लेख


कर्नाटक के चुनाव में पानी का मुद्दा छाया हुआ है. बीजेपी तथा कांग्रेस दोनों नें दो बिंदु उठाये हैं. पहला तो यह कि कावेरी का पानी वे अधिक मात्रा में हासिल करने का प्रयास करेंगे और दूसरा यह कि सरकार को मुफ्त पानी उपलब्ध कराएगी. ये दोनों ही बातें असंभव के साथ साथ नुकसानदेह भी है.

कावेरी का जल सीमित है. तमिलनाडु और कर्नाटक दोनों की मांग जायज है और इसका कहीं न कहीं उचित विभाजन करना ही पड़ेगा और दोनों को उसे स्वीकार करना ही पड़ेगा. यह कार्य सुप्रीम कोर्ट के द्वारा किया जा चुका है अतः इसके ऊपर जनता को ज्यादा आश्वासन देना केवल भ्रम पैदा करना है चूंकि कर्नाटक ज्यादा पानी हासिल कर ही नहीं सकता है.

दूसरा बिंदु जनता को मुफ्त पानी उपलब्ध कराने का है. सच्चाई यह है कि कर्नाटक में वर्त्तमान में ही पानी का जल संकट गहरा रहा है. कर्नाटक के विभिन्न जिलों की वार्षिक वर्षा, जल श्रोतों की स्थिति, तालाबों और टैंकरों से सिंचाई, भूजल इत्यादि की स्थिति हम यहाँ देख सकते हैं और समझ सकते हैं कि लम्बे समय से कर्नाटक में जल त्रासदी फैली हुई है. इस वजह से किसानों की स्थिति दयनीय बनी हुई है. इस परिस्थिति में जब हम वर्त्तमान पानी की मांगों को ही हम पूरा नहीं कर पा रहे हैं तो लोगों को मुफ्त पानी उपलब्ध कराना असंभव है.

कर्नाटक की समस्या वास्तव में पूरे देश की समस्या है. पूरे देश में हाल यह है कि पानी का न्यून मूल्य होने के कारण किसानो द्वारा अधिक पानी की खपत करने वाली फसलें जैसे गुलबर्गा और बीदर में अंगूर और मंड्या में मलबरी की खेती अधिक की जाती है. इन फसलों में पानी की खपत ज्यादा होती है और फलस्वरूप शहरों और छोटे किसानों को पानी उपलब्ध नहीं होता है. इस समस्या का उपाय यह है कि किसानों को मात्रा के अनुसार प्रति क्यूबिक  मीटर माप के हिसाब से पानी का दाम वसूल किया जाय. वसूल की गयी रकम को सभी किसान परिवारों में बराबर बराबर बाँट दिया जाय. परिणाम यह होगा कि जो किसान अधिक मात्र में पानी की खपत करते हैं उनको पानी का मूल्य अधिक अदा करना पड़ेगा. जो किसान रागी अथवा बाजरा जैसी कम पानी वाली या असिंचित फसल उगाते हैं उनको पानी का कोई मूल्य नहीं देना पड़ेगा लेकिन उन्हें इस रकम से मुफ्त आय होगी. उन्हें अंगूर उगाने वाले किसानों द्वारा दिए गए पानी का मूल्य में से एक हिस्सा मिलेगा. समाधान को है कि जल के  मूल्य को वसूल कर के इसी रकम को सभी लोगों में बराबर बराबर बाँट दिया जाय. इससे यह लाभ होगा कि जल की अधिक खपत करने वाले लोगों को जल का अधिक दाम देना होगा और जो व्यक्ति जल का ज्यादा इस्तेमाल नहीं करता है उन्हें मुफ्त इनकम हो जाएगी. लोग जल का उपयोग कम करेंगे और पानी का संकट कम हो जायेगा.

इसी प्रकार बेंगलुरु जैसे शहरों की समस्या का निदान यह है कि पानी का दाम को वर्त्तमान से दस गुना बढ़ा दिया जाय. नतीजा यह होगा कि लोग गाड़ी धोने एवं बगीचे में सिंचाई करने के लिए पानी की खपत कम करेंगे. साथ साथ वसूली गयी इस रकम को बेंगलुरु में रहने वाली पूरी जनता में बराबर बराबर बाँट दिया जाय. परिणाम यह होगा बेंगलुरु के जो लोग पानी ज्यादा खपत करते हैं उन्हें पानी का मूल्य ज्यादा अदा करना पड़ेगा. उनकी पानी की खपत कम हो जाएगी. उनकी पानी की खपत कम होगी तो सर्वत्र पानी की उपलब्धता बढ़ जाएगी. विशेषकर झुग्गियों इत्यादि में स्टैंडपोस्ट पर मुफ्त पानी आसानी से  उपलब्ध हो जायेगा.

कर्नाटक की जनता को समझना चाहिए कि न तो हम कावेरी का पानी ज्यादा ले सकते हैं और न ही मुफ्त पानी देना संभव है. जरुरत इस बात की है कि कावेरी विवाद से अपना ध्यान हटाकर जल वितरण की नीति में सुधार किया जाय जिससे कि पानी की खपत को कम करके अपने संसाधनों के अनुरूप इस्तेमाल किया जा सके.            


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