए अमेरिका में 1930 के दशक में मिसिसिपी नदी पर बैराज की एक श्रृंखला बनायीं गयी है हालांकि, उस परियोजना के कई नकारात्मक प्रभाव देखने को मिले हैं और अब यहां तक कहा जा रहा है कि "नदी को अपनी तरह से बहने दिया जाना चाहिए".

    मिसिसिपी नदी पर बराज
  • टिहरी झील (फोटो साभार: विमल भाई)

    गंगा नदी की गुणवत्ता को बांधों का निर्माण ऋषिकेश, हरिद्वार, प्रयाग, काशी और गंगा सागर तक प्रभावित कर रहा है। सच है कि बांधों के निर्माण से बिजली की उपलब्धता बढ़ने से लाभ होगा। पर सवाल यह है कि क्या ये बांध नदी के पानी के मनोवैज्ञानिक गुणों की गिरावट का कारण बनती हैं। 

  • Post By: Shripad Dharmadhikari & Jinda Sandbhor
    राष्ट्रीय जलमार्ग को दर्शाता नक्शा (वाराणसी) फोटो साभार: जिंदा सिंधभोर

    उत्तर प्रदेश में वाराणसी जलमार्ग का केंद्र बनने जा रहा है क्योंकि यहाँ चार नदियाँ आपस फैली हुई है. वाराणसी में चार जलमार्गो को भरत सरकार ने राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया है, जो की नुक्सानदेह हैं.

  • टिहरी बांध में डुबने के कारण वीरान हुए खेत (फोटो साभार गंगा टुडे टीम)

    पहाड़ी क्षेत्रों से पलायन हो रहा है क्योंकि मैदानी क्षेत्रों की अपेक्षा पहाड़ी क्षेत्रों में कृषि करना मुश्किल है. जलविद्युत् परियोजनाओं के कारण कई समस्याए पैदा हो रही है जैसे

  • केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना (फोटो साभार: द इंडियन एक्सप्रेस)
    सरकार ने जल आपूर्ति हेतु नदी जोड़ो परियोजना को शुरू किया है परन्तु इससे आम जनजीवन में बहुत से नुक्सान हैं. जब जल आपूर्ति के अन्य विकल्प मौजूद हैं तो नुकसानदेह परियोजना को बढ़ावा क्यों दिया जा रहा है.
  • सिंगोली भटवारी पावर प्रोजेक्ट की आपदा में टूटी बराज (फोटो साभार: गंगाटुडे टीम)

    सिंगोली भटवारी पावर प्रोजेक्ट के अनुबंध को तीन साल बढाए जाने के बजाय इस परियोजना को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए.

  • हाल ही में NGT ने गंगा की सुरक्षा को देखते हुए यह फैसला दिया है कि गंगा के तटों का सीमांकन किया जायेगा. इस फैसले के तहत NGT ने गंगा की सुरक्षा के तहत हर जिले में गंगा के तटों में 200 मीटर के दायरे में कोई भी निर्माण कार्य (पुल, भवन, खनन इत्यादि) नहीं होगा और 500 मीटर के दायरे में कोई भी प्रदुषण नहीं फैलाया जायेगा.

    नदी में बाड़ के दौरान नदी में जलमग्न भवन (फोटो साभार: गंगा टुडे टीम)
  • अमेरिका द्वारा हटाया गया एल्व्हा डैम (फोटो साभार: डांसिंग बेयर, विकिमीडिया)

     

    अमेरिका ने 2016 में नदियों पर बनाये गए 72 परियोजनाओं को हटाया गया है.जबकि 1912 से 2016 तक अमेरिका ने 1384 बांधों को किया है.

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    श्रीनगर गढ़वाल में निर्मित अलकनंदा जलविद्युत परियोजना (फोटो साभार: गंगा टुडे टीम)
    जब हमारे पास श्रीनगर परियोजना का उत्तम विकल्प मौजूद है तो जरुरी नहीं कि डैम बनाकर क्षेत्र को नुक्सान पहुचाया जाए
  • कुछ फसलों की पैदावार के लिए अत्यधिक पानी की आवश्यकता होती है (फोटो साभार: वेमेंकोव, विकिमीडिया)
    जिन फसलों को अत्यधिक पानी की आवश्यकता होती है और उनमे सिंचाई के लिए गंगा के जल से पूर्ति की जाती है तो उन फसलों को तुरंत प्रतिबंधित कर देना चाइये.
  • बाह्य आक्रमण से जलविद्युत परियोजनाओं को खतरा (फोटो साभार: जीवन नेगी, विकिमीडिया)

     जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण से देश को अत्यधिक नुक्सान हैं.

