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pancheswar dam
एक तरफ सरकार पंचेश्वर में विस्थापन के वादे कर रही है . दूसरी तरफ 15 साल पुराने बने टिहरी बाँध में लोगों का धरना प्रदर्शन जारी है. (फोटो साभार: अमर उजाला व इनाडू इंडिया)

महाकाली नदी, उत्तराखंड क्षेत्र की एक प्रसिद्ध नदी है जो भारत-नेपाल की सीमा पर है, जिस पर टिहरी बाँध से तीन गुना बड़ा पंचेश्वर बाँध बनेगा. यह विश्व की दूसरी सबसे बड़ी परियोजना होगी. इस बाँध के बनने से राष्ट्रहित में बिजली उत्पादन होगा. लेकिन इस बाँध के उतने ही बड़े नकारात्मक प्रभाव भी पड़ेंगे. पंचेश्वर बाँध के निर्माण से देश के पर्यावरणविद चिंतित हैं. उनका मानना है कि जिस प्रकार टिहरी बाँध ने उत्तराखंड के पर्यावरण को हानि पहुंचाई है उसी प्रकार पंचेश्वर परियोजना भी पर्यावरण के लिए घाटे का सौदा होगी. आप हमारा पिछला पोस्ट पढ़ सकतें हैं जिसमे हमने बांधों से होने वाले फायदे और नुकसानों का आंकलन किया था. इन नकारात्मक प्रभावों पर माउंटेन डेवलपमेंट रिसर्च सेण्टर (हे.न.ब. केंद्रीय विश्वविद्यालय) के नोडल अधिकारी श्री अरविन्द दरमोड़ा बताते हैं कि उत्तराखंड के 200 गावं अपनी सम्पूर्ण पौराणिक सभ्यता के साथ इस बाँध में डूब जायेंगे. इन सभी गावं के लोगों को किसी दूसरी जगह विस्थापित कर दिया जायेगा. लेकिन जब से टिहरी बाँध बना है, तब से अभी तक वहां के लोगों का पूर्ण विस्थापन नहीं हुआ है. तो हम कैसे मान लें कि पंचेश्वर में विस्थापन होगा?  सरकार का बड़े बाँध बनाने का उद्देश्य ज्यादा बिजली उत्पादन करना है किन्तु ग्लोबल वार्मिंग की वजह से नदियों में पानी घट रहा है. भागीरथी में पानी कम होने की वजह से टिहरी बाँध अपनी क्षमता से आधी भी बिजली उत्पादन नहीं कर पा रहा है. इसी प्रकार पंचेश्वर में भी ऐसा ही होगा लेकिन सरकार वर्तमान पानी की उपलब्धता के आधार पर बिजली उत्पादन के आंकड़े दे रही है . (अरविंद दरमोड़ा का साक्षात्कार यहाँ देखें).

overview of pancheswar
पंचेश्वर बाँध का गूगल दृश्य (फोटो साभार: गूगल अर्थ)

इसी प्रकार एनजीओ “प्रकृति पर्यावरण संस्था” से जुड़ी बीना चौधरी कहती हैं(बीना चौधरी का साक्षात्कार यहाँ देखें) कि पंचेश्वर बाँध बनाने का उद्देश्य सिंचाई के लिए पर्याप्त जल जमा करना है. जब नदियों में पानी ही नहीं होगा तो सिंचाई कैसे होगी और पंचेश्वर बाँध बना कर कौन सी सिंचाई के लिए पानी जमा किया जायेगा?  पहले भी मैदानी क्षेत्रों में सिंचाई होती थी, जैसे की तालाबों से. इसी प्रकार के पारंपरिक सिंचाई के साधनों का विकास किया जाना चाहिए. टिहरी परियोजना की तुलना में उत्तर प्रदेश में जल संग्रहण से, 30 गुना ज्यादा सिंचाई की जा सकती है (रिपोर्ट यहाँ उपलब्ध है पेज 91 पैरा 2) तो पंचेश्वर जैसे बाँध की आवश्यकता नहीं होगी. आगे बीना चौधरी कहती हैं कि बाँध बनने से पहले स्थानीय लोगों का फर्जी सर्वे किया जाता है. बाँध बनने के दुष्प्रभाव स्थानीय लोगों को नहीं बताये जाते हैं. उनके जनप्रतिनिधियों को कंपनियों द्वारा लालच देकर बाँध के पक्ष में कर लिया जाता है. यदि स्थानीय जनता को बांधों के दुष्प्रभाव की सही जानकारी होगी, तो वे पंचेश्वर जैसे बांधों का समर्थन नहीं करेंगे. जिन लोगों की जमीनों और घरों पर यह बाँध बनेगा उन लोगों को पैसा और अन्य स्थानों पर जमीनें दे कर खुश कर दिया जायेगा. चूँकि इन लोगों को इस बाँध से होने वाले वास्तिक दुष्प्रभावों की जानकारी नहीं दी जाती है इसलिए उन लोगों को इन दुष्प्रभावों की जानकारी नहीं होती है. अतः वे लोग किस आधार पर इस बाँध का विरोध करेंगे?

प्रसिद्द भू-वैज्ञानिक और फॉर्मर वाईस चांसलर कुमाऊं विश्वविध्यालय, खड़ग सिंह वल्दिया जी नें माना था कि बड़े बाँध हिमालयी राज्यों में बहुत नुक्सान दायक हैं. (इसका उल्लेख यहाँ देख सकते हैं) फिर क्यूँ टिहरी परियोजना से तीन गुना बड़ी परियोजना बनाई जा रही है?

पंचेश्वर बाँध से न तो पर्याप्त बिजली बनेगी, न ही यह सिंचाई का समाधान है. बिजली के लिए सौर ऊर्जा, तथा सिंचाई के लिए जल संग्रहण करना चाहिए. जब हमारे पास बिजली और सिंचाई के बेहतर विकल्प मौजूद हैं तो यह बड़ी परियोजनाएँ किसे फायदा पहुँचाने के लिए बनाई जा रही हैं?


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