लेख


    कुछ विद्वानों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण भविष्य में वर्षा का वितरण कम होगा. उस समय बांधों में रोका गया पानी सिंचाई के लिए प्रयोग होगा अतः बड़े बांधों का बनना अनुपयोगी क्यों है?

महानदी पर स्थित भाकड़ा नागल बाँध में वर्षा जल संरक्षण

    दरअसल ग्लोबल वार्मिंग के कारण धरती का तापमान बढ़ेगा और वर्षा अधिक होगी. अरब सागर का तापमान बढ़ने से वाष्पीकरण आधिक होगा और भारत में पानी अधिक बरसेगा. अनुमान है कि 5 से 10 प्रतिशत अधिक पानी की वर्षा हो सकती है. लेकिन जो वर्षा वर्तमान में चार महीने फैल कर होती है, वह ग्लोबल वार्मिंग के साथ-साथ कम दिनों में होगी जबकि पानी की मात्रा उतनी ही रहेगी. वर्षा कम दिनों में होने के साथ अधिक तेजी से गिरेगी. नीचे चित्र में वर्षा की 30 साल और 10 साल के वितरण को दर्शाया गया है (WWF की रिपोर्ट यहाँ मौजूद है). नीचे दिये ग्राफ में देखा जा सकता है कि 30 साल की औसत वर्षा में पानी चार महीनों में फैल कर बरसता था वह 10 साल में संकुचित हो गया है. जो इस बात का प्रमाण है की वर्षा कम दिनों में हो रही है.

    वर्षा के संकुचित होने का मतलब यह है कि पानी जब बरसेगा तो अत्यधिक तेजी से बरसेगा और जल्द ही नदियों के रास्ते समुद्र को चला जायेगा. अगर पानी धीरे-धीरे बरसता है तो वह भूमि में ज्यादा रिसता है और भूजल का पुनर्भरण होता है. पानी ज्यादा तेज़ी से बरस कर जल्द समुद्र में बह जाने के कारण पानी भूमि में कम रिसेगा और सिंचाई के लिए पानी कम मिलेगा. वर्तमान में भूमिगत जल का स्तर गिर रहा है. भविष्य में यह और तेजी से गिरेगा चूँकि रिसाव कम होगा. फलस्वरूप सिंचाई भी कम हो पायेगी. हमारे खाद्यानों के उत्पादन में भारी गिरावट आयेगी. प्रश्न यह है कि ग्लोबल वार्मिंग के इस विशाल परिवर्तन का हल टिहरी और भाकड़ा जैसे बड़े बांधों द्वारा निकल सकता है अथवा अन्य विकल्पों से ? हमें यह देखना होगा कि कम समय में अधिक बरसे पानी को बड़े बांधों में एकत्रित करके क्या हम अपनी सिंचाई की जरूरतों को पूरी कर सकते हैं?

   हमारे आंकलन के अनुसार ऐसा नहीं होगा चूँकि पहली समस्या यह है कि ज्यादा वर्षा हमारे मैदानी इलाकों में होती है, न कि पहाड़ों में.  नीचे दिए गए आंकड़ों से हम उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में वर्षभर की औसत वर्षा को देख सकते हैं:

उत्तराखंड - 53483 m2 (क्षेत्रफल)* 130.86cm (औसत वर्षा प्रति वर्ष)= 69, 98,000 घन मीटर

उत्तर प्रदेश  - 243286m2 (क्षेत्रफल)* 156.3cm (औसत वर्षा प्रति वर्ष) = 3,80,25,000 घन मीटर

    ज्ञात हो कि जहाँ उत्तराखंड की कुल वर्षा का मात्र 35 लाख घन मीटर पानी का ही संचयन बड़े बांधों में हो सकता है वहीं उत्तर प्रदेश में 380 लाख घन मीटर पानी बरसता है. हम यह मान लें कि 69,98,000 घन मीटर पानी का आधा पानी उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में बने बांधों में संचयन संभव है. अतः वर्षा का आधा ही पानी बड़े बांधों में संचित होगा यानी कुल 34,99,000 घन मीटर पानी का ही संचयन हो पायेगा.

    ध्यान रहे कि बड़े बांधों से हम केवल पहाड़ में बरसे हुए पानी का भण्डारण कर सकते हैं. मैदानी क्षेत्रों में बरसे पानी का भंडारण पहाड़ी क्षेत्रों में बने बांधों में नहीं होता है. इसलिए पहाड़ में बरसे न्यून पानी के भण्डारण से मैदानी क्षेत्रों की ज्यादा जरूरत को पूरा नही किया जा सकता है. हमें मैदानी इलाकों में होने वाली वर्षा के जल को पुनर्भरण के लिए उपयोग करना ही पड़ेगा और वही हमें ग्लोबल वार्मिंग से छुटकारा दिला सकता है.

