लेख


स्मार्ट सिटी देहरादून के प्रस्ताव का सुखद पक्ष है कि शहर को एक नोलेज हब के रूप में विकसित किया जाएगा. इसके अंतर्गत साइकिल ट्रैक, सडकों का चौड़ीकरण, अतिक्रमण को दूर करना, स्ट्रीट लाईट की व्यवस्था, इत्यादि किया जाना है. सरकार के इस मंतव्य का हम भरपूर स्वागत करते हैं. हमारा मानना है कि भारत के आर्थिक विकास के लिए सेवा क्षेत्र ही सबसे ज्यादा उपयुक्त है और नोलेज हब को बनाना इस दिशा में सही कदम है.

स्मार्ट सिटी प्रस्ताव में पर्यावरण सम्बंधित दो विषयों पर विशेष ध्यान देने की जरुरत है. पहला विषय शहर के हरित क्षेत्रों का है. स्मार्ट सिटी प्रस्ताव में बताया गया है कि देहरादून के हरित क्षेत्र वर्ष 2004 में 22 प्रतिशत से घट कर वर्ष 2009 तक 15 प्रतिशत रह गए हैं. (इस सन्दर्भ में स्मार्ट सिटी प्रस्ताव पेज न. 9 नीचे देखें).

प्रस्ताव में कहा गया है कि हरित क्षेत्र को रेट्रोफिट किया जायेगा यानि उसको पुनर्जीवित किया जायेगा. प्रस्ताव में शहर के 29,350 लोगों का सर्वेक्षण दिया  गया है. सर्वे में 8 प्रतिशत लोगों ने जोन 4 को प्राथमिक बताया है जबकि 67 प्रतिशत लोगों नें जोन 4 + ग्रीनफील्ड - टी स्टेट एरिया को प्रमुखता दी है (जानकारी के लिए चित्र देखें). इसका अर्थ हुआ की ग्रीनफ़ील्ड क्षेत्र को 59 प्रतिशत लोग प्राथमिकता दे रहे हैं.

अर्थात देहरादून के लोग चाहते हैं कि ग्रीनफ़ील्ड को प्राथमिकता से विकसित किया जाय. इस पृष्टभूमि में हम देख सकते हैं कि स्मार्ट सिटी प्रस्ताव में हरित क्षेत्र को बढ़ाने के लिए क्या कहा गया है?

स्मार्ट सिटी प्रस्ताव में पार्कों में वृक्षारोपण करने की बात मात्र कही गयी है और रिस्पन्ना के लिए बनाई गयी इको टास्क फ़ोर्स द्वारा नदी किनारे वृक्ष लगाने की बात की जा रही है जिसका हम स्वागत करते हैं.

यह वृक्षारोपण उन्ही क्षेत्रों में किया जायेगा जहाँ वर्तमान में वृक्षारोपण हुए हैं. अर्थात उनका घनत्व बढाया जायेगा. इस प्रकार के वृक्षारोपण से हरित क्षेत्र नहीं बढेगा. हरित क्षेत्र को पुनः 15 से 22 प्रतिशत या इससे भी अधिक बढाने की बात प्रस्ताव में कही ही नहीं गयी है. जरुरत थी कि जिन क्षेत्रो में वृक्षों के काटे जाने के कारण हरित क्षेत्र 22 से 15 प्रतिशत हो गया है, उसमे वापस ग्रीन कवर को पुनः वापस स्थापित किया जाता. यदि पूर्व के हरित क्षेत्र में सड़क या मकान बना दिए गए हैं, तो इन्हें हटा कर उस क्षेत्र को पुनः हरित क्षेत्र में बदलना था.वास्तविकता यह है की हरित क्षेत्र पर स्मार्ट सिटी मौन है.

दूसरी समस्या पानी की है. देहरादून में कई प्रसिद्द नदियाँ बहती हैं जिनमे प्रमुख रिस्पन्ना नदी है. आज रिस्पन्ना नदी पूरी तरह सूखी हुई है.

