लेख


गंगाजी   और  पन-बिजली   -   विकास

[ यह लेख श्री स्वामी ज्ञान स्वरुप सानंद जी (फॉर्मर प्रोफेसर जी डी अग्रवाल, आई आई टी कानपुर और सेकेटरी मेंबर - केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ) के पचासवें दिन की भूख हड़ताल के दिन लिया गया है. स्वामी ज्ञान स्वरुप का सबसे व्यापक बयान इस बात के लिए है कि वे गंगाजी के लिए क्यों आमरण अनशन पर हैं -  उनके लिए  गंगा तपस्या और उन लोगों के लिए सांस्कृतिक विवेक जाग्रत करने के लिए एक एक आवाहन है  जिससे माँ गंगा की देखभाल हो सके.]

sanand swami ji maharaaj

A

गंगाजी - विशेषतायें  एवं महत्व

A1 प्रथमदृष्ट्या गंगाजी एक धारा हैं । धारा का प्रमुख गुण होता है प्रवाह, प्रवाह नहीं तो वह धारा नहीं; झील, तालाब, जोहड, पोखर कुछ भी हो, पर धारा नहीं । टिहरी बांध के पीछे 50-60 कि.मी., श्रीनगर-अलकनंदा बांध के पीछे 10-15 कि.मी., यहां तक कि मनेरी बांध के पीछे 2-3 कि.मी., या उत्तरकाशी और विष्णुप्रयाग बराजों के पीछे एकाध कि.मी. को अब न धारा कह सकते हैं, न गंगाजी ।

A2 हिमालय पर्वत के ग्लेशियरों (हिमनदों) तथा पर्वत-सिक्त झरनों द्वारा पूरित जल के कारण गंगाजी की धाराए स्वभावतः सदानीरा हैं, मौसमी, बरसाती नहीं । प्रवाह घटता - बढता हैं ; प्राकृतिक कारणों से जैसे वर्षा, तापक्रम, हिमपात; पर्याप्त सूचना देकर अनायास नहीं; विशेषतया मानव-इच्छा या मानव-स्वार्थ जनित कारणों से नहीं (जैसा जल-विद्युत उत्पादन में बार-बार होता रहता है) ।

A3 प्राकृतिक जलधाराओं जिनमें पहाडी सोतों, झरनों से नदी, नाले, गाड सभी आते हैं एक विशेष गुण है ऊपर वायु-मण्डल से और शेष तीन तरफ (तली और दोनों बगल) में क्षेत्र की भूमि के साथ निरंतर सम्पर्क और आदान प्रदान । कहीं तली या एक या दोनों बगल की भूमि से जल रिस कर धारा में आता है, तो कहीं रिस कर धारा से भूमि में आता है । कहीं तली या भूमि के कण, टुकडे कट कर धारा में मिल जाते हैं तो कहीं धारा से अलग हो तली या एक या दोनों बगलों में बैठ जाते हैं । कहीं वायु में उपस्थित आक्सिजन, कार्बन डाई आक्साइड, नैट्रोजन आक्साइड, सल्फर आक्साइड, आदी गैसें जल में धुल जाती हैं तो जल जीवो द्वारा उत्सर्जित गैसें जल-धारा से निकल कर वायु में चली जाती हैं । यदि ऊपर छत डाल कर जल का वायु-मण्डल से सम्पर्क समाप्त कर दिया जाये, या तली पक्की कर या एक या दोनों बगल में तट बन्ध बनाकर उसका क्षेत्र की भूमि से सम्पर्क काटदिया जाये तो वह प्राकृतिक नदी नहीं रह जाती । प्राकृतिक नदी के इन आवश्य गुणों को अंग्रेजी में bed connectivity, lateral connectivity तथा open-to-air कहते हैं ।

A4 उपर्युक्त सभी गुणों, सदैव समुचित (प्राकृतिक/नैसर्गिक या environmental/ecological/पर्यावश्यक) प्रवाह (गति एवं मात्रा दोनों) तथा निरन्तर वायु-मण्डल से और क्षेत्रीय भूमि से तीनों ओर (तली और दोनों तटों) से सम्पर्क के साथ-साथ अबाध प्रवाह-पथ (longitudinal connectivity) कि शर्त मिलाने पर यदि पूरी होती हों तब हम उस धारा को अविरल कहेंगे । स्पष्ट है कि उपर्युक्त शर्ते मानव छेड छाड हीन स्थिति ही में सैद्धान्तिक या वास्तविक रूप में पूरी हो सकती हैं । व्यावहारिक परिस्थिति में छोटे-मोटे समझौते करने ही पडेंगे जैसे हम पुल बनाते समय करते हैं ।