  • rudolph A furtado

    गंगा नदी में खननकार्य (फोटो साभार: रुडोल्फ ए फुर्तादो)

     

    उत्तराखंड हाईकोर्ट ने गंगा के किनारे खनन पर लगी रोक को हटा दी है. नदी में खनन कार्य भी आवश्यक होता है क्यूंकि नदी में गाद निरंतर बहकर आती रहती है.

  • गंगोत्री में स्थित माँ गंगा का मंदिर (फोटो साभार: जीएनयू डॉक्स.विकिमीडिया)

     

    “His Holinesses welcomes the declaration of Government of India to name Holy Ganga as the National River” – By Jagadguru Sri Nischalanandji, Shankaracharya of Goverdhan Mutt,Puri

  • टिहरी झील में मीथेन की मात्रा जांचते नीरी के वैज्ञानिक

    मृत पशुओं, पेड़ों, पौधों और अन्य कार्बनिक पदार्थ नदी के प्रवाह के साथ पनबिजली परियोजनाओं द्वारा बनाये गये जलाशयों में नीचे बैठ कर सड़ने लगते हैं. शुरू में वे पानी में उपलब्ध ऑक्सीजन का इस्तेमाल करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का उत्सर्जन करते हैं. लेकिन जब पानी में ऑक्सीजन समाप्त हो जाती है, तो वे मिथेन (CH4) गैस का उत्सर्जन करते हैं जो कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में अधिक हानिकारक होती है. नागपुर स्थित नेशनल इन्वोर्मेंट इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (NEERI) ने टिहरी जलाशय से उत्सर्जन का अध्ययन किया है. वे कहते हैं कि: "ग्रीनहाउस गैस, अर्थात CO2 और CH4 का उत्सर्जन, जलाशय में जलमग्न वनस्पति के माध्यम से आने वाले आने वाले जैविक पदार्थों के कारण अधिक होने की संभावना है. जलाशय से कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन का उत्सर्जन स्तर क्रमशः 2550 और 24 मिलीग्राम प्रति वर्ग मीटर "प्रति दिन" होता है. (एनईईआरआई रिपोर्ट यहां उपलब्ध है पृष्ठ 5, पैरा 5). यह स्पष्ट है कि टिहरी जलाशय के नीचे स्थित पानी मर चुका है. इसमें ऑक्सीजन नहीं है. बिजली पैदा करने के बाद टिहरी से जो पानी छोड़ा जाता है उसमे ऑक्सीजन नहीं होती है और वह मृत पानी होता है.

    इंटरनेशनल रिवर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ब्राजील में बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं से ग्रीनहाउस गैस का कुल उत्सर्जन 2 किलो कार्बन प्रति किलोवाट बिजली से अधिक है (रिपोर्ट यहां उपलब्ध है - तालिका 1). इसकी तुलना में कोयले से केवल 0.95 किग्रा प्रति किलोवाट बिजली का उत्सर्जन होता है. (संदर्भ के लिए संलग्न रिपोर्ट - पृष्ठ 8) है। इसलिए, थर्मल प्लांटों की तुलना में बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं कार्बन उत्सर्जन में और अधिक बढ़ जाती हैं.

    सरकार गंगा की सहायक नदियों पर लखवार, व्यासी और पंचेश्वर जैसे बड़े बांधों का निर्माण कर रही है. इन परियोजनाओं से मरा हुआ पानी छोड़ा जायेगा तो गंगा साफ़ कैसे होगी?

     

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  • नमामि गंगे अभियान क्या है?

