लेख


श्रीनगर जलविद्युत परियोजना पर मक डंपिंग

उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने अवैध मक डंपिंग के कारण उत्तराखंड में दो जल विद्युत परियोजनाओं का निर्माण रोक दिया था. सर्वोच्च न्यायालय का उच्च न्यायालय के निर्णय को बदलते हुए  निर्माण की अनुमति दी है. इससे पहले भी सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसा ही किया था.

कहानी 2010 के आसपास शुरू होती है जब उत्तराखंड में अलकनंदा नदी पर श्रीनगर जलविद्युत परियोजना के निर्माण के चलते हुए नदी में अंधाधुंध मक डंपिंग हो रही थी. चार सरकारी समितियों (वन सलाहकार समिति, पर्यावरण और वन मंत्रालय की दो समिति, एडवोकेट कमिश्नर श्री ए डी एन राव की अध्यक्षता वाली समिति) ने पाया था कि इस परियोजना द्वारा नदी में अवैध रूप से मिट्टी को अलकनंदा नदी में डाला जा रहा था. वन सलाहकार समिति ने यह भी सिफारिश की थी कि अवैध मक डंपिंग के कारण परियोजना पर काम रोक दिया जाना चाहिए, लेकिन मंत्रालय इस सिफारिश पर कार्य करने के पक्ष में नहीं था अतः इस मामले को राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के समक्ष उठाया गया. 

अवैध मक डंपिंग का मामला NGT के समक्ष भी उठाया गया

इसी बीच परियोजना को पर्यावरण मंजूरी की वैधता को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई थी. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल से मक डंपिंग का मामला खुद को स्थानांतरित कर दिया. सुप्रीम कोर्ट को देश में किसी भी अदालत में किसी भी मामले को अपने आप में स्थानांतरित करने का अधिकार है. मामले को अपने पास स्थानांतरित करने के बाद, इन समितियों की सिफारिशों पर विचार करने के बजाय सुप्रीम कोर्ट ने एक और समिति की नियुक्ति के लिए पर्यावरण मंत्रालय से कहा. अब इस समिति की अध्यक्षता आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिक अरुण कुमार को दी गयी थी. अरुण कुमार ने श्रीनगर परियोजना को क्लीन चिट दे दी. अरुण कुमार की रिपोर्ट के आधार पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा परियोजना को क्लीन चिट दे दी गयी.

अरुण कुमार की विश्वसनीयता संदिग्ध है. वह मंत्रालय के पसंदीदा थे. मंत्रालय ने उन्हें उत्तराखंड में जलविद्युत परियोजनाओं के संचयी पर्यावरणीय प्रभावों पर अध्ययन करने की जिम्मेदारी दी थी. इस निर्णय के दूसरे हिस्से में  सुप्रीम कोर्ट ने उनकी रिपोर्ट को खारिज कर दिया और कहा कि अरुण कुमार की रिपोर्ट ने वास्तव में काम्युलेटिव (कई परियोजनाओं को एक साथ) प्रभावों को नहीं देखा है. लेकिन याचिकाकर्ता की आपत्ति के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने अरुण कुमार की रिपोर्ट स्वीकार कर ली और परियोजना को अलकनंदा नदी में अंधाधुंध मक डंपिंग के बावजूद जारी रखने की इजाजत दे दी.

वर्ष 2013 में अलकनंदा में भीषण बाढ़ आई. श्रीनगर परियोजना द्वारा अवैध रूप से डंप किए जाने वाले मक की बड़ी मात्रा नदी में बह गयी.

मक डंपिंग की वजह से आवासीय क्षेत्रों में नुक्सान

मक डंपिंग द्वारा नदी में मिट्टी के बह जाने से नदी के तल में लगभग 10 फीट की वृद्धि हुई. नतीजन, पानी का स्तर भी बढ़ गया. इस पानी ने श्रीनगर परियोजना के पावरहाउस और श्रीनगर के भक्तियना क्षेत्र में बड़ी संख्या में घरों में प्रवेश किया. राष्ट्रीय राजमार्ग 58 मक और पानी से भर गया था जिससे यह कई दिनों के लिए बंद कर दिया था.

घटनाओं के उपरोक्त अनुक्रम से पता चलता है कि अवैध गतिविधियों के बावजूद परियोजना के निर्माण की अनुमति सुप्रीम कोर्ट ने दे दी. भक्तियना के लोगों की पीड़ा केवल सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के कारण है. अवैध मक डंपिंग के पक्ष में ऐसे फैसले देने के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाना उचित होगा. 

अब सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर अपनी गलती दोहराई है. सुप्रीम कोर्ट ने  उत्तराखंड उच्च न्यायालय के फैसले को पलटकर सिंगोली भटवारी और विष्णुगढ़ पिपलकोटी पावर प्रोजेक्ट के निर्माण की अनुमति दे दी है. अवैध मक डंपिंग अब पहले की तरह जारी रहेगी और फिर से उत्तराखंड के लोगों को नुकसान पहुंचाएगी जैसे श्रीनगर में हुआ है जिसके लिए सर्वोच्च न्यायालय जिम्मेदार होगा.


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