A5 सभी जानते हैं कि सभी मानव-सभ्यतायें नदी घाटियों में ही जन्मी, पालित हुई और इस का कारण मात्र जल नहीं, उतना ही महत्वपूर्ण गुण-वती मृदा का सृजन आदान-प्रदान एवं नवी-करण था जो बिना अविरलता के संभव नहीं । भूगर्भ जल स्तर को बनाये रख वर्षा-हीन महीनों में पेय जल, सिंचाई आदि में योगदान दे पाना भी अविरलता के अभाव में संभव नहीं होगा । अविरलता की सबसे अधिक आवश्यकता तो जलीय प्राणियों को है चाहे वह हिल्सा माछ हो या डाल्फिन या घडियाल या कछुए, बैक्टीरिया या कीडे खाने वाले मैंढक ।

A6 गंगाजी, प्रथमदृष्ट्या एक प्राकृतिक जल-धारा, एक नदीं हैं (जैसा कि A1 में कहा गया है) उन पर भी वें सभी बातें लागू होती हैं जो हर अन्य नदी पर लागू होती हैं और हम ने A1 से A5 में कही । हर नदी में हर समय हर स्थान पर उस नदी, समय, और स्थान के लिये आवश्यक पर्यावश्यक (ecological/environmental) प्रवाह होना चाहिये और bed connectivity, longitudinal and lateral connectivity तथा open-to-air आदि अविरलता की सभी शर्तें (छोटो-मोटे समझौतों के साथ) पूरी होनी चाहिए । पर क्या गंगा जी के लिये भी मात्र इतना ही अर्थात् अविरलता की शर्तें पूरा होना ही काफी है ?? नहीं ,नहीं !!

A7 गंगाजी को हमारी पुरातन (हिंदू, बौद्ध, जैन, द्रविड, बनवासी आदी सभी पुरातन भारतीय, भारत में जन्मी) संस्कृतियों में अत्यंत विशेष, अत्यन्त उच्च स्थान दिया गया - सभी अन्य नदियों से ऊपर । रामायण और राजा भगीरथ की कथा द्वारा गंगाजी के पाप-नाशक, मोक्ष-दायक होने की कह, उनका संबंध हमारे तीनों बडे देवता ब्रह्मा-विष्णु-महेश से जोड कर, गीता में कृष्ण जी द्वारा धाराओं में मैं जाह्नवी (गंगा) कहलाकर, और आदि शंकर द्वारा रोग-शोक-ताप-पाप हरने वाली के रूप में । पुराणों में तो ढेर सारी अनर्गल कथायें गढ कर उन्हें कहीं देवी (super-human) तो कही मानवी (human) रूप देकर । किसी पण्डित संस्कृतज्ञ से गंगाजी की विशेषता पूछो तो वो ढेर सारे श्लोक पढ देगा या पौराणिक कथायें सुना देगा पूछो प्रमाण तो कहेगा शास्त्रवचन । शायद कुछ और श्लोक पढ डाले । मैं शास्त्रों के प्रति श्रद्धा रखता हूं पर पोंगा पन्थी के प्रति नहीं । गंगाजी की तथा उनके जल, उनके द्वारा लाई गई मिट्टी, साद (जो नीचे बैठ जाये), गाद (जो तैरती रहे) जल जीवों की विशेषतायें हमारे पूर्वजों ने अपने अनुभवों से जानी, जांची, वर्षों तक परखी और फिर अपनी भावी नासमझ अनुभवहीन पीढियों के लिये उन्हें विशेष वरदान के रूप में आदर देने, उनका संरक्षण करने को कह गये । स्वार्थी संस्कृतज्ञ ब्राह्मणों ने उन्हें पुराणों का पात्र बना डाला । चलो इस मूर्खता और पोंगा पंथी से ही सही उन्नीसवीं सदी में कॅाटले से पहले तक गंगाजी मानवीया छेड छाड से तो बची रही । वैसे हिलसा माछ, गांगेय डाल्फिन,अन्य गांगेय जलजीव, गंगाजी की मिट्टी, साद, गाद के उपजाऊपन, गंगाजल के सडन-मुक्त, प्रदूषण-नाशक, रोग-नाशक गुणों को क्या हमारें पूर्वज अपने लंबी अनुभव से नही जानते थे - मुझे तो ये सब मेरे बाबा दादी ने बताये-सिखाये जो न विज्ञान पढे थे न पुराणों पर विश्वास करते थे । अब गंगाजल तथा गंगाजी की मिट्टी, साद, गाद (और बालू, बजरी, बोल्डर भी क्योंकि इन्ही से तो मिट्टी, साद, गाद बनते है) का विश्लेषण और अध्ययन इन गुणों की पुष्टि करना, मात्रा नापना और इन गुणों के वैज्ञानिक कारण तलाशना वैज्ञानिक शोधकर्ताओं का काम है और ऐसी शोध प्रेरित करना जरूरत पडे तो आदेश देकर कराना हमारे नेताओं हमारी सरकारों का काम । ऐसी शोध पर्याप्त मात्रा में हो रही है क्या? नहीं हो रही तो क्यों नहीं हो रही?? जब तक न हो तब तक गंगाजी को सामान्य नदी मान उन्हें विकास रथ में जोतकर मार डालें??? वाह री हमारी सरकार !!!