    दूसरी समस्या यह है कि हम जब पहाड़ी क्षेत्र के बरसात के पानी को बांधों में रोक लेते हैं तो मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ कम आती है. आम धारणा  यह है कि बाढ़ को सीमित करना जनहित का कार्य है. लेकिन इसका विपरीत प्रभाव भी पड़ता है. जब बाढ़ का पानी चारों तरफ फैलता है, तो मैदानी क्षेत्र में भूमिगत जल का पुनर्भरण होता है, जो कि जाड़े और गर्मियों के मौसम में ट्यूबवेल से निकालकर सिंचाई के काम आता है. अतः जब हम टिहरी जैसे बांधों में बरसात के पानी को रोक लेते हैं, तो मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ कम आती है और बाढ़ कम आने से भूमिगत जल का पुनर्भरण कम होता है और सिंचाई कम होती है. इस प्रकार बड़े बांधों द्वारा सिंचाई पर दो विपरीत प्रभाव पड़ते हैं. सकारात्मक प्रभाव यह होता है कि टिहरी जैसे बाँध में हम पानी रोक कर उसे जाड़े और गर्मियों में छोड़ते हैं जिससे मैदानी क्षेत्र में सिंचाई बढती है. दूसरी तरफ नकारात्मक प्रभाव यह है कि बांधों में पानी रोक लेने से पानी कम फैलता है, बाढ़ कम आती है जिससे मैदानी क्षेत्रों में जल का पुनर्भरण कम होता है और सिंचाई कम होती है. इन दोनों विरोधाभासी प्रभावों का अंतिम प्रभाव सकारात्मक नहीं दिखता. अभी तक का अनुभव है कि टिहरी बाँध के बनने के बाद भी मैदानी क्षेत्रों में भूमिगत जल का स्तर तेजी से गिर रहा है, जो यह दिखाता है की टिहरी जैसे बांधों से सिंचाई में जो वृद्धि हुई है, उसकी तुलना में भूमिगत जल के कम पुनर्भरण से सिंचाई में कटौती ज्यादा हुई है .

    बरसाती पानी को धरती में समाहित करना ही होगा  टिहरी डैम पर आश्रित रहना बड़ी भूल होगी . बाढ़ के पानी द्वारा भूजल पुनर्भरण का एक उत्तम उपाय पाइन (pyne) है. pyne व्यवस्था को हम नीचे दिए गए चित्रों से समझ सकते हैं:

सामान्यतः नदी ऐसे बहती है:

जब नदी में  पानी बढ़ता है तो उसे विशेष नहरों से बहाकर गाँव के तालाबों में एकत्रित कर लिया जाता है.

 

जब नदी का पानी घट जाता है तब वह पानी तालाबों में टिका रहता है. इसके दो लाभ हैं एक ओर जल का रिसाव होगा और उससे भूजल पुनर्भरण होगा दूसरे  उस पानी का सिंचाई के लिए प्रयोग किया जा सकता है . ये तालाब हर तरह से उपयोगी हैं.

 

    पहाड़ों में बड़े बाँध बनाने की तीसरी समस्या गाद भरने की है. जैसा कि वैज्ञानिकों का अनुमान है कि टिहरी बाँध 130 से 170 वर्षों में गाद से भर जाएगा. जिसके बाद इस बाँध की वर्षा के जल भण्डारण की क्षमता शून्यप्राय हो जाएगी. जबकि अगले 100 वर्षों में ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव और अधिक गहराएगा. एक तरफ वर्षा के जल भण्डारण की जरुरत बढ़ेगी वहीं  दूसरी तरफ बांधों के जल संचयन की क्षमता घटेगी. अतः बांधों में जल संचयन अल्पकालीन माना जा सकता है. यह दीर्धकालीन हल नहीं होगा.

    हमारा मानना है कि बड़े बाँध असफल होंगे क्योंकि मैदानी क्षेत्रों की तुलना में उनका कैचमेंट कम है तथा समयक्रम में वे गाद से भर जायेंगे. अतः बांधों के माध्यम से ग्लोबल वार्मिंग का हल निकालना हमारी बड़ी भूल साबित होगी . ग्लोबल वार्मिंग का एकमात्र समाधान है की टिहरी जैसे बांधों को हटाकर इसमें संग्रहीत पानी को निर्बाध फैलने दिया जाय और इसके कारण उत्पन्न  हुई बाढ़  को धरती में समाने दिया जाय तथा मैदानी इलाकों में बाढ़ के इस पानी को पाइन जैसे उपायों से भूमिगत जल में रोका जाये. हमें अपने देश कि तालाब संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा .


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