लेख


केदारनाथ आपदा को आये चार साल बीत चुके हैं. लेकिन पहाड़ों का गुस्सा आज भी कम नहीं हुआ है क्योंकि सरकार ने ऐसी दुर्घटनाओ को दूर करने के लिए ठोस नीति नहीं बनाई है. भारत मौसम विभाग ने दावा किया था

की केदारनाथ आपदा की वजह असाधारण भारी बारिस थी. जबकि आंकड़े एक अलग ही कहानी बताते हैं. 17 जून 2013 को केदारनाथ के नजदीकी स्थानों में जो बारिस दर्ज की गई वो इस प्रकार है:

चमोली 76 मिलीमीटर, जोशीमठ 114मिलीमीटर, टिहरी 169 मिलीमीटर, जखोली 108 मिलीमीटर और रुद्रप्रयाग में 92 मिलीमीटर.

इस्की तुलना में उत्तराखंड के अन्य स्थानों में भारी बारिस हुयी जैसे

मुक्तेश्वर में 237 मिली, बाबांस 230 मिली, चम्पावत 222 मिली और उत्तरकाशी 207 मिली.

प्रभावित क्षेत्र में बारिस अन्य गैर प्रभावित इलाकों की तुलना में बहुत कम थी. ऐसी बारिस कई बार उस क्षेत्र में हो चुकी है. वाडिया संसथान, उत्तराखंड सरकार और जल संसाधन मंत्रालय के आपदा प्रबंधन केंद्र की रिपोर्ट में भी यह कहा गया है की भारी बारिस हुयी थी लेकिन बारिस असामान्य नहीं थी. हम यहाँ रिपोर्ट दे रहे हैं आप देख सकते है. (पेज नंबर 3)

ऊपर के क्षेत्र में आपदा का कारण चोरबरी ग्लेशियर का फटना था लेकिन नीचे मंदाकिनी नदी के के किनारे हुयी तबाही का कारण जल विद्युत् परियोजनाए थी. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सरकार ने रवि चोपड़ा कमेटी बनाई थी. इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा: THDC officials informed the EB team during its

field visit that its claim that Rishikesh and Haridwar were saved from catastrophic floods was based on an inundation analysis performed by its hydrologists and engineers. The inundation maps produced by THDC were reviewed and a ground survey was done in some of the areas shown as would be inundated by THDC. A ground survey team People’s Science Institute (PSI), Dehra Doon directed by the EB Chairman noticed a major discrepancy between the stage discharge graph provided by THDC and the record

maintained at the CWC gauging station at Kharkhari in Haridwar. Further, according to the CWC gauging station, the highest flood level (HFL) at Kharkhari in 2013 was about 296 m. THDC’s inundation map for Kharkhari at 295.68 m shows a certain flooded area for this level. Residents of the area when interviewed in the ground survey conducted by the scientists from PSI, said that flood water never reached their area. According to them the flood did not breach the raised highway between their locality and the river. Thus THDC’s inundation analysis results could not be substantiated by the ground survey in Haridwar city. It therefore raises some doubts about the magnitude of flooding that was averted in Hardiwar.

R. Chopra, Chairman, EB”

नीचे क्षेत्र में आपदा का असली कारण यह था की जलविद्युत परियोजनाओ ने मंदाकिनी का रास्ता बंद कर दिया था. भारी बारिस ने पत्थरों और पेड़ों को उखाड़ दिया. बारिस इन पेड़ों और पत्थरों को मंदाकिनी नदी में ले गई. नदी इस मिटटी और पेड़ों को सीधे बहा के ले जाती लेकिन फाटा- व्युंग और सिंगोली भटवारी में जल विद्युत परियोजनाओ ने इस बहाव को रोक दिया. सारा मलवा  बराज में फंस गया और बाँध के पीछे जलाशय जल्दी से भर गया.  इस बराज के ऊपर सीतापुर में पुल के ऊपर पानी भर गया.  केदारनाथ से आने वाले लोग इस पुल के दूसरी तरफ फंस गए. पुल के डूबने के कारण वो मन्दाकिनी को पार नहीं कर पाए.

फाटा- व्युंग में अवरोध के कारण नदी का जल स्तर बढ़ गया और नदी ने यहाँ कटान शुरू कर दिया. आगे लार्सन और टर्बो द्वारा बने गई सिंगोली भटवारी जल विद्युत् परियोजना में नदी ने और अवरोध का सामना किया. आमतौर पर नदी का बहाव सीधा होता है लेकिन नदी बराज के किनारे को काटकर निकली थी इसलिए नदी सांप की तरह चलने लगी. मंदाकिनी नदी ने सामने पहाड़ को ठोकर मारकर काटना शुरू कर दिया. नदी किनारों को काटकर मिटटी और पेड़ों को साथ ले गई जिस कारण नदी में पानी का स्तर बढ़ने लगा. पानी का स्तर बढने से चंद्रापुरी जैसे गाँव पूरी तरह डूब गए.

विष्णुगाड में मंदाकिनी फोटो गंगा टूडे टीम

यह कहानी का अंत नहीं था मंदाकिनी रुद्रप्रयाग में अलकनंदा में शामिल हो गई. फिर दोनों ने एक साथ जीवीके की श्रीनगर जलविद्युत परियोजना द्वारा किये अवरोध का सामना किया. कंपनी ने शुरू में फाटकों को नहीं खोला जिस कारण तालाब जल्दी भर गया. 17 जून 2013 को चार बजे तक यह तालाब चारों तरफ से अपने उच्चतम स्तर पर पहुँच गया था. तब कंपनी ने इस स्तर को कम करने के लिए अचानक फाटक खोले. पानी एक विशाल बहाव के साथ सुनामी की तरह निकल गया. कंपनी ने नदी के किनारे पत्थरों की दीवार और तार जाल जैसे सुरक्षा उपायों के बिना नदी किनारे भारी मात्रा में मिटटी जमा की थी. नदी इस मिट्टी को अपने साथ ले गई जिस कारण एक बार फिर पानी का स्तर बढ़ गया. यह पानी श्रीनगर में कई घरों में घुस गया और यहाँ लोगों को विस्थापित करना पडा. रास्ट्रीय राजमार्ग 58 को भी 2 सप्ताह के लिए बंद करना पडा.

श्रीनगर में अलकनंदा नदी का कहर

विनाश केवल चोरबारी झील के फटने की वजह से नहीं हुआ था. विनाश जल विद्युत् परियोजनाओ द्वारा गंगा के प्रवाह को अवरोध करने के कारण हुआ जो पूर्ण रूप से मानव निर्मित था.

हम मोदी जी से निवेदन करते हैं की जल विद्युत् परियोजनाओ से निर्मित आपदाओं से बचने के लिए इन परियोजनाओ को निरस्त करें.


ट्विट्टर पर जुडें

फेसबुक पर जुडें

गूगल प्लस से जुडें