लेख


द्वारा: श्रीपiद धर्माधिकारी एवं जिन्दा सांडभोर
भारत में प्रस्तावित राष्ट्रीय जलमार्ग

 मार्च 2016 को भारतीय संसद में राष्ट्रीय जलमार्ग अधिनियम 2016 पारित किया गया. इस अधिनियम में 111 नदियों को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया गया है. हमारे संविधान में नदियों पर मूलरुप से आधिपत्य राज्य सरकारों का है. लेकिन जहाँ संसद द्वारा किसी नदी को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया जाय, वहां पर जलमार्ग और सम्बंधित निर्माणों के अधिकार केंद्र सरकार को स्थानांतरित हो जाते हैं. उपरोक्त क़ानून के द्वारा जलमार्ग वाली नदियों पर आधिपत्य राज्य सरकार से छीनकर केंद्र सरकार को दे दिया गया है. इस क़ानून के पारित होने से केंद्र सरकार को जहाजरानी एवं नौ परिवहन के लिए इन जलमार्गों के विकास का अधिकार मिल गया है. इसके पीछे मकसद है कि, माल की ढुलाई की आर्थिक संभावनाओं का लाभ उठाया जाय.

हमारे अध्ययन में नदियों पर माल की ढुलाई की पौलिसी में निम्न समस्याएं देखी जा रही हैं:

  • कैपिटल और रख-रखाव के लिए ड्रेजिंग: कई स्थानों पर नदी की गहराई और चौड़ाई कम होती है. यहाँ पर ड्रेजिंग की आवश्यकता होती है. ड्रेजिंग के दौरान नदी की तली से गाद, गारे, चट्टानो आदि को खोद कर निकाला जाता है जिसकी वजह से नदी का सारा पानी गन्दा हो जाता है. मछलियां पलायन कर जाती हैं. जिसकी वजह से मछुवारों को भारी नुक्सान होता है. ड्रेजिंग से कछुवों और डॉल्फिन जैसे जलीय जीवों का वातावरण दूषित हो जाता है (पानी मटमैला हो जाता है), जिससे वे आपस में संचार स्थापित नहीं कर पाते हैं. गंदे पानी की वजह से जलीय वनस्पति के बीच सूर्य की रौशनी नहीं पहुँच पाती है और प्रकाश संस्लेषण की प्रक्रिया नहीं हो पाती है. उदहारण के लिये, गंगा के निचले बाढ क्षेत्रों में डॉल्फिन पर अध्ययन कर रहे विशेषज्ञ नचिकेत केलकर नें कहा है कि,

सघन ड्रेजिंग गतिविधियों से बेहद शोर और अस्थिरता पैदा होती है जिससे जलीय जीव विविधता, खासतौर से भारत के राष्ट्रीय जलीय पशु – गंगाई नदी डॉल्फिन (प्लाटेनिस्टा गैंजेटिका)” – पर बहुत हानिकारक प्रभाव पड़ते हैं. गंगा नदी में पाए जाने वाली यह लुप्तप्राय डॉल्फिन मछली एक अनूठा स्तनपायी जीव है जो अल्ट्रासोनिक फ्रीक्वेंसी से ही अपना रास्ता ढूँढता है. शोध के आधार पर हमारा अनुमान है कि प्रस्तावित विधेयक में जिस पैमाने पर जलमार्गों के लिए ड्रेजिंग की बात कही जा रही है उससे राष्ट्रीय महत्त्व की इस प्रजाति का जीवन और भी ज्यादा खतरे में पड़ जायेगा.” (रिपोर्ट 1 नीचे देखें)

