लेख


उत्तराखंड में टिहरी और श्रीनगर जैसी विद्युत परियोजनाओं के नीचे का पानी अपेक्षाकृत साफ है. फिर भी यह कई मायनों में नदी में  प्रदूषण फैलाते हैं.

चित्र 1: श्रीनगर बाँध के नीचे बहता साफ़ पानी

प्रभाव:

प्रथम प्रभाव मछलियों पर है. मछलियों की कार्बनिक पदार्थ को पचाने की क्षमता होती है. मछलियों को तालाबों के साफ पानी में देखा जा सकता है, क्योंकि मछलियां तालाब में कार्बनिक पदार्थ खा लेती हैं.

चित्र 2: मछलियां नदी के पानी को साफ़ करती हैं

 नदियां मछलियों का निवास स्थान होती हैं. अतः वे इसमें स्वछंद रूप से विचरण कर सभी कार्बनिक पदार्थों को खा लेती हैं. बांधों से मछलियों को हानि होती है.

उत्तराखंड में पाए जाने वाले प्रसिद्ध माहसीर मछली अंडे देने के लिए ठंडे क्षेत्रों में चली जाती हैं. फिर छोटी मचलियाँ नदी की धारा के साथ बहकर मैदानी क्षेत्रों में पहुँच जाती हैं जहाँ पर ये परिपक्कव मछलियों का रूप ले लेती हैं.(नीचे फोटो देखें).

चित्र 3: माहसीर मछलियाँ अंडे देने के लिए गंगा के ऊपरी क्षेत्रों में जाती हैं

परिपक्व माहसीर मछलियां फिर से यही चक्र दोहराते हुए अंडे देने के लिए पहाड़ी क्षेत्रों में जाती हैं किंतु बाँध द्वारा रूकावट के कारण वे अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच पाती हैं. माहसीर मछली पहले उत्तरकाशी तक पायी जाती थी परंतु अब यह टिहरी के ऊपर नहीं पायी जाती हैं. पहले यह 100 किलोग्राम  तक होती थी. अब मात्र 700 ग्राम की ही रह गयी हैं.

कई अध्ययनों से पता चलता है कि बांध में मछलियों, कछुओं और अन्य जलीय जानवरों की संख्या में कमी आई है. (IUCN की रिपोर्ट देख यहाँ सकते हैं), (जैविक विविधता के सम्मेलन की रिपोर्ट यहाँ सकते हैं) और (स्थलीय जैविक विविधता पर जलविद्युत परियोजनाओं के प्रभाव की रिपोर्ट यहाँ सकते हैं). जब हम टिहरी जैसे बांधों का निर्माण करते हैं, तो मछलियों की संख्या कम हो जाती है और उनकी प्रदूषण को कम करने की क्षमता भी कम हो जाती है. इसलिए, जो भी प्रदूषक नदी में प्रवेश होता है वह सहज रूप से साफ नहीं होता जैसा कि पहले साफ हो रहा था. अतः प्रदूषण पर बांधों का पहला प्रभाव मछलियों को सीमित करके होता है.

गंगा की पवित्रता का आधार:

बांधों का दूसरा प्रभाव कॉलिफाज़ के माध्यम से होता है. गंगा नदी के पानी में एक प्रकार का फायदेमंद बैक्टीरिया पाया जाता है जिसे कॉलिफाज़ कहा जाता है. जबकि गंगा नदी में पाए जाने वाला हानिकारक जीवाणु कॉलिफ़ॉर्म कहलाता है.

चित्र 4: कॉलिफाज़ गंगा के प्रदूषण में मौजूद कॉलिफ़ॉर्म को खाकर नदी को साफ़ रखते हैं

कॉलिफाज़, कॉलिफ़ॉर्म को खाकर नदी को साफ करते हैं. कॉलिफाज़ नदी की गाद या रेत में तब तक चिपके रहते हैं जब तक कि उन्हें चारों ओर कॉलिफ़ॉर्म नहीं मिलते. कॉलिफ़ॉर्म के मिलते ही कॉलिफाज़ सक्रिय हो जाते हैं और कॉलिफॉर्म खाने शुरू करते हैं. राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (NEERI) के वैज्ञानिकों ने बताया है कि “गंगा में कॉलिफाज़ अद्वितीय हैं”. आम तौर पर एक प्रकार का कॉलिफाज़ एक प्रकार का ही कॉलिफ़ॉर्म खाता है. गंगा के कॉलिफाज़ की अनूठी गुणवत्ता यह है कि एक कॉलिफाज़ बड़ी संख्या में कॉलिफ़ॉर्म खाते हैं. गंगा के कॉलिफाज़ वाइड स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक दवाओं की तरह होते हैं - जिस प्रकार एक एंटीबायोटिक दवाई बड़ी संख्या में जीवाणुओं को मारती हैं उसी प्रकार गंगा का कॉलिफाज़ भी अनेक कीटाणुओं को नष्ट करता है. यही गंगा के “स्व-शुद्ध" करने की क्षमता का रहस्य है. गंगा का पानी कभी खराब नहीं होता है क्योंकि कॉलिफाज़ लगातार कॉलीफ़ॉर्म को खाते रहते हैं. ये विस्तृत स्पेक्ट्रम कॉलिफाज़ गंगा की रेत में रहते हैं और ये अपस्ट्रीम स्ट्रेच में बनते हैं. रेत गंगा के माध्यम से बहती है और इस रेत को टिहरी बांध ने रोक लिया है जिसकी वजह से कॉलिफाज़ भी टिहरी बाँध में कैद हो चुके हैं और समान्य रूप से नदी में नहीं बह रहे हैं.(कॉलिफाज़ पर हमारी पिछली पोस्ट यहाँ देखें).