    गंगा नदी के पुनरुद्धार और कायाकल्प के लिए भारत सरकार द्वारा अक्टूबर 2016 में नमामि गांगे मिशन शुरू किया गया है. मिशन के अंतर्गत गंगा की सतह पर साफ सफाई, क्रीमेटोरिया आधुनिकीकरण, घाट की मरम्मत, ग्रामीण स्वच्छता, नगर मल-जल प्रबंधन और वनीकरण पर ध्यान केंद्रित किया है. (यहां देखें)

  • लेखक - मयूख डे

    हूगली नदी में यातायात देखा जा सकता है (फोटो साभार: मयुख डे)

    गंगा के मैदानी क्षेत्र में एक अनोखा प्राणी डॉलफिन बसा हुआ है. डॉल्फिन देख नहीं सकता है. यह पशु ध्वनियों पर आधारित रहता है और आवाज़ सुन कर अपने शिकार को पकड़ता है. कलकत्ता में डॉलफिन देखने के बाद मैं आश्चर्यचकित था किशहर के भीतर मैंने कभी नदी में रहने वाले जानवरों के इस अवशेष की कल्पना नहीं की थी. सीवेज, प्लास्टिक, तेल और रसायनों के वाहक होने के अलावा, हूगली नदी, पूरे देश में सबसे व्यस्त जलमार्गों में से एक है. एक मोटरबोट, जिसकी क्षमता 100 लोगों की होती है, प्रत्येक 10 मिनट के अंतराल में एक घाट से दूसरे घाट के बीच में चक्कर लगातीरहती है. इसके अलावा, भरी कंटेनर और कोयला ले जाने वाले जहाजों द्वारा धुंआ भी पूरी नदी में फ़ैल जाता है.

    हुगली नदी में भारी वाहक ट्रैफिक (फोटो साभार: मयुख डे)

    हूगली नदी में भरी वाहक ट्रेफिक होने की वजह से पानी के नीचे बहुत ज्यादा शोर होता है. चूँकि डॉलफिन ध्वनि पर निर्भर हैं, इसलिए हूगली नदी में शोर उन्हें निश्चित रूप से प्रभावित करता है. कलकत्ता में हूगली नदी के विपरीत, बिहार में गंगा नदी है, जहाँ झींगा मछलियों और डॉलफिन की आवाजें, पूरे पानी को स्तंभ से भर देती हैं. वहीँ एक मोटरबोट इन जानवरों की आवाज सुनने और अपनी जीविका चलाने की क्षमता को क्षीर्ण कर देती है. बगेर सही अध्ययन के यह पता नहीं चल पायेगा कि, हमारी नदियों में आवाज का प्रदूषण गंगा नदी में डॉलफिन को कैसे प्रभावित कर रहा है. उदाहरण के लिए चीन की यांगत्जी नदी को लिया जा सकता है, जो कि एक बार डॉलफिन का घर था. नदी में बढ़ता शोर, डॉलफिन के विलुप्त होने के कारणों में से एक माना जा सकता है. कहीं ऐसा न हो जाये कि जिस प्रकार चीनी नदी से डॉलफिन विलुप्त हो गयी हैं उसी प्रकार हमारी गंगा से भी डॉलफिन विलुप्त न हो जाएँ.

    गंगा के बाढ़ के मैदानों के एक अप्रयुक्त अनुभाग की एक हवाई छवि (फोटो साभार: मयूख डे)

    वास्तविकता यह है कि डॉलफिन गंगा नदी में बने अंतर्देशीय जलमार्गों के अत्याचारों को झेल रही हैं. और यह अंतर्देशीय जलमार्ग डॉलफिन के विनाश का संकेत है. सही है कि कलकत्ता में आज शोर तथा मोबिल ऑइल के बीच डॉलफिन पायी जा रही हैं. परन्तु भागलपुर की तुलना में यह बहुत कमजोर हैं. इस प्रकार के जलमार्गों के निरंतर निर्माण से इस सुन्दर जीव का मिलना, और भी मुश्किल होता जा रहा है. मयूख डे द्वारा लिखित सम्पूर्ण कहानी यहाँ पढ़ सखते हैं...


    मयुख डे: मयुख डे, बैंगलोर के नेशनल सेंटर ऑफ बायोलॉजिकल साइंसेज में वर्तमान एमएससी वाइल्डलाइफ बायोलॉजी और कंजर्वेशन कोहोर्ट कार्यरत है. पहले मगरमच्छ, मछलियों और गंगा नदी डॉल्फिन से जुड़ी परियोजनाओं पर काम करने के बाद, उनका संबद्ध पिछले तीन सालों से ताजे पानी की प्रणालियों से रहा है। यहां, वह डॉल्फिन नदी के लिए अपनी चिंताओं के बारे में लिखते हैं जो भारत के शोरगुल वाले यातायात जलमार्ग में रहता है. 

     

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  •     कुछ विद्वानों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण भविष्य में वर्षा का वितरण कम होगा. उस समय बांधों में रोका गया पानी सिंचाई के लिए प्रयोग होगा अतः बड़े बांधों का बनना अनुपयोगी क्यों है?