A8 उपरोक्त चर्चा से निम्न निष्कर्श स्पष्ट हो जाते हैं -

(क) गंगाजल सामान्य जल नहीं - उसमें अद्भुत अनुपम सडन-नाशक, रोग नाशक, स्वास्थ्य वर्धक, प्रदूषण नाशक गुण है जिन्हें बनाये रखने हैं ।

(ख) उपरोक्त गुण निलाम्बित कणों के कारण हैं । प्रवाह में छेड-छाड करने से ये कण नीचे बैठ जाते हैं (जैसे बांध बराज के पीछे) या नष्ट हो जाते है (जैसे टरबाइन में) ।

(ग) गंगाजल की गुणवत्ता बनाये रखने के लिये अविरल प्रवाह जरूरी होगा । 

(घ) गंगाजी के जल जीवों की रक्षा के लिये भी अविरलता आवश्यक शर्त होगी । 

(ङ) गंगाजी के विशेष गुण-युक्त जल कम से कम कुछ मात्राओं में गंगासागर तक पहुंचे और जल जीवों के भी रक्षा हो इसके लिये हर स्थान पर हर समय गंगाजी की धारा में न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह बना रहना आवश्यक होगा ।

(च) गंगाजल की गुणवत्ता मात्र pH (acidity), DO (Dissolved Oxygen), BOD (Biological Oxygen Demand) , TDS (Total Dissolved Solids) , FC (Free Chlorine), TC (Total Chlorine) जैसे सामान्य जल गुणवत्ता से नही मापी जा सकती न केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड, BIS (Bureau of Indian Standards), EPA (United States Environmental Protection Agency) या WHO (World Health Organization) के मानक गंगाजल पर लगाये जा सकते हैं । RO (Reverse Osmosis), UV (Ultra Violet) जैसी आधुनिक तकनीकों संशोधित जल गंगाजल या उसके समान नहीं बन जायेंगे । गंगाजल की गुणवत्ता के परीक्षण के लिये हमें नये कारक, नये मानक, स्थापित करने होंगे । याद रखें निर्मल जल गंगा जल नहीं हो जाता, गंगाजल की गुणवत्ता  निर्मलता  से कहीं अलग, अधिक  र ऊपर है ।

(छ) इसका अर्थ यह नहीं कि निर्मलता आवश्यक नहीं क्योंकि डाला गया मल गंगाजल के स्वाभाविक गुणों को भी प्रभावित कर सकता है । आवश्यक गंगा जल के स्वाभाविक गुणों का आकलन और उनकी रक्षा, जैसे भी हो ।


B

पन-बिजली  -- विकास

 

B1 कोई भी क्रिया बिना ऊर्जा नहीं हो सकती, चाहे वह जैवि क क्रिया हो चाहे भौतिक या रासायनिक एवं प्राकृतिक । साथ ही हमारी पृथ्वी पर ऊर्जा का एक मात्र स्रोत सूर्य है - (जैसे कि सभी पदार्थों का भी आदि स्रोत क्योंकि अन्ततः तो हमारी पृथ्वी सूर्य से ही टूटा एक टुकडा है ) । सूर्य से प्राप्त यह ऊर्जा एक ओर तो सभी ठोस और द्रव पदार्थों मे रासायनिक ऊर्जा के रूप में विद्यमान है और पृथ्वी के गर्भ में तापीय geo-thermal ऊर्जा के रूप में भी तथा दूसरी ओर सूर्य किरणों के माध्यम से प्रकाश और ताप के रूप में ही नहीं वायु-प्रवाह जनित पवन ऊर्जा, समुद्री तरंगों और ज्वार-भाटे की या बनस्पति, पेड पौधों की बदने में संगृहीत होती रासायनिक ऊर्जा भी मूलतः सौर ऊर्जा ही है । ऊंचे पहाडों से तेजी के साथ नीचे आते जल में या जल प्रपात में उपस्थित भौतिक ऊर्जा (static या potential energy + गतिज या dynamic energy) भी मूलतः सौर ऊर्जा ही है । टरबाईन - generator द्वारा इस ऊर्जा का दोहन कर इसे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करना पन-बिजली उत्पादन कहलाता है ।

