लेख


 पोस्ट द्वारा – रवि चोपड़ा

गंगा एक्ट में क़ानून बनाने के लिए पुनः विचार की आवश्यकता है

केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा कायाकल्प मंत्रालय (MoWR RD & GR) ने, सितंबर 2018 में,  हरिद्वार के मातृ सदन में गंगा नदी के संरक्षण में उपवास पर बैठे स्वामी सानंद के साथ एक विधेयक साझा किया था. भारत सरकार द्वारा यह GOI राष्ट्रीय नदी गंगा के संरक्षण के लिए स्वामी सानंद द्वारा किये जा रहे अनशन को जल्द से जल्द रोकने का एक त्वरित उपाय था.

स्वामी सानंद ने इस विधेयक की सावधानीपूर्वक समीक्षा की लेकिन वे अत्यंत निराश थे. क्योंकि यह पहले के मसौदे में मान्यता प्राप्त बुनियादी सिद्धांतों को किसी भी प्रकार से स्वीकार नहीं करता था जिसे स्वामी सानंद ने गंगा महासभा के तत्वावधान में तैयार करने में मदद की थी. वे भारत की संसद द्वारा इसके तत्काल गोद लेने के लिए अभियान चला रहे थे. भारत के विभिन्न हिस्सों से गंगा कार्यकर्ताओं ने 19 और 20 जनवरी को मातृ सदन में एक बैठक की और निम्नलिखित निर्णय लिए:

  • राष्ट्रीय प्रतीक अधिनियम के तहत राष्ट्रीय नदी गंगा को राष्ट्रीय प्रतीक घोषित नहीं किया गया है. इसलिए इसमें राष्ट्रीय चिह्न पर दी गई कानूनी सुरक्षा का अभाव है. हमारी मांग है कि राष्ट्रीय तिरंगे झंडे की तरह, राष्ट्रीय पक्षी मोर और राष्ट्रीय पशु बाघ की तरह  गंगाजी को राष्ट्रीय प्रतीक अधिनियम के तहत गंगाजी को भारत के राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए.
जिस प्रकार गंगा डॉल्फिन और मोर को राष्ट्रीय जलचर और राष्ट्रीय पक्षी माना गया है उसी प्रकार राष्ट्रीय नदी कहने के साथ साथ नदी संरक्षण के पूर्ण क़ानून लागू किये जाएँ
  • MoWR के विधेयक में गंगाजी - जो एक बड़ी आबादी का जीवन निर्वाह करती है, को केवल एक नदी के रूप में देखा गया है. विधेयक में इस बात का जिक्र नहीं है कि पवित्र नदी के रूप में अपनी विशिष्ट स्थिति के कारण गंगाजी को निरंतर अविरलता और संरक्षण की आवश्यकता है. इसके अलावा, यदि गंगाजी के जल को लंबे समय तक संग्रहित किया जाए तो भी इसका जल अशुद्ध नहीं होता है. नेशनल एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट, (NEERI), नागपुर द्वारा एक वैज्ञानिक अध्ययन (2011) में बताया गया कि गंगाजल का यह विशेष गुण उच्च हिमालयी क्षेत्रों से लायी जाने वाली गाद के कारण होती है
  • इंस्टीट्यूट ऑफ माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी, चंडीगढ़ के एक हालिया अध्ययन (2017) में खुलासा किया है कि गंगाजल में मनुष्यों में 17 बीमारियों से अधिक रोगों को मारने की अद्वितीय क्षमता है. विधेयक में सभी नदियों की विशेषताओं के बजाय इस तरह की अनूठी विशेषताओं पर गंगाजी के संरक्षण को आधार बनाने की आवश्यकता है.
मन्दाकिनी, अलकनंदा और भागीरथी नदी बेसिन
  • विधेयक के प्रावधानों को लागू करने के लिए MoWR के विधेयक में उच्च-स्तरीय परिषद का प्रस्ताव दिया गया है. इसमें ज्यादातर केंद्रीय मंत्री, गंगा बेसिन राज्यों के मुख्यमंत्री और अधिकारी शामिल हैं. लेकिन केवल तीन स्वतंत्र विशेषज्ञ हैं. अगर इतिहास में देखा जाए तो गंगा नदी के संरक्षण पर बने इस तरह के आधिकारिक निकाय कभी सफल नहीं हुए हैं.  हमारी मांग है कि राष्ट्रीय चुनाव आयोग की तरह गंगा एक्ट भी एक सशक्त, स्वायत्त और वैधानिक निकाय का गठन करे - जिसमें अधिकतर  स्वतंत्र लोग हों, जो किसी भी सरकारी पद पर न हों और जो गंगाजी के संरक्षण के प्रयासों के लिए जाने जाते हों. केवल इस तरह का ही एक सशक्त स्वायत्त निकाय गंगाजी को अपनी प्राचीन महिमा के लिए पुनर्स्थापित कर सकता है.
  • गंगा एक्ट में गंगा नदी की सहायक नदियों का जिक्र नहीं किया गया है. हिमालय के विभिन्न क्षेत्रों से निकलने वाली भागीरथी, अलकनंदा, मन्दाकिनी, पिंडर, धौली गंगा और मन्दाकिनी मिलकर गंगा नदी का निर्माण करती हैं. अतः गंगा एक्ट के अंतर्गत सभी हिमालयी क्षेत्र की नदियों में किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ को असंवैधानिक माना जाय. MoWR के मसौदे पर हिमालयी क्षेत्र से गंगा सागर तक गंगाजी पर किसी भी प्रकार के निर्माण और अविरलता को बाधित न करने पर विचार किया जाए.

हम सभी गंगा प्रेमियों से आह्वान करते हैं कि वे अपने क्षेत्र के स्थानीय सांसदों से गंगा एक्ट के विषय पर चर्चा करें ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि स्वामी सानंद के मसौदे को अपनाने लिए विधेयक में बुनियादी जरूरतें शामिल हो सकें.


ट्विट्टर पर जुडें

फेसबुक पर जुडें

गूगल प्लस से जुडें