लेख


उत्तराखंड के चारों धाम पवित्र नदियों पर स्थित हैं. बद्रीनाथ धाम अलकनंदा नदी पर, केदारनाथ धाम मन्दाकिनी नदी पर, गंगोत्री धाम भागीरथी पर और यमुनोत्री धाम यमुना नदी पर. इन चारों धामों पर देश की जनता आसानी से पहुँच सके इसके लिए सरकार नें चारों धामों को जोड़ने वाली सड़क के चौडीकरण की महत्त्वकांशी योजना शुरू की है. इस योजना पर 50 हज़ार करोड़ रुपये की लागत का अनुमान है.

बदरीनाथ धाम से निकलने वाली अलकनंदा नदी

पर्यटन| पलायन| रात्रि बस सेवाएं| छोटे व्यापारी

श्री सोबन सिंह पंवार, ग्राम प्रधान, डडूवा, टिहरी गढ़वाल कहते हैं कि चार धाम सड़क चौडीकरण से पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, उत्तराखंड में रोजगार के अवसर पैदा होंगे, शहरी और क्षेत्रीय विकास होगा. श्रीनगर नगर पालिका पूर्व अध्यक्ष श्री बिपिन मैठाणी जी कहते हैं कि चार धाम सड़क चौडीकरण योजना से सबसे बड़ा फायदा यह होने जा रहा है कि उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में रात्री बस सेवा शुरू हो जाएगी, जिससे निवासियों द्वारा रात्री सफ़र करके समय की बचत की जा सकेगी. चार धाम सड़क के किनारे स्थित बागवान कसबे के कम्पूटर सेंटर प्रशिक्षक श्री गणेश भट्ट कहते हैं कि चार धाम सड़क योजना के निर्माण से सड़क किनारे छोटे व्यापारियों को फायदा होगा. चौड़ी सड़क होने से उत्तराखंड में हर साल आने वाले पर्यटक बाज़ारों और दुकानों में रुकेंगे जिससे अच्छे लाभ की उम्मीद होगी. यद्यपि इस योजना को बनाने के लिए व्यापारियों की दुकाने तोड़ी जा रही हैं परन्तु आने वाले समय में पर्यटन वृद्धि से इन्हें लाभ होंगे.

योजना के दौरान सड़क किनारे छोटे व्यापारियों की तोड़ी गयी दुकाने

गंगा आह्वाहन उत्तरकाशी से जुड़ी मल्लिका भनोत कहती हैं कि पर्यटन एवं बाज़ारों के बढ़ने से उत्तराखंड से पलायन रुकेगा. नीचे चित्र में हम देख सकते हैं कि सड़क चौड़ी होने से छोटे होटलों को बढ़ावा मिलेगा और पर्यटन बढेगा.

उत्तराखंड चार धाम को बढ़ावा देने वाले क्षेत्रीय होटल एवं रेस्टोरेंट

चार धाम के लिए बन रही नयी सड़क को हम नीचे चित्र में देख सकते हैं.

चार धाम योजना के अंतर्गत बन रही नयी सड़क

सुरक्षा

श्री सोबन सिंह का कहना है कि देश की सरहद पर भारतीय सेना के आवागमन के लिए उत्तराखंड में चौड़ी सड़क मददगार होगी. नीचे चित्र में सेना के ट्रक को बोर्डर की तरफ जाते हुए देख सकते हैं.

उत्तराखंड बॉर्डर पर देश की सुरक्षा के लिए चार धाम एक महत्वपूर्ण कदम

पर्यावरणीय स्वीकृति| वृक्षों का कटान| मक डंपिंग| लैंड स्लाइडिंग

उत्तराखंड के चारों धामों को जोड़ने वाली इस सड़क योजना के कुछ नकारात्मक पक्ष भी हैं. मल्लिका भनोत जी कहती हैं कि चार धाम योजना द्वारा पर्यावरणीय स्वीकृति को बाईपास कर दिया गया है. सरकार नें 719 किलोमीटर की इस चार धाम योजना को 100-100 किलोमीटर के छोटे प्रोजेक्टों में बाँट दिया है चूंकि 100 किलोमीटर से छोटे प्रोजेक्ट में पर्यावरणीय स्वीकृति को लेना अनिवार्य नहीं होता है. उनके अनुसार NGT और सुप्रीम कोर्ट को सरकार भ्रमित कर रही है. चार धाम परियोजना को एक सूक्ष्म योजना बता कर कार्य किया जा रहा है जबकि यह विशाल योजना है जिसके तमाम पर्यावरणीय प्रभाव होंगे.