B2 जीवन का तात्पर्य ही क्रियात्मकता है । सृष्टि में जीवन के उद्भव से ही प्रत्येक जीव अपनी सभी स्वाभाविक एवं आवश्यक क्रियाओं को अपने स्वयं के शरीर में विद्यमान रासायनिक ऊर्जा के द्वारा सम्पन्न करता था जिसकी पूर्ति वह या तो प्रकाश-संश्लेषण द्वारा करता था या अपने भोजन के आक्सीकरण या अन्य रासायनिक क्रियाओं द्वारा । छोटे से छोटे  जीवाणु से लेकर बडे से बडे पशु पक्षि तक, जिन में मानव भी शामिल है अन्य किसी प्रकार की ऊर्जा की आवश्यकता जीवों को नहीं थी। सभी अपनी सभी क्रियायें प्रकाश-संश्लेषण या भोजन से प्राप्त शारीरिक ऊर्जा से स्वयं ही कर लेते थे । अधिकतर जीवों में तो सहयोग की भी आवश्यकता कम ही पडती थी, चीटियों, मधुमक्खियों, जैसी कुछ प्रजातियों को छोड कर या जीव के शैशव काल में । पर मानव जाति तो अधिक बुद्धिशाली थी । और वह बुद्धि ही क्या जो श्रम से बचने के तरीके न ढूंढे सो शरीरश्रम से बचने के लिये पशुओं का और मानव-दासों के पशुबल की ऊर्जा का उपयोग शुरू हुवा । जैसे सभ्यता का विकास हुवा शरीरबल के साथ साथ पशुबल का उपयोग भी हेय माने जाने लगा साथ ही ऊर्जा की खपत भी दिन दूनी रात चौगुनी बढती गई । यातायात साधन, प्रकाश या पंखे ही नहीं, ए०सी०, मिक्सी, ओवेन, फ्रिज, वाशिंग मशीन, वैक्यूम क्लीनर, तरह तरह के कल कारखाने । जितना अधिक सभ्य उतनी अधिक ऊर्जा की खपत और फिर भी संतोष नहीं- और - और - और । ऐसे में पहाडों से आते जल की पनबिजली पर ललचाई नजर कैसे न पडती ।

B3 तीव्र गति से बहते या तीखे ढाल से नीचे उतरते जल से सीधे टरबाईन चला कर बिजली बनाई जा सकती है - इससे प्राप्त होने वाली ऊर्जा की मात्रा [ प्रवाह * (((गति^२)/२)) + g * ऊंचाई का अंतर) ] के ऊपर निर्भर करती है । पहाडी क्षेत्र में जहां प्रवाह की गति और ऊंचाई का अंतर अधिक मिलते हैं प्रवाह की मात्रा कम ही होती है - प्रकृति में जल प्रवाह की गति भी 3-4 मी०/से० से अधिक नहीं मिलती (तली के घर्षण और वायु के अवरोध के कारण / अतः प्राप्त हो सकने वाली ऊर्जा अन्ततः [ प्रवाह की मात्रा x ऊंचायी के अंतर ] पर निर्भर हो जाती है । प्राकृतिक प्रपात पर तो सीधे सीधे प्रपात के ऊपर से जल पेन्सटाक पाइप के द्वारा प्रपात के नीचे स्थापित टर्बाइन में डाल कर बिजली बनाई जा सकती है - अन्यथा एक कृत्रिम प्रपात उत्पन्न करना पडता है बांध बनाकर । जितना ऊंचा बांध, उतना ही अधिक ऊंचायी का अन्तर, उतना ही अधिक बिजली उत्पादन । पर बांध के पीछे इतनी ही बडी झील, झील में डूबने वाली भूमि, बनों या खेती का विनाश, लोगों का विस्थापन, लागत तो बडी होगी ही । टिहरी बांध का उदाहरण सामने है ही जिसने धरासू से लगभग 60 कि०मी० दूर बांध की भागीरथी जी को प्रवाह-हीन झील में परिवर्तित कर दिया, एक लाख से ऊपर लोगों को उजाडा उनकी कृषि भूमि और संपत्ति और एक बडे क्षेत्र के बन नष्ट किये । पर्यावरण पर वन्य पशुओं पर तथा प्रवासी जलजीव प्रजातियों पर दुष्प्रभाव तो सदा बने ही रहेंगे ।