नदियों व् समुद्रों में कैपिटल ड्रेजिंग इस प्रकार से की जाती है
  • नदी को छोटी धारा में समेटना: अक्सर गहराई बनाने के लिए नदी के फैले हुए पानी को एक छोटे चेनल के अन्दर एकत्रित कर दिया जाता है जिससे कि उस चैनल के अन्दर पानी की गहराई ज्यादा हो जाए और जहाज चल सकें. नदी के फैलाव क्षेत्र में जलीय जीव आसानी से अपने अण्डों का संरक्षण करते हैं जिन्हें जैवमंडल का हिस्सा माना जाता है. अतः नदी को एक धारा में समेटने से जैवमंडल में सीधे असर पड़ता है.
  • घाटों और नदी बंदरगाहों का निर्माण: अंतर्देशीय जलमार्ग निर्माण हेतु नदियों,क्रिक्स और खाड़ियों के तटों पर जगह जगह बंदरगाह और हब बनाने होंगे. इन निर्माण कार्यों से आस पास के पेड़ों और मैन्ग्रोव जंगलों की बड़े पैमाने पर कटाई होगी. महाराष्ट्र के धरमतर सीपोर्ट के लिए“राष्ट्रीय जलमार्ग -10 के रास्ते में स्थित एक जेटी के निर्माण के लिए यहाँ तट पर स्थित मैनग्रोव वन पट्टी को साफ़ कर दिया गया है.” (रिपोर्ट 2 नीचे देखें)
घाटों और बंदरगाहों में कंस्ट्रकशंन कार्य होने से गन्दगी और प्रदुषण बढ़ता है
  • बैराजों का निर्माण: नदी के पानी में आवश्यक गहराई बनाये रखने के लिए ड्रेजिंग के अलावा जगह जगह बैराज भी बनाने होंगे. बैराजों के निर्माण से नदी का किनारा डूबने लगता है, उसमे होने वाली खेती नष्ट हो जाती है, नदी का प्रवाह बदल जाता है, नदी के आसपास के पर्यावरण में बदलाव आते हैं. बैराज बनाने से नदी में गाद का बहाव भी रुक जाता है. उदाहरण के लिए 2016 में गंगा नदी में बाढ़ की स्थिति पैदा हो गयी थी. इस पर बिहार के मुख्यमंत्री नें कहा था कि “फरक्का बैराज के कारण बिहार के निचले हिस्सों (बैराज के ऊपरी हिस्सों) में बड़े पैमाने पर गाद के जमाव की वजह से बिहार में बाढ़ का इतना पानी आया था.

  • डीजल, तेल के रिसने से प्रदूषण: जलमार्गों में चलने वाले जहाज़ों से डीजल, तेल और लुब्रिकेंट रिसते रहते हैं. गंगा जलमार्ग (NW-1) में एलपीजी को जहाजों के इधन के तौर पर इस्तेमाल करने का प्रस्ताव रखा गया है. यह एक स्वागत योग्य कदम है मगर इससे भी नौकाओं से निकलने वाले लुब्रिकेंट की समस्या ख़त्म नहीं होगी.

 

जहाजों से इस प्रकार से डीजल और तेल का रिसाव होता है
  • वैश्विक अनुभव: भारत में विभिन्न परिवहन माध्यमों में अंतर्देशीय नौ परिवहन का हिस्सा केवल5 प्रतिशत रहा है जबकि चीन, अमेरिका और यूरोप में यह संख्या क्रमशः 8.7, 8.3 और 7 प्रतिशत रहा है. ऐसा प्रतीत होता है कि इन देशों का अनुसरण करते हुए भारत सरकार नें भी जलमार्गों के विस्तार का विचार बनाया है. लेकिन हम भूल रहे हैं कि भारत और अन्य देशों की नदियों के चरित्र में मौलिक अंतर है. भारत की नदियों में अधिकतर पानी मानसून के चार महीनो में बहता है जबकि यूरोप और अमेरिका की नदियों में पानी जल श्रोतों से आता है और पूरे वर्ष बहता है. भारत में पानी के स्तर का उतार चढाव ज्यादा होने के कारण वर्ष में आठ महीने नदी में पानी कम रहता है जिसको गहरा करने के लिए हमें ड्रेजिंग करनी पड़ती है. यह परिस्थिति अमेरिका और यूरोप में नहीं है. चीन का अध्ययन हम नहीं कर पाए हैं. दूसरा अंतर यह है कि हमारे देश में नदियों की गहरी सांस्कृतिक भूमिका है. कावेरी, कृष्णा, नर्मदा और गंगा को हम पूजते हैं और इनमे स्नान करते हैं. अतः भारत में जलमार्ग बनाकर नदियों के चरित्र में परिवर्तन करने से हमारी संस्कृति पर गहरा आघात पड़ता है. तीसरी बात यह है कि मिस्सिसिपी वाटरवे के अध्ययन में बताया गया है कि मूल रूप से जलमार्ग से ढुलाई करना, सड़क परिवहन की तुलना में महंगा पड़ता है. परन्तु सड़क मार्ग से ढुलाई करने पर सरकार टैक्स वसूल करती है, जबकि जलमार्ग से ढुलाई पर सरकार कोई टैक्स वसूल नहीं करती है. अतः टैक्स के इस अंतर के कारण जलमार्ग लाभकारी हो जाता है.

