लेख


गंगा पर निर्मित जलविद्युत और सिंचाई परियोजनाओं द्वारा छोड़े जाने वाले पर्यावरणीय प्रवाह के सन्दर्भ में हाल ही में केंद्र सरकार नें एक अधिसूचना जारी की है (चित्र 1). पर्यावरणीय प्रवाह का अर्थ होता है कि नदी की मुख्य धारा पर जल का प्रवाह निरंतर बना रहे. पर्यावरणीय प्रवाह की घोषणा करने के लिए सरकार का कदम स्वागत योग्य है. गंगा नदी की विशेषताओं का वर्णन करने के लिए अधिसूचना भी प्रशंसनीय है. यह अधिसूचना कहती है कि गंगा नदी अद्वितीय है और इसमें विशेष गुण हैं; केंद्र सरकार नदी की पूर्णता को बहाल करने और बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है; यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि नदी में पानी का निर्बाध प्रवाह रखा जाए. इस प्रशंसनीय बयान के बावजूद यह अधिसूचना एक अलग संदेश देती है. अधिसूचना यहाँ देखें.

अधिसूचना में कहा गया है कि हिमालयी गंगा पर जलविद्युत परियोजनाओं को पर्यावरणीय प्रवाह के लिए 20 से 30 प्रतिशत पानी छोड़ना होगा. लेकिन 7 आईआईटी के कंसोर्टियम ने सिफारिश की थी कि लगभग 49 से 52 प्रतिशत पानी नदी की जीवंतता के लिए छोड़ा जाना चाहिए. 20 से 30 प्रतिशत पानी का छोड़ा जाना गंगा नदी की जीवंतता को बनाए रखने के लिए अपर्याप्त है.

आईआईटी कंसोर्टियम| भारत सरकार| रिपोर्ट की समीक्षा

सरकार ने उपरोक्त वर्णित आईआईटी कंसोर्टियम की सिफारिश की समीक्षा करने के लिए एक समिति गठित की है. आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर ए. के. गुसाईं  आईआईटी कंसोर्टियम का हिस्सा थे; इसलिए कंसोर्टियम की सिफारिशों में उनकी सहमति और अनुमोदन है. लेकिन फिर भी प्रोफेसर ए. के. गुसाईं आईआईटी कंसोर्टियम की रिपोर्ट की समीक्षा करने के लिए समीक्षा समिति में बैठे थे. उन्होंने पर्यावरणीय प्रवाह के 49 से 52 प्रतिशत की सिफारिश को 20 से 30 प्रतिशत पर घटा दिया है. इसीलिए उन्हें समीक्षा समिति में बैठाया गया था.

इसके अलावा देश में सभी नदियों के लिए पर्यावरण मंत्रालय द्वारा 20 से 30 प्रतिशत पर्यावरणीय प्रवाह को पहले से ही लागू किया गया है. राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में पुष्प सैनी द्वारा दायर एक मामले मे केरल सरकार ने जवाब दिया है कि पर्यावरण मंत्रालय पर्यावरण प्रवाह के रूप में 20 से 30 प्रतिशत पानी को छोड़े जाने की सिफारिश कर रहा है. इसका अर्थ यह है कि यह अधिसूचना पहले से ही स्वीकृत अभ्यास को दोहराती है जो देश की सभी नदियों पर लागू किया जा चूका है.

20 से 30 प्रतिशत पर्यावरणीय प्रवाह का आंकड़ा बी के चतुर्वेदी समिति द्वारा सुझाया गया था, जो पिछले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार (यूपीए) के दौरान स्थापित किया गया था. बीजेपी ने हमेशा यूपीए पर हमला किया है क्योंकि हिंदूत्व और गंगासमर्थित होने के बावजूद वर्तमान केंद्र सरकार ने गंगा नदी के रख-रखाव के लिए यूपीए सरकार द्वारा की गई सिफारिश के लिए 1% पानी भी नहीं जोड़ा है जो दिखाता है कि एनडीए सरकार की गंगा के प्रति कोई प्रतिबद्धता नहीं है.

पर्यावरणीय प्रवाह| सिंचाई परियोजना| फ्लशिंग

मैदानी इलाकों में सिंचाई परियोजनाओं के लिए नदियों के पर्यावरणीय प्रवाह की स्थिति और भी अधिक गंभीर है. अधिसूचना में दिए गए आंकड़ों के अनुसार  हरिद्वार में पर्यावरणीय प्रवाह 47 घन मीटर/सेकेंड छोड़ना होगा. हरिद्वार में कुल प्रवाह 23900 घन मीटर/सेकंड है. इस तरह पर्यावरण प्रवाह के लिए पानी 0.15 प्रतिशत है जो कुल पानी का 1% भी नहीं है. जबकि आईआईटी कंसोर्टियम का कहना है कि पर्यावरण प्रवाह के लिए 51 प्रतिशत  पानी जारी किया जाना चाहिए इसी प्रकार बिजनौर में औसत पर्यावरणीय प्रवाह 36 घनमीटर/सेकेंड कहा गया है जो वार्षिक प्रवाह के 0.11 प्रतिशत पर बैठता है. 

गंगा के प्रवाह का क्यूमेक्स में आंकलन

अधिसूचना में कहा गया है कि मौजूदा परियोजनाएं इस आदेश के जारी होने की तारीख से तीन साल के भीतर इस पर्यावरण प्रवाह छोड़ेंगी. निहित विचार है कि मौजूदा परियोजनाओं के लिए यह नियम तुरंत लागू करना संभव नहीं है. ऐसा नहीं है. प्रत्येक जल विद्युत परियोजना में बांध के निचले हिस्से में फ्लशिंग गेट्स होते हैं जो बांध के पीछे जमा तलछट को दूर करने के लिए खोले जाते हैं जैसा चित्र 4 में दिखाया गया है. फ्लशिंग गेट्स का उपयोग पर्यावरणीय प्रवाह के लिए पानी को मुक्त करने के लिए तत्काल किया जा सकता है. अर्थ हुआ की विष्णु प्रयाग जैसी परियोजनाओं के नीचे गंगा 3 वर्ष तक सूखी रहेगी जैसा चित्र 3 में दिखाया गया है.

विष्णुप्रयाग के नीचे अलकनंदा नदी

अधिसूचना के प्रस्तावना में कहा गया है कि गंगा का प्रवाह निरंतर बनाए रखा जाएगा. लेकिन मौजूदा परियोजनाओं ने पहले ही बांध बनाया है. अतः यदि फ्लशिंग गेट्स के माध्यम से पर्यावरण प्रवाह जारी भी करते हैं, तो इसका मतलब निर्बाध प्रवाह नहीं है. निर्बाध प्रवाह का महत्व है कि मछलियां अपस्ट्रीम में माइग्रेट कर सकें और गाद नियमित रूप से नीचे की ओर बहती रहे. इसलिए गंगा नदी पर मौजूदा परियोजनाओं के कारण गंगा मरी हुई रहेगी. 

बाँध के नीचे से फ्लशिंग इस प्रकार से की जाती है

हम यहां उल्लेख कर सकते हैं कि केंद्रीय जल और विद्युत अनुसंधान केंद्र पुणे ने रिपोर्ट बनाई थी कि बांधों से निर्बाध पर्यावरणीय प्रवाह जारी करना संभव है. (रिपोर्ट यहाँ देखें)

वर्तमान अधिसूचना धोखा है. एनडीए सरकार के अनुसार मौजूदा परियोजनाओं से पर्यावरणीय प्रवाह छोड़ने के तत्काल आवश्यकता नहीं है. पर्यावरणीय प्रवाह के लिए निर्माणाधीन परियोजनाओं को फिर से डिजाइन करने की आवश्यकता नहीं है.


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