लेख


आज भारत दुनिया में सबसे तेज़ी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है. हमारे इस आर्थिक विकास को देखकर दुनिया द्वारा हमारा अनुसरण किया जायेगा. यह दर्शाता है कि हम आर्थिक विकास को एक नयी दिशा दे रहे हैं. लेकिन देश की तरक्की के लिए पर्यावरण के अनुकूल रह कर आर्थिक विकास हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है. जिसके लिए हमें देश की विभिन्न प्रजातियों को विलुप्त होने से बचाना चाहिए. हमारे जैवमंडल में हर प्रजाति का अपना महत्त्व है और इनमे से अनेक प्रजातियाँ ऐसी हैं जो भविष्य में मनुष्य को जीवन जीने में कारगर सिद्ध होंगी.

 

प्रजातियों की विलुप्ति का कारण

पूर्व में गायों की अलग अलग नसल देखी जाती थी. आज अधिकतर जर्सी गाय ही दिखती हैं. इसी प्रकार पूर्व में पहाड़ों में पेड़ों की तमाम प्रजातियाँ दिखती थी जैसे बुरांश, काफल, इत्यादि. पूर्व में निमोली और कसेरु जैसे फल बाजार में मिलते थे जो अब मिलना बंद हो गए हैं. इससे पता लगता है कि कई प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं.

शांति मंत्र में कहा गया है:

शांति कीजिये प्रभु त्रिभुवन में, शांति कीजिये .

जल थल में और गगन में, अंतरिक्ष में, अग्नि में, पवन में, औषधि वनस्पति वन उपवन में, सकल विश्व में जड़ चेतन में, शांति कीजिये.

शांति राष्ट्रनिर्माण सृजन में, नगर ग्राम में और भवन में जीवनमात्र के तन में मन में, और जगत के कण कण में शांति कीजिये.

ॐ शांति  शांति  शांति  ॐ

कई स्थानों पर हमने संकट में पड़ी प्रजातियों को सुरक्षा प्रदान करके उन्हें जीवित रखने का प्रयास किया है जैसे टाइगर रिज़र्व में. लेकिन दूसरी तरफ कई प्रजातियाँ लुप्त होने की तरफ बढ़ रही है जैसा कि नीचे चित्र में दिखाया गया है:

फरक्का बराज बनने से हिलसा मछली फरक्का के ऊपर अपने प्रजनन क्षेत्रों तक नही पंहुच पा रही हैं और फरक्का से इलाहाबाद तक लुप्त हो गयी हैं. इसी प्रकार हरिद्वार में भीमगोडा बैराज और श्रीनगर में अलकनंदा पर बांध बनाने से माहसीर मछली अपने ऊपर के प्रजनन तक नहीं पहुंच पा रही हैं और इसका आकार छोटा होता जा रहा है. पूर्व में यह 20-25 किलोग्राम तक की पायी जाती थी जो अब 1 किलोग्राम की मिल रही है.

IUCN (International Union for Conservation of Nature) की रिपोर्ट के अनुसार प्रजातियों के विलुप्त होने के निम्न छह कारण हैं. IUCN की रिपोर्ट यहाँ देख सकते हैं:

  1. आवासीय स्तर पर गिरावट
  2. अत्यधिक शोषण
  3. प्रदूषण
  4. बीमारियाँ
  5. विदेशी प्रजातियों के आक्रमण
  6. वैश्विक जलवायु परिवर्तन  

उपरोक्त कारणों में हम नदियों की प्रजातियों को विलुप्त करने में इस प्रकार योगदान दे रहे हैं-

  1. बराजों से मछलियों का आवागमन अवरुद्ध होता है और उनका रिहायशी क्षेत्र छोटा होता है. सिंचाई के लिए अधिक मात्रा में पानी निकालने से भी ऐसा होता है.
  2. प्रदुषण से उनका जीवन कठिन हो जाता है.
  3. जलमार्ग की तरह उपयोग होने से एलियन (विदेशी) प्रजातियों का प्रवेश होता है जो घरेलु जातियों को दबा देती हैं.

इन प्रजातियों का जीवित रहना हमारे लिए जरुरी है क्योंकि इन प्रजातियों में से कुछ प्रजातीयाँ आने वाले समय में मनुष्य को जावित रहने में मददगार सिद्ध होगी. जैसे धान की एक प्रजाति होती है जो बाढ़ के पानी के साथ साथ बहुत तेजी से बढती है और बाढ़ में ही अनाज पैदा करती है. अब मान लीजिये हमने बांध बना कर बाढ़ के आने को रोक लिया जिससे यह प्रजाति नष्ट हो गयी. इसका बीज अनुपलब्ध हो गया. समय क्रम में हम बाढ़ को किन्ही कारणों से नहीं रोक पाए.

 

भविष्य की आवश्यकता

यदि हमने बाढ़ में उपजने वाले धान की प्रजाति का संरक्षण किया होता तो हम उस बीज को पुनः बड़े पैमाने पर खेती करके अपना पेट भर सकते थे. इसके विपरीत यदि हमने उस प्रजाति के बीज को संरक्षित नहीं किया तो भविष्य की बाढ़ में हमको भूखे मरना पड़ेगा. इसीलिए अर्थशास्त्री मानते है कि संकटग्रस्त प्रजातियों को जीवित रखना एक नैसर्गिक जिमेदारी ही नहीं बल्कि एक आर्थिक रिसोर्स है जो कि भविष्य में मनुष्य को जीवित रखने में मददगार साबित होंगी. इसलिए हमें संकटग्रस्त प्रजातियों का संरक्षण करना चाहिए. नदियों के सन्दर्भ में जलविधुत और सिंचाई योजनाओं से पीछे हटना चाहिए, जिससे जलीय जैव विविधता पर नकारात्मक प्रभाव न पड़ें और हम अपने भविष्य को दाव में न लगायें.

 

 

इस विषय पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को लिखें

 


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