लेख


 

विद्युत उत्पादन के लिए सौर ऊर्जा सबसे बेहतर विकल्प है

हम सुझाव दे रहें हैं कि पर्यावरण, मत्स्य पालन और सेडीमेंट के संरक्षण के लिए जलविद्युत परियोजनाओं के लिए गंगा पर बांध नहीं बनाने चाहिए. लेकिन प्रश्न है कि: "हम अपनी विद्युत उत्पादन की आवश्यकता को कैसे पूरा करेंगे? न ही हमारे पास यूरेनियम है, जिससे हम परमाणु ऊर्जा बना सकें और न ही कोयले का भण्डार है जिससे कि थर्मल ऊर्जा बना सके. हमारे पास केवल जलविद्युत और सौर ऊर्जा के ही विकल्प हैं.” यह बात सही है. लेकिन हम सौर उर्जा से अपनी जरूरत को बखूबी पूरा कर सकते हैं. जलविद्युत की वास्तव में जरूरत ही नहीं है.

भारतीय सौर ऊर्जा राष्ट्रीय संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार सौर हमारी ऊर्जा उत्पादन की क्षमता 750 गीगावॉट है जबकि "पायनियर" की रिपोर्ट के अनुसार जल विद्युत की क्षमता 306 गीगावॉट है. सरकार ने 100 गीगावॉट सौर ऊर्जा का उत्पादन करने का सही निर्णय लिया है लेकिन साथ-साथ सरकार जल विद्युत परियोजनाओं को भी बढ़ाना चाहती है जिस पर पुनर्विचार की आवश्यकता है.

 

सौर ऊर्जा की उपयोगिता

सौर ऊर्जा का उत्पादन पर्यावरण के अनुकूल है. यह नदियों और जंगलों को नुकसान नहीं पहुंचाता है. राजस्थान के रेगिस्तान और डेक्कन पठार जैसे बंजर क्षेत्रों में सौर ऊर्जा पैनल लगाए गए हैं. सौर ऊर्जा, जलविद्युत परियोजनाओं की तुलना में बहुत सस्ती है. सौर ऊर्जा की वर्तमान लागत 3 रुपये प्रति किलोवाट है,जबकि यह जलविद्युत की 8 से 11 रुपये प्रति किलोवॉट है. इसलिए सौर ऊर्जा सस्ती और पर्यावरण के अनुकूल है जिसे देखते हुए हमे इसे बढ़ावा देना चाहिए. हमारी सौर ऊर्जा की क्षमता 750 गीगावॉट है जो की जलविद्युत की क्षमता से लगभग 5 गुना है. इसलिए, हमारी विद्युत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सौर उर्जा सक्षम है. जलविद्युत उत्पन्न करने की कोई आवश्यकता नहीं है.

सौर ऊर्जा के साथ एकमात्र समस्या यह है कि बिजली उत्पादन केवल दिन के समय हो सकती है जबकि बिजली की मांग सुबह और शाम अधिक होती है. जलविद्युत परियोजनाओं से बिजली किसी भी समय बनायीं जा सकती है. जलविद्युत परियोजना दिन और रात में झील में पानी को रोक लेती हैं, और सुबह और शाम उस पानी को छोड़ कर बिजली उत्पन्न करती है. यही कारण है कि सरकार द्वारा जलविद्युत परियोजनाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है.

 

सौर ऊर्जा का उत्पादन

निष्कर्ष यह है कि सौर ऊर्जा सस्ती और पर्यावरण-अनुकूल है, लेकिन यह केवल दिन के समय ही तैयार की जा सकती है. जबकि हमारी जरुरत सुबह और शाम को अधिक होती है. इस समस्या का समाधान यह है कि सौर ऊर्जा को पम्प स्टोरेज सिस्टम से जोड़ दिया जाय. पम्प स्टोरेज सिस्टम में दो तालाब होते हैं. पम्प स्टोरेज सिस्टम से दिन की बिजली को सुबह और शाम की बिजली में आसानी से बदला जा सकता है.

पम्प स्टोरेज सिस्टम में दो तालाब होते हैं जैसा कि नीचे दिए गए चित्र में दिखाया गया है. दिन के समय जब सस्ती सौर ऊर्जा उपलब्ध होती है तब नीचे के तालाब से पानी को पम्प करके ऊपर के तालाब में डाल दिया जाता है. सुबह और शाम को जब ऊर्जा की मांग ज्यादा होती है और ऊर्जा का दाम ज्यादा होता है, तब उसी पानी को ऊपर के तालाब से नीचे के तालाब में टरबाईंन के माध्यम से छोड़ा जाता है और बिजली बनाई जाती है. इस प्रकार यह पानी ऊपर और नीचे के तालाबों के बीच उसी प्रकार ऊपर नीचे होता रहता है जिस प्रकार दूध को दो गिलासों में फेंटा जाता है. इस प्रक्रिया से हम दिन की सस्ती सौर ऊर्जा को सुबह और शाम की महंगी सौर ऊर्जा में बदल सकते हैं.

सौर ऊर्जा के साथ पम्प स्टोरेज सिस्टम के उपयोग से जलविद्युत परियोजनाओं को हटाया जा सकता है

केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की रिपोर्ट के अनुसार पम्प स्टोरेज योजना से दिन की बिजली को सुबह शाम की बिजली में बदलने का खर्च 30 से 40 पैसा प्रति यूनिट (किलोवाट घंटा) आता है (यहाँ देखें). IIT कानपुर ने भी पम्प स्टोरेज सिस्टम का खर्च 30 पैसा बताया है: “It is found that the presence of pumping based storage facility translates to a value of Rs. 0.297/kWh in the overall cost.” (यहाँ देखें)

 

निष्कर्ष

अतः सोलर पावर को पंप स्टोरेज सिस्टम के साथ मिलाकर सुबह और शाम की बिजली का खर्च 3.40 रुपये प्रति किलोवाट से भी कम आएगा (3 रूपए सौर उर्जा का खर्च +40 पैसे सोलर प्लांट का खर्च) जबकि जलविद्युत परियोजना की लागत 8 से 11 रुपये के बीच होती है. इसलिए, हमें पंप स्टोरेज सिस्टम के साथ सौर ऊर्जा को जोड़ कर अपनी उर्जा की जरूरत को पूरा करना चाहिए. ऐसा करने से हम सभी जलविद्युत परियोजनाओं को हटा सकते हैं और अपनी नदियों को बांधों से मुक्त कर सकते हैं.

 

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