चार धाम योजना में पेड़ों के कटान को लेकर लक्ष्मोली, टिहरी गढ़वाल के ग्राम प्रधान सुरेश नेगी कहते हैं कि सरकार द्वारा अभी तक वृक्षारोपण की कोई भी बात नहीं की गयी है. जो पेड़ काटे गए हैं, वे गलत काटे गए हैं. जितने पेड़ काटने चाहिए थे उससे कहीं अधिक पेड़ काटे गए हैं. इन पेड़ों से स्थानीय लोगों को मिलने वाली चुगान का मुआवजा नहीं दिया गया है. आम आदमी पार्टी और अन्ना हजारे संगठन से जुड़े हुए भूपाल चौधरी जी कहते हैं कि अगर पेड़ काटने ही थे तो इसके लिए कई साल पहले से विचार किया जाना चाहिए था. कटे हुए पेड़ की जगह लगने वाला नया पौधा छोटा होगा. क्या वह नया पौधा वर्षों से जीवित उस कटे हुए पेड़ की भरपाई कर पायेगा? वृक्षों के कटान पर बिपिन मैठाणी जी कहते हैं कि बहुत जगहों पर नियम विरुद्ध भी पेड़ कटे हैं. कम से कम सड़क के किनारे-किनारे वृक्षारोपण करना चाहिए या फिर पूरी सड़क के किनारे वृक्षारोपण की जगहों को चिन्हित कर दिया जाय. यह जिम्मेदारी भी कार्य करने वाली कंपनियों और वन विभाग की होनी चाहिए. वृक्षों के कटान पर मल्लिका भनोत जी कहती हैं कि जो पेड़ इन पहाड़ों को आपस में बाँध रहे थे उन्हें तो आपने काट दिया. इसके बदले आप देहरदून, हरिद्वार, ऋषिकेश कहीं भी वृक्षारोपण कर लीजिये लेकिन जो पेड़ काटे गए हैं उनकी जरुरत तो वहीँ पर थी जहाँ उन्हें काटा गया है. उनकी भरपाई सरकार कैसे करेगी? ये सब बातें पर्यावरणीय स्वीकृति में आती हैं लेकिन वो तो सामने ही नहीं आई है.

चार धाम योजना के लिए सड़क के किनारे काटे गए पेड़

श्रीनगर गढ़वाल के सामाजिक कार्यकर्ता श्री अनिल स्वामी कहते हैं कि चार धाम योजना में जगह जगह मिट्टियों के ढेर लगे हुए हैं. पहाड़ों का कटान करके सारा मलबा गदेरों में डाला जा रहा है. गदेरों में डाली गयी मिटटी का इनके पास कोई ट्रीटमेंट नहीं है जिसे हम नीचे चित्र में देख सकते हैं.

चार धाम योजना के दौरान मुल्यागावं के गदेरे पर गिराया जा रहा मलबा

लैंड स्लाइडिंग

मल्लिका भनोत जी कहती हैं कि उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थिति अति-संवेदनशील है. पहाड़ों और पेड़ों के कटान से पहाड़ और जमीन कमजोर होंगे और लैंडस्लैडिंग बढ़ेगी. ऐसे लाभ से क्या फ़ायदा जिससे हमारे घर में हम ही असुरक्षित हो जाएँ. बिपिन मैठाणी कहते हैं कि पहाड़ों में अक्सर बरसात के मौसम में लैंडस्लाइड की वजह से सड़कें जगह-जगह पर ब्लाक हो जाती हैं  योजना में इसका कोई प्रबंध नहीं दिखता है.

चार धाम योजना के दौरान सड़क के किनारे लैंडस्लाइड

कार्यान्वयन|नदियाँ|चार धाम|मैदानों में नदियाँ| अध्यात्मिक शक्ति

उत्तराखंड की चार धाम योजना सही योजना है लेकिन इसके कार्यान्वयन में बहुत कमियाँ हैं. इन कमियों को दूर कर भी दिया जाय तो भी एक विषय रह जाता है. वह यह कि चारों धामों पर पहुँचने के लिए सरकार 50 हजार करोड़ रुपयों की इस योजना को लागू कर रही है, लेकिन इन धामों से जो पवित्र नदियाँ निकलती हैं और धामों के अध्यात्मिक प्रसाद को मैदान तक लाती हैं, उनकी अध्यात्मिक शक्ति को बनाये रखने के प्रति सरकार उदासीन है.

जलविद्युत परियोजनाओं से इन नदियों द्वारा चारों धामों की अध्यात्मिक उर्जा लाने में शक्ति का ह्रास हो रहा है. एक तरफ सरकार चारों धामों तक तीर्थ यात्रियों को पहुचाने का अच्छा कार्य कर रही है जिससे वे इन धामों की अध्यात्मिक शक्ति हासिल कर सकें. इस कार्य पर 50 हज़ार करोड़ रुपये का खर्च किया जा रहा है. लेकिन दूसरी तरफ इन्ही चार धामों की आध्यात्मिक शक्तियों को नीचे लाने वाली नदियों पर जल विद्युत परियोजनाएं बनाकर उन्ही आध्यात्मिक शक्तियों का ह्रास किया जा रहा है. इन परियोजनाओं में वर्तमान में अलकनंदा पर विष्णुगाड पीपलकोटी तथा मन्दाकिनी पर सिंगोली भटवारी परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं. कम से कम इन दोनों परियोजनाओं का राष्ट्रीयकरण करके सरकार को इनकी कार्यदायी संस्थाओं को उचित मुआवजा देकर इन परियोजनाओं को निरस्त करना चाहिए जिससे कि चारों धामों की आध्यात्मिक शक्ति मैदानों तक पहुँच सके. इस कार्य में हमारे अनुमान में केवल चार हजार करोड़ रुपये खर्चा आएगा. इस परियोजना की मूल विसंगति यह है कि चार धामों की आध्यात्मिक शक्ति तक तीर्थ यात्री को पहुँचाने के लिए हम 50 हज़ार करोड़ रुपये का खर्च कर रहे हैं लेकिन उसी आध्यात्मिक शक्ति को बचा कर मैदान तक पहुचाने के लिए हम चार हजार करोड़ रुपये का खर्च करने को तैयार नहीं हैं.


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