लेख


सरकार के गंगाजी के प्रति उदासीन रुख से क्षुब्ध होकर सानंद स्वामी (डॉ. जी डी अग्रवाल, पूर्व प्रोफेसर आईआईटी कानपुर) 72 दिनों से हरिद्वार के मात्रसदन हरिद्वार में निराहार रह कर शरीर की परवाह न करते हुए तपस्या कर रहे हैं.

उनका मत है कि गंगाजी पर बन रहे बाँध गंगा के जल की विशेषता को नष्ट कर रहे हैं. पूर्व में यह जल सड़ता नहीं था. रोग, शोक एवं ताप को नष्ट करता था. अब ऐसा नहीं है. गंगा पर बाँध बनने से इसमें विद्यमान कालिफाज जैसे लाभकारी जीवाणु नष्ट हो रहे हैं. कुछ तो टनल में ऑक्सीजन की कमी से समाप्त हो जाते हैं और बचे हुए टरबाइन में घुमाए जाने से नष्ट हो जाते हैं. ऊपर पत्थरों की रगड़ से पानी में तांबे जैसे लाभकारी धातु प्रवेश करते हैं, जड़ी बूटियों के गुण भी पानी में प्रवेश करते हैं, साथ ही बद्री विशाल की आध्यात्मिक ताकत पानी के साथ बहकर आती है. बाँध के पीछे पानी रुके रहने से सारे गुण समाप्त हो जाते हैं. ऐसे में गंगाजल की प्रदुषण एवं रोग नाशक क्षमता बाँध से नष्ट हो जाती हैं और पानी सड़ने लगता है. शोध में पाया गया है कि बाँध के ऊपर के पानी में उपरोक्त सभी गुण मौजूद हैं और नीचे के पानी में नहीं हैं. इसी प्रकार बाँध के नीचे पानी में स्नान करने के असर में भी महसूस किया जाता है. अतः गंगाजल विशेष है.

1916 में ब्रिटिश काल में गंगा पर बाँध बनाने की मंत्रणा करने के लिए मदन मोहन मालवीय जी और 8 महाराजा, अन्य गणमान्य व्यक्ति एवं ब्रिटिश वायसराय के प्रतिनिधि कुल 50 लोग एकत्रित हुए थे. यह किसी एक राज्य का मामला नहीं था. यह देश की संस्कृति का मामला था. अतः पूरे देश के लोग एकत्रित हुए थे. ज्ञात हो कि राजा भगीरथ अपने पूर्वजों को तारने के लिए गंगाजी को लाये थे ताकि गंगासागर तक निर्विघ्न बहते हुए उनके पूर्वजों को मोक्ष प्राप्त हो जाए. यह सत्य है कि आर्य संस्कृति के लोग भारत के बाहर कही भी रहें, गंगा में डुबकी लगाने को तरसते हैं. मुसलमान शासक अकबर और औरंगजेब, राजस्थान के अनेकों राजपूत शासक केवल गंगाजल इसलिए नहीं पीते थे कि वह देवी है. वे इसलिए पीते थे क्योंकि उसमे रोग प्रतिरोधक क्षमता एवं मानसिक प्रसन्नता देने का गुण था.

आज देश की सरकार और संत समाज दोनों “गंगाजी का पूर्व स्वरुप” स्थापित करने में रूचि नहीं रखते हैं. वे गंगा की विशेषता को बांधों के माध्यम से नष्ट कर रहे हैं.

सानंद स्वामी ने 2011 में जगद्गुरु शंकराचार्य श्री स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य श्री अविमुक्तेश्वरानंद से संन्यास की दीक्षा ली. गुरु अविमुक्तेश्वरानंद के प्रति आज भी उनका अपार स्नेह है, परन्तु वे अपने को छला हुआ महसूस करते हैं. 2012-13 में गुरु अविमुक्तेश्वरानंद नें गंगा सागर में पांच लोगों को गंगा पर बन रहे बांधों से गंगा को मुक्त कराने के लिए तपस्या करने का संकल्प दिलाया था. योजना थी कि एक के बाद दूसरा पाँचों लोग तप करेंगे. वहां से लौटकर गुरु के आदेश से वे तपस्या पर बैठ गए. गुरु के गुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती को इनका संकल्प सही नहीं लगा, क्योंकि उनके सम्बन्ध देश के अनेकों केन्द्रीय मंत्रियों एवं जीवीके बाँध कंपनी से थे. संकल्प से उन मंत्रियों का नुकसान होता था. अतः उन्होंने अविमुक्तेश्वरानंद पर उपवास खुलवाने का दबाव बनाया. गुरु अविमुक्तेश्वरानंद नें अपने शिष्यों को दिलाये गए संकल्प में सहायक बनने के स्थान पर उनका उपवास खुलवा दिया.

“मंत्रियों एवं जीवीके कंपनी का हित साधने के लिए मेरा उपवास खुलवा दिया”  

दरअसल गुरु अविमुक्तेश्वरानंद जी को स्वरूपानंदजी से मिलने वाली गद्दी का मोह है. उनके संकल्प और शिष्य की परवाह नहीं है. स्वरूपानंदजी को मात्र अपने मठ की परवाह है गंगाजी की नहीं. देश के सभी साधू चाहे वे चिन्मयानन्द हों, चिदानंद हों, अथवा रामदेव किसी को गंगाजी को बचाने में रूचि नहीं है.

निराहार रहकर शरीर त्यागने के सम्बन्ध में सानंद बचपन में पढ़े उस प्रकरण का ऊल्लेख करते हैं जिसका स्मरण उन्हें आज भी है. वे कहते हैं कि सईस वो होता है जो घोड़े की मालिश एवं भोजन इत्यादि के प्रबंध का कार्य करता है. वह ध्यान रखता है कि घोड़ा कमज़ोर न हो जाए और रईस वह होता है जो घोड़े को दौड़ाता है. उसके पास इतना समय नहीं होता है कि वह उसके दानापानी के लिए पूछे. वह तो अपने उद्देश्य तक पहुँचने के लिए चाबुक मारता हुआ उसे दौड़ाता है और उद्देश्य को हासिल कर लेता है. घोड़ा भी उसका साथ देता है. महाराणाप्रताप नें चेतक के साथ ऐसा ही किया था. सानंद स्वामी को सईस बनना गवारा नहीं है. वे अपनी तुलना उस रईस से करते हैं जो घोड़े की परवाह न करके उद्देश्य को हासिल करता है. वे अपने शरीर को उस घोड़े की तरह देखते हैं और उसपर रईस की तरह सवारी करना चाहते हैं. उनका उद्देश्य गंगा को बचाना है. अतएव वे घोड़े सरीखे अपने शरीर को त्यागना उचित समझते हैं.

इस लेख को स्वयं स्वामी जी की वाणी में नीचे सुने.

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