रिस्पन्ना नदी का उद्गम मसूरी के पास की पहाड़ियों से होता है. वहां पर प्राकृतिक स्रोतों से पानी अभी भी निकलता है और रिस्पन्ना नदी में बहता है. लेकिन नीचे पहुँचने के साथ यह पानी देहरादून की जलापूर्ति के लिए निकाल लिया जाता है.(जलापूर्ति की रिपोर्ट नीचे देखें)

रिस्पन्ना को पुनर्जीवित करने के लिए पानी निकालना बंद या कम करना होगा. इसके लिए देहरादून में जल आपूर्ति के लिए वैकल्पिक जल स्रोत ढूँढने होंगे. जैसे ऋषिकेश से गंगा नदी के पानी को देहरादून लाया जा सकता है. लेकिन देहरादून के स्मार्ट सिटी प्रस्ताव में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है. इसका अर्थ यह है कि रिस्पन्ना का पानी निकाला जाता रहेगा और नदी पुनः जीवित नहीं होगी.

रिस्पन्ना नदी के सूखने का दूसरा कारण है कि मैदानी इलाकों में ट्यूबवेल अत्यधिक मात्रा में लगा दिए गए हैं जिसके कारण भूमिगत जल का स्तर नीचे गिर गया है. नदी में आने वाला पानी शीघ्र ही नीचे समा जाता है. इसके लिए जरूरी है कि रिस्पन्ना नदी के 8 से 10 किलोमीटर तक के क्षेत्र में ट्यूबवेल को बंद कर दिया जाय अथवा उनकी गहराई को सीमित कर दिया जाए जिससे कि रिस्पन्ना के क्षेत्र में भूमिगत जल लबालब भरा रहे और रिस्पन्ना का पानी नीचे समाये. तब ही रिस्पन्ना जीवित होगी. लेकिन इस विषय पर भी देहरादून स्मार्ट सिटी प्रस्ताव पूर्णतया खामोश है.

रिस्पन्ना नदी की तीसरी समस्या अतिक्रमण की है.(अतिक्रमण की रिपोर्ट यहाँ देखें) रिस्पन्ना के मार्ग पर झुग्गी झोपड़ियाँ, मकान और गाड़ियों की पार्किंग बड़ी मात्र में हो रही है, जिसके कारण नदी की आसपास की भूमि में प्रदूषण समा जाता है. जब कभी भी नदी में पानी आता है तो इस प्रदूषण से जल स्वयं प्रदूषित हो जाता है. यानि भूमिगत प्रदूषण से नदी का पानी प्रदूषित होने लगता है जैसा कि ओस्मोसिस प्रक्रिया में होता है. 

नदियाँ केवल पानी ही नहीं लाती हैं बल्कि शहर के सौन्दर्य, शहर का वातावरण, शहर के भूजल को  संतुलित करती हैं. अतः वर्तमान प्लान स्मार्ट कोटी के सौंदर्य एवं जीवन के विपरीत है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है. जैसा कि नीचे चित्र में देखा जा सकता है  कि स्मार्ट सिटी के प्रस्ताव में नदी को पुनर्जीवित करने की बात पांचवें पाएदान पर लिखी गयी है जिसका कोई विस्तार नहीं दिया गया है.

रिस्पन्ना नदी बहती है तो शहर का सौन्दर्य नोलेज हब बनाने में भी सहायक होगा. अगर शहर सुन्दर होगा तो यहाँ शिक्षा और सॉफ्टवेयर पार्क बनाने को लोग उत्सुक होंगे.

पर्यावरण सम्बन्धी इन खर्चों को हमें नुकसानदेह नहीं समझना चाहिए बल्कि यह देखना चाहिए कि यदि शहर का पूरा चित्र सौन्दर्यमयी हो जाता है, नदियाँ बहती हैं, उसके किनारे पार्कों में हरियाली रहती है, लोगों का परस्पर आवागमन रहता है तो हमें शहर को नोलेज हब बनाने में मदद मिलेगी.

 

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सम्बंधित रिपोर्ट:


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