लेख


 

NGT को पराली से होने वाला प्रदुषण तो ज्यादा हानिकारक लगता है परन्तु जल विद्युत परियोजनाओं से प्रतिदिन निकलने वाली हानिकारक गैसों की कोई चिंता नहीं

दिल्ली के लोग धुंध से पीड़ित हैं जो स्वास्थ्य समस्याओं और सड़क दुर्घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार है. पंजाब और हरियाणा की राज्य सरकारों ने धान की पराली को जलाने पर रोक लगा दी है. राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने भी इसी तरह के आदेश दिए हैं. हालांकि, इस तरह के सतही उपायों से समस्या हल नहीं की जा सकती.

  हम एनजीटी के इस की निर्णय का हार्दिक अभिनन्दन करते हैं कि पंजाब में केवल 2 मिलियन टन धान का अवशेष (पराली) होता है जबकि पश्चिम बंगाल 3.6 मिलियन टन पराली होती है. फिर भी, पश्चिम बंगाल में पराली जलाना नहीं देखा जाता. क्योंकि पश्चिम बंगाल में श्रमिक आसानी से उपलब्ध होते हैं. यह आर्थिक रूप से किसानों को श्रमिकों द्वारा धान की पराली को पेपर मीलों तक पहुँचाने में लाभकारी होते हैं या पशु चारे के रूप में इस्तेमाल करने के लिए होता है. लेकिन पंजाब में, श्रम महंगा है और कम आपूर्ति में है. इसके अलावा, धान की पराली की कटाई और गेहूं की बुवाई के लिए 15 दिन का समय उपलब्ध होता है. इस कम समय में किसानों को श्रम नहीं मिलता है इसलिए वे धान की पराली को जलाना ज्यादा आसान समझते हैं. किसान पराली इसलिए जलाते हैं क्योंकि उनके पास पराली को नष्ट करने का कोई अन्य विकल्प नहीं है.

 यह अच्छा है कि सरकार समस्या के बारे में चिंतित है. लेकिन इस समस्या को सुलझाने वाली नीतियां विफल हो रही हैं. क्योंकि किसानों के पास पराली को नष्ट करने के लिए कोई अन्य विकल्प नहीं है. भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के लिए पराली की खपत के लिए यह उत्तम समाधान हो सकता है कि, जिस प्रकार गेंहू और धान के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य स्थापित किये गए हैं उसी प्रकार पराली के लिए भी न्यूनतम समर्थन मूल्य स्थापित किये जाएँ,जिससे कि ठेकेदार, किसानों से पराली खरीद सकें, फिर इसे इकट्ठा करके एफसीआई को इसकी आपूर्ति करें. एफसीआई इस पराली को महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में आपूर्ति करें जहाँ किसानों को अपने जानवर के लिए चारे की जरुरत होती है या फिर जहाँ पेपर मीलों को कच्चे माल की जरुरत होती है. इस पूरी प्रक्रिया में होने वाले नुक्सान का ज़िम्मेदार एफसीआई को होना चाहिए जो कि सरकार द्वारा बाध्य होना चाहिए। इस प्रक्रिया से राष्ट्र को अनेक प्रकार से लाभ होगा जैसे कि हम धुंध की विकराल समस्या से छुटकारा पायेंगे. क्योंकि किसानों द्वारा अब पराली नहीं जलाई जाएगी और वे उसे बेचकर कमाई करेंगे. यह जरूरी है कि धान की पराली को जलाने पर प्रतिबंध लगाने के बजाय सरकार पराली के इस्तेमाल पर अधिक रचनात्मक नीतियों का निर्माण करे.

 “पराली जलाना” वायु प्रदूषण का एक छोटा सा हिस्सा है जो केवल फसल की कटाई के समय होता है. अतः पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को नगण्य माना जा सकता है. किन्तु हम बड़ी मात्रा में बिजली खपत कर रहे हैं, जिससे कोयले की तरह बड़े पैमाने पर जीवाश्म ईंधन जलता है, और अत्यधिक मात्रा में कार्बन और मीथेन गैसों का उत्सर्जन  होता है जो कि ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने का प्रमुख कारक है. हम बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं का निर्माण कर रहे हैं जो कोयला प्लांटों में उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन से अधिक ज्यादा नुक्सानदेयी गैसों का उत्सर्जन करते हैं. इस बिंदु पर इंटरनेशनल रिवर्स की रिपोर्ट देखें.

 इसी तरह राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (एनईईआरआई) की एक रिपोर्ट बताती है कि: 

टिहरी बांध के जलाशय से कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन 2550 मिलीग्राम प्रति वर्ग मी. है, जबकि मीथेन उत्सर्जन प्रतिदिन 24 मिलीग्राम प्रति वर्ग मी. प्रति दिन है. यह transpiration के क्षणिक प्रदूषण की तुलना में अधिक खतरनाक है. (रिपोर्ट यहां उपलब्ध है पृष्ठ 15, पैरा 5) हानिकारक उत्सर्जन के बारे में अधिक जानकारी के लिए, आप हमारी पिछली पोस्ट यहां पढ़ सकते हैं.

 एक तरफ, हम पराली जलाने से होने वाली क्षणिक समस्या से बहुत ज्यादा चिंतित हैं दूसरी तरफ, हम बिजली की उच्च खपत पर चुप हैं, जो कि ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने में अत्यधिक लाभकारी है. हमें यह महसूस करना होगा कि इस धरती पर बिजली का असंतुलित उपभोग एक बोझ है और हमें इसे पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए अपनी  जीवनशैली को बदलना होगा. सरकार का पराली जलाने को रोकने का निर्णय व्यर्थ होगा. बजाय इसके हमें बिजली की खपत एक सीमित दायरे में करनी होगी जिससे कि जलविद्युत परियोजनाएं न बने और प्रतिदिन विनाशकारी गैसों के उत्सर्जन से पर्यावरण को बचाया जा सके.


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