लेख


 

बाँध के नीचे से गाद निकालने के लिए इस प्रकार से फ्लशिंग की जाती है (फोटो साभार: गर्ट रिचर)

टिहरी जैसे बाँध उपयुक्त नहीं

हमारा मानना है कि टिहरी जैसे बड़े बाँध हमारे लिए अनुपयुक्त हैं क्योंकि ये टिकाऊ नहीं हैं. इनमे मुख्य समस्या यह है कि नदी पानी में अपने साथ गाद भी लेकर आती है और वह गाद बाँध में जमा हो जाती है. जब बाँध गाद से भर जाता है तो उसकी पानी को रोकने की क्षमता समाप्त हो जाती है, जैसे कि बाल्टी को यदि बालू से भर दिया जाय तो उसमे पानी नहीं रखा जा सकता है. दरअसल इस बालू और मिट्टी को ही हम गाद कहते हैं जो नदी के साथ बह कर आती है और यह अत्यधिक उपजाऊ होती है. किसान नदी के इस पानी को अपने खेतों में पूर्णतया फैलने देते हैं, जिससे कि यह गाद पूरी तरह से खेतों में फ़ैल जाए और फसल अच्छी हो सके. बाँध के पीछे गाद भरने की इस समस्या को बाँध निर्माता जानते हैं. इस समस्या के हल के लिए उनके द्वारा बाँध के जड़ पर कुछ गेट बनाये जाते हैं जिसको समय-समय पर खोल कर के पीछे भरी हुई गाद को फ्लश आउट यानी निकाल दिया जाता है.

समस्या यह है कि इस प्रक्रिया से झील की पूरी गाद नहीं निकलती है. जैसे कि टिहरी झील में लगभग 45 किलोमीटर तक पानी भरा हुआ है जबकि, फ्लशिंग से जो गाद निकलती है वह लगभग एक या डेड किलोमीटर तक की निकलती है, जैसा कि नीचे दिए गए चित्र में दिखाया गया है.

45 किलोमीटर बाँध की झील में केवल डेड किलोमीटर की दूरी तक यदि गाद निकल जाएगी तो  लगभग 43 किलोमीटर की गाद तो वैसे ही रह जायेगी. अतः धीरे धीरे गाद भरती जायेगी और झील की जल भण्डारण क्षमता ख़त्म हो जाएगी और बाँध लगभग अनुपयोगी हो जाएगा.

बाँध का अध्ययन

टिहरी हाइड्रो पावर कारपोरेशन ने इस समस्या के दो अध्ययन कराए हैं. पहला अध्ययन भारत की टोजो विकास इंटरनेशनल द्वारा किया गया है. इस अध्ययन में इस प्रकार विवरण दिया गया है:

Progressive loss of storage due to sedimentation in different storage zones are assessed as under:

Dead storage                       0.6% in 3yrs

Live storage                          0.59% in 3 yrs

Gross storage                      0.59% in 3 yrs

बाँध की कुल क्षमता का कुछ हिस्सा ही उपयोग में आता है. नीचे के हिस्से में सतत पानी भरा रहता है जिसे डेड स्टोरेज कहते हैं. ऊपर का हिस्सा जिसमे गर्मियों और जाड़ों में पानी निकाल लिया जाता है और बरसात में पुन: पानी भर जाता है उसे लाइव स्टोरेज कहते हैं. टोजो कम्पनी के अनुसार तीन साल में लगभग 0.6 प्रतिशत लाइव स्टोरेज और डेड स्टोरेज कम हो गया है. यानी कि एक साल में 0.2 प्रतिशत स्टोरेज ख़त्म हो गया है. डेड स्टोरेज के भरने के सस्थ साथ लाइव स्टोरेज का भरना तेजी से होगा. लाइव स्टोरेज ख़त्म होने का अर्थ यह है कि भविष्य में इस क्षेत्र में बाँध की जल ग्रहण करने की क्षमता ख़त्म हो जाएगी. यदि फ्लशिंग से पूरी गाद निकल गयी होती तो लाइव स्टोरेज में इस प्रकार की कमी नहीं आती. टोजो कंपनी नें अपनी रिपोर्ट में कहा है कि टिहरी बाँध का उपयोगी कार्यकाल लगभग 130 वर्ष होगा. (टोजो कंपनी की रिपोर्ट यहाँ देख सकते हैं):'

"keeping in view the above calculation by methods defined in the CBIP manual on the reservoir, the useful life of the reservoir can be taken safely as 130 years."

दूसरा अध्ययन IRI  रूड़की के हाईड्रोलिक डिज़ाइनर श्री ए सी पांडे द्वारा कराया गया है. इसके भी परिणाम लगभग वैसे ही हैं. श्री पांडे के अनुसार टिहरी बाँध में डेड स्टोरेज लगभग 170 साल में पूरी तरह भर जाएगा. पानी भंडारण की पूरी क्षमता 465 वर्षों में शून्य हो जाएगी. (श्री पांडे द्वारा किया गया टिहरी बाँध पर विस्तृत सर्वे यहाँ पर देख सकते हैं)

बाँध के पूरी तरह से भरने के बाद पानी ऊपरी सतह से होते हुए निकल जायेगा जैसा कि हम नीचे दिए गए चित्र में देख सकते हैं.

अतः दोनों अध्ययनों के अनुसार डेड स्टोरेज यानी कि नीचे का हिस्सा 130 से 170 सालों में भर जाएगा. उसके बाद टिहरी बाँध की जल भंडारण की क्षमता क्रमशः कम होती चली जाएगी. लगभग 200 से 300 वर्षों में टिहरी बाँध पूरी तरह गाद से भर जाएगा और इसमें एक बूँद पानी भी नहीं टिक सकेगा.

प्रश्न यह है कि जब हम देश में विकास की बात कर रहे हैं तो केवल दो सौ या तीन सौ साल के अल्पकालिक विकास की क्यों? इस अल्पकालिक समय के लिए इन बड़े बांधों का निर्माण रोक देना चाहिए जो कि मनुष्य और प्रकृति को नज़रंदाज़ करते हुए बनाये जा रहे हैं.

 

इस विषय पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को लिखें.इस विषय पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को लिखें.


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