लेख


जलविद्युत परियोजनाओं के विरोध में स्वामी सानंद ने अपने प्राण त्याग दिए थे

आईआईटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर जी डी अग्रवाल (स्वामी सानंद) ने मंदाकिनी और अलकनंदा पर चार निर्माणाधीन जलविद्युत परियोजनाओं को रद्द करने की मांग करते हुए 112 दिनों के लम्बे उपवास के बाद पिछले साल के अंत में अपना शरीर त्याग दिया. केरल के छब्बीस साल के ब्रह्मचारी संत आत्म्बोधानंद पिछले चार मास से अधिक समय से (23 फरवरी 2019 से) से उपवास करते हुए उन्ही चार परियोजनाओं को रद्द करने की मांग कर रहे हैं.

स्वच्छ गंगा:

गंगा पर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) बनाने में केंद्र सरकार लगभग 20,000 करोड़ रुपये खर्च कर रही है. प्रदूषण का एक प्रमुख कारण हानिकारक जीवाणुओं की उपस्थिति है जिन्हें कोलीफॉर्म कहा जाता है. ये हजारों प्रकार के पाए जाते हैं. प्रत्येक प्रकार के कोलीफॉर्म को एक विशेष प्रकार के लाभकारी जीवाणुओं द्वारा नष्ट कर दिया जाता है जिसे कोलिफाज कहा जाता है. नेशनल एन्वायरमेंट इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट, नागपुर ने कहा है कि गंगा के कोलिफाज में अद्वितीय "व्यापक स्पेक्ट्रम" क्षमताएं हैं. एक कोलीफॉर्म कई प्रकार के कोलिफाज को नष्ट कर सकता है. इंस्टीट्यूट ऑफ माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी, चंडीगढ़ ने कहा है कि उनके शोध में पाया गया है की गंगा के जल में उपलब्ध कोलिफाज 17 प्रकार के रोगों को बनाने वाल कॉलिफोर्म को नष्ट कार देते है जो का गंगा इस अद्वितीय गुण है. ये लाभकारी कौलिफाज़ गंगा की गाद से चिपक जाते हैं. इन लाभकारी कौलिफाज़ को जीवित रहने के लिए नदी में गाद का निरंतर प्रवाह होना जरुरी है. गंगा के पानी को जलविद्युत परियोजनाएँ द्वारा सुरंगों में डाल दिया जाता है या फिर जलाशयों के पीछे रोक लिया जाता है जिससे गाद का बनना बंद हो जता है, इन अद्वितीय कलिफाज का घर नष्ट हो जाता है, और ये कौलिफाज़ नष्ट हो जाते हैं, और हमें पानी को साफ़ करने का अतिरिक्त खर्च एसटीपी में करना पड़ता है. इसलिए जलविद्युत परियोजनाओं हो हटाना लाभप्रद है.

प्रयागराज में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट

जैव विविधता:

हमें ग्लोबल वार्मिंग के गंभीर परिदृश्य में अपनी जैव विविधता की रक्षा करनी चाहिए. उत्तराखंड की प्रसिद्ध महसीर मछली अंडे देने के लिए ऊपर की ओर पलायन करती है. फ़िशलिंग तब बहते पानी के साथ नीचे बहते हैं. नीचे बड़े होकर वे अगले चक्र में ऊपर की ओर पलायन करते हैं. यह पलायन जल विद्युत परियोजनाओं द्वारा बाधित होता है. इसी प्रकार मछ्ली की प्रजाति स्नो ट्राउट को जीवित रहने के लिए बहुत अधिक ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है जो की बहते पानी में ही उपलब्ध होती है. इन अनोखी प्रजातियों को परियोजनाओं से नुकसान होता है.  