    महानदी पर स्थित भाकड़ा नागल बाँध में वर्षा जल संरक्षण

    ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव

        दरअसल ग्लोबल वार्मिंग के कारण धरती का तापमानबढ़ेगा और वर्षा अधिक होगी. अरब सागर का तापमान बढ़ने से वाष्पीकरण अधिक होगा और भारत में पानी अधिक बरसेगा. अनुमान है कि 5 से 10 प्रतिशत अधिक पानी की वर्षा हो सकती है. लेकिन जो वर्षा वर्तमान में चार महीने फैल कर होती है, वह ग्लोबल वार्मिंग के साथ-साथ कम दिनों में होगी जबकि पानी की मात्रा उतनी ही रहेगी. वर्षा कम दिनों में होने के साथ अधिक तेजी से गिरेगी. नीचे चित्र में वर्षा की 30 साल और 10 साल के वितरण को दर्शाया गया है (WWF की रिपोर्ट यहाँ मौजूद है). नीचे दिये ग्राफ में देखा जा सकता है कि 30 साल की औसत वर्षा में पानी चार महीनों में फैल कर बरसता था वह 10 साल में संकुचित हो गया है. जो इस बात का प्रमाण है की वर्षा कम दिनों में हो रही है.

        वर्षा के संकुचित होने का मतलब यह है कि पानी जब बरसेगा तो अत्यधिक तेजी से बरसेगा और जल्द ही नदियों के रास्ते समुद्र को चला जायेगा. अगर पानी धीरे-धीरे बरसता है तो वह भूमि में ज्यादा रिसता है और भूजल का पुनर्भरण होता है. पानी ज्यादा तेज़ी से बरस कर जल्द समुद्र में बह जाने के कारण पानी भूमि में कम रिसेगा और सिंचाई के लिए पानी कम मिलेगा. वर्तमान में भूमिगत जल का स्तर गिर रहा है. भविष्य में यह और तेजी से गिरेगा चूँकि रिसाव कम होगा. फलस्वरूप सिंचाई भी कम हो पायेगी. हमारे खाद्यानों के उत्पादन में भारी गिरावट आयेगी. प्रश्न यह है कि ग्लोबल वार्मिंग के इस विशाल परिवर्तन का हल टिहरी और भाकड़ा जैसे बड़े बांधों द्वारा निकल सकता है अथवा अन्य विकल्पों से ? हमें यह देखना होगा कि कम समय में अधिक बरसे पानी को बड़े बांधों में एकत्रित करके क्या हम अपनी सिंचाई की जरूरतों को पूरी कर सकते हैं?

     

    बड़े बांधो से समस्या

       हमारे आंकलन के अनुसार ऐसा नहीं होगा चूँकि पहली समस्या यह है कि ज्यादा वर्षा हमारे मैदानी इलाकों में होती है, न कि पहाड़ों में.  नीचे दिए गए आंकड़ों से हम उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में वर्षभर की औसत वर्षा को देख सकते हैं:

    उत्तराखंड - 53483 m2 (क्षेत्रफल)* 130.86cm (औसत वर्षा प्रति वर्ष)= 69, 98,000 घन मीटर

    उत्तर प्रदेश  - 243286m2 (क्षेत्रफल)* 156.3cm (औसत वर्षा प्रति वर्ष) = 3,80,25,000 घन मीटर

        ज्ञात हो कि जहाँ उत्तराखंड की कुल वर्षा का मात्र 35 लाख घन मीटर पानी का ही संचयन बड़े बांधों में हो सकता है वहीं उत्तर प्रदेश में 380 लाख घन मीटर पानी बरसता है. हम यह मान लें कि 69,98,000 घन मीटर पानी का आधा पानी उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में बने बांधों में संचयन संभव है. अतः वर्षा का आधा ही पानी बड़े बांधों में संचित होगा यानी कुल 34,99,000 घन मीटर पानी का ही संचयन हो पायेगा.

        ध्यान रहे कि बड़े बांधों से हम केवल पहाड़ में बरसे हुए पानी का भण्डारण कर सकते हैं. मैदानी क्षेत्रों में बरसे पानी का भंडारण पहाड़ी क्षेत्रों में बने बांधों में नहीं होता है. इसलिए पहाड़ में बरसे न्यून पानी के भण्डारण से मैदानी क्षेत्रों की ज्यादा जरूरत को पूरा नही किया जा सकता है. हमें मैदानी इलाकों में होने वाली वर्षा के जल को पुनर्भरण के लिए उपयोग करना ही पड़ेगा और वही हमें ग्लोबल वार्मिंग से छुटकारा दिला सकता है.

