लेख


गुजरात चुनाव को गुजरात के पूर्व मुख्मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा स्थापित विकास मॉडल के परीक्षण के रूप में देखा जा रहा है. गुजरात मॉडल की उपलब्धियों में से एक साबरमती नदी के बैंकों का विकास है. इसमें कोई संदेह नहीं है कि अहमदाबाद के बड़े बड़े लोग साबरमती बैंको पर घुमने का आनंद ले रहे हैं. लेकिन सिर्फ बड़े लोग क्योंकि साबरमती की अपनी अस्मिता और उसका अपना पर्यावरण नष्ट हो गया है और वह गरीब लोगों की पहुँच से दूर हो गयी है.

साबरमती तट क्या है?

सरकार ने साबरमती के दोनों किनारों पर ईंट की दीवार बनायी है और साबरमती को एक सीमित मार्ग में परिवार्तित कर दिया है. नदी के दोनों किनारों पर भूमि का इस्तेमाल प्रापर्टी सम्पति के विकास के लिए किया गया है, जैसे कि बाजार, अपार्टमेन्ट और बहुमंजिले मकान. यह उन शहरी लोगों के लिए अच्छा है जो इन अपार्टमेंट में रहते हैं और जो तट का आनंद लेते हैं लेकिन, क्या यह नदी के लिए और बड़ी संख्या में गरीब लोगों के लिए अच्छा है?

साबरमती नदी के किनारे पर रिवाइज के मूल प्रवाह को प्रतिबंधित किया गया है

अहमदाबाद, इलाहाबाद और वाराणसी जैसे शहर नदियां के किनारे स्थित हैं. बड़ी संख्या में तीर्थयात्रियों और नागरिक नदी के प्राकृतिक प्रवाह का और नदी किनारे बैठकर आनंद लेते हैं. लेकिन साबरमती के तट पर दीवारों के निर्माण के द्वारा हमने प्राकृतिक प्रवाह को एक सीमित एवं नियंत्रित प्रवाह में बदल दिया है. जैसे कि प्राकृतिक हवा सुखद होती है, लेकिन पंखे की हवा उतनी सुखद नहीं होती, इसी तरह नदी का प्राकृतिक प्रवाह सुखद होता है.साथ ही, साबरमती नदी तक सार्वजनिक पहुंच भी कम हो गई है. गरीब लोग आसानी से नदी तक नहीं पहुंच सकते चूँकि तट पर बड़े लोगों का कब्ज़ा हो गया है. अहमदाबाद ने कुछ विकसित लोगों के आनंद के लिए साबरमती को खो दिया है.

नदी के मूल सिद्धांत की हत्या कर दी गयी है

नदी का मूल कार्य स्वतंत्र रूप से प्रवाह करना है. यह झूलती है और नृत्य करती है. नदी अपने किनारों के बीच बहती है जिसमें घास और पेड़ होते हैं जो पक्षियों के लिए आवास प्रदान करते हैं और जिसमें मछलियाँ अपना जीवन व्यततीत करती है. सरकार ने सभी पौधों और घास को हटा दिया है. जिन पेड़ों में पक्षी निवास करते थे उन पेड़ों को निकाल दिया है. साबरमती आज एक रोबोट द्वारा किये जा रहे नृत्य प्रदर्शन की तरह है. साबरमती की स्तिथि समझने के लिए आइए हम स्वयं को सुरंग के अंदर दो दीवारों के बीच चलने के बारे में सोचें और एक पार्क में चलने के साथ तुलना करें. जब हम एक पार्क में चलते हैं, हम कहीं भी घूम सकते हैं, हम पक्षियों को देखते हैं, हम घास देखते हैं, हम खेलते हैं, हम आनंद लेते हैं. लेकिन जब हम एक सुरंग में चलते हैं तो हमें सीधे चलना पड़ता है, हम केवल दोनों तरफ दीवार देख रहे  होते हैं; हमारे पास सीधे चलने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं होता है. इसी प्रकार साबरमती केवल दीवारों को देख रही है. उसके आंतरिक शक्ती और उसकी आत्मा खो गयी है.

हमें आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता है

 साबरमती का के साथ हमारे सम्बन्ध के दो स्तर दिखते है. पहला स्तर संपत्ति विकास का है जो हमारी शारीरिक आवश्यकताओं को पूरा करता है. दुसरा स्तर प्राकृतिक प्रवाह का है जिससे हमारी आत्मा को सुख मिलता  है. हमें चुनना होगा कि हम साबरमती को भौतिक वस्तु के रूप में देखते हैं या आध्यात्मिक स्तर पर.साबरमती का मॉडल अब पूरे देश में दोहराया जा रहा है. लखनऊ में गोमती नदि को दीवारों में बांध दिया गया है. हम अहमदाबाद के लोगों से साबरमती के कंक्रीट पर आधारित नदी के किनारे को खारिज करने और नाचती-गाती नदी को बहाल करने की मांग करनी चाहिए और पक्षियों और मछलियों को उनका घर वापस देना चाहिए.


 

 


ट्विट्टर पर जुडें

फेसबुक पर जुडें

गूगल प्लस से जुडें