लेख


केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना (फोटो साभार: द इंडियन एक्सप्रेस)
सरकार ने जल आपूर्ति हेतु नदी जोड़ो परियोजना को शुरू किया है परन्तु इससे आम जनजीवन में बहुत से नुक्सान हैं. जब जल आपूर्ति के अन्य विकल्प मौजूद हैं तो नुकसानदेह परियोजना को बढ़ावा क्यों दिया जा रहा है.

सरकार ने नदी-जोड़ो परियोजना शुरू करने का फैसला लिया है। सूखे क्षेत्रों में पानी की आपूर्ति करने के लिए इस योजना को बनाया गया है.

  नदी जोड़ो परियोजना के दो रूप हैं -

 1. एक राज्य के भीतर दो नदियों को जोड़ना

2. दो राज्यों की नदियों को आपस में जोड़ना

एक राज्य के भीतर, दो नदियों को जोड़ने से निम्न समस्याएं उजागर होती हैं-

  • उन नदियों से भी पानी को स्थानांतरित किया जाएगा जिन नदियों में अक्सर बाढ़ आती है. लेकिन बाढ़ से भी लाभ होते हैं. नदी के वातावरण में बाढ़ का यह लाभ होता है कि पानी के फैलाव से अंडरग्राउंड पानी का पुन: भरण होता है जो कि बाद में सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है. कुछ फसलें ऐसी भी हैं जो केवल बाढ़ के ही पानी में उगती हैं. यदि बाढ़ का पानी दूसरी नदियों में डाल दिया जायेगा तो उन फसलों को उचित पानी नहीं मिलेगा और आखिर में उन फसलों को नुकसान होगा। रिपोर्ट यहां संलग्न है (पेज 24, पैरा 2)
  •  मछलियों आदि निवास, नदी में विभिन्न स्थानों पर अलग-अलग वातावरण में विकसित होते हैं। अगर हम एक नदी का जल दूसरी नदी में डालेंगे, तो वातावरण में फर्क पड़ना स्वाभाविक है, जिसके कारण कई जलीय जीव विस्थापित हो जाएंगे या वे समाप्त हो जाएंगे। यह भी संभव है कि कई प्रजातियां विलुप्त हो जाएँ, जिस प्रकार हिलसा और महसीर मछलियों के सन्दर्भ में फरक्का में हुआ है. ऐसे विस्थापन का प्रभाव अनिश्चित और अज्ञात है। 
  • हमारे पास परंपरागत जल संचयन तकनीकों का सस्ता विकल्प उपलब्ध है. जैसे खेतों में ऊँची मेंड़ बनाना, तालाबों में जलसंग्रह इत्यादि. इन विकल्पों की जगह अगर हम नदी का जल एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित करते हैं तो पानी देने वाले क्षेत्र में पानी की कमी हो जाएगी.
  • केन-बेतवा परियोजना का निर्माण मध्यप्रदेश में हुआ है, जिसमे की वाइल्ड लाइफ सन्चुँरी सहित 6000 हेक्टेयर वन भूमि से अधिक जलमग्न होने की संभावना है। वन सलाहकार समिति का कहना है कि नुकसान की क्षतिपूर्ति करना संभव नहीं है क्योंकि नदी द्वारा डूब क्षेत्र, बाघों के निवास स्थान में आता है जो अद्वितीय है इसके अलावा समिति द्वारा “diversion of unique riverine eco system. " पर ध्यान नहीं दिया है।इस परियोजना की लागत पर रिपोर्ट यहां संलग्न है।

राज्यों की नदियों को जोड़ने से निम्नलिखित समस्याएँ उजागर करती हैं

  • राज्य पहले से नदी के जल वितरण से संतुष्ट नहीं हैं. पंजाब और हरियाणा के बीच सतलज-यमुना के जल के बंटवारे पर विवाद 50 से अधिक वर्षों तक गहरा हुआ है. पंजाब सरकार का कहना है कि राज्य में पानी का स्तर बहुत कम है. यदि हम हरियाणा को पानी देते हैं, तो पंजाब में जल संकट उत्पन्न होगा. जबकि, हरियाणा सरकार सतलज के पानी के ऊपर अपने अधिकार की बात कर रही है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी पंजाब पानी देने से इनकार कर रहा है।
  •  इसी तरह कावेरी जल विवाद में कर्नाटक का कहना है कि कम वर्षा की वजह से कावेरी में पानी का स्तर कम हो गया है और इसी वजह से वे तमिलनाडु को पानी नहीं दे सकते। इसके खिलाफ, तमिलनाडु ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की. तमिलनाडु का कहना है कि वह हर स्थिति में पानी चाहता है, अन्यथा उसके लाखों किसान बर्बाद हो जायेंगे. 

यदि ऐसी समस्याएं राज्यों के बीच पहले से मौजूद हैं, तो यह कैसे संभव होगा कि राज्यों में नदियों को आपस में जोड़ने से पानी की समस्या को समाप्त किया जाएगा।

इसलिए हमारा भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी से अनुरोध है कि “नदी जोड़ो परियोजनाओं” को रोकने का त्वरित निर्णय लिया जाये, जो हमारे पर्यावरण लिए अधिक हानिकारक हैं।

 

 


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