        दूसरी समस्या यह है कि हम जब पहाड़ी क्षेत्र के बरसात के पानी को बांधों में रोक लेते हैं तो मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ कम आती है. आम धारणा  यह है कि बाढ़ को सीमित करना जनहित का कार्य है. लेकिन इसका विपरीत प्रभाव भी पड़ता है. जब बाढ़ का पानी चारों तरफ फैलता है, तो मैदानी क्षेत्र में भूमिगत जल का पुनर्भरण होता है, जो कि जाड़े और गर्मियों के मौसम में ट्यूबवेल से निकालकर सिंचाई के काम आता है. अतः जब हम टिहरी जैसे बांधों में बरसात के पानी को रोक लेते हैं, तो मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ कम आती है और बाढ़ कम आने से भूमिगत जल का पुनर्भरण कम होता है और सिंचाई कम होती है. इस प्रकार बड़े बांधों द्वारा सिंचाई पर दो विपरीत प्रभाव पड़ते हैं. सकारात्मक प्रभाव यह होता है कि टिहरी जैसे बाँध में हम पानी रोक कर उसे जाड़े और गर्मियों में छोड़ते हैं जिससे मैदानी क्षेत्र में सिंचाई बढती है. दूसरी तरफ नकारात्मक प्रभाव यह है कि बांधों में पानी रोक लेने से पानी कम फैलता है, बाढ़ कम आती है जिससे मैदानी क्षेत्रों में जल का पुनर्भरण कम होता है और सिंचाई कम होती है. इन दोनों विरोधाभासी प्रभावों का अंतिम प्रभाव सकारात्मक नहीं दिखता. अभी तक का अनुभव है कि टिहरी बाँध के बनने के बाद भी मैदानी क्षेत्रों में भूमिगत जल का स्तर तेजी से गिर रहा है, जो यह दिखाता है की टिहरी जैसे बांधों से सिंचाई में जो वृद्धि हुई है, उसकी तुलना में भूमिगत जल के कम पुनर्भरण से सिंचाई में कटौती ज्यादा हुई है .

        बरसाती पानी को धरती में समाहित करना ही होगा  टिहरी डैम पर आश्रित रहना बड़ी भूल होगी . बाढ़ के पानी द्वारा भूजल पुनर्भरण का एक उत्तम उपाय पाइन (pyne) है. pyne व्यवस्था को हम नीचे दिए गए चित्रों से समझ सकते हैं:

    सामान्यतः नदी ऐसे बहती है:

    जब नदी में  पानी बढ़ता है तो उसे विशेष नहरों से बहाकर गाँव के तालाबों में एकत्रित कर लिया जाता है.

     

    जब नदी का पानी घट जाता है तब वह पानी तालाबों में टिका रहता है. इसके दो लाभ हैं एक ओर जल का रिसाव होगा और उससे भूजल पुनर्भरण होगा दूसरे  उस पानी का सिंचाई के लिए प्रयोग किया जा सकता है . ये तालाब हर तरह से उपयोगी हैं.

     

        पहाड़ों में बड़े बाँध बनाने की तीसरी समस्या गाद भरने की है. जैसा कि वैज्ञानिकों का अनुमान है कि टिहरी बाँध 130 से 170 वर्षों में गाद से भर जाएगा. जिसके बाद इस बाँध की वर्षा के जल भण्डारण की क्षमता शून्यप्राय हो जाएगी. जबकि अगले 100 वर्षों में ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव और अधिक गहराएगा. एक तरफ वर्षा के जल भण्डारण की जरुरत बढ़ेगी वहीं  दूसरी तरफ बांधों के जल संचयन की क्षमता घटेगी. अतः बांधों में जल संचयन अल्पकालीन माना जा सकता है. यह दीर्धकालीन हल नहीं होगा.

