लेख


बदरीनाथ धाम से निकलने वाली गंगा की सहायक नदी अलकनंदा पर बांधों से संकट

गंगा नदी में मछलियों के ऊपर की तरफ पलायन, गाद का नीचे की तरफ बहाव और नदी की सुन्दरता के लिए गंगा का निर्बाध प्रवाह अत्यंत आवश्यक है. तब ही गंगा द्वारा गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ धामों से लायी गयी आध्यात्मिक शक्तियों को जलविद्युत परियोजनाओं की टरबाइनों द्वारा नष्ट होने से बचाया जा सकता है.

वर्तमान में गंगा की मुख्य सहायक नदियों पर चार जलविद्युत परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं - मंदाकिनी पर फाटा-ब्युंग तथा सिंगोली-भटवारी, अलकनंदा पर विष्णुगढ़-पीपलकोटी और धौली गंगा पर तपोवन-विष्णुगढ़. इन परियोजनाओं को हटाने की मांग को लेकर ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद 24 अक्टूबर 2018 (इस लेख को लिखने के समय 135 दिन) से उपवास पर बैठे हैं.

ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद ने दो और मांगें की हैं. पहली यह कि गंगा नदी पर कोई भी नई जल विद्युत परियोजना नहीं बनाई जाएगी. दूसरी यह कि हरिद्वार के कुंभ क्षेत्र में खनन को रोका जाना चाहिए. कुंभ क्षेत्र को भोगपुर से बढ़ाकर 2 किलोमीटर नीचे रायघाटी तक किया जाना चाहिए.

गंगा प्रेमियों का एक प्रतिनिधिमंडल गंगा मंत्री श्री नितिन गडकरी से  27 फरवरी, 2019 को मिला था. श्री गडकरी ने बताया कि सरकार ने निर्णय लिया है कि गंगा पर कोई भी नई परियोजना नहीं बनाई जाएगी. ऐसी सभी परियोजनाएं जिनके लिए अंतिम पर्यावरण मंजूरी जारी नहीं की गई है उन्हें भी निरस्त किया जायेगा. उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रीय मिशन क्लीन गंगा ने जिलाधिकारी को पहले से अधिसूचित क्षेत्र में खनन रोकने के निर्देश जारी किए हैं. श्री गडकरी ने कहा कि रायघाटी तक कुंभ क्षेत्र के विस्तार पर सरकार सकारात्मक विचार करेगी. उपरोक्त दो मांगों को स्वीकार करने के लिए हम श्री नितिन गडकरी को धन्यवाद देते हैं. इन मांगो का महत्व इस बात से है कि वर्त्तमान में खनन जारी था, जैसा कि 27 मार्च 2018 को लिए गए निम्न चित्र में देखा गया है.

कुंभ क्षेत्र हरिद्वार में खनन पर रोक के बावजूद भी खनन हो रहा है

लेकिन चार जल विद्युत परियोजनाओं के निरास्तिकरण का मुद्दा अभी सुलझा नही है. इन चार परियोजनाओं में से मंदाकिनी पर बन रहे फाटा-ब्युंग को 2013 की बाढ़ में भारी नुकसान पहुंचा है और वर्तमान में इस पर कार्य रुका हुआ है. अतः कह सकते हैं कि प्रभावी मांग केवल निर्माणाधीन तीन परियोजनाओं के निरास्तिकरण के लिए है.

इन परियोजनाओं की कुल क्षमता लगभग 1000 मेगावाट है. इन परियोजनाओं  से उत्पन्न बिजली का 12 प्रतिशत उत्तराखंड को मुफ्त मुहैया कराया जाएगा. गणना से पता चलता है कि उत्तराखंड को मुफ्त में दी जाने वाली बिजली का कुल मूल्य लगभग 100 करोड़ रुपये प्रति वर्ष होगा. वर्ष 2018-19 में उत्तराखंड सरकार की राजस्व प्राप्ति 45,000 करोड़ रुपये थी. इन परियोजनाओं से होने वाला राजस्व राज्य के वर्तमान राजस्व का केवल 0.2 प्रतिशत है. इसके अलावा, इस राशि के लिए केंद्र सरकार राज्य सरकार को आसानी से मुआवजा दे सकती है.

चमोली में अलकनंदा पर निर्माणाधीन विष्णुगाड-पीपलकोटी परियोजना

इन परियोजनाओं पर होने वाला खर्च लगभग 5000 करोड़ रुपये होगा. इनमें टीएचडीसी (टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन) द्वारा विष्णुगाड-पीपलकोटी परियोजना और एनटीपीसी (नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन) द्वारा तपोवन-विष्णुगढ़ परियोजना बनायीं जा रही है. ये सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियाँ हैं और सरकार उन्हें निर्माण को रोकने का निर्देश दे सकती है जैसा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एनटीपीसी द्वारा बनाई जा रही लोहारीनाग पाला परियोजना के लिए दिया था. विवाद की एकमात्र समस्या सिंगोली-भटवारी परियोजना पर है जिसे लार्सन एंड टुब्रो (L & T) द्वारा बनाया जा रहा है और जिसका स्वामित्व श्री मुकेश अंबानी के पास है. इस परियोजना को दिया जाने वाला मुआवजा लगभग 1,000 करोड़ रुपये होगा. गंगा के संरक्षण के लिए यह छोटा भुगतान है. 

 सरकार ने सात निर्माणाधीन परियोजनाओं के कामों का आंकलन करने के लिए एक समिति का गठन किया है. इनमें से ऊपर बताई गई 4 परियोजनाएँ और तीन अन्य परियोजनाएँ शामिल हैं. इन तीन अन्य परियोजनाओं में से दो मंदाकिनी की सहायक नदियों पर 6 और 10 मेगावाट की छोटी परियोजनाएँ हैं. निर्माणाधीन सातवीं परियोजना टिहरी पंप स्टोरेज परियोजना है. इस परियोजना में दिन के समय टिहरी के नीचे से टिहरी जलाशय में पानी की पम्पिंग की जानी है. सुबह और शाम को टरबाइन द्वारा उसी पानी को वापस छोड़ कर बिजली पैदा की जाएगी जब बिजली की खपत अधिक होती है. यह परियोजना गंगा के मुक्त प्रवाह को प्रभावित नहीं करती है. यह परियोजना गंगा पर कोई नया अवरोध पैदा नहीं करती है और हमारे आकलन में परियोजना को संचालित करने की अनुमति दी जा सकती है.

टिहरी जैसी पम्प-स्टोरेज परियोजना से सौर ऊर्जा को सुबह-शाम की बिजली में परिवर्तित किया जा सकता है. जल विद्युत् का लाभ यह है कि इसे मनचाहे समय में बनाया जा सकता है. इसका विकल्प सोलर पावर है परन्तु सोलर पावर दिन में बनती है. सोलर पावर को  हम टिहरी पंप स्टोरेज जैसी परियोजना से सुबह शाम की बिजली में बदल सकते हैं. ऐसी परियोजनाओं के लगने से हमारी जल विद्युत बनाने की जरूरत नहीं रह जाएगी. हम पंप स्टोरेज का समर्थन करते हैं क्योंकि यह जल विद्युत परियोजनाओं को हटाने में मदद करेगा.

निष्कर्ष यह है कि सात परियोजनाओं में से मंदाकिनी की सहायक नदियों पर दो बहुत छोटी परियोजनाएं हैं, फाटा-ब्युंग को पहले से ही छोड़ दिया गया है, और टिहरी पंप स्टोरेज परियोजना का समर्थन किया जाता है. इस आलेख की शुरुआत में वर्णित केवल तीन परियोजनाओं के लिए ही समस्या बनी हुई है.

गंगा नदी के मुक्त प्रवाह को बहाल करने के लिए उक्त 3 परियोजनाओं का निरस्तिकरण अतिआवश्यक है. इस मुद्दे को अन्य 4 परियोजनाओं के साथ जोड़कर भटकाया नहीं जाना चाहिए. यदि अन्य 4 परियोजनाओं को रद्द कर दिया जाता है तो यह बोनस होगा. बहरहाल निर्माणाधीन तीन परियोजनाओं को तत्काल रद्द किया जाना चाहिए.


ट्विट्टर पर जुडें

फेसबुक पर जुडें

गूगल प्लस से जुडें