ऊँचा बांध बनाने का एक दूसरा विकल्प निकाला गया । एक कम ऊंचे बांध या बराज के द्वारा जल धारा को बगल के पहाड में एक बडे पाइपनुमा सुरंग खोद कर पहाड के अंदर अंदर ले जाकर कही 10-25 कि०मी० दूर और सुरंग के मुह से 100-250 मीटर नीचे उसी नदी या किसी अन्य जल प्रवाह के पास टर्बाइन लगा कर बिजली बना कर जल को फेंक दिया जाये । इस में ऊंचा बांध तो नहीं बनाना पडा पर पहाड में एक लंबी सुरंग खोदनी पडी । झील नहीं बनी पर मलबा जो सुरंग से निकला उसके निस्तारण की समस्या । जल में प्रवाह तो बना रहा पर जल का प्राकृतिक चहानों, बनस्पति और वायु से संपर्क तो कट गया । जल जीवों का संकट भी जस का तस बना रहा । पहाड में बडे व्यास की लंबी सुरंग बनाने से जल स्रोतों की और पहाड की स्थिरता की नई समस्याएं खडी होने की या ऊपर के पहाडों के ढहने-टूटने की समस्याएं भी बड जाती हैं ।

B4 उपरोक्त सभी कठिनाई और दुष्प्रभाव होते हुवे भी यदि पर्यावरण पर होने वाले दुष्प्रभाव की लागत न जोडी जाये तो अन्य किसी भी तरह के (पशु-ऊर्जा को छोडकर) ऊर्जा दोहन से सस्ती पडती हैं । प्रारंभ में स्थापित करने में बडी पूंजी भले ही लगे, पर बाद में हल्दी लगे ना फिटकरी पर रंग आये चोखा वाली बात हो जाती है - लगभग मुफ्त ढेर सारी ऊर्जा । इसमें भी बडी बात यह कि ऊर्जा दोहन के अन्य तरीकों की तुलना में पन-बिजली स्थापनाओं की अधिक लागत मशीनों पर नहीं बांध या सुरंग बनाने में मजदूरों तथा दुलाई जैसे कार्यो पर होता है जिसे सरकारे पसन्द करती हैं - बहुत लोगों को रोजगार मिलता हैं - सालों तक । सडके बनती है पूरा क्षेत्र बाहर के लिये खुल सा जाता जाता है ।

B5 पन बिजली की एक विशेषता मिनटों में उत्पादन शुरू कर देने और जब चाहों मिनटों में उसे बन्द कर देने में है । अतः अधिक आवश्यक के समय (जैसे सायं 6 बजे से 11 बजे तक) बिजली बनाई फिर अगले दिन सायं तक बन्द कर दी । इसका प्रभाव नीचे के स्थानों जलस्तर के घटने बढने पर और जल-जीवों पर पडता है - जैसे उत्तरकाशी के घाटों पर मनेरी-भाली परियोजना का या ऋषिकेश के त्रिवेणी घाट पर टिहरी का । क्या इसका कोई मूल्य नहीं ?

C

गंगाजी  र पन-बिजली

 

C1 गंगाजी या उनकी उत्तराखंड में स्थित धाराओं के साथ कोई बडी छेड छाड मुगलों के शासनकाल तक भी नहीं हुई, यद्यपि यमुना जी से पश्चिमी यमुना नहर निकालने का कार्य अकबर के शासन में शुरू हुवा, और शाहजहां के काल में तो इस से यमुना जी का जल डाक - पत्थर से इस नहर द्वारा करनाल, कुरुक्षेत्र, पानीपत होता हुवा दिल्ली में चांदनी चौक और लाल किले तक पहुंचता था । 1820 के दशक में अंग्रेजों ने इस बादशाही नहर का नवीकरण किया, और डाक-पत्थर से पूर्वी यमुना नहर निकाली जो सहारनपुर, शामली, बडौत, बागपत होते हुवे दिल्ली शाहदरा तक सिंचाई-जल पहुंचाती थी । 1840 में अंग्रेज सरकार ने गंगाजी को छेडने का साहस किया । गंगाजी से निकलने वाली पहली नहर का कार्य 1841 में प्रारंभ होकर 1846 में पूरा हुवा । नहर के मार्ग में उपलब्ध ढाल उससे कहीं अधिक था जितने की नहर के प्रवाह के लिये जरूरत थी अतः नहर में कई जगह जल प्रपात थे जैसे पथरी, आसफनगर, मुहम्मदपुर, आदि ।

C2 कॅाटले (Sir Proby Thomas Cautley) द्वारा बनाये भीमगोडा हैडवर्क्स एक बहुत कम ऊंचायी (1.5 मी०) पत्थर की चिनाई की दीवार (weir) थी जिसकी ऊंचायी बढाने के लिये जल कम होने पर 0.5 मी० तख्ते खडे किये जाते थे। उसके एक भाग में मछलियों के ऊपर नीचे जाने के लिये fish-ladder थी । बगल से (दाये) नहर हर की पैडी से होती हुई जाती थी - आवश्यकता से अधिक जल बाये तट के साथ लगे तख्ते दार फाटकों से निकाल कर वापस नील धारा में डाल दिया जाता था । इस प्रकार न अविरलता भंग होती थी न गंगाजी के विशेष कणों या जलीय जीवों के आवागमन में बाधा पडती थी । मान्यता भी यही थी और काफी हद तक तथ्य भी कि रुडकी, देबबन्द, खतौली, मुरादनगर, बुलन्दशहर, तक तो मानो गंगनहर गंगाजी की धारा ही है - उसी श्रद्धा से लोग नहाते और पूजा करते हैं ।

