गंगा की अविरलता का लाभ

गंगा के प्रति देश के लोगों की श्रद्धा है. इस श्रद्धा का आर्थिक मूल्यांकन कैसे किया जाए? इस सम्बन्ध में आई.आई. टी. रुड़की के प्रोफेसर डॉ रजत अग्रवाल नें एक अध्ययन किया.

आई.आई. टी. रुड़की द्वारा गंगा की अविरलता का अध्ययन

डॉ रजत अग्रवाल बताते हैं कि गंगा की अविरलता को बनाये रखने के लिए लोग आर्थिक रूप से अपना कितना योगदान दे सकते हैं यह जांचने के लिए मैंने पूरे देश में एक अध्ययन किया. इस अद्ययन के लिए हमने “प्रोजेक्ट टाइगर” को आधार बनाया. देश को बाघ से कोई आर्थिक लाभ नहीं मिलता है. किन्तु अगर उन्हें मालूम हो कि जंगल में बाघ घूम रहा हो तो उनके लिए हर्ष का विषय होता है. अगर पूछा जाए कि वे टाइगर के संरक्षण के लिए कितना पैसा देने को तैयार हैं, तो सभी लोग कुछ न कुछ देने को तैयार रहते हैं. इस रकम को बाघ के जीवित रहने अथवा बाघ का गैर-उपयोगी मूल्य माना जा सकता है. इसका रकम का आकलन लोगों की रकम देने की स्वीकारता अथवा  विलिंगनेस टू पे से किया जा सकता है.

बाघ को जीवित रखने के लिए लोग रकम देने को तैयार हैं.

इसी प्रकार हम पता लगा सकते हैं कि यदि गंगा अविरल बहती रहे तो लोग इसके लिए कितनी रकम देने को स्वीकार करते हैं. यह रकम गंगा की अविरलता का गैर-उपयोगी मूल्य होगा. गंगा के उपयोग जैसे उससे पीने का पानी लेने का मूल्य इसके अतरिक्त होता है.

इस स्टडी को हमने आई आई टी के छात्रों के माध्यम से पूरा किया. कुछ मानक बनाये गए जिसके माध्यम से यह पता चल सके कि गंगा के अविरल बहने से हमें कितना लाभ होता है.

इस प्रोजेक्ट के तहत हमने लगभग 1200 लोगों का सैंपल इकठ्ठा किया. इनमे कुछ लोग गंगा नदी के तटीय क्षेत्रों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, उत्तराखंड आदि से थे. लेकिन  ज्यादातर लोग उन राज्यों से थे जिनका गंगा से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है जैसे कि पश्चिमी एवं दक्षिणी भारत के राज्यों द्वारा. इस स्टडी में अनेक मानकों जैसे पुरुषों एवं महिलाओं की संख्या, उनकी उम्र, लोगों की आय, विलिंगनेस टू पे आदि का डाटा लिया गया.

गंगा की अविरलता बयाने रखने के लिए के लिए लोग रकम देने को तैयार हैं.

डाटा में सबसे महत्वपूर्ण बात निकलकर यह आई कि देश में जो लोग गंगा से दूर हैं वे लोग गंगा के संरक्षण के लिए ज्यादा उत्सुक हैं बजाय कि उन लोगों के जो गंगा के तटीय राज्यों में रहते हैं. अर्थात जो गंगा से सीधे आर्थिक लाभ ले रहे हैं वे गंगा के संरक्षण के प्रति ज्यादा चिंतित नहीं दिखते हैं. दक्षिण के कुछ प्रान्तों जैसे आँध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक एवं केरल से लिए गए आंकड़ों के अनुसार वहां पर हर परिवार 750 रुपये वार्षिक गंगा के संरक्षण को देने के लिए तैयार है.

दक्षिण के प्रान्तों का हर परिवार 750 रुपये वार्षिक गंगा के संरक्षण को देने के लिए तैयार है.

हमारे डाटा में 1253 लोगों के आंकड़े लिए गए हैं जिसमे से 900 परिवार ऐसे हैं जिन्होंने कभी न कभी गंगा में आकर स्नान किया है और जिन्होंने गंगा के बारे में केवल सुना हुआ है. 1253 लोगों में से लगभग 1100 लोग हिंदू धर्म को मानते थे जबकि 353 लोग अन्य धर्मो को मानते थे. हिन्दू धर्म के अलावा भी अन्य धर्मो के लोग गंगा के संरक्षण की लिए दान करने को तैयार थे.

कई लोग ऐसे हैं जिनकी वार्षिक आय दस लाख से अधिक है लेकिन वे गंगा के संरक्षण के लिए मात्र 100 रुपये प्रति वर्ष देने को तैयार हैं जबकि कई लोग ऐसे हैं जिनकी वार्षिक आय 2 से 4 लाख है किन्तु वे गंगा के संरक्षण के लिए 1000 रुपये प्रति वर्ष देने को तैयार हैं.

गंगा की अविरलता का लाभ 19,500 करोड़ रूपए प्रति वर्ष है

इस प्रकार गंगा की अविरलता का गैर-उपयोगी मूल्य विशाल है और छोटे आर्थिक लाभ के लिए गंगा का दोहन अनुचित है.