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उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गंगा और यमुना नदियों को जीवित व्यक्ति घोषित कर दिया है. यह निर्णय 15 मार्च, 2017 को न्यूजीलैंड संसद द्वारा पारित एक विधेयक (वाँगनूई नदी) का हवाला देकर लिया गया.

वहाँ माओरी जनजाति 1870 से वांगनुइ नदी के संरक्षण के लिए आंदोलन कर रहे थे. अब वाँगनूई नदी को एक कानूनी व्यक्ति के रूप में सभी अधिकार दे दिए गए हैं. एक नदी को कानूनी व्यक्तित्व देने का दृष्टिकोण अद्वितीय है. दो अभिभावकों को वांगनुई नदी का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया,एक सरकार और दुसरा माओरी जनजाति.

हम यहां न्यूजीलैंड संसद की रिपोर्ट देख सकते हैं. न्यूजीलैंड संसद के इस अधिनियम का संज्ञान लेते हुए उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने कहा कि गंगा और यमुना को कानूनी व्यक्तित्व घोषित किया जाना चाहिए. उच्च न्यायालय ने नमामी गंगा प्रोजेक्ट के महानिदेशक, उत्तराखंड के मुख्य सचिव और उत्तराखंड के महाधिवक्ता को गंगा का प्रतिनिधित्व करने के अधिकार दिए हैं. उच्च न्यायालय के फैसले को यहां संलग्न किया गया है. न्यूजीलैंड संसद और उत्तराखंड उच्च न्यायालय के दृष्टिकोण में मौलिक अंतर है. न्यूजीलैंड संसद ने सरकारऔर माओरी जनजाति को नदी का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार दिया. इसके विपरीत, उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने केवल सरकारी अधिकारियों को यह अधिकार दिया है. इन सरकारी लोगों के पास पहले से ही कई अधिकार मौजूद हैं. उदाहरण के लिए, मंत्रिमंडल ने नमामि गंगा परियोजना के महानिदेशक को नदी में प्रदुषण फ़ैलाने वालों पर दंड लगाने का अधिकार पहले से ही दिया है जैसा कि नीचे की समाचार में देखा गया है.

“द हिन्दू” की रिपोर्ट 22 SEP 2016

अगर ये अधिकारी सक्रिय होते तो गंगा मरने की कगार पर नहीं होती. उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गंगा को वास्तव में उन लोगों का बंदी बना दिया जो पहले ही उसके नुकसान के लिए जिम्मेदार हैं. श्री नरेंद्र मोदी से हमारा विनम्र अनुरोध है कि गंगा के संरक्षण के लिए वास्तव में काम कर रहे गैर-सरकारी लोगों को गंगा का प्रतिनिधित्व करने वाले क़ानून में संशोधन करें.

 


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