लेख


वर्तमान में जल विद्युत अर्थात हाइड्रोपावर से उत्पन्न बिजली का मूल्य 7 से 9 रुपया प्रति यूनिट पड़ रहा है जबकि बाजार में उपलब्ध बिजली का दाम 3 से 4 रुपये प्रति यूनिट है. इसलिए मूलतः हाइड्रोपावर अप्रासंगिक हो गयी है. फिर भी सरकार और कम्पनियां इस महंगी बिजली को बनाने को उद्यत हैं. इस पोस्ट में हम मंदाकिनी नदी में निर्माणाधीन सिंगोली भटवाडी हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की आर्थिकी का विश्लेषण करेंगे और जानना चाहेंगे कि ऐसी परियोजनाओं को क्यों बनाया जा रहा है.

वास्तविक में यह प्रोजेक्ट 666 करोड़ रुपये की लागत से बनना था. उस समय इससे उत्पन्न बिजली की लागत 2.66 रुपये प्रति यूनिट होनी थी (यहाँ देखें एनेक्स 1). इसके बाद इस प्रोजेक्ट के विलम्ब से बनने के कारण इसकी पूँजी लागत बढ़कर 1694 करोड़ हो गयी है. तदानुसार उपभोक्ता को  इससे बनी हुई बिजली की लागत आज के दिन लगभग 6.76 रुपये प्रति यूनिट पड़ेगी.

वर्तमान में हमारे देश में बिजली की खरीद बिक्री भाव के लिए इंडिया एनर्जी एक्सचेंज मौजूद है. इस मंडी में बिजली के उत्पादक एवं खरीददार आपस में सौदे करते हैं. इंडिया एनर्जी एक्सचेंज में अप्रेल 2018 से जनवरी 2019 तक सुबह-शाम बनने वाली पीकिंग पावर का औसत मूल्य 3.85 प्रति यूनिट था. अर्थ हुआ कि बाजार में जो बिजली 3.85 रुपये प्रति यूनिट में उपलब्ध है उसी बिजली को सिंगोली भटवाडी प्रोजेक्ट द्वारा 6.76 रुपये में बनाकर उपभोक्ता को सप्लाई किया जायेगा. इस प्रक्रिया में उपभोक्ता पर 2.91 रुपये प्रति यूनिट का अतिरिक्त भार बढेगा.

इस प्रोजेक्ट द्वारा बिजली अगले 40 वर्ष तक बनाई जायेगी. भविष्य में बनाई गयी बिजली के कारण उपभोक्ता पर जो अतिरिक्त भार पड़ेगा उसका आंकलन हम आज के मूल्य में कर सकते हैं. उदाहरण के लिए यदि हम बैंक में एक फिक्स्ड डिपोसिट कराएं जिससे सात साल बाद हमें सौ रुपये मिलना हो तो आज उसके लिए हमें केवल 50 रुपये ही बैंक में जमा कराने होंगे. अथवा सात साल बाद मिलने वाले एक हजार रुपये के वर्तमान की डिसकाउंटटेड कीमत सिर्फ 500 रुपये है. इसी प्रकार अगले चालीस सालों में सिंगोली भटवाडी प्रोजेक्ट द्वारा बनाये जाने वाली बिजली को हम वर्तमान में डिसकाउंट कर सकते हैं (यहाँ देखें एनक्स 2). हमारी गणित के अनुसार अगले 40 वर्षों में बनाई जाने वाली बिजली का जो उपभोक्ता पर अतिरिक्त भार बढेगा, जिसकी वर्तमान में डिसकाउंटटेड कीमत 1175 करोड़ रुपये है. अर्थात इस प्रोजेक्ट के चलने से उपभोक्ता को अनायास ही  1175 करोड़ रूपए अतिरिक्त देने होंगे.

मन्दाकिनी नदी पर निर्माणाधीन सिंगोली भटवाड़ी परियोजना

उत्तराखंड सरकार के साथ हुए समझौते की धारा 11 के अंतर्गत सरकार को अधिकार है कि इस प्रोजेक्ट को खरीद ले. इस परिस्थिति में सरकार को परियोजना में खर्च हुए धन का 75% कार्यदायी कंपनी को देना होगा. जैसा कि ऊपर बताया गया है कि सिंगोली भटवाडी प्रोजेक्ट की वर्तमान लागत 1694 करोड़ रुपये है. इसे खरीदने के लिए सरकार को 75% प्रतिशत यानि 1252 करोड़ रुपये अदा करने करने होंगे (यहाँ देखें एनक्स 3).

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि यदि सरकार आज 1252 करोड़ रूपए खर्च करके इस प्रोजेक्ट को बंद कर दे तो उपभोक्ता को 1175 करोड़ रूपए की बचत होगी. तब यह अतिरिक्त भार नहीं पड़ेगा. ये दोनों रकम लगभग बराबर हैं इसलिए इस प्रोजेक्ट को हटाने से उपभोक्ता को तनिक भी नुक्सान नहीं होगा. ध्यान दें कि इस गणित में हमने जैव विविधता, मछ्ली, जल की गुणवत्ता, भूस्खलन आदि पर्यावरणीय और सामजिक प्रभावों की कीमत का आंकलन नहीं किया है. यदि इनका आंकलन कर लें तो निश्चित रूप से इस प्रोजेक्ट को हटाना ही उत्तम होगा.

जलविद्युत परियोजनाओं से उत्पन्न बिजली के दाम महंगे होते हैं

प्रश्न उठता है कि इस आर्थिकी के बावजूद उत्तराखंड सरकार इस प्रोजेक्ट को जारी रखने के लिए क्यों उद्यत है? कारण यह है कि उत्तराखंड सरकार को इस प्रोजेक्ट से प्रथम 15 वर्ष तक 12% और उसके बाद के 25 वर्ष तक 18% बिजली मुफ्त मिलेगी. भविष्य में मिलने वाली इस बिजली की डिसकाउंटटेड कीमत आज के दिन 235 करोड़ रूपए है (एनक्स 2 यहाँ देखें). यानि यदि यह प्रोजेक्ट चलता है तो उत्तराखंड सरकार को आज 235 करोड़ रूपए मिलेंगे. इस 235 करोड़ रूपए को अर्जित करने के लिए उत्तराखंड सरकार देश के उपभोक्ता पर 1175 करोड़ रूपए का भार आरोपित कर रही है. अतः इस प्रोजेक्ट को बंद करना ही उचित दिखता है.

वास्तव में यही परिस्थिति लगभग सभी निर्माणाधीन जलविद्युत परियोजनाओं और भविष्य में बनने वाली परियोजनाओं की है. अतः सरकार को चाहिए कि वर्तमान में बिजली के न्यून दाम देखते हुए इन सभी निर्माणाधीन परियोजनाओं को बंद करने पर विचार करे. सभी नदियों को इनसे मुक्त करें. बताते चलें कि बाजार में इसी बिजली के दाम न्यून होने का मूल कारण सोलर पावर के दाम में गिरावट है. आज नयी तकनीकों के विकास से सौर ऊर्जा का उत्पादन सस्ता हो गया है जिसके कारण बाजार में बिजली का दाम कम है और जलविद्युत द्वारा उत्पन्न बिजली अप्रासंगिक हो गयी है.      


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