        हमारा मानना है कि बड़े बाँध असफल होंगे क्योंकि मैदानी क्षेत्रों की तुलना में उनका कैचमेंट कम है तथा समयक्रम में वे गाद से भर जायेंगे. अतः बांधों के माध्यम से ग्लोबल वार्मिंग का हल निकालना हमारी बड़ी भूल साबित होगी . ग्लोबल वार्मिंग का एकमात्र समाधान है की टिहरी जैसे बांधों को हटाकर इसमें संग्रहीत पानी को निर्बाध फैलने दिया जाय और इसके कारण उत्पन्न  हुई बाढ़  को धरती में समाने दिया जाय तथा मैदानी इलाकों में बाढ़ के इस पानी को पाइन जैसे उपायों से भूमिगत जल में रोका जाये. हमें अपने देश कि तालाब संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा.

     

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    बाँध के नीचे से गाद निकालने के लिए इस प्रकार से फ्लशिंग की जाती है (फोटो साभार: गर्ट रिचर)

    टिहरी जैसे बाँध उपयुक्त नहीं

    हमारा मानना है कि टिहरी जैसे बड़े बाँध हमारे लिए अनुपयुक्त हैं क्योंकि ये टिकाऊ नहीं हैं. इनमे मुख्य समस्या यह है कि नदी पानी में अपने साथ गाद भी लेकर आती है और वह गाद बाँध में जमा हो जाती है. जब बाँध गाद से भर जाता है तो उसकी पानी को रोकने की क्षमता समाप्त हो जाती है, जैसे कि बाल्टी को यदि बालू से भर दिया जाय तो उसमे पानी नहीं रखा जा सकता है. दरअसल इस बालू और मिट्टी को ही हम गाद कहते हैं जो नदी के साथ बह कर आती है और यह अत्यधिक उपजाऊ होती है. किसान नदी के इस पानी को अपने खेतों में पूर्णतया फैलने देते हैं, जिससे कि यह गाद पूरी तरह से खेतों में फ़ैल जाए और फसल अच्छी हो सके. बाँध के पीछे गाद भरने की इस समस्या को बाँध निर्माता जानते हैं. इस समस्या के हल के लिए उनके द्वारा बाँध के जड़ पर कुछ गेट बनाये जाते हैं जिसको समय-समय पर खोल कर के पीछे भरी हुई गाद को फ्लश आउट यानी निकाल दिया जाता है.

    समस्या यह है कि इस प्रक्रिया से झील की पूरी गाद नहीं निकलती है. जैसे कि टिहरी झील में लगभग 45 किलोमीटर तक पानी भरा हुआ है जबकि, फ्लशिंग से जो गाद निकलती है वह लगभग एक या डेड किलोमीटर तक की निकलती है, जैसा कि नीचे दिए गए चित्र में दिखाया गया है.

    45 किलोमीटर बाँध की झील में केवल डेड किलोमीटर की दूरी तक यदि गाद निकल जाएगी तो  लगभग 43 किलोमीटर की गाद तो वैसे ही रह जायेगी. अतः धीरे धीरे गाद भरती जायेगी और झील की जल भण्डारण क्षमता ख़त्म हो जाएगी और बाँध लगभग अनुपयोगी हो जाएगा.

    बाँध का अध्ययन

    टिहरी हाइड्रो पावर कारपोरेशन ने इस समस्या के दो अध्ययन कराए हैं. पहला अध्ययन भारत की टोजो विकास इंटरनेशनल द्वारा किया गया है. इस अध्ययन में इस प्रकार विवरण दिया गया है:

    Progressive loss of storage due to sedimentation in different storage zones are assessed as under:

    Dead storage                       0.6% in 3yrs

    Live storage                          0.59% in 3 yrs

    Gross storage                      0.59% in 3 yrs

    बाँध की कुल क्षमता का कुछ हिस्सा ही उपयोग में आता है. नीचे के हिस्से में सतत पानी भरा रहता है जिसे डेड स्टोरेज कहते हैं. ऊपर का हिस्सा जिसमे गर्मियों और जाड़ों में पानी निकाल लिया जाता है और बरसात में पुन: पानी भर जाता है उसे लाइव स्टोरेज कहते हैं. टोजो कम्पनी के अनुसार तीन साल में लगभग 0.6 प्रतिशत लाइव स्टोरेज और डेड स्टोरेज कम हो गया है. यानी कि एक साल में 0.2 प्रतिशत स्टोरेज ख़त्म हो गया है. डेड स्टोरेज के भरने के सस्थ साथ लाइव स्टोरेज का भरना तेजी से होगा. लाइव स्टोरेज ख़त्म होने का अर्थ यह है कि भविष्य में इस क्षेत्र में बाँध की जल ग्रहण करने की क्षमता ख़त्म हो जाएगी. यदि फ्लशिंग से पूरी गाद निकल गयी होती तो लाइव स्टोरेज में इस प्रकार की कमी नहीं आती. टोजो कंपनी नें अपनी रिपोर्ट में कहा है कि टिहरी बाँध का उपयोगी कार्यकाल लगभग 130 वर्ष होगा. (टोजो कंपनी की रिपोर्ट यहाँ देख सकते हैं):'