अमेरिका की इंस्टिट्यूट फॉर एग्रीकल्चर एंड ट्रेड पालिसीके एक अध्ययन के अनुसार अमेरिका में जलमार्गों को बनाये रखने के लिए 800 मिलियन डॉलर प्रतिवर्ष का खर्च होता है. इसमें से ढुलाई करने वाली कंपनियां केवल 80 मिलियन डॉलर अदा करती हैं जो कि कुल खर्चे का मात्र 10% होता है. बाकी 90% खर्च सरकार द्वारा वहन किया जाता है. अगर इसकी तुलना ढुलाई के दुसरे माध्यमों से करें तो सड़कों के रख-रखाव के लिए 70% खर्च तेल उर वाहनों पर अदा किये गए टेक्स से लिया जाता है. यानि सड़कों के रख-रखाव में केंद्र सरकार केवल 30% खर्च करती है. इसी प्रकार रेल लाइनों को बनाये रखने के लिए पूरा खर्चा रेल कम्पनियां करती हैं. रेल लाइनों के रख-रखाव का सरकार पर तनिक भी भार नहीं पड़ता है. इंस्टिट्यूट के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि अमेरिका में जो जलमार्ग चल रहा है उसका कारण उसकी आर्थिक व्यवहार्यतानहीं बल्कि उसे सरकार द्वारा दी जा रही सब्सिडी है. जलमार्गों के रख-रखाव में 90% खर्च सरकार देती है, सड़कों में 30% और रेल लाइनों में शून्य. इस अंतर के कारण रेलमार्ग किफायती प्रतीत होता है, जो कि वास्तव में किफायती नहीं है. भारत में जलमार्ग की सही गणना करने के लिए जरुरी है कि सड़क तथा रेलमार्ग से वसूले गए टैक्स और जलमार्ग पर प्रस्तावित टैक्स को देखते हुए ही इसका किफायती होने का आंकलन किया जाए.

मिसिसिपी वाटरवे की रिपोर्ट में कहा गया है कि:

In 2012, the shippers and barge companies contributed a paltry 10 percent toward the cost of the Inland Waterways Navigation System- just $80 million of the $800 million needed to keep the system running each year. Few other American businesses receive such a generous tax payer subsidy of their expanses.

Other U.S. transportation sectors contribute much more toward infrastructure costs. For example, 70% of the cost to maintain roads and highways is paid through taxes on fuel and truck parts. The cost to maintain commercial freight lines is paid in full by railroad companies and receives no direct taxpayer support. It is time to level the playing fields and let markets function more efficiently. ” (report IATP, annexure- 24) (विस्तृत रिपोर्ट 3 नीचे देखें)

यानि केवल टेक्स की छूट के कारण भारत में जलमार्ग फायदेमंद समझा जा रहा है. अतः इन देशों में चल रहे जलमार्गों के अधिक प्रचालन का हमें अन्धानुकरण नहीं करना चाहिए.

अंतर्देशीय जल परिवहन को उसकी किफ़ायत और पर्यावरण संबंधी अनुकूलता के आधार पर सही ठहराया जा रहा है. उपरी तौर पर ईधन की लागतों के लिहाज से तो यह काफी किफायती दिखाई पड़ता है मगर यह किफायत हमेशा मुमकिन नहीं होती बल्कि बहुत सारे दूसरे हालातों पर भी निर्भर करती है. खासतौर से यह इस पर निर्भर करती है कि पूरी परिवहन श्रृंखला केवल  पानी पर ही आश्रित है या परिवहन के दूसरे साधनों की भी आवश्यकता होगी. इसके अलावा जलमार्गों से परिवहन की लागत और उससे होने वाले फायदे जलमार्ग के  स्वरूप, उसकी गहराई और कई दूसरे कारकों पर भी काफी निर्भर करते हैं. लिहाजा हमे जलमार्गो की लाभप्रदता को आंकने के लिये एक-एक जलमार्ग का अलग अलग अध्ययन और विशलेषण करना होगा. 

निष्कर्ष:

भारत के सभी बड़े जलमार्गों के निर्माण से नदी के चरित्र, और समुदायों की आजीविका पर गंभीर असर पड़ेगा. यह भी स्पष्ट नहीं है कि जिन आर्थिक लाभों की बात की जा रही है वे इन परियोजनाओं की भारी लागतों से ज्यादा होंगे या नहीं. हमारा मानना है कि जलमार्गों के निर्माण के लिए इस एकतरफा मारामारी को फिलहाल रोक दिया जाना चाहिए. पहले इन जलमार्गों की आवश्यकता, उनकी लागत और प्रभावों का विस्तृत आंकलन किया जाना चाहिए. जिसमे लोगों और नागरिक संगठनो की पूरी सहभागिता हो. तब-तक जलमार्गों के बारे में अंतिम फैंसला नहीं लिया जाना चाहिए.

 

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सम्बंधित रिपोर्ट:

 


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