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सिंगोली भटवारी पावर प्रोजेक्ट की आपदा में टूटी बराज (फोटो साभार: गंगाटुडे टीम)

सिंगोली भटवारी पावर प्रोजेक्ट के अनुबंध को तीन साल बढाए जाने के बजाय इस परियोजना को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए.

 

सिंगोली भटवारी परियोजना को 2007 में पर्यावरण स्वीकृति दी गयी थी. यह स्वीकृति 10 साल के लिए वैध थी. 31 मई 2017 को इस अवधि को सरकार ने तीन साल तक बढ़ा दिया गया है.

नदी घाटी और जलविद्युत परियोजनाओं के लिए विशेषज्ञ समिति की बैठक 31 मई 2017 को आयोजित की गई थी. कमेटी ने 2003 में आई आपदा को अनदेखा करते हुए इस परियोजना की पर्यावरणीय स्वीकृति को 3 साल के लिए बढाने के लिए संस्तुति दी है. स्पष्ट होता है की पर्यावरण मंत्रालय ने आपदा से आई समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया दिया है. समिति ने स्वीकार किया है किआपदा में हाइड्रो पावर परिजोजना में नुक्सान हुआ है ( 31मई 2017 की रिपोर्ट यहाँ उपलब्ध है - पेज 3 पैरा 5.3) परन्तु इस पर ध्यान नहीं दिया है.

2013 की आपदा में हमने देखा की हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट आपदा को बढ़ावा देता है. हाड्रो पावर प्रोजेक्ट की बराज टूटने से नदी सांप की तरह दोनों किनारों को काटते हुए बही और तांडव किया. यदि यह बराज नहीं होते तो बाढ़ की स्थित पैदा नहीं होती .पानी बिना रुके बह जाता.आप हमारा केदारनाथ आपदा का कारण पोस्ट पढ़ सकते हैं जहाँ हमने इस समस्या को बारीकी से समझाने का प्रयास किया है. (इसके सन्दर्भ में पोस्ट यहाँ देख सकते हैं)

केदारनाथ आपदा पर रवि चोपड़ा (अध्यक्ष विशेषज्ञ बॉडी) के एक अध्ययन के मुताबिक़ ( रिपोर्ट यहाँ संलग्न है ) रिपोर्ट में कहा है की

under a hyper concentrated flow regime, when a river is overwhelmed by its sediment supply, it tends to aggrade in stretches where the velocity drops (wide valley expanses/meanders) and migrate laterally in order to follow a minimum resistance path. Both these processes occur because of bank erosion and flooding. Geomorphic expression of this process is visible in the relatively wiser segment of Mandakini valley below the Singoli-Bhatwari Hydro-electric power project and between Chandrapuri upto Tilwara.”

हमने राज्यसभा में इस मुद्दे के प्रति प्रायोजन दायर किया है (रिपोर्ट यहाँ सलंग्न है), जिसमें राज्य सभा की कमेटी ने सुझाव दिया गया है की जल विद्युत के उत्पादन के लिए एक बाँध बनाने के बजाय पानी को आंशिक ठोकर बनाकर “घराट” की तरफ निकाला जा सकता है ताकि बराज बनने से नदी को नुकसान न हो.

इसलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से हमारा अनुरोध है की इन जल विद्युत परियोजनाओं द्वारा आपदा को बढ़ावा देने के कारण इन्हें रोकने के लिए त्वरित कदम उठायें.

 

आपसे निवेदन है कि पोस्ट पढ़कर नीचे अपना कमेंट/सुझाव आवश्य दें.


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