लेख


पोस्ट: डॉ रवि चोपड़ा 

2018 में सरकार नें दावा किया था कि गंगा का पानी पहले की अपेक्षा अब साफ हो गया है. मई 2018 में जल संसाधन मंत्रालय के सचिव यू पी सिंह ने कहा था कि नदी के जल की गुणवत्ता में तीन प्रमुख मापदंडों – बायो-केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी), डीसाल्व्ड ऑक्सीजन (डीओ) और कोलीफॉर्म में सुधार हुआ है. 2016 की तुलना में 2017 में पानी की गुणवत्ता में 80 स्थानों पर सुधार देखा गया है. 33 स्थानों पर डीओ के स्तर और 26 स्थानों पर बीओडी स्तर में सुधार हुआ है, जबकि 30 स्थानों पर कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की संख्या कम हो गई है. ये तथ्य केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वर्ष 2015-17 की रिपोर्ट से लिए गए थे. (रिपोर्ट यहाँ देखें)

गंगा में पाए जाने वाले प्रदूषित बैक्टीरिया तत्व कोलिफोर्म

 इसी प्रकार जून 2018 की एक रिपोर्ट में सरकार द्वारा दावा किया गया था कि '' रामगंगा नदी की सहायक नदियों अर्थात बहला, दाहेला, कोसी और रामगंगा पर पानी की गुणवत्ता में  (गंगा के साथ संगम से पहले) पिछले दो वर्षों के दौरान सुधार देखा गया है.”  (रिपोर्ट यहाँ देखें)

अब इन दावों की सत्यता जानने का प्रयास करते हैं. जून 2018  में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा जारी एक अन्य रिपोर्ट से इन दावों का खंडन होता है. (रिपोर्ट यहाँ देखें) यह रिपोर्ट एक बायो-मोनेटरिंग पद्धति पर आधारित है जो एक लंबे समय तक नदी के निरंतर प्रदूषण के प्रभाव को प्रकट करती है.

सरकार द्वारा किये गए दावे फ़िजियो-केमिकल पद्धति से किये गए हैं. इस पद्धति में किसी विशेष समय एवं स्थान पर पानी की गुणवत्ता के बारे में जांच की जाती है. जिस स्थान से नमूने लिए गए उससे पानी की गुणवत्ता के परिणाम भी भिन्न-भिन्न हो सकते हैं. उदाहरण के लिए नदी के किनारे लिया गया पानी और नदी के बीच लिए गये पानी के नमूने बहुत अलग परिणाम दे सकते हैं.

बायो-मोनेटरिंग पद्धति में सूक्ष्म जीवों के नमूने एकत्र किये जाते हैं जो नदी के तल पर या चट्टानों के नीचे रहते हैं. ये नदी के जीवों के जीवन चक्र पर पड़ रहे पानी की गुणवत्ता के प्रभाव को दिखाते हैं. कुछ प्रजातियां प्रदूषण के प्रति संवेदनशील होती हैं जबकि कुछ प्रदूषण की क्षमता को झेलने वाली हो सकती हैं. बायो-मोनेटरिंग पद्धति में जीवों की प्रजाति और उनकी संख्या दर्ज की जाती है और प्रदूषण स्तर या पानी की गुणवत्ता जानने के लिए एक स्कोरिंग की जाती है. उदाहरण के लिए संवेदनशील जीवों की अनुपस्थिति को उच्च प्रदूषण स्तर माना जाता है.

बायो मॉनिटरिंग की हालिया रिपोर्ट कहती है कि 2014 में भीमगोडा के ऊपर गंगा की BWQ (जैविक जल गुणवत्ता) कक्षा बी (मामूली प्रदूषण) से 2017 में कक्षा ए (स्वच्छ) में बदल गई जो की गुणवत्ता में सुधार दिखाती है. लेकिन  अगले कुछ किलोमीटर में ही  पानी की गुणवत्ता में गिरावट आई है. 

हरिद्वार में स्थित भीमगोड़ा बैराज

हरिद्वार के डाउनस्ट्रीम और जगजीतपुर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) के अपस्ट्रीम में  BWQ को वर्ग A से गिर कर वर्ग C हो गई है. जगजीतपुर एसटीपी के डाउनस्ट्रीम में वर्ग ए से गिर कर वर्ग डी (भारी प्रदूषण) की अत्यधिक  गिरावट थी. ये आंकड़े बताते हैं कि सरकार द्वारा 2017 में किए गए सुधार के दावे सही नहीं हैं. दरअसल पानी की गुणवत्ता बिगड़ गई है. 

हरिद्वार के जगजीतपुर में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट

पानी की मात्रा और प्रदूषण के स्तर के बीच घनिष्ठ संबंध है. जल का अधिक प्रवाह न केवल प्रदूषण को कम करता है बल्कि जलीय जीवों को जीवित रहने में सक्षम भी बनाता है जो कि प्रदूषण को और अधिक साफ करते हैं. भीमगोड़ा के नीचे प्रदूषण स्तर में वृद्धि यह संकेत करती है कि भीमगोड़ा बैराज से नदी में छोड़े जाने वाला पानी बहुत कम है जो कि शहर से नदी में प्रवेश होने वाले प्रदूषण भार को साफ़ करने के लिए अपर्याप्त है.

आमतौर पर एसटीपी द्वारा छोड़े गए पानी की बीओडी 30 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए, जबकि स्नान के लिए नदी के पानी की गुणवत्ता 3 मिलीग्राम प्रति लीटर होनी चाहिए. इसलिए एसटीपी के डिस्चार्ज कम से कम 10 गुना पानी नदी में होने से ही नदी के पानी की गुणवत्ता स्नान करने वाली हो सकती है. 

 समस्या यह है कि सिंचाई की मांगों के कारण जगजीतपुर एसटीपी से निकलने वाले पानी का 10 गुना अधिक प्रवाह सुनिश्चित कर पाना मुश्किल है. एक समाधान यह हो सकता है कि जगजीतपुर से निकलने वाले ट्रीटेड पानी को  सिंचाई के लिए इस्तेमाल किया जाए. उतना ही पानी भीमगोड़ा से नदी में अधिक छोड़ा जाये. ऐसा करने से जगजीतपुर में नदी के पानी का बहाव अधिक हो जायेगा जो कि नदी के पानी को स्नान लायक बना देगा.  


ट्विट्टर पर जुडें

फेसबुक पर जुडें

गूगल प्लस से जुडें