C3 1905-1910 बीच भीमगोडा हैडवर्क्स का आधुनिकीकरण हो गया कान्क्रीट का बांध, लोहे के गेटवाले स्लूइस आदि और मायापुर डैम बन गये । गंगाजी अविरलता भंग हो गयी - हर की पैडी से ऊपर ही । कई वर्ष के संघर्ष के बाद माननीय मालवीय जी के नेतृत्व में हर की पैडी की अविरल धारा तो प्रतीक रूप में बहाल हो गयी पर नीचे की नहर और नील-धारा-गंगाजी की मूलधारा जिस पर नीचे की सभी गांगेय तीर्थ स्थित हैं - शुक्रताल, बृजघाट, राजघाट, ब्रह्मावर्त, शृंगवेरपुर, प्रयाग, वाराणसी आदि सभी स्थित हैं, तो गंगाजी की अविरल धारा से महरूम ही हैं । गंगात्व या गंगाजी के विशेष गुणों से अनभिज्ञ, हरिद्वार से नीचे के जल में सडनहीनता विशेषता के प्रति तापरवाह, प्राचीन ग्रंथों (तथाकथित शास्त्रों) की कथाओं में अंधविश्वास रखने वाले मूढ, लालची, स्वार्थी हमारे समाज को क्या अन्तर पडना था -- उन्हें तो बस मनौतियां मांगना, परम्परा निभाना ।

C4 1920 के बाद अंग्रेज सरकारों का ध्यान पन-बिजली दोहन की ओर गया और गंगा नहर पर स्थित दो बडे प्रपातों, पथरी तथा मुहम्मदपुर में पनबिजली घर बनायें गये इन में न भण्डारण बांध था न सुरंग । नहर में गंगात्व या अविरलता का प्रश्न ही नहीं था और इन बिजली घरों से कोई दुष्प्रभाव हुवा हो मुझे नही लगता । 1952-55 में ऊपर के दो छोटे प्रपातों को तोडकर, पूरे प्रवाह का बिजली बनाने में उपयोग कर तथा डिजाइन में सुधार कर पथरी जल-विद्युत-केंद्र की क्षमता लगभग तिगुनी कर दी गई । मैं तब रुडकी में पढ रहा था जहां से पथरी मात्र 18 कि०मी० था । पनबिजलीघर डिजाइन और निर्माण के पहले पाठ मैं ने वहीं से सीखे ।

C5 उत्तराखंड में मुख्य धाराओं पर जल-विद्युत परियोजनाओं का कोई काम 1960 तक प्रारंभ नही हुवा यद्यपि उत्तरप्रदेश में शारदा प्रणाली पर पनबिजली दोहन शुरू हुवा और जल-विद्युत विभाग गठित हुवा जिसकी रिहन्द जल-विद्युत परियोजना के निर्माण में मैं 1954 से 1960 तक कार्यरत रहा जो एक बडे कान्क्रीट बांध पर आधारित थी । 1960 के अंतिम 6 मास में उत्तर प्रदेश के केंद्रीय डिजाइन डाइरेक्टरेट में कार्यरत था जहां मेरा सम्पर्क पहली बार गंगा-यमुना से बिजली दोहन के चिन्तन से हुवा पर यह बहुत ही प्राथमिक, लगभग वैचारिक स्तर पर ही था । 1961 के प्रारंभ में ही मैं ने उत्तरप्रदेश सरकार की सेवा त्याग, आई.आई.टी. कानपुर में अध्यापक हो गया और शीघ्र ही सिंचाई-पनबिजली क्षेत्र छोड पर्यावरण-विशेषज्ञ कहलाने लगा । पर पुराना लगाव छूटता कहाँ है? मैं सिंचाई और पनबिजली परियोजनाओं पर जाता रहा । मेरा दुर्भाग्य कि 1978 पर जब गंगाजी की किसी भी एक प्रमुख धारा पर पहली बिजली परियोजना -- भागीरथी पर मनेरी-भाली परियोजना -- प्रारंभ हो रही थी मुझे निर्माण-नियोजन विशेषज्ञ के रूप 15 दिन मनेरी निर्माणस्थल पर रहने का अवसर मिला । काश मैं उस समय उस परियोजना के भागीरथी जी पर दुष्प्रभाव आंक कर उसका विरोध करता । मनेरी-भाली एक सुरंग परियोजना थी जिसने भागीरथी जी की अविरलता नष्ट कर दी और उनके जल में विद्यमान गंगात्व को बहुत हानी पहुँचाई । अब तो मनेरी-भाली परियोजना का दूसरा चरण (उत्तरकाशी-धरासू) भी पूरा हो चुका है अब तो मनेरी से एक कि०मी० ऊपर से टिहरी (बल्कि कोटेश्वर) के नीचे तक के लगभग 150 कि०मी० में भागीरथी जी धारा के रूप में मात्र उत्तरकाशी के घाटों के निकट 2-3 कि०मी० में दिखती हैं अन्यथा या सुरंग में या झील में लुप्त । कहीं सभी निर्माणाधीन और प्रस्तावित बांध बन गये तो क्या होगा??