    "keeping in view the above calculation by methods defined in the CBIP manual on the reservoir, the useful life of the reservoir can be taken safely as 130 years."

    दूसरा अध्ययन IRI  रूड़की के हाईड्रोलिक डिज़ाइनर श्री ए सी पांडे द्वारा कराया गया है. इसके भी परिणाम लगभग वैसे ही हैं. श्री पांडे के अनुसार टिहरी बाँध में डेड स्टोरेज लगभग 170 साल में पूरी तरह भर जाएगा. पानी भंडारण की पूरी क्षमता 465 वर्षों में शून्य हो जाएगी. (श्री पांडे द्वारा किया गया टिहरी बाँध पर विस्तृत सर्वे यहाँ पर देख सकते हैं)

    बाँध के पूरी तरह से भरने के बाद पानी ऊपरी सतह से होते हुए निकल जायेगा जैसा कि हम नीचे दिए गए चित्र में देख सकते हैं.

    अतः दोनों अध्ययनों के अनुसार डेड स्टोरेज यानी कि नीचे का हिस्सा 130 से 170 सालों में भर जाएगा. उसके बाद टिहरी बाँध की जल भंडारण की क्षमता क्रमशः कम होती चली जाएगी. लगभग 200 से 300 वर्षों में टिहरी बाँध पूरी तरह गाद से भर जाएगा और इसमें एक बूँद पानी भी नहीं टिक सकेगा.

    प्रश्न यह है कि जब हम देश में विकास की बात कर रहे हैं तो केवल दो सौ या तीन सौ साल के अल्पकालिक विकास की क्यों? इस अल्पकालिक समय के लिए इन बड़े बांधों का निर्माण रोक देना चाहिए जो कि मनुष्य और प्रकृति को नज़रंदाज़ करते हुए बनाये जा रहे हैं.

     

    इस विषय पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को लिखें.इस विषय पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को लिखें.

  • चीन में भारी संख्या में जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण हुआ है. साथ साथ चीन आर्थिक विकास में हमसे आगे निकल गया है. इसलिए चीन का अनुसरण करते हुए हम भी बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं बना रहे हैं.

    चीन में बना विशाल थ्री गोर्गेस बाँध

    थ्री गोर्गेस बाँध के प्रभाव

    चीन का सबसे बड़ा थ्री गोर्जेस बाँध है जो कि यांग्से नदी के ऊपर बनाया गया है. इस बाँध से वर्ष 2009 में उत्पादन शुरू कर दिया गया था. लेकिन अब इस बाँध के तमाम दुष्प्रभाव सामने आने लगे हैं जो कि निम्न प्रकार हैं:

    • चीनी अकादमी ऑफ इंजीनियरिंग ने रिपोर्ट दी है कि सितंबर 2006 में जलाशयों के स्तर के बढ़ने के बाद के सात महीनों में इस क्षेत्र में  822 भूकंपीय झटके आये है. (रिपोर्ट नीचे देखें)