NEERI की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि टिहरी बांध के नीचे भी कॉलिफाज़ भी मिलाता है. लेकिन यह कॉलिफाज़ पहले से बह चुकी रेत के कारण है. अब अपस्ट्रीम से डाउनस्ट्रीम प्रवाह में कमी आने के कारण व्यापक स्पेक्ट्रम कॉलिफाज़ की उपस्थिति में भी कमी आई है और गंगा की स्वयं को शुद्ध रखने की क्षमता में भी गिरावट आई है.

जल की कमी:

बांधों द्वारा पड़ने वाला तीसरा नकारात्मक प्रभाव है कि बांध के नीचे डाउनस्ट्रीम बगैर पानी के होता है. उदाहरण के लिए विष्णुप्रयाग में देखा गया है कि जलविद्युत परियोजना द्वारा अलकनंदा में पानी बहुत कम मात्रा में छोड़ा जाता है.

चित्र 5: विष्णुप्रयाग परियोजना के बाद अलकनंदा नदी में पानी बहुत ही कम है

पानी को बांध से एक सुरंग के माध्यम से निकाला जाता है और बिजली घर की 20 किलोमीटर की दूरी तक लाया जाता है. बांध के नीचे का खंड तब तक सूखा रहता है जब तक कि नदी में अन्य प्राकृतिक श्रोत शामिल न हों. यह सूखा स्ट्रेच नदी में मौजूद सभी जलीय जीवन को मारता है.

ऊपर चित्र में दिखाया गया है कि श्रीनगर बाँध के नीची पानी साफ है. लेकिन इस पानी में बीमारी फ़ैलाने वाले कीटाणु उत्पन्न हो रहे हैं. इस रुके हुए पानी के कारण शहर के इतिहास में अब तक के सबसे अधिक टायफ़ायड और पीलिया के मरीज़ देखे गए हैं.

 

चित्र 6: श्रीनगर परियोजना की वजह से श्रीकोट में रुका हुआ अलकनंदा का पानी

आध्यात्मिकता:

बांधों से चौथा प्रभाव पानी की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचाना है. जापानी वैज्ञानिक मासारू इमोटो के अध्ययन से पता चलता है कि पानी के अणु एकत्र होते हैं और पानी के बहते समय वे सुंदर या भद्दे पैटर्न बनाते हैं.

चित्र 7: साफ़ पानी में बनते वाटर क्रिस्टल के सुन्दर पैटर्न
चित्र 8: रुके हुए दूषित पानी में बनते हुए भद्दे वाटर क्रिस्टल पैटर्न

साफ़ पानी में बहुत सुन्दर पैटर्न बनते हैं लेकिन बांधों के पीछे रुका हुआ पानी होता है जिसमे कि भद्दे पैटर्न बनते हैं. बाँध के पीछे बने तालाब में पानी सुंदर से बदसूरत पैटर्न में बदल जाता है और तालाब में जो सुंदर पैटर्न बच जाते हैं वे जल के टरबाईन में पड़ने के साथ ही टूट जाते हैं.पूजा के लिए हिंदू गंगाजल को कलश में रख कर मंत्रोच्चारण करते हैं. ये मंत्र पानी में प्रवेश करते हैं. पूजे के अंत में, पुजारी भक्तों पर यही जल छिड़कते हैं.

चित्र 9: पूजा स्थल में कलश पर रखा हुआ हुआ शुद्ध गंगाजल आत्मशुद्धि के लिए उपयोग होता है

सिद्धांत यह है कि मंत्र पानी में प्रवेश करते हैं और सुंदर अणु का पैटर्न बनाते है जो आध्यात्मिक रूप से चार्ज किए जाते हैं. जब हम उपासकों पर इस पानी को छिड़कते हैं, तो उस पानी में निहित आध्यात्मिक शक्ति पूजा करने वालों के शरीर में प्रवेश करती है. बांधों से होकर निकलने वाला पानी उसी प्रकार से माना जा सकता है जिस प्रकार गंगाजल को मिक्सी में घुमाकर भक्तों पर छिड़का जाय. क्या वाकई में गंगाजल को मिक्सी में घुमाने के बाद उसकी वही आध्यात्मिक शक्ति बरकरार रहेगी?

निष्कर्ष यह है कि जलविद्युत परियोजनाओं के चार नकारात्मक प्रभाव होते हैं. सबसे पहले मछलियों और जलीय जीवों को, जो पानी को साफ करते हैं, उन्हें हम नुकसान पहुंचा रहे हैं. दूसरा, कॉलिफ़ॉर्म खाने वाले कॉलिफाज़ कम हो जाते हैं. तीसरा, हाइड्रोपॉवर बांध के नीचे बने तालाब में जहर विकसित किया जा रहा है. चौथा, बांध के पीछे स्थिर जल और टरबाइन अपर्याप्त से नीचे लाए गए आध्यात्मिक शक्तियों को नुकसान पहुंचाते हैं.

हमें गंगा में जा रहे मलजल को साफ करना चाहिए लेकिन मछलियों, कॉलिफाज़ और आध्यात्मिक शक्तियों की रक्षा करना भी आवश्यक है. केवल नदी की ऊपरी सफाई करने से ही गंगा का उद्धार नहीं हो सकता. इसके लिए आवश्यक है जलविद्युत परियोजनाओं को हटाकर गंगा की वास्तविक शक्तियों को बचाया जा सके.

 

इस विषय पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को लिखें


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