पनबिजली  के लिये गंगाजी  की बलि !!

क्या ऐसी संभावना  रोकने के लिये यह नश्वर जीवन दांव  पर लगाना  कोई बडी बात है?

मेरे विचार से नहीं ।

Swami Gyan Swaroop Sanand started his fast on the 22nd June 2018 CE, that is, on Ganga Dussehra having not received any responses from the Prime Minister of India or the Government of India for his Open Letters written to the Prime Minister dt. 24th February 2018 CE and 13th June 2018 CE.

He wrote a third letter to the Prime Minister of India on the 5th of August 2018 CE which was sent through Sushri Uma Bharti ji to the PM Shri Narendra Modi.

In addition to this statement, Swami Gyan Swaroop Sanand wrote an educative article to reflect on the terms being used today as well as his observations on what is the way forward given the state we are in to preserve the sacredness and uniqueness of Ma Gangaji. They can be seen from the next page. It is these ideas that inform his directives/requests for action to/from the Prime Minister through his Open Letters as well as the Letter sent through Sushri Uma Bharti ji.

 

गंगाजी की निर्मलता ~ स्वच्छता ~ पवित्रता ~ गुणवत्ता

[Article Collected on the 50th day of his fast that he started on 22nd June 2018 CE]

(Swami Gyan Swaroop Sanand wrote this on both sides of a page and left another blank page possibly to add to it.

We will add to it as and when it is updated.)

  1. गंभीरता और वैज्ञानिक समझ से बचने वाला हमारा समाज (यहां तक कि सरकारी विशेषज्ञ भी) इन दिनों गंगाजी के संदर्भ में इन चार गुणों में से पहले दो का बहुतायत से प्रयोग करता है जैसे वे दोनों एक ही बात हों । मेरे बचपन के दिनों में हम गंगाजी या गंगाजल के सन्दर्भ में पवित्रता की बात करते थे निर्मलता या स्वच्छता की नहीं । वैज्ञानिक दृष्टि से गंगाजी एक जलधारा हैं और उनके सन्दर्भ में हमें गंगाजल की गुणवत्ता की बात करनी चाहिये। इन चारों को समझें ।

(क) जिस जल में आंख से देखनेवाला मैल न हो अर्थात् जो देखने मे पारदर्शी और रंगहीन हो उसे निर्मल कहेंगे। इस प्रकार शुद्ध दूध को भी निर्मल नहीं कहेंगे पर धुले हुवे रंगहीन लवणों, BOD या उपस्थित जीवाणुओं से निर्मलता पर असर नही पडेगा । निर्मलता को मापने के कारक colour तथा turbidity होंगे।

(ख) स्वच्छता केवल एक भावात्मक गुण है जिसमें पांचों ज्ञानेन्द्रियों से पहचाने जा सकने वाले सभी गुणों का आभास ही नहीं पूर्व का इतिहास भी समाहित रहता है पर जिसे नापा नहीं जा सकता । धुले हुवे वस्त्र को स्वच्छ कहेंगे निर्मल नहीं । जिस बर्तन का संसर्ग गन्दगी से हुवा हो उसे या उसमें रखे जल को स्वच्छ नहीं कहेंगे, भले ही गन्दगी कहीं नजर न आये । इस प्रकार स्वच्छता निर्मलता से कहीं आगे जाती है - दिखाई न पडने वाली “मैल” को भी देखती है । बहुधा उपचार या शोधन से निर्मलता आती है, स्वच्छता नहीं । स्वास्थ्य के लिये स्वच्छता चाहिये निर्मलता से काम नहीं चलेगा ।

(ग) पवित्रता से तात्पर्य होता है मैल को नष्ट करने की क्षमता - केवल मैल या अस्वच्छता का अभाव या अनुपस्थिति नहीं। गंगाजल को बचपन में हमें पवित्र कहना होता था वह झूठ नहीं था क्योंकि :