नदी का सौन्दर्य:

संयुक्त राज्य अमेरिका के वाशिंगटन राज्य के लोगों ने सरकार को याचिका दी कि एल्हवा बांध उन्हें मछली पकड़ने और कयाकिंग से रोक रहा है. सरकार ने एक सर्वेक्षण किया. राज्य के लोगों से पूछा गया था कि वे एल्व्हा बांध को हटाने के लिए कितना पैसा देने को तैयार होंगे? सर्वेक्षण में पाया गया कि बिजली उत्पादन और सिंचाई से होने वाले लाभों की तुलना में लोग एल्हवा बांध को हटाने के लिए अधिक भुगतान करने को तैयार थे. सरकार ने इस सर्वे के आधार पर बांध को हटा दिया. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, रुड़की ने अनुमान लगाया है कि यदि गंगा स्वतंत्र रूप से बहती है, तो भारत के लोग प्रति वर्ष 23,255 करोड़ रुपये का लाभ प्राप्त करेंगे. यदि हम इस मूल्य का दस प्रतिशत चार निर्माणाधीन परियोजनाओं के लिए आवंटित करते हैं, तो इन 4 परियोजनाओं को हटाने का लाभ 2,325 करोड़ रुपये प्रति वर्ष होगा. इन परियोजनाओं पर अब तक लगभग 5,000 रुपये खर्च किए जा चुके हैं. इन परियोजनाओं को हटाने की लागत 5,000 करोड़ रुपये की होगी जबकि हमें प्रति वर्ष 2,325 करोड़ रुपये का लाभ होगा. 

नदी के सौन्दर्य के लिए वाशिंगटन में हटाया गया एल्वाह डैम

आर्थिक विकास:

उत्तराखंड राज्य को जल विद्युत परियोजनाओं से 12 प्रतिशत मुफ्त बिजली मिलती है. ये परियोजनाएँ गंगा की ऊँचाई से गिरने और समुद्र तक पहुँचने की सभी भौतिक गुणवत्ता का उपयोग करती हैं. इसका विकल्प गंगा के उच्च मनोवैज्ञानिक गुणों का उपयोग करना है. हमने हरिद्वार, ऋषिकेश और देवप्रयाग में तीर्थ यात्रियों का सर्वेक्षण किया और पाया कि छब्बीस प्रतिशत तीर्थयात्रियों को गंगा में डुबकी लगाने से स्वास्थ्य लाभ मिला, 14 प्रतिशत को बेहतर व्यवसाय मिला और 9 प्रतिशत को परीक्षाओं में सफलता मिली. यह इंगित करता है कि गंगा के किनारे अस्पताल और विश्वविद्यालय जैसे सेवा क्षेत्र सफलता की बेहतर दर प्रदान करेंगे. इन गतिविधियों से राज्य को भारी राजस्व प्राप्त होगा.

पीकिंग पावर:

नई जलविद्युत परियोजनाओं से बिजली की उत्पादन लागत 10-11 रुपये प्रति यूनिट है. नयी सोलर उर्जा की लगत 3-4 रुपये प्रति यूनिट है. विद्युत मंत्रालय के केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के प्रमुख के अनुसार सौर ऊर्जा का भंडारण और उपयोग सुबह और शाम को किया जा सकता है. इसमे केवल 40 पैसे प्रति यूनिट की लागत होती है. अतः सोलर पाकिंग उर्जा का दाम 5 रूपए से कम पड़ेगा जबकि जलविद्युत का दाम 10 रूपए पड़ेगा. यही कारण है कि आज जल विद्युत परियोजनाएं वित्तीय संकट में हैं. इन्हें हटाना ही उत्तम है.

जल विद्युत परियोजनाओं में पम्प स्टोरेज विधि एक बेहतर विकल्प है

गंगा बोनस:

फिर भी इन परियोजनाओं को हटाने से लाभ पूरे देश के लोगों को मिलेगा, जबकि उत्तराखंड राज्य को नुकसान हो सकता है. इसलिए, केंद्र सरकार द्वारा  राज्य को "गंगा बोनस" का भुगतान करना चाहिए.


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