लेख


“Central Pollution Control Board (CPCB) has inventoried 35 distilleries… out of which… 17 have achieved Zero Liquid Discharge (ZLD)…”

देश के सात आईआईटी संस्थानों के वैज्ञानिको ने गंगा प्रदुषण पर अपनी रिपोर्ट बनाई है. रिपोर्ट में स्पष्ट कहा

गया है की गंगा की स्वच्छता के लिए जीरो लिक्विड डिस्चार्ज पालिसी लागू करना बहुत जरूरी है. यानी उद्योगों, होटलों इत्यादि द्वारा गंदे पानी को स्वयं साफ़ करके पुनः उपयोग किया जाय. सीवेज को किसी भी रूप में गंगा जी एवं उनकी सहायक धाराओं में न डालने दिया जाए. आईआईटी रिपोर्ट के अनुसार.: All new colonies/townships and large multi-storied complexes must adopt a zero-liquid discharge policy, wherein domestic sewage generated within the complex must be treated and recycled/reused within the complex itself.आईआईटी रिपोर्ट यहाँ है (रिपोर्ट पेज 12).

वर्तमान पालिसी है की उद्योगों द्वारा गंदे पानी को ट्रीटमेंट करके नदी में डाला जाता है लेकिन इस पर हमेशा संदेह बना रहा रहता है. इसका बार बार निरीक्षण करना बहुत मुश्किल है. जब सरकर द्वारा निरीक्षण कराया जाता है तब ये लोग ट्रीटमेंट किया हुआ साफ़ पानी बहाते है. सरकार बार बार इन पर नजर नहीं रख सकती है. इसका एकमात्र उपाय है जीरो लिक्विड डिस्चार्ज पालिसी लागू की जाए. जैसे हम स्नान करने के बाद इस्तेमाल हुए जल को एकत्र करें. फिर उस पानी को साफ़ करके किचन गार्डन में इस्तेमाल कर दें. घर की सरहद से बाहर उस गंदे पानी को न जाने दिया जाय. इसी प्रकार सभी उद्योग गंदे पानी को ट्रीटमेंट के बाद स्वयं इस्तेमाल करें और बार बार करें जब तक वह पानी समाप्त नहीं हो जाता. आईआईटी की रिपोर्ट के अनुसार गंदे पानी को साफ़ करने में होने वाला खर्चा उद्योगों को स्वयं वहन करना चाहिए, इस खर्चे को वहन करने में वे सक्षम है. केंद्र सरकार और राज्य सरकार की इसमें भूमिका न्यून होनी चाहिए:

The cost of industrial waste management, including reuse/recycle of treated sewage is to be largely borne by the industries themselves with minimal support from central/state governments. Our preliminary studies show that the industries can absorb such costs and in long run this will help in sustained growth of industries through internalizing the environmental costs.(रिपोर्ट पेज 33)

गंदे पानी के ट्रीटमेंट की लागत को आंशिक या पूरी तरह से चुकाने के लिए साफ़ किये गए पानी को बेचने के लिए एक व्यवसाय माडल बनाया जा सकता है. ऐसी परियोजनाओ के लिए केंद्र सरकार से सहयोग की जरूरत है. नगरपालिका के मामले में नगरपालिका को गंदे पानी को ट्रीटमेंट के बाद बेचने का प्रयास करना चाहिए. जैसे कानपुर में सीसामऊ नाला है जिससे तीन दर्जन मोहल्लों का 13.6 करोड़ लीटर गंदा पानी निकलता है जो सीधे गंगा में जाता है. इस नाले के गंदे पानी को साफ़ करनें की व्यवस्था करनी चाहिए और साफ़ किये गए पानी को सिंचाई के लिए बेचा जा सकता है. आईआईटी की रिपोर्ट कहती है कि अगर कोई गंदे पानी को गंगा में प्रवाहित करता है तो उसपर भारी दंड होना चाहिए. (रिपोर्ट पेज 56).

वर्तमान पालिसी का केंद्र पानी को साफ़ करके नदी में छोड़ने का है. जीरो लिक्विड डिस्चार्ज पर सिर्फ चर्चाएँ होती हैं लेकिन इसे सख्ती से लागू नहीं किया जाता. मोदी जी से आग्रह है की गंगा संकट में है चूँकि पानी को साफ़ करके नदी में छोड़ा जा रहा है की नहीं इस पर हमेशा संशय बना रहता है, इसलिए नदी में जाने वाले सभी सीवेज पूर्ण रूप से बंद कर दिए जाएँ. सभी उद्योग, होटल इत्यादि गंदे पानी को साफ़ करके पुनः इस्तेमाल करे. सरकार द्वारा स्पष्ट रूप से जीरो लिक्विड डिस्चार्ज लागू करने के दिशा निर्देश दिए जाए तभी गंगा स्वच्छ रह सकती है.


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