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टिहरी झील में मीथेन की मात्रा जांचते नीरी के वैज्ञानिक

मृत पशुओं, पेड़ों, पौधों और अन्य कार्बनिक पदार्थ नदी के प्रवाह के साथ पनबिजली परियोजनाओं द्वारा बनाये गये जलाशयों में नीचे बैठ कर सड़ने लगते हैं. शुरू में वे पानी में उपलब्ध ऑक्सीजन का इस्तेमाल करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का उत्सर्जन करते हैं. लेकिन जब पानी में ऑक्सीजन समाप्त हो जाती है, तो वे मिथेन (CH4) गैस का उत्सर्जन करते हैं जो कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में अधिक हानिकारक होती है. नागपुर स्थित नेशनल इन्वोर्मेंट इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (NEERI) ने टिहरी जलाशय से उत्सर्जन का अध्ययन किया है. वे कहते हैं कि: "ग्रीनहाउस गैस, अर्थात CO2 और CH4 का उत्सर्जन, जलाशय में जलमग्न वनस्पति के माध्यम से आने वाले आने वाले जैविक पदार्थों के कारण अधिक होने की संभावना है. जलाशय से कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन का उत्सर्जन स्तर क्रमशः 2550 और 24 मिलीग्राम प्रति वर्ग मीटर "प्रति दिन" होता है. (एनईईआरआई रिपोर्ट यहां उपलब्ध है पृष्ठ 5, पैरा 5). यह स्पष्ट है कि टिहरी जलाशय के नीचे स्थित पानी मर चुका है. इसमें ऑक्सीजन नहीं है. बिजली पैदा करने के बाद टिहरी से जो पानी छोड़ा जाता है उसमे ऑक्सीजन नहीं होती है और वह मृत पानी होता है.

इंटरनेशनल रिवर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ब्राजील में बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं से ग्रीनहाउस गैस का कुल उत्सर्जन 2 किलो कार्बन प्रति किलोवाट बिजली से अधिक है (रिपोर्ट यहां उपलब्ध है - तालिका 1). इसकी तुलना में कोयले से केवल 0.95 किग्रा प्रति किलोवाट बिजली का उत्सर्जन होता है. (संदर्भ के लिए संलग्न रिपोर्ट - पृष्ठ 8) है। इसलिए, थर्मल प्लांटों की तुलना में बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं कार्बन उत्सर्जन में और अधिक बढ़ जाती हैं.

सरकार गंगा की सहायक नदियों पर लखवार, व्यासी और पंचेश्वर जैसे बड़े बांधों का निर्माण कर रही है. इन परियोजनाओं से मरा हुआ पानी छोड़ा जायेगा तो गंगा साफ़ कैसे होगी?


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