लेख


गन्ने की फसल के लिए भूमिगत जल का अत्यधिक प्रयोग होता है जिससे भूमिगत संचित जल का स्तर लगातार घट रहा है

देश के किसान इस समय दो समस्याओं को झेल रहे हैं. एक तरफ उन्हें गन्ने का उपयुक्त मूल्य देर से मिल रहा है और दूसरी तरफ जमीन में पानी के स्तर में लगातार गिरावट आ रही है जिससे उनके उत्पादन का खर्च बढ़ रहा है. किसानों को पेमेंट समय से न मिलने का मुख्य कारण यह है कि हमारे देश में गन्ने का दाम सरकार द्वारा निर्धारित किया जाता है जबकि चीनी मिलों को चीनी बाजार भाव पर बेचनी पड़ती है. वर्तमान में चीनी का दाम कम होने के कारण गन्ने का यह दाम अदा नही किया जा सकता है. जैसे ग्रहणी को कहा जाय कि अच्छी गुणवत्ता का आटा लाये लेकिन उसका बजट न बढ़ाया जाय.

वर्तमान में अपने देश में गन्ने का दाम लगभग 2800 रुपया प्रति क्विन्टल है. इसके सामने अमेरिका में गन्ने का दाम लगभग 2200 रुपया प्रति क्विन्टल है. गन्ने का ऊंचा दाम होने से चीनी मिलों को घाटा हो रहा है जबकि किसानो को ऊंचे दाम से अधिक लाभ मिल रहा है इसलिए किसान गन्ने का उत्पादन बढ़ा रहे हैं जबकि चीनी मिलें उससे उत्पादित चीनी को बेचने में असमर्थ हैं. गन्ने का दाम ऊँचा होने के कारण विश्व बाज़ार में चीनी का दाम आज लगभग 22 रुपये प्रति किलो है जबकि भारत में यह लगभग 35 रुपये प्रति किलो है. इसलिए पेमेंट की समस्या मूलतः गन्ने के ऊंचे सरकारी दाम निर्धारित किये जाने की वजह से है.

हरियाणा की चीनी मिल

चीनी का निर्यात:

इस समस्या का एक हल यह हो सकता है कि चीनी के अधिक उत्पादन का निर्यात कम कर दिया जाय. परन्तु यह भी कठिन है क्योंकि, जैसा ऊपर बताया गया है, विश्व बाज़ार में चीनी का दाम लगभग 22 रुपये प्रति किलो है जबकि हमारे देश में 35 रुपये प्रति किलो है. इसलिए वीश्व बाजार में चीनी को बेचने के लिए सरकार को भारी मात्रा में निर्यात सब्सिडी देनी होगी. इसमें सरकार के ऊपर खर्च का बोझ बढेगा. सरकार पहले ऊर्वरक तथा बिजली पर सब्सिडी देकर गन्ने का उत्पादन बढ़ा रही है और फिर उस बढ़े हुए उत्पादन को निर्यात सब्सिडी देकर उसका निष्पादन कर रही है. यह इस प्रकार हुआ कि जैसे आप आलू का एक कट्टा बाजार से खरीद कर लायें और फिर कुली को खर्च देकर कहें की उसे कूड़ेदान में फेंक कर आये. इस प्रकार की दोहरी मार सरकार पर पड़ रही है इसलिए निर्यात का रास्ता सफल नहीं होगा.

ब्राजील की पेट्रोल नीति:

दूसरा संभावित हल है कि गन्ने से पेट्रोल बना लिया जाय. गन्ने से एथेनॉल नाम का उत्पाद बनता है जिसे पेट्रोल के स्थान पर गाड़ियों में डाला जा सकता है. ब्राजील नें इस नीति का बहुत सफल उपयोग किया है.

ब्राजील में गन्ने का उपयोग पेट्रोल बनाने में इस्तेमाल होता है.

विश्व बाज़ार में जब पेट्रोल महंगा होता है तो ब्राजील गन्ने का उपयोग एथेनॉल के लिए करता है, तेल के आयात कम कर देता है और चीनी का निर्यात भी कम कर देता है. इसके विपरीत जब विश्व बाजार में चीनी का दाम अधिक होता है तो यह एथेनॉल का उत्पादन कम करके चीनी का उत्पादन बढ़ाता है और उस चीनी को निर्यात करता है. इसी प्रकार भारत सरकार भी ब्राजील की इस नीति को अपनाना चाह रही है. सरकार का प्रयास है कि देश में एथेनॉल का उत्पादन बढ़ाया जाय जिससे कि आयातित तेल पर हमारी निर्भरता भी कम हो जाय और चीनी के अधिक उत्पादन की समस्या भी समाप्त हो जाय.

इस नीति में संकट पानी का है. भारत में ब्राजील की तुलना में पानी की उपलब्धता बहुत कम है. ब्राजील में एक वर्ग किलोमीटर भूमि में 33 व्यक्ति रहते हैं जबकि हमारे देश में 416. ब्राजील में वर्ष में औसत वर्षा 1250 मिलीमीटर होती है जबकि अपने देश में केवल 500 मिलीमीटर. इन दोनों आंकड़ों का सम्मलित प्रभाव यह है कि ब्राजील में हमारी तुलना में प्रति व्यक्ति 30 गुना अधिक पानी उपलब्ध है. जब ब्राजील गन्ने का उत्पादन अधिक करता है तो वहां पानी की समस्या उत्पन्न नहीं होती है क्योंकि वहां वर्षा भी अधिक होती है और जसंख्या भी कम है. हमारे यहाँ गन्ने का उत्पादन बढ़ाकर एथेनॉल बनाने का सीधा परिणाम यह होगा कि वर्तमान में जो भूमिगत पानी का जलस्तर गिर रहा है वह और अधिक तेजी से गिरेगा.

इससे दो समस्याएँ पैदा होंगी. पहला यह कि गहराई से पानी को निकालने में देश को बिजली का खर्च अधिक वहन करना होगा. आज किसानो को हर दूसरे तीसरे वर्ष अपने ट्यूबवेल की गहराई को बढ़ाना पढ़ रहा है क्योंकि सदियों से जो भूमि में जल एकत्रित होकर पड़ा हुआ है उसे हम निकालकर गन्ने का उत्पादन कर रहे हैं. निकले गए पानी का पुनर्भरण नहीं हो रहे है जिससे जल स्तर गिर रहा है. यह उस प्रकार हुआ कि अपने बैंक में जमा फिक्स्ड डिपोसिट को तोड़ कर हम अपनी जीविका चलायें. अंततः वह फिक्स्ड डिपोसिट की रकम समाप्त हो जाएगी और हमारी जीविका संकट में आ जायेगी. इसी प्रकार सदियों से जमा भूमिगत पानी शीघ्र समाप्त हो जाएगा और तब देश के सामने खाद्यसुरक्षा का संकट उत्पन्न हो जाएगा. इसलिए एथेनॉल बनाने के लिए गन्ने का उत्पादन करना देश के लिए सफल नहीं होगा.

विश्व में भूमिगत जल के अत्यधिक इस्तेमाल के उदाहरण:

दुनिया में कई जगह पानी के इस अति दोहन से उपजाऊ भूमि रेगिस्तान में बदल चुकी है. नीचे दिए गए चित्र में मिन्किन काउंटी क्षेत्र को उपग्रह दृश्य में गोले में दिखाया गया है जो कि भूमिगत जल के सूख जाने के कारण रेगिस्तान बन चुका है. (रिपोर्ट यहाँ देखें).

मिन्किन काउंटी क्षेत्र को दिखाया गया है जहाँ अत्यधिक भूजल के दोहन से रेगिस्तान बन चुका है

नीचे चित्र में मिन्किन का एक खाली घर दिखाया गया है जिसमे चीन के मिन्किन में भूजल स्तर में कमी और पानी की आपूर्ति की कठिनाइयों के कारण लगभग 364 ग्रामीण गावं से पलायन कर चुके हैं. इस प्रकार के मकान खाली पड़े हैं.

पानी की कमी के कारण रेगिस्तान बनने की वजह से लोगों ने अपने घर छोड़ दिए हैं

नीचे चित्र में देख सकते हैं कि मिन्किन में भूजल स्तर में कमी के कारण उपजाऊ जमीन भी रेतीली भूमि में बदल चुकी है. इस रेतीली भूमि में पेड़ सूख चुके हैं और सिर्फ रेगिस्तान दिखता है.

पेड़ पौधों की जड़ें भूमिगत जलस्तर की पहुँच तक नहीं जा पाती हैं अतः वे पानी से वंचित होकर मर रही हैं

इसी प्रकार से हम देख सकते हैं कि उत्तरी अमेरिका के नेब्रास्का, कंसास और टेक्सास में, ईरान के दक्षिणी क्षेत्र में, उत्तरी मोरक्को के क्षेत्रों में और पूर्वी केलिफोर्निया की ओवेन्स घाटी क्षेत्र में भूजल के अत्यधिक दोहन से रेगिस्तान जैसी स्थिति बन गयी है. भारत के तमिलनाडु में यही स्थिति चावल की फसल के कारण है. यदि हम गन्ने के उत्पादन के लिए भूमिगत जल का अति दोहन करते रहे तो आने वाले समय में उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र भी रेगिस्तान बन सकते हैं.

बफर स्टाक:

समस्या का तीसरा हल यह सुझाया जा रहा है कि फ़ूड कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया चीनी को खरीद कर बफर स्टॉक बना लें. इस समय हमारे पास चीनी की वार्षिक खपत 2.6 करोड़ टन है. इसके सामने एक करोड़ टन का बफर स्टॉक हमारे सामने पहले ही उपलब्ध है और इस वर्ष 3.6 करोड़ टन चीनी के उत्पादन होने का अनुमान है. अतः इस वर्ष के अंत में हमारे पास दो करोड़ टन का बफर स्टॉक हो जाएगा. यदि गन्ने के उत्पादन को बढ़ने की पालिसी पर हम डटे रहे तो हर वर्ष यह बफर स्टाक और बढ़ता जाएगा. अतः इस पालिसी के अंतर्गत चीनी के अधिक उत्पादन के निष्पादन का हल नहीं ढूँढा जा सकता है.

निष्कर्ष:

गन्ना किसानो की समस्या का एक मात्र हल यह है कि गन्ने का उत्पादन कम किया जाय. इसके लिए जरूरी है कि सरकार द्वारा निर्धारित किये गए गन्ने के दामो में भारी कटौती की जाय. गन्ने का दाम कम होगा तो किसान स्वयं गन्ने का उत्पादन कम करेंगे. साथ ही इससे पानी भी बचेगा क्योंकि गन्ने के उत्पादन में पानी की बहुत अधिक खपत होती है. गन्ने की एक फसल को उत्पादित करने में लगभग 20 बार पानी दिया जाता है. जबकि गेंहू अथवा धान को दो या तीन सिंचाई ही पर्याप्त होती है. एक और लाभ यह होगा कि सरकार द्वारा बिजली, ऊर्वरक और निर्यात पर सब्सिडी दी जा रही है उसकी भी बचत होगी. समस्या यह है कि इससे किसान उद्वेलित होंगे. इसका उपाय यह है कि बिजली, ऊर्वरक और निर्यात पर सब्सिडी पर जो रकम सरकार द्वारा खर्च की जा रही है उसे सीधे गन्ना किसानो के बैंक खातों में जमा करा दिया जाय. इससे किसान को सीधे रकम मिल जायेगी और उनके लिए गन्ने का अधिक उत्पादन का लोभ समाप्त हो जाएगा.

 

इस विषय पर माननीय प्रधानमंत्री जी को लिखें 


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