    • चीन के भूगर्भीय अन्वेषण और खनिज संसाधन ब्यूरो के वैज्ञानिक कहते हैं कि बांध का निर्माण शुरू होने के नौ वर्ष बाद लगभग 700 मिलियन क्यूबिक फीट की चट्टान क्विंगगन नदी (जहाँ से तीन किलोमीटर दूरी पर यांग्से नदी बहती है) में फिसल गई और 65 फुट की लहरें उठी जिसमे 14 लोगों की जान गयी.(रिपोर्ट नीचे देखें).
    क्विंगगन नदी पर हो रहे लगातार भूस्खलन को यहाँ देखा जा सकता है
    • मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी और चीनी एकेडमी ऑफ साइंसेज के प्रोफेसर कहते हैं कि थ्री  गोर्गेस बांध ने 400 से अधिक प्रजातियों को नुक्सान पहुँचाया है, तथा मौसमी पैटर्न में बदलाव हुआ है. चीनी के डव वृक्ष और डौन रेडवुड सहित कम से कम 57 पौधों की प्रजातियां खतरे में पड़ गई है. (रिपोर्ट नीचे देखें).
    चीन की डव वृक्ष और डौन रेडवुड प्रजाति थ्री गोर्गेस बाँध की वजह से खतरे में हैं
    • चीन के वुहान विश्वविद्यालय के अनुसार बांध के नीचे बाढ़ कम हो जाती है और यांग्से नदी के पानी का स्तर भी कम हो गया है, जिससे मछलियों का जीवित रहना मुश्किल हो गया है. इस परियोजना के कारण दुर्लभ “बाजी डॉल्फिन” की संख्या में गिरावट आई है.(रिपोर्ट नीचे देखें).
    थ्री गोर्गेस बाँध की वजह से बाजी डॉलफिन में गिरावट हुई है.
    • चाइना डेली (चीन की सबसे बड़ी अंग्रेजी भाषा का अख़बार) ने बताया कि यांग्त्ज़ी नदी 142 वर्षों में अपने निम्नतम जलस्तर तक पहुंच गयी है. यांग्त्ज़ी नदी जल संसाधन आयोग के एक अधिकारी ने स्वीकार किया कि बांध ने नदी की प्रवाह मात्रा को 50 प्रतिशत कम कर दिया है.(रिपोर्ट नीचे देखें).

    थ्री गॉर्गेस जैसे बड़े बांधों ने देश को बिजली और सिंचाई प्रदान की है, लेकिन यदि हम इन नकारात्मक प्रभावों पर विचार करें तो अल्प अवधि में प्राप्त लाभ की तुलना में दीर्घ अवधि में  हानिकारक प्रभाव अधिक हो सकते हैं.

    चीनी अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

    चाइना एकेडमी ऑफ एनवायरनमेंटल प्लानिंग के एक हालिया अध्ययन में कहा गया है  कि “2012 में वनों, वेटलैंड्स और घास के मैदानों द्वारा पर्यावरणीय क्षति में चीन की जीडीपी 3.5 प्रतिशत कम हो गयी है.’’ थ्री गोर्गेस बाँध को आर्थिक विकास के लिए बनाया गया था, लेकिन अब दिख रहा है कि यह बाँध आर्थिक विकास की दृष्टि से हानिकारक हो सकता है. इसी प्रकार चीन ने हर तरफ पर्यावरण की अनदेखी की है.

    विश्व बैंक नें कहा है कि “चीन में प्रदूषण की समस्या अर्थव्यवस्था को गिरा रही है और यह चीन और दुनिया के लिए खतरनाक जहर बना हुआ है. चीन यदि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है, तो भविष्य में स्वास्थ्य और समृद्धि को सुरक्षित करने में वह असमर्थ होगा.” (सम्बंधित रिपोर्ट नीचे देखें)

    अमरीका के हवाई राज्य स्थिति पूर्व-पश्चिम केंद्र के अनुसार  "वर्ष 1992 में चीन के पर्यावरणीय प्रदूषण का आर्थिक बोझ, सकल घरेलू उत्पाद के 15 प्रतिशत के बराबर हो सकती है" (सम्बंधित रिपोर्ट नीचे देखें).

    चीन का अनुसरण

    इन अध्ययनों से पता लगता है कि चीन के थ्री गोर्गेस जैसे बड़े बांधों द्वारा यद्यपि तात्काल बिजली तथा सिंचाई जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराई गई हैं लेकिन यह टिकाऊ नहीं है. दीर्धकाल में होने वाले दुष्प्रभावों को यदि संज्ञान में लिया जाय तो यह प्रोजेक्ट नुकसानदेह भी हो सकते हैं. अतः भारत सरकार को चाहिए कि चीन का अन्धानुकरण करने के स्थान पर पंचेश्वर, भाखड़ा नांगल और टिहरी जैसे बड़े बांधों का गंभीर अध्ययन कराये और इनके दुष्प्रभावों की गणना करें, उनका आर्थिक मूल्यांकन करें, तत्पश्चात कोई निर्णय ले कि इस प्रकार के बड़े बाँध बनने चाहिए या नहीं.

    टिहरी बाँध में भी थ्री गोर्गेस बाँध की ही तरह विनाशकारी प्रभाव दीखते हैं
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    सम्बंधित रिपोर्ट: