लेख


 पोस्ट: डॉ. प्रकाश नौटियाल

बांधों के निर्माण से हम अपनी जैव विविधता नष्ट कर रहे हैं

जैव विविधता का अर्थ वायु, जल और भूमि पर निवास करने वाली प्रजातियों की संख्या से होता है. जलीय जैव विविधता का अर्थ है कि पानी में मौजूद कीड़े,  घोंघे, मछलियां, कछुए और डॉल्फ़िन जैसी प्रजातियाँ प्रचुर संख्या में उपलब्ध हों. जलीय जैव-विविधता का आधार जल की गुणवत्ता होता है. जल स्वच्छ होता है और उसमे ऑक्सीजन अधिक होती है तब ही वह जलीय प्रजातियों को धारण करने में सक्षम होता है.  

जैव विविधता के आर्थिक मूल्य का आकलन करना मुश्किल होता है. यदि आप नदी के तट पर बैठे हैं और पानी में तैरते हुए पक्षियों और मछलियों का आनंद ले रहे हैं, तो उस आनंद मूल्य बताना संभव नहीं है. हम कह सकते हैं कि इस आनंद का मूल्य एक करोड़ रुपये या उससे अधिक हो सकता है. अतः जैव विविधता का मूल्य बहुत अधिक होता है.  

मछलियाँ उच्च कोटि की जलीय जीव हैं. वे मत्स्य पालन के माध्यम से आजीविका प्रदान करती हैं जिन्हें मुख्य तौर पर तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है. पहला वर्ग मछुआरों का है जो मछलियों को पकड़ते हैं और उन्हें अपनी आजीविका के लिए बेचते हैं. दूसरा वर्ग सजावटी मछलियों का होता है जिसमे मछलियां अक्वेरियम में रखी जाती हैं. तीसरा वर्ग रिक्रिएश्नल मत्स्य पालन का होता है, जहां लोग मनोरंजन के लिए मछलियों को पकड़ते हैं. इस कार्य के लिए वे मछ्ली पकड़ने के शुल्क का भुगतान करते हैं, बल्कि लॉजिंग, बोर्डिंग और गाइडों पर भी खर्च करते हैं.

मछलियों से लोगों की आजीविका का वहन होता है साथ ही यह सजावट को बढ़ावा देती हैं

बांधों का निर्माण दो प्रमुख तरीकों से जैव विविधता को प्रभावित करता है. पहला यह कि नदी के अधिकाँश हिस्सों में पानी की मात्रा कम हो जाती है क्योंकि जल को हाइड्रोपावर द्वारा सुरंगों की तरफ मोड़ दिया जाता है. दूसरा यह कि बांध मछलियों के आवागमन को रोकते हैं. उत्तराखंड की एक प्रतिष्ठित मछ्ली स्वर्ण महसीर है. महासीर को तैयार अंडे और शुक्राणु डिस्चार्ज के लिए अलकनंदा और भागीरथी बेसिन के ठंडे इलाकों में पलायन करना पड़ता है. टिहरी बांध ने महसीर के आवागमन को बाधित कर उसे कमजोर बना दिया है. साथ-साथ मत्स्य विभाग ने टिहरी जलाशय में मछली पकड़ने को प्रोत्साहित किया है. जलाशय में मौजूद कम वजन की महसीर के बावजूद भी मछली पकड़ी जा रही है. नतीजतन भागीरथी बेसिन में वर्ष 2000 से पहले महासीर का वजन 80 किलोग्राम तक था जो की अब मुश्किल से 5-10 किलोग्राम ही पाया जाता है.

टिहरी बांध की मूल परियोजना में योजना बनाई गई थी कि महसीर की हैचरी स्थापित की जाएगी और जलाशय में मछलियों को छोड़ा जाएगा. हालांकि, यह हैचरी लगायी नहीं गई जिसके कारण महसीर कमजोर हो गई. इतना ही नहीं कॉमन कार्प की आकस्मिक प्रवेश के कारण महसीर का और अधिक नुक्सान हुआ. यह मछली नदी के अन्दर रिवरबेड को नुक्सान पहुंचाती है और इसे अशांत बनाती है जो कि महसीर को पसंद नहीं है. कॉमन कार्प बड़ी संख्या में अंडे देती है. कॉमन कार्प की बढ़ती आबादी की वजह से महसीर की संख्या में गिरावट आयी है.

बांधों के निर्माण से महसीर मछ्ली की प्रजाति समाप्त हो रही है

इसी तरह स्नो ट्राउट उत्तराखंड की एक प्रसिद्ध मछली है. इस मछली को जीवित रहने के लिए उच्च स्तर की ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है. लेकिन बांधों के पीछे बने जलाशय में जल का प्रवाह नहीं होता है इसलिए ऑक्सीजन का स्तर कम होने की वजह से स्नो ट्राउट पर संकट आ पड़ा है. 

बांधों के निर्माण से स्नो ट्राउट की प्रजाति विलुप्ति की कगार पर है

देवप्रयाग से पहले भागीरथी में अब शायद ही कभी स्नो ट्राउट मछ्ली पायी जाती है. वर्तमान में नदी के प्रवाह में हो रहे परिवर्तन इन मछलियों के लुप्त होने की संभावना है. मत्स्य विभाग नयार और गंगा नदी के संगम पर रिक्रिएश्नल मछली पकड़ने को बढ़ावा दे रहा है. नयार नदी महसीर का प्रजनन स्थल है. रिक्रिएश्नल मछली पकड़ने को बढ़ावा देने से महासीर की संख्या में भारी गिरावट आएगी. सैद्धांतिक रूप से रिक्रिएश्नल मछली पकड़ने का मतलब है कि पकड़ी गई मछली को नदी में वापस छोड़ा जाएगा लेकिन हमें यह नहीं पता कि मछली जीवित रहेगी या नहीं. जैव विविधता पर बाधों के प्रभाव का वीडियो यहाँ देखें.

रिक्रिएशनल मत्स्य को गंगा और नयार नदी के संगम पर विकसित करने की योजना है

निष्कर्ष यह है कि जल विद्युत्  बांध जैव विविधता को नुकसान पहुंचा रहे हैं जो की हमारे लिए नुकसानदेह होगा.


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