  • डा. D.S. भार्गव की शोध के अनुसार गंगा जल मे BOD नष्ट करने की क्षमता सामान्य जल से 10-25 गुण अधिक है ।
  • NEERI की शोध के अनुसार मल-जीवाणु काॅलीफार्म को नष्ट करने की अद्भुत क्षमता है ।
  • IMBT चण्डीगढ के S. Mayilraj की शोध के अनुसार लगभग 20 प्रजातियों के जीवाणुओं को नष्ट करने की क्षमता है ।
  • आदि शंकराचार्य और तुलसीदास जी के अनुसार गंगाजल में रोग, शाप, ताप ही नहीं पापकर्म तक भी नाश करने का क्षमता है भले ही उसे सिद्ध न किया जा सके ।

मल को नाश करने की यह क्षमता ही गंगाजल का विशेषगुण, उसका गंगात्व है । इस गंगात्व को पूर्ववत् स्थापित करना ही Gangaji Rejuvenation होगा, इसे बनाये रखाना ही गंगाजी का  Conservation । याद रखें इसका कम से कम कुछ भाग मापनीय है ।

(घ) गुणवत्ता: ऊपर की चर्चा से यह तो स्पष्ट हो गया होगा कि गंगाजी के सन्दर्भ में मात्र निर्मलता या स्वच्छता की बात करना निरर्थक ही नहीं गंगाजी का घोर अपमान है । निर्मल तो कुएं, सरोवर, झील का या बोतलबंद पानी भी हो सकता है तो क्या वह गंगाजल हो जायेगा? गंगाजल और गंगा जी की तली की बालू-बजरी के गुणों की जांच के लिये हमें उपयुक्त अनुमापनीय कारक और उनकी स्वीकार्य सीमायें तय करनी होंगी । स्पष्ट है इनमें pH  (acidity), turbidity, DO (Dissolved Oxygen), TDS (Total Dissolved Solids), BOD (Biological Oxygen Demand), COD (Chemical Oxygen Demand) , Coliform MPN (Most Probable Number) जैसे सामान्य जल गुणवत्ता कारक तो होंगी ही (यद्यपि इनके स्वीकार्य सीमायें भिन्न हो सकती है ) साथ ही BOD Destruction Rate Constant, Re-oxidation Rate Constant, Coliphage types and density, phages for clinical pathogens - types and density - जैसे गंगात्व के विशेष गुण भी नापने होंगे । इस सब पर विस्तृत शोध कार्य की आवश्यकता है । गंगा Rejuvenation या Conservation के लिये उपलब्ध धनराशि का कम से कम 10% भाग तो ऐसी शोध पर ही लगना चाहिये जो शेष प्रबन्धन में आवश्यक कार्यों का स्वरूप तय करें ।

  1. गंगाजी की पवित्रता / गुणवत्ता (कहीं जा रही निर्मलता / स्वच्छता) के लिये कार्य:

(क) समझा जाये और दृढ मन से माना जाये कि गंगाजी के विशेषगुण उनकी पवित्रता, उनका गंगात्व सब हिमालय से आते हैं - हम एक बार नष्ट या कम हो जाने पर उन्हें पैदा नहीं कर सकते, बढा नही कर सकते - कर सकते तो गंगाजल बनाने की फैक्टरियां स्थापित कर लेते । गंगात्व का गंगाजी में अलग अलग जगह पर भिन्न भिन्न मौसम में मापन करना, उसमे कभी किन कारणों से आती है यह समझना और उस समझ के आधार पर प्रबन्धन तय करना होगा ।

(ख) अविरलता और पर्यावरणीय प्रवाह (FDC (Flow Duration Curve) विधि से गणनाकृत) बनाये रखना तो आवश्यक लगते ही हैं और इन्हें तो तुरन्त कड़ाई से लागू कर देना चाहिये ।

(ग) बाहर से आने या मिलने वाले प्रदूषण, वह नगरीय सीवेज हो या औद्योगिक अवजल या ठोस अपाशिष्ट या अन्य मल उसकी मात्रा उस समय और स्थान पर गंगाजी की शोधन क्षमता के 10% से अधिक न हो ऐसा सुनिश्चित करना होगा । गंगाजी में डालने से पूर्व शोधन -- sewage treatment, effluent treatment तथा sewage pumping, Municipal Waste Disposal, आदि -- का दायित्व गंगाजी का नहीं । गंगा मंत्रालय इनके गंगाजी में प्रवेश पर नियंत्रण कर सकता है, इन की, या इन पर खर्च की जिम्मेदारी या उसमें भागीदारी नहीं ।


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