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हाल ही में NGT ने गंगा की सुरक्षा को देखते हुए यह फैसला दिया है कि गंगा के तटों का सीमांकन किया जायेगा. इस फैसले के तहत NGT ने गंगा की सुरक्षा के तहत हर जिले में गंगा के तटों में 200 मीटर के दायरे में कोई भी निर्माण कार्य (पुल, भवन, खनन इत्यादि) नहीं होगा और 500 मीटर के दायरे में कोई भी प्रदुषण नहीं फैलाया जायेगा.

नदी में बाड़ के दौरान नदी में जलमग्न भवन (फोटो साभार: गंगा टुडे टीम)

हम NGT के इस फैसले का सम्मान करते हैं किन्तु गंगा में पानी के स्तर के बढने के साथ साथ पानी का फैलाव बढता है. अतः गंगा के किनारे को उसके अधिकतम जल स्तर से मापना चाहिए. अगर हम गंगा के वर्तमान किनारे में मात्र 200 मीटर के दायरे तक ही प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित करते हैं तो उन इलाकों में जहाँ बाड़ के समय पानी दूर दूर तक फैलता है वे इस प्रतिबन्ध से बाहर रह जायेंगे.

बाड़ के दौरान नदी के क्रॉस सेक्शन एरिया में फैलाव (फोटो साभार: सुमित राणा)

एनजीटी को इस विषय पर गंभीरता से सोचना चाहिए कि पूर्व वर्षों में बाड़ के फैलाव में जो आंकलन सर्वाधिक किया गया हो वहां तक प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित किया जाना चाहिए, ताकि उस भूमि में भविष्य की बाढ़ में जल फैले तो वह जल भूमि द्वारा सोख लिया जाये और भूजल रिचार्ज के तहत भविष्य में इस जल का उत्तम रूप से प्रयोग किया जा सके.

सत्ता में आने के बाद भारत के प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी में कहा था की “अब हमें गंगा से कुछ लेना नहीं है बल्कि सिर्फ देना है” मोदी जी की इस भावना का स्वागत करते हुए हम उनसे आग्रह करते हैं कि गंगा का सीमांकन का दायरा अधिकतम बाढ़ से लिया जाये ताकि उस क्षेत्र में निर्माण न हो तथा जानमाल का नुकसान कम हो और भूजल रिचार्ज